संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल षष्ठी | बुधवार
नक्षत्र: आर्द्रा | योग: अतिगंड | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 22 अप्रैल 2026
शिक्षा : एम. ए. प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व, एम. ए. लोक प्रशासन
प्रमुख रचनाएँ :
व्यवसाय : अध्येता भारतीय ज्ञान परम्परा
पता : रायपुर छत्तीसगढ़
गणगौर भारत का एक प्रमुख सांस्कृतिक एवं धार्मिक पर्व है, जो शिव और शक्ति के एकात्म स्वरूप का प्रतीक है। यह विशेष रूप से महिलाओं और अविवाहित कन्याओं द्वारा प्रेम, समर्पण और त्याग के भाव के साथ मनाया जाता है। चैत्र मास में 18 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव…
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वारुणी पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिन्दू पर्व है, जो जल के देवता वरुण की उपासना और जल के महत्व की स्मृति से जुड़ा है। भविष्यपुराण, नारदपुराण और स्कन्दपुराण जैसे ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। यह पर्व जल संरक्षण, प्रकृति…
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झांसी में जन्मी माता कर्मा निष्काम भक्ति की प्रतीक हैं। उनकी सच्ची श्रद्धा से स्वयं भगवान जगन्नाथ ने उनके हाथों की खिचड़ी स्वीकार की। UP, MP, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में समान रूप से पूजनीय, वे सेवा, त्याग और आस्था की अमर गाथा हैं।
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यह लेख होली के उत्सव को भारतीय ऋतुचक्र, लोकपरंपरा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करता है। छत्तीसगढ़ की जनजातीय परंपराओं, फगुआ काटने की रीति और प्राकृतिक रंगों की औषधीय विधियों के माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि भारतीय तीज-त्योहार केवल आस्था नहीं, बल्कि पर्यावरण, स्वास्थ्य और सामाजिक…
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यज्ञोपवीत अथवा जनेऊ सनातन परंपरा का एक अत्यंत पवित्र संस्कार है, जो उपनयन संस्कार के माध्यम से व्यक्ति को द्विजत्व प्रदान करता है। यह केवल एक सूत्र नहीं, बल्कि ज्ञान, संयम, पवित्रता और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। उपनयन संस्कार के पश्चात व्यक्ति को ब्रह्मचर्य, यज्ञ, अध्ययन और कर्तव्यबोध के…
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खैरागढ़, छत्तीसगढ़ का नवगठित जिला होते हुए भी एशिया के प्रथम संगीत विश्वविद्यालय के कारण वैश्विक पहचान रखता है। 1956 में राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और महारानी पद्मावती देवी ने अपनी पुत्री इंदिरा की स्मृति में इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना की, जहाँ संगीत, नृत्य और ललित कलाओं…
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गुजरात के मेहसाणा जिले में स्थित मोढेरा का सूर्य मंदिर भारतीय स्थापत्य, खगोल विज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान परंपरा का अद्भुत उदाहरण है। सोलंकी शासक भीम प्रथम द्वारा 11वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर मारू-गुर्जर शैली, सूर्य उपासना, ज्यामितीय संरचना और खगोलीय सटीकता का अनुपम संगम प्रस्तुत करता है। सूर्यकुंड, नृत्यमंडप…
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कोणार्क का सूर्य मंदिर प्राचीन भारतीय स्थापत्य, खगोल विज्ञान और आध्यात्मिक दर्शन का अद्वितीय उदाहरण है। रथनुमा संरचना, प्रतीकात्मक पहिए और सूर्य उपासना से जुड़ी यह विश्व धरोहर भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक ऊँचाई को दर्शाती है।
