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खुशहाली एवं समृद्धि का प्रतीक हरेली एवं हरेला त्यौहार

भारत कृषि प्रधान देश होने के साथ – साथ उत्सव प्रधान भी है। यहाँ अधिकतर त्यौहार कृषि कार्य पर आधारित हैं, प्रत्येक त्यौहार किसी न किसी तरह कृषि कार्य से जुड़ा हुआ है। छत्तीसगढ़ में जब धान की बुआई सम्पन्न हो जाती है तब सावन माह की अमावश को कृषि उपकरणों एवं कृषि में कार्यरत गौधन के प्रति आभार व्यक्त करने का त्यौहार हरेली मनाया जाता है। इसी तरह उत्त्तराखंड एवं हिमाचल में हरेला पर्व भी मनाया जाता है जो कि कृषि कार्य से जुड़ा हुआ है।

हरेला पर्व

हरेला का मतलब है ‘हरे रंग का दिन’। साथ ही भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करने के लिए श्रावण के महीने में इसे मनाया जाता है। हरेला पर्व साल में तीन बार मनाया जाता है। पहला – चैत्र मास, दूसरा – सावन मास और तीसरा – आश्विन (क्वार) मास में।

हरेला पर्व खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक होता है इसलिए उत्तराखंड वासियों द्वारा इस पर्व की शुरुआत सुबह स्नान करने से की जाती है। हरेला पर्व से नौ दिन पहले ही सभी लोगों द्वारा अपने घरों में एक टोकरी में मिट्टी लेकर उसमें सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं जो कि हरेला पर्व के आने तक उग कर तैयार हो जाते हैं।

हरेला बोने के लिए टोकरी अथवा फैले हुए पात्र में मिट्टी डालकर गेहूँ, जौ, धान, गहत, मक्का, उड़द तथा सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों को बोया जाता है। शहरी श्रद्धालु इन बीजों की उपलब्धता के अभाव में गेहूँ, जौ एवं मक्का को ही बो लेते हैं। इन उगे हुए छोटे-छोटे पौधों को ही हरेला कहा जाता है। कर्क संक्रांति अर्थात हारेला के दिन इन बोए हुए अनाजों के अंकुरित पौधों को परिवार के सदस्यों द्वारा शिरोधार किया जाता है।

नौवें दिन इसकी गुड़ाई की जाती है और दसवें दिन यानी कि हरेला पर्व के दिन काटा जाता है। विधि-विधान एवं नियम अनुसार घर के बुजुर्गों द्वारा सुबह पूजा पाठ करके हरेले को देवी देवताओं को चढ़ाया जाता है। घर के बुजुर्गों द्वारा सभी सदस्यों को हरेला लगाया जाता है और परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा बुजुर्गों से आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। आशीर्वाद देते समय घर के बुजुर्गों द्वारा विशेष प्रकार का लोक गीत गाया जाता है। इसी के साथ ही सभी लोग मिलकर भगवान से परिवार की खुशहाली के साथ सुख समृद्धि की कामना करते हैं।

मिश्रित अनाज को देवस्थान में उगाकर कर्क संक्रांति के दिन हरेला काट कर यह त्योहार मनाया जाता है। जिस तरह मकर संक्रांति से सूर्य भगवान उत्तरायण हो जाते हैं और दिन बढ़ने लगते हैं, वैसे ही कर्क संक्रांति से सूर्य भगवान दक्षिणायन हो जाते हैं। कहा जाता है कि इस दिन से दिन रत्ती भर घटने लगते है। इस तरह रातें बड़ी होती जाती हैं।

उत्तराखंड में हरेला पर्व बड़ी ही आस्था और भक्ति भावना के साथ मनाया जाता है। यह दिन सभी लोगों के लिए बड़ा ही हर्ष और उल्लास का का होता है। इस लिए पहाड़ों से शहरों तक यह पर्व बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है।\हरेला पर्व पर्यावरण संरक्षण का त्यौहार है.। इस त्यौहार को मनाने से समाज कल्याण की भावना विकसित होती है।

इस लोकपर्व पर वृहत वृक्षारोपण का भी आयोजन किया जाता है। छत्तीसगढ़ का लोक पर्व हरेली और उत्तराखंड का लोक पर्व लोकपर्व हरेला सीधे तौर पर प्रकृति से जुड़ा हुआ है जिस कारण इसे प्रकृति पूजन का पर्व भी कहा जाता है।

