संवत् 2082 विक्रमी | पौसा कृष्ण एकादशी | बुधवार
नक्षत्र: अनुराधा | योग: गंड | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जनवरी 2026
शिक्षा : शिक्षा: एम.ए. प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व
प्रमुख रचनाएँ : प्रमुख कार्य: भारतीय कला, संस्कृति और इतिहास-पुरातत्व के क्षेत्र में पिछले 7 वर्षों से कार्यरत हैं।
व्यवसाय : संपादक, दक्षिण कोसल टुडे
पता : रायपुर, छत्तीसगढ़
रत्ती एक पौधे का बीज है, जो आमतौर पर पहाड़ी और वन क्षेत्रों में पाया जाता है। यह प्राचीन भारतीय मापन पद्धति के एक इकाई के रूप में प्रचलित थी। इसका उपयोग आयुर्वेद में किया जाता है। आइए इस बहुमूल्य बीज गूंजा/रत्ती के बारे में जाने।
Read More
क्या लोक कथाएं केवल मनोरंजन हैं या उनमें छिपा है गहरा विज्ञान? सरहुल में घड़े के पानी से बारिश की भविष्यवाणी हो या ऐतिहासिक वीरगाथाएं—हमारी 'वाचिक परंपरा' में पूर्वजों के अनुभव जीवित हैं। पढ़िए कैसे पीढ़ियों से चला आ रहा यह श्रुति ज्ञान हमें हमारे गौरवशाली अतीत और जड़ों से…
Read More
यह लेख “समय” की वैज्ञानिक व सांस्कृतिक महत्ता पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा केवल खगोलीय गणना नहीं, बल्कि सृष्टि, ऋतु परिवर्तन और प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक है। यह पर्व जीवन, कृषि और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है।
Read More
माता भूमि की संतति होकर मानव ने वन से नगर तक की यात्रा की, पर अपनी मूल प्रकृति नहीं छोड़ी। यह आलेख बताता है कि आज का विश्व प्राचीन वनवासियों की प्रकृति-आधारित जीवनशैली का ऋणी है, और क्यों भारतीय संस्कृति आज भी जीवित सभ्यता है। पढ़ने हेतु लिंक देखें।
Read More
भारत की लोक-स्मृति में विविध जनजातियों की उत्पत्ति-कथाएं केवल किंवदंतियाँ नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और एकात्म भाव की जीवित धारा हैं। बैगा से लेकर सवरा तक प्रत्येक कथा प्राचीन भारत के उस सांस्कृतिक सूत्र को प्रकट करती है जो समस्त समाजों को एक ही आध्यात्मिक परंपरा में जोड़ता है। आगे…
Read More
सोलहवीं शताब्दी में पुर्तगालियों के विरुद्ध लगभग चालीस वर्षों तक संघर्ष करने वाली भारत की प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी रानी अब्बक्का चौटा की इस विस्तृत कथा में उनके साहस, सैन्य नेतृत्व, समुद्री रणनीति, प्रशासनिक कुशलता और ऐतिहासिक योगदान का गहन वर्णन किया गया है। यह लेख इस विस्मृत वीरांगना की…
Read More
जनजातीय गौरव दिवस: हमारे महापुरुषों और राष्ट्रीय-गौरव के स्मरण का दिन _जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन महापुरुषों और जनजातीय समाज की सांस्कृतिक विरासत को उत्सव के रूप में मनाने का दिन है। आइये…
Read More
जनजातीय महापुरुषों और सामाजिक गौरव का पुनर्स्मरण: जनजातीय गौरव दिवस जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है। बिरसा मुंडा जी के जन्म दिवस को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रूप में स्वीकार किया गया है। यह दिन केवल…
Read More
यह लेख जनजातीय समाज के जीवन-मूल्यों, देवत्व, न्याय व्यवस्था और सामाजिक संतुलन का विश्लेषण करता है। यह दिखाता है कि जिन्हें पिछड़ा कहा गया, वही समाज आज भी मानवता, समानता और सामूहिक जीवन के उच्चतम आदर्शों को जीवित रखे हुए है।
Read More
यह लेख जनजातीय समाज की ज्ञान परम्परा, तकनीकी कौशल और जीवनदृष्टि पर प्रकाश डालता है। यह दिखाता है कि खनिज, औषधि, स्थापत्य और पर्यावरण-संरक्षण में जनजातीय समाज का ज्ञान आज भी भारत के सतत विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधार बन सकता है।
Read More
अंग्रेजों ने भारत के जनजातीय समाज को “असभ्य” और “पिछड़ा” बताकर जिस दृष्टि से संसार को प्रभावित किया, उसी दृष्टि को हमने भी अपनी मान्यता बना लिया। परिणामस्वरूप वह समाज, जिसे वेदों ने वन्याय नमः कहकर प्रणाम किया, आज संग्रहालय की वस्तु समझा जाने लगा। यह लेख उसी औपनिवेशिक दृष्टि…