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यह लेख भारतीय संस्कृति में सूर्य की आध्यात्मिक, धार्मिक और वैज्ञानिक महत्ता को स्पष्ट करता है। वैदिक ग्रंथों, पर्व-परंपराओं और आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में सूर्य को जीवन, ऊर्जा, समय और चेतना के केंद्र के रूप में समझाया गया है।
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पीतल उद्योग और बढ़ईगिरी जैसे पारंपरिक ग्रामोद्योग भारतीय संस्कृति, कौशल और आधुनिक इंजीनियरिंग विकास के बीच सेतु का कार्य करते हैं। ये उद्योग कम पूंजी में अधिक रोजगार, पर्यावरणीय टिकाऊपन और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का सशक्त मॉडल प्रस्तुत करते हैं।
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कृषि आधारित ग्रामोद्योग भारत की अर्थव्यवस्था की वह सुदृढ़ नींव हैं, जो कम पूंजी में रोजगार, आत्मनिर्भरता और ग्रामीण समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती हैं। ये उद्योग विकास, संवेदनाओं और स्वदेशी शक्ति का संतुलित मॉडल प्रस्तुत करते हैं।
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यह आलेख बांस शिल्प को भारतीय हस्तकला, वनोत्पाद आधारित ग्रामोद्योग और आत्मनिर्भर भारत के संदर्भ में प्रस्तुत करता है। इसमें बांस की पर्यावरणीय उपयोगिता, सांस्कृतिक महत्त्व, आर्थिक योगदान, जनजातीय कारीगरों की भूमिका और ग्रामीण रोजगार सृजन में इसकी बढ़ती संभावनाओं का समग्र विवेचन किया गया है।
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मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का पावन पर्व है, जो ऋतु परिवर्तन, आध्यात्मिक चेतना, दान, तिल-गुड़, तीर्थ स्नान और सामाजिक सौहार्द का संदेश देता है। यह पर्व विविध नामों और परंपराओं के साथ भारत की सांस्कृतिक एकता को उजागर करता है।
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यह लेख खादी को केवल वस्त्र नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत स्मृति, स्वदेशी आंदोलन, गांधी दर्शन और आत्मनिर्भरता की चेतना के रूप में प्रस्तुत करता है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आधुनिक ‘खादी इंडिया’ ब्रांड तक, खादी की ऐतिहासिक यात्रा, सामाजिक भूमिका और समकालीन महत्व का समग्र विवेचन इसमें किया…
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पोंगल दक्षिण भारत का प्रमुख फसल पर्व है, जो सूर्यदेव, प्रकृति और किसानों के प्रति कृतज्ञता का भाव व्यक्त करता है। यह उत्सव कृषि, ऋतु परिवर्तन, पारिवारिक परंपराओं और सामूहिक जीवन के संतुलन का प्रतीक है, जिसमें सनातन संस्कृति की एकात्म भावना स्पष्ट रूप से झलकती है।
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लोहड़ी पंजाब और उत्तर भारत का प्रमुख लोकपर्व है, जो मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर ऋतु परिवर्तन, कृषि जीवन, श्रम-सम्मान और सामूहिक एकता का उत्सव है। अग्नि, नई फसल, लोकगीत और लोकनृत्यों के माध्यम से यह पर्व कृतज्ञता, नवऊर्जा और सामाजिक समरसता का संदेश देता है।
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यह लेख मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ की परंपरा के पीछे छिपे धार्मिक, ज्योतिषीय, सामाजिक और वैज्ञानिक कारणों का विवेचन करता है। तिल-गुड़ केवल एक पर्व-व्यंजन नहीं, बल्कि ऋतु, स्वास्थ्य, दान-पुण्य और जीवन में संतुलन का गहरा सांस्कृतिक संदेश है।
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दियारी छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक कृषि-पर्व है, जो नई फसल और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। यह उत्सव भारतीय संस्कृति में निहित ईशावास्य, प्रकृति-एकात्मता और सामुदायिक सहभागिता के जीवंत दर्शन को प्रकट करता है।