हरेली तिहार

हरेली त्यौहार एक कृषि त्यौहार है। हरेली का मतलब हरियाली होता है, जो हर वर्ष सावन महीने के अमावस्या में मनाया जाता है। हरेली मुख्यतः खेती-किसानी से जुड़ा पर्व है। छत्तीसगढ़ राज्य में ग्रामीण किसानों द्वारा बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस त्यौहार के पहले तक किसान अपनी फसलों की बोआई या रोपाई कर लेते हैं और इस दिन कृषि संबंधी सभी यंत्रों जैसे – हल, गैंती, कुदाली, फावड़ा समेत कृषि के काम आने वाले सभी तरह के औजारों की साफ-सफाई कर उन्हें एक स्थान पर रखकर उसकी पूजा-अर्चना करते हैं।

घर में महिलाएं तरह-तरह के छत्तीसगढ़ी व्यंजन खासकर गुड़ का चीला बनाती हैं। हरेली में जहाँ किसान कृषि उपकरणों की पूजा कर पकवानों का आनंद लेते हैं, आपस में नारियल फेंक प्रतियोगिता करते हैं, वहीं युवा और बच्चे गेड़ी चढ़ने का आनंद लेते हैं।

छत्तीसगढ़ की ग्रामीण कृषि संस्कृति,परंपरा एवं आस्था सदियो पुरानी है।प्रकृति जब हरियाली रूपी चादर को ओढ़ती है तो किसानो के चेहरे पर भीनी मुस्कान श्रम की सारी थकान को मिटा देती है।वे धरती माता के साथ कृषि यंत्रों की भी पूजा करते है

छत्तीसगढ़ में हरेली तिहार को गेड़ी तिहार के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गेड़ी का खासा महत्व होता है. गेड़ी चढ़ना अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है. लेकिन धीरे-धीरे यह परंपरा अब कम होती जा रही है, माना जाता है कि पुरातन समय में जब गलियां केवल मिट्टी की हुआ करती थी तो भरी बरसात में होने वाला त्यौहार हरेली में कीचड़ से भरी गलियों में बिना जमीन में पैर रखे बिना कीचड़ लगे गेड़ी दौड़ होती थी। 

हरेली त्यौहार के दिन गांव के पुजारी बैगा घर घर जाकर दशमूल पौधा एवं भिलवा पत्ते आदि को घर मुख्य दरवाजे पर बांधते हैं एवज में पुजारी बैगा को अन्न भेंट किया जाता है। छत्तीसगढ़ की प्राचीन लोककला सावनाही भित्तिचित्र कला में उकेरी जाने वाली प्रमुख आकृतियों में प्रकृति और संस्कृति का सुंदर संयोजन देखने को मिलता है। इसमें नदी, समुद्र की लहरें, संस्कृति से जुड़ी विभिन्न् आकृतियां, कमल, घड़ा, गाय के खुर, कुम्हड़ा चानी, कांदा पान, कुसियारी, पुरइन पान, पिड़हाई, गुरबारी शंख, चक्रआदि शामिल हैं।

हरेली त्यौहार में बनाए जाने वाले व्यंजन छत्तीसगढ़ लोक पर्व के साथ लोग व्यंजनों के लिए भी जाना जाता है छत्तीसगढ़ में हरेली के लिए भी कुछ खास व्यंजन हर घर में पकाए जाते हैं जैसे गुड़ के चीले और गुलगुला भजिया। किसान अपनी अच्छी फसल की कामना करते हुए कुल देवता एवं ग्राम देवता की पूजा करते हैं।

हरेला पर्व हरेली तिहार दोनों ही खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक हैं। इस लोकपर्व पर वृहत वृक्षारोपण का भी आयोजन किया जाता है। छत्तीसगढ़ का लोक पर्व हरेली और उत्तराखंड का लोक पर्व लोकपर्व हरेला सीधे तौर पर प्रकृति से जुड़ा हुआ है जिस कारण इसे प्रकृति पूजन का पर्व भी कहा जा सकता है।

आलेख

डॉ अलका यतींद्र यादव बिलासपुर छत्तीसगढ़

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