Read More
जब हम किसी समाज को समझना चाहते हैं, तो हम सर्वप्रथम उस समाज के इतिहास को देखते हैं। जैसे राजपूतों को समझने के लिए हम इतिहास में उन्हें देखते हैं। हम इतिहास में पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप जैसे शूरवीरों की ओर देखते हैं। मराठों को समझने के लिए वीर शिवाजी…
Read More
जब हम भारत के स्वाधीनता संग्राम की चर्चा करते हैं, तो अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध अपने संघर्ष का ही ब्यौरा देते हैं। इस दौरान हम अपने उस संघर्ष को विस्मृत कर देते हैं, जो हमने 9वीं सदी से 18वीं सदी तक इस्लामी आक्रमणकारियों के विरुद्ध किया था। और अंग्रेजों…
Read More
इतिहास को ठीक-ठीक न जानने के कारण जब हम स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं, तो केवल अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध संघर्ष को ही देखते हैं, और उसमें भी 1857 से 1947 तक का ही। 1857 के संग्राम को ही हम अज्ञानवश भारतीयों द्वारा अंग्रेजों के प्रतिकार का पहला प्रयास…
Read More
यह लेख तुलसी-पूजा को भारतीय प्रकृति-उपासना की जीवंत परम्परा के रूप में प्रस्तुत करता है; सिंधु–वैदिक संकेतों, पौराणिक आख्यानों, गृह-आंगन के तुलसी चौरे, लोक-उत्सवों और आयुर्वेदिक दृष्टि के आधार पर बताता है कि भारतीय संस्कृति में भक्ति, नैतिकता और पारिस्थितिकी एक ही सांस्कृतिक सूत्र में गुँथे हुए हैं।
Read More
अमला नवमी, जिसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है, भारतीय समाज में प्रकृति पूजन की अद्वितीय परंपरा का प्रतीक पर्व है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है, जो भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित माना गया है। वैदिक और पौराणिक काल से चली आ रही…
Read More
भारतीय संस्कृति में सूर्य उपासना की परंपरा अत्यंत प्राचीन और व्यापक रही है। वेदों, पुराणों और लोक परंपराओं में सूर्य को जीवन और ऊर्जा का स्रोत माना गया है। छत्तीसगढ़ में सूर्य उपासना के असंख्य पुरातात्त्विक, अभिलेखीय और लोकसांस्कृतिक साक्ष्य मिलते हैं—सिंघनपुर के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों से लेकर भोरमदेव, सिरपुर, जांजगीर…
Read More
छत्तीसगढ़ में दीपावली पर मनाया जाने वाला गौरा-गौरी उत्सव शिव–पार्वती के दिव्य विवाह का लोक उत्सव है। फूल कूटाई, मिट्टी-जल पूजा, दूधफरा प्रसाद, गड़वा बाजा-अनुष्ठान, सुआ नृत्य और शोभायात्रा से सामाजिक समरसता, प्रकृति उपासना और समृद्धि की कामना झलकती है।
Read More
भारत में शारदीय नवसस्येष्टि (दीपावली) प्रमुख पर्व है, भारतीय संस्कृति का महाउत्सव है। दीपावली भारतीय जीवन-दर्शन के चार प्रमुख पर्वों में से एक है, जो ऋतु परिवर्तन के अवसर पर मनाए जाते हैं।
Read More
नरक चतुर्दशी दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाती है। यह दिन असत्य, अंधकार और नकारात्मकता पर सत्य, प्रकाश और पवित्रता की विजय का प्रतीक है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है, जो आत्मशुद्धि और प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता…
Read More
धनतेरस केवल खरीदारी का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय वैदिक परंपरा में स्वास्थ्य, आयुर्वेद और आत्मचेतना का उत्सव है। इस दिन भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, जो स्मरण दिलाता है कि सच्चा धन सोना-चाँदी नहीं, बल्कि निरोगी शरीर, संतोषी मन और जागृत चेतना है। यमदीपदान, अमृत-कलश और आरोग्य…
Read More
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक संवाद का भी मंच है। इसकी सबसे अनोखी परंपरा मुरिया दरबार है, जहाँ रियासत काल से लेकर आज तक राजा.......
