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मिट्टी की गुणवत्ता एवं जैव विविधता का संरक्षण आवश्यक

हमारी धरती धन-धान्य से सदैव भरी रहे अक्षय रहे अक्षय तृतीया का पर्व इन्हीं महत्व को उजागर करता है। छत्तीसगढ़ में अक्ती त्यौहार के साथ खेती किसानी की शुरुआत होती है। किसान अच्छी फसल के लिए धरती माता, बैल, खेती-बाड़ी के औजार और बीजों की पूजा अर्चना कर आशीर्वाद लेते हैं। अक्षय तृतीया के दिन स्वयंसिद्ध मुहूर्त होता है इस कारण सारे कार्यों की शुरुआत होती है। शादी विवाह का विशेष मुहूर्त होता है।

जैविक खेती की पहल-

धरती माता की रक्षा की शपथ लेकर जैविक खेती को बढ़ाना बढ़ावा देना ताकि मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनी रहे। मिट्टी को पुनर्जीवन देने के लिए वर्मी कंपोस्ट, गोमूत्र आदि का उपयोग कर जैविक खेती को बढ़ावा देना देने की शुरुआत की गई है। रासायनिक खाद, कीटनाशकों से विषाक्त होती धरती और उस पर उपजने वाली फसलें विषाक्त हो रही हैं। हमारा भोजन जहर भरा हो चला है जो अनेक रोगों का जिम्मेदार है। मानव जीवन को सुखमय बनाने की पर्यावरणीय पहल की शुरुआत छत्तीसगढ़ में अक्ती त्यौहार से प्रारंभ होती है।

मिट्टी जीवन्त है जो चराचर जगत को सहेजती है।

पंचमहाभूत में से एक जो हमें भोजन प्रदान करती है। जहरीले रसायनों, कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से जमीन बंजर हो रही है। ऐसी जमीन पर उगने वाली फसलें भी विषाक्त हो रही है। समूचा पर्यावरण, पंचमहाभूत भी ऐसी विषाक्तता से अछूते नहीं हैं। पूरी दुनिया मिट्टी में व्याप्त विषाक्तता के खतरे से जूझ रही है।

संकट से बचाव की पहल-

मिट्टी को पूजने की हमारी प्राचीन परम्परा रही है। विश्व पर्यावरण दिवस पर मिट्टी को पुनर्जीवन देने का आव्हान किया गया है ताकि आमजन मिट्टी की अहमियत जाने, विषाक्त होती मिट्टी को बचाने की पहल करें। धरती माता की पूजा अर्चना करते हुए जब हम मिट्टी को पुनर्जीवन देते हुए जैविक खेती किसानी को अपनाने की ओर क़दम रखेंगे तो हर और सुख समृद्धि का वातावरण बनेगा।

धरती ही अक्षय है जो हमें माता जैसा स्नेह अपनी फसलों से देती है। पांडव वनवास काल के दौरान भूखे थे, ऐसे समय में दुर्वासा ऋषि अपने संतों के साथ भोजन के लिए जा पहुंचे थे। भोजन संकट से उबरने के लिए युधिष्ठिर ने भगवान सूर्य से प्रार्थना की, जिन्होंने अक्षय पात्र दिया कि सभी अतिथि के लिए भोजन उपलब्ध होगा। श्री कृष्ण ने इस पात्र को द्रौपदी के लिए अक्षय बना दिया जो जगत को तृप्त कर सके। प्रकारान्तर से धरती माता ही अक्षय है जो युगों युगों से संपूर्ण जगत को भोजन प्रदान कर रही है। हमारा पोषण करती धरती की रक्षा हम करें ताकि वह हमारा और हमारी पीढ़ियों का सतत् पोषण करती रहे।

पृथ्वी पर मौजूद जीवन-

जंतु, पशु -पक्षी का अपना एक विशेष महत्व है और वे सभी एक दूसरे पर अवलंबित हैं। प्राकृतिक संसाधन सहित मरुस्थल और हिम आच्छादित पर्वत शिखर, नदियां आदि सब कुछ मानव जीवन के लिए जरूरी है। जीवन की गुत्थियां एक दूसरे पर आश्रित है। किसी एक जीव के खत्म हो जाने के खतरे को आज के वैज्ञानिक समझने लगे हैं। यही कारण है कि धरती के कोने कोने में जैव विविधता संपदा को सहेजा, संवारा जाने लगा है।

