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गोवा मुक्ति संग्राम में स्वयंसेवकों की भूमिका

गोवा मुक्ति दिवस 19 दिसंबर 1961

भारत को जिस स्वरुप और जिन भौगोलिक सीमाओं को वर्तमान में हम देख पा रहे है वह स्वतन्त्रता प्राप्ति के बहुत बहुत बाद तक चले संघर्ष और एकीकरण के अनथक चले अभियान का परिणाम है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी बहुत से क्षेत्र ऐसे बाकी थे जिन पर स्वाभाविक और नेसर्गिक तौर पर भारतीय गणराज्य का शासन होना ही चाहिए था।

कहना न होगा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और स्वतन्त्रता के जो अर्थ भारतीय इतिहासकारों ने निकाले और जिस रूप में भारतीय को सत्ता हस्तांतरित की गई वह सब एक षड्यंत्र से कम और कुचक्र से अधिक कुछ नहीं था।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विषय में हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जब भी चर्चा करते है तो वर्तमान भारतीय भूगोल के कुछ भूभागों पर स्पष्ट और घोषित रूप से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की अमिट छाप पाते है।

आर एस एस और इस राष्ट्र के लाखों राष्ट्रवादियों के ह्रदय में विभाजित भारत के जो घाव यदा कदा हरे होते रहते थे (और रहते है) का ही परिणाम था कि अंग्रेजो के जाने के बाद भी इन राष्ट्रवादियों द्वारा कुछ तत्कालीन ओपनिवेशिक क्षेत्र जो कि फ़्रांस या पुर्तगाल के कब्जे में थे, के लिए संघर्ष चलता रहा और इन क्षेत्रों में विदेशी शासन खत्म होकर ये क्षेत्र भारतीय गणराज्य का भाग बनते गए और इन पर भारतीय सुशासन स्थापित होता गया।

संघ के इस अभियान का ही एक ज्वलंत उदाहरण है दादरा नगर हवेली जहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ 1954 में भारत को स्वतंत्र हुए 7 वर्ष हो चुके थे, अंग्रेजों के जाने के साथ ही फ़्रांस ने एक समझौते के अंतर्गत पुडुचेरी आदि क्षेत्र भारत सरकार को दे दिए, किन्तु अंग्रेजों के पूर्व आए पुर्तगालियों ने भारत के अनेक क्षेत्रों में अपना शासन अक्षुण्ण रखा।

पुर्तगालियों ने अपने कब्जे के क्षेत्रों में चल रहे डा. राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में चल रहे सत्याग्रह को कुचलने का निर्णय लिया और इस हेतु भारी मात्र में सैनिको और शस्त्रों की तैनाती की गई। गोवा, दीव-दमन और दादरा नगर हवेली के स्वतंत्र होने की आशा क्षीण होने लगी थी। स्वतंत्रता मिलने के बाद भी हमारी मातृभूमि का कुछ हिस्सा परतंत्र था, इसका दु:ख सबको था।

ऐसे समय में कुछ राष्ट्रवादी संगठन के कार्यकर्ताओं ने “आजाद गोमान्तक दल’ की स्थापना कर इस दिशा में प्रयत्न किया। इन देशभक्तों की योजना से तत्कालीन केन्द्रीय सरकार साशय अपने आप को अलग रख रही थी। दिल्ली की बेरुखी के चलते हुए भी गोमांतक सेना ने हिम्मत नहीं हारी और इस अभियान के अंश रूप में महाराष्ट्र-गुजरात की सीमा से लगा दादरा नगर हवेली का एक हिस्सा लक्ष्य रूप में निश्चित किया गया।

शिवशाहीर बाबा साहब पुरन्दरे, संगीतकार सुधीर फड़के, खेलकूद प्रसारक राजाभाऊ वाकणकर, शब्दकोश रचयिता विश्वनाथ नरवणे, मुक्ति के पश्चात्‌दादरा नगर हवेली के पुलिस अधिकारी बने नाना काजरेकर, पुणे महानगर पालिका के सदस्य श्रीकृष्ण भिड़े, नासिक स्थित भोंसले मिलिट्री स्कूल के मेजर प्रभाकर कुलकर्णी, ग्राहक पंचायत के बिन्दु माधव जोशी, पुणे विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्रीधर गुप्ते आदि नवयुवक ही थे।

मन में पुर्तगालियों की परतंत्रता की पीड़ा लिए यह दल उस समय रा.स्व. संघ के महाराष्ट्र प्रमुख बाबाराव भिड़े व विनायक राव आप्टे से मिला और उन्हें सशस्त्र क्रांति की योजना बताई। इसके पश्चात संघ के नतृत्व में एक व्यवस्थित, गुप्त, सशस्त्र संघर्ष की योजना बनाई गई। दादरा नागर हवेली को मुक्त करने के इस अभियान को पूर्ण और सफल करने के लिए धन की आवश्यकता स्वाभाविक तौर पर थी जिसके लिए सुधीर फडके ने बीड़ा उठाया।

फडके ने स्वर सम्राज्ञी लता जी से संपर्क कर एक कार्यक्रम आयोजित करने का निवेदन पूरा विषय बताते हुए किया जिसे लता जी ने तुरंत स्वीकार कर लिया। लता दीदी का संगीत कार्यक्रम पुणे के हीरालाल मैदान में हुआ जिससे बहुत धन एकत्रित हुआ किन्तु वह भी कम पड़ा अतः स्थानीय स्तर पर नागरिको और संगठनों समितियों आदि का उपयोग इस हेतु किया गया।