Read More
यह लेख बस्तर दशहरा के प्रमुख अनुष्ठानों और विधियों का विस्तृत परिचय देता है। इसमें ज्योति कलश स्थापना, जोगी बिठाई, बेल-पूजा, मावली माता का आगमन, रथ-यात्रा, महाअष्टमी-नवरात्र अनुष्ठान, भीतर रैनी, मुरिया दरबार और विदाई तक की परंपराओं का वर्णन है। लेख बताता है कि बस्तर दशहरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि…
Read More
बस्तर दशहरा भारत का सबसे लंबा और अनूठा पर्व है, जहाँ शक्ति की उपासना और महिषासुर पर देवी दुर्गा की विजय को अद्वितीय परंपराओं व जनभागीदारी के साथ जीवंत किया जाता है। यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है।
Read More
बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा और विश्व का सबसे लंबा उत्सव है, जो 75 दिनों तक चलता है। देवी दंतेश्वरी को समर्पित यह पर्व शक्ति-उपासना, रथयात्रा और विविध जनजातीय परंपराओं का संगम है। इसकी शुरुआत काकतीय राजा पुरुषोत्तम देव ने 15वीं शताब्दी में की थी। आज भी यह बस्तर…
Read More
यह लेख भारत की उस परंपरा पर प्रकाश डालता है, जिसमें हर भारतीय पितरों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा रखता है। लोक-रीतियों से लेकर शास्त्रीय विधियों तक,यह भाव भारत के विविध समुदायों को एक सूत्र में बाँधता है। पितृ मोक्ष अमावस्या के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण लेख अवश्य पढ़ें।
Read More
क्या आप जानते है, बस्तर में रथ यात्रा का नाम गोंचा पर्व कैसे पड़ा? "गुंडीचा" एक शब्द है, जो ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध रथयात्रा का अभिन्न हिस्सा है....
Read More
पारधी जनजाति मूल रूप से एक खानाबदोश शिकारी, खाद्य संग्राहक घुमंतू जनजाति है। इनका मुख्य कार्य शिकार करना है। जीविकोपार्जन के लिए पारधी जनजाति के लोग शिकार करते हैं। वर्तमान में शिकार पर प्रतिबंध होने के बाद भी ये तीतर, बटेर, घाघर, खरगोश, सियार, लोमड़ी आदि का चोरी छुपे शिकार…
Read More
विश्व में प्राचीन सभ्यताओं का उदय नदियों की घाटी पर हुआ है। आरंभ में आदिम मानव के लिए स्वयं को लंबे समय तक सुरक्षित रख पाना बेहद ही चुनौती पूर्ण था। आदिम मानव का निवास जंगलों में नदी-नालों, झरनों एवं झीलों के आस पास रहा करता था।
Read More
इतिहास में ऐसे नायक बिरले ही होते हैं जो समाज उद्धार के लिए जन्म लेते हैं तथा समाज को अंधेरे से उजाले की ओर लेकर आते हुए तमसो मा गमय की सुक्ति को चरितार्थ करते हैं। अंग्रेजों के संरक्षण में ईसाईयों द्वारा मचाये गये धर्म परिवर्तन अंधेरे को दूर करने…
Read More
दुर्ग से 14 किमी दूरी पर स्थित यह स्थल आध्यात्मिक भावभूमि का परिचय देता है। शिवनाथ नदी के पश्चिमी तट पर स्थित नगपुरा में कलचुरि कालीन जैन स्थापत्य कला का इतिहास सजीव होता है। राष्ट्रीय राजमार्ग 6 से लगी हुई दुर्ग-जालबांधा सड़क पर स्थित श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ का प्रवेश…
Read More
छत्तीसगढ़ में कबीरपंथियों की तीर्थ स्थली दामाखेड़ा, रायपुर बिलासपुर मार्ग पर सिमगा से 10 किमी दूरी पर एक छोटा सा ग्राम है। यह कबीरपंथियों की आस्था का सबसे बड़ा केन्द्र माना जाता है। कबीर साहब के सत्य, ज्ञान तथा मानवतावादी सिद्धांतों पर आधारित दामाखेड़ा में कबीर मठ की स्थापना वर्ष…
Read More
भारत देश पर ब्रिटेन के लंबे शोषण, उत्पीड़नपूर्ण औपनिवेशिक शासन से 1947 मे स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद लौह व्यक्तित्व और अदम्य साहस के धनी तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल के अथक प्रयासों से 562 देशी रियासतों मे से अधिकतर का भारत विलय हो गया।
जिन्ना जहां एक ओर द्विराष्ट्र…
Read More
छत्तीसगढ़ के हृदय स्थल जांजगीर-चांपा जिले के अति पावन धरा तुर्रीधाम शिवभक्तों के लिए अत्यंत ही पूजनीय है। सावन मास में हजारों की संख्या में शिव भक्त अपनी मनोकामना लेकर तुर्रीधाम पहुंचते है। स्थानीय दृष्टिकोण से यहाँ उपस्थित शिवलिंग, प्रमुख ज्योतिर्लिंगों के समान ही वंदनीय है।
यह शिवालय सक्ति-चांपा मार्ग…
Read More