विलुप्त होती जैव विविधता-

पृथ्वी पर 5 से 30 मिलियन प्रजातियां होने का अनुमान वैज्ञानिक लगाते हैं। अभी तक 1.5 मिलियन प्रजातियों को ही पहचाना जा सका है। बढ़ता प्रदूषण बढ़ती आबादी और अंधाधुंध विकास से होते विनाश से जैव संपदा को अत्यधिक क्षति पहुंच रही है। दुनिया की ज्यादातर प्रजातियां को हम जान नहीं सके हैं उनके विलुप्त होने का खतरा ज्यादा हो गया है। प्राकृतिक रूप से भी प्रजातियां भी विलुप्त हो रही है। इंसानी हस्तक्षेप के कारण विलुप्तिकरण की दर एक हज़ार से दस हजार गुना ज्यादा हो रही है। प्रजातियों को बचाये रखने के लिए दुनिया में अब बायोस्फीयर रिजर्व स्थापित किए जा रहे हैं।

धरती पर मौजूद पेड़- पौधे और जीव-जंतुओं के बीच संतुलन बनाए रखने तथा जैव विविधता के मुद्दों के बारे में लोगों में जागरूकता और समझ बढ़ाने के लिए हर बरस 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। 22 मई 1992 को नैरोबी एक्ट में जैव विविधता को 193 देशों ने स्वीकार किया और इस दिन को जैव विविधता दिवस घोषित किया।

भारतीय संस्कृति में संरक्षण-

भारतीय संस्कृति में जैव विविधता को बचाए रखने के लिए धार्मिक रूप से विधान बनाए गए हैं। वेद सहि दूसरे धार्मिक ग्रंथों में पेड़ -पौधे, नदी -पहाड़, कुआं- तालाब, पशु -पक्षी, सभी के संरक्षण और संवर्धन के लिए विधान बनाए गए हैं। भारतीय पर्व और त्योहारों में, रीति रिवाजों में प्रकृति को सहेजा गया है। संपूर्ण भूमंडल को एक कुटुंब की संज्ञा दी गई है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति समूची दुनिया से अनूठी है और विश्व को एक समृद्ध दृष्टिकोण भी प्रदान कराती है।

सभी जीवन के लिए-

जैव विविधता दिवस 2022 की थीम है, “सभी जीवन के लिए एक साझा भविष्य का निर्माण।”
हमारी जैव विविधता संपदा तेजी से खत्म हो रही है जिन्हें बचाए रखने के लिए वर्ष 2011-2020 के दशक को यू एन जी ए द्वारा संयुक्त राष्ट्र के जैव विविधता दशक घोषित किया था। ताकि जैव विविधता पर एक राजनीतिक योजना के कार्यान्वयन को बढ़ावा दिया जा सके। प्रकृति के साथ सद्भाव से रहने की समग्र दृष्टि को बढ़ावा दिया जा सके।

भारत की जैव संपदा-

जैव विविधता के नजरिए से भारत एक समृद्ध देश है। विश्व का 2.4 फीसदी भूभाग होने के बावजूद यहां दुनिया की 7-8 प्रतिशत प्रजातियों का पर्यावास है। इन प्रजातियों में 45000 पादप और 91000 जीव- जंतु हैं। दुनिया के 34 जैव विविधता हॉटस्पॉट में से चार भारत में हैं। भारत में जैव विविधता के कई आकर्षक वैश्विक केंद्र हैं।

भारत दुनिया के लिए कई मायनों में उदाहरण माना जा सकता है। जो देश एक अरब 30 करोड़ लोगों की आबादी को स्थाई रूप से भोजन उपलब्ध कराता है यह एक मिसाल है! चुनौतियां भी है कि भूमि, मिट्टी और जल संसाधनों और देश की समृद्ध विविधता को नष्ट किए बिना, शहरों में प्रदूषण की धुंध पैदा किए बिना किस तरह उपलब्धि बरकरार रखी जा सकती है!

भारत के राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की मदद से ग्रामीणों की आजीविका में बेहतरी के लिए नए मापदंड स्थापित किए हैं ।

भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर रहा है जैव विविधता को संजो कर उसे कैसे जीवन्त बनाए रखना है यह भारत की संस्कृति में विद्यमान हैं उसका अनुसरण करते हुए सब का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।

आलेख

श्री रविन्द्र गिन्नौरे
भाटापारा, छतीसगढ़

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One comment

  1. विवेक तिवारी

    अब्बड़ सुग्घर जानकारी👌👌👌

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