धन, साधन, संसाधन इकट्ठा करने के बाद इस योजना को कार्य रूप देने के लिए 31 जुलाई, 1954 को मूसलाधार वर्षा में लगभग दो सौ युवकों का जत्था दादरा नगर हवेली की राजधानी सिलवासा की ओर रवाना हुआ। यह सशस्त्र जत्था कहाँ, क्यों, किसलिए जा रहा था किसी को पता नहीं था।

इस विषय में केवल एक वाक्य इस जत्थे ने सुना और कहा था जो कि बाबाराव भिड़े आप्टे के मुखारबिंद से निकला वह था -”वाकणकर जी के साथ जाइए।” आश्चर्यजनक रूप से इस वाक्य को आदेश मानकर सैकड़ों नवयुवक अनुशासित सैनिक की भांति दादरा नागर हवेली कि ओर कूच कर चले।

विष्णु भोपले, धनाजी बुरुंगुले, पिलाजी जाधव, मनोहर निरगुड़े, शान्ताराम वैद्य, प्रभाकर सिनारी, बालकोबा साने, नाना सोमण, गोविन्द मालेश, वसंत प्रसाद, वासुदेव भिड़े एवं उनके साथी साहसी तरुणों ने अपने नेता के पीछे चलकर प्राणों को तो बलि पर चढाया किन्तु इस पुर्तगाल शासित क्षेत्र पर भारतीय ध्वजा फहरा दी।

किसी ने भी अपने स्वजनों को यह नहीं बताया कि वे जा कहां रहे हैं तथा कब आएंगे। घर जाएंगे तो अनुमति नहीं मिलेगी, इस डर से कुछ लोग सीधे स्टेशन चले गए। सशस्त्र आन्दोलन कैसे करना है, इसकी जानकारी किसी को भी नहीं थी, फिर भी वे अपने अभियान में सफल रहे।

राजाभाऊ वाकणकर, सुधीर फड़के, बाबा साहब पुरन्दरे, विश्वनाथ नरवणे, नाना काजरेकर आदि इस आन्दोलन के सेनानी थे, उन्होंने उस क्षेत्र में रहकर संग्राम स्थल की सारी जानकारी प्राप्त कर ली थी। विश्वनाथ नरवणे गुजराती अच्छी बोलते थे। उन्होंने स्थानीय जनता से गुप्तरूप में मिलकर बहुत जानकारी प्राप्त की थी।

राजाभाऊ वाकणकर ने कुछ पिस्तौलें एवं अन्य शस्त्र जमा कर लिए थे। इस प्रकार युद्धस्थल की छोटी-छोटी जानकारी, शस्त्र सामग्री एवं पैसा इकट्ठा होने के पश्चात्‌श्री बाबाराव भिड़े ने पुणे से तैयार हो रहे जत्थे के सैनिको को प्रतिज्ञा दिलाई। स्पष्ट शब्दों में सूचनाएं दीं और “मेरा रंग दे बसंती चोला’-गीत गाते-गाते रा.स्व. संघ के संस्कारों से संस्कारित देशभक्तों की टोली अदम्य साहस के साथ निकल पड़ी।

31 जुलाई की रात को सिलवासा पहुंचकर सभी अंधेरे और मूसलाधार वर्षा में सावधानीपूर्वक आगे बढ़ने लगे और पुर्तगाली मुख्यालय के परिसर में आते ही योजनानुसार पटाखे फोड़ने लगे, पुर्तगाली सैनिकों को वह आवाज बन्दूकों की लगी, अचानक बने भयभीत कर देने वाले वातावरण से वे सहम गए। इसके बाद जो हुआ वह पुर्तगालियों के पतन की कहानी बना।

“आजाद गोमान्तक दल जिन्दाबाद, भारत माता की जय’- के जयघोष के साथ युवकों के कई दल वहाँ प्रवेश कर गए। इस दौरान विष्णु भोपले ने एक पुर्तगाली सैनिक का हाथ काट डाला, यह देखकर बाकी सैनिक डर गए और इन सैनिकों ने शरण मांग ली।

इन वीरों ने पुलिस चौकी एवं अन्य स्थानों से पुर्तगाली सैनिकों की चुनौती को समाप्त किया और 2 अगस्त की सुबह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेतृत्व में दादरा नागर हवेली गए राष्ट्रभक्त युवकों के दल ने वहाँ से पुर्तगाली शासन के झंडे को उतारकर भारत का तिरंगा फहरा दिया।

राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत स्वयंसेवकों के इस दल ने दादरा नागर हवेली के भारतीय गणराज्य में विलय के बाद भी सावधानी रखते हुए इस क्षेत्र से वापिस कूच नहीं किया बल्कि 15 अगस्त तक वहीँ रहकर स्वतंत्रता दिवस की परेड और तिरंगा ध्वजारोहण कराकर ही वापिस लौटे और इस प्रकार दादरा नागर हवेली के भारत गणराज्य में विलय का अध्याय पूर्ण हुआ।

आज उस घटना की वर्षगाँठ पर गोमांतक सेना के सभी जवानों का कृतज्ञ राष्ट्र गौरवपूर्ण स्मरण करता है और ऐसे वीर पुनः पुनः इस धरती पर जन्मे और इस भारत भूमि की मान प्रतिष्ठा वृद्धि करें यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी. पुनः स्मरण एवं शत शत नमन।

आलेख

श्री प्रवीण गुंगनानी
बैतुल, मध्य प्रदेश

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