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छत्तीसगढ़ के सिरपुर (प्राचीन श्रीपुर) का इतिहास 6वीं से 8वीं शताब्दी के स्वर्णकाल से जुड़ा है। महानदी के तट पर बसा यह नगर धर्म, शिक्षा, कला, बौद्ध विहारों और अद्वितीय स्थापत्य का प्रमुख केंद्र रहा है। लक्ष्मण मंदिर, सुरंग टीला, आनंद प्रभुकुटी विहार और राजप्रासाद के अवशेष सिरपुर के गौरवशाली…
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यह लेख पौष माह के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है, तथा भारत के विविध पर्वों और परंपराओं के माध्यम से सांस्कृतिक एकता, सामूहिक विकास और सनातन दर्शन के गहरे संबंध को स्पष्ट करता है।
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थाईपुसम तमिल परंपरा का एक पवित्र पर्व है, जो तमिल कैलेंडर के थाई माह और हिंदू चंद्र कैलेंडर के पौष माह के आध्यात्मिक संगम को दर्शाता है। भगवान मुरुगन को समर्पित यह उत्सव भक्ति, तपस्या, कृतज्ञता और बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय का प्रतीक है।
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बनशंकरी देवी अथवा शकुंभरी देवी कर्नाटक की प्रमुख आराध्य देवी हैं, जिन्हें संरक्षण, पोषण और लोककल्याण का प्रतीक माना जाता है। तिलकारण्य वन से जुड़ी उनकी पौराणिक कथा, दुर्गमासुर वध और अकाल निवारण का प्रसंग देवी के करुणामय तथा जीवनदायिनी स्वरूप को प्रकट करता है। चोलाचिगुड स्थित बनशंकरी मंदिर धार्मिक…
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यह लेख गोंड, मुरिया और धुरवा आदि जनजातियों में प्रचलित मृतक संस्कारों का गहन विवेचन करता है। पंचतत्व, पुनर्जन्म, पितृ-पूजन और सामाजिक संतुलन से जुड़े इन संस्कारों में निहित भारतीय जीवन-दर्शन को यह स्पष्ट करता है।
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भारतीय दर्शन की आश्रम व्यवस्था में विवाह संस्कार गृहस्थ आश्रम का प्रवेश-द्वार है, जो समाज, वंश और संस्कृति की निरंतरता सुनिश्चित करता है। प्रस्तुत लेख में जनजातीय समाज की विवाह परंपराओं का विवेचन है, जहाँ एकविवाह, बहुपत्नी और बहुपति विवाह सामाजिक-आर्थिक संतुलन के आधार पर प्रचलित रहे हैं। उरांव, हल्बा…
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यह लेख पद्मपुराण में वर्णित चौरासी लाख योनियों की अवधारणा से प्रारंभ होकर संस्कारों के दार्शनिक अर्थ और उनके सामाजिक प्रयोजन को स्पष्ट करता है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ की विभिन्न जनजातियों बैगा, मुरिया, गोंड, धुरवा, हल्बा, धनवार आदि में प्रचलित जन्म संस्कारों का विस्तृत विवेचन करते हुए यह लेख…
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छत्तीसगढ़ प्राकृतिक सौंदर्य, घने वनों, जलप्रपातों, तीर्थस्थलों और जीवंत लोकसंस्कृति का अद्वितीय संगम है। यह राज्य इको-टूरिज्म, वेलनेस टूरिज्म, आध्यात्मिक यात्रा और साहसिक पर्यटन की अपार संभावनाओं के साथ भारत के पर्यटन मानचित्र पर एक विशिष्ट पहचान स्थापित करता है।
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भारत के जनजातीय समाज को समझने के लिए पुरातात्विक साक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं। नागपुर, हटा और हरियागढ़ जैसे क्षेत्रों में मिले किले, बावड़ियाँ, स्थापत्य, शिल्पकला एवं प्राचीन तकनीकी कौशल यह प्रमाणित करते हैं कि गोंड और धुरवा जैसे समाज न केवल उन्नत नगर-निर्माता थे, बल्कि सुरक्षा, जल-संचार…
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जनजातीय समाज प्रकृति के साथ एकात्म होकर जो अद्भुत औषधीय ज्ञान विकसित करता आया है, इस लेख में उसी पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली, जंगली फूलों-फलों के पोषण गुण, जड़ी-बूटियों के उपयोग और वन आधारित उपचार पद्धतियों का विस्तृत वर्णन है। यह भारतीय मूल ज्ञान का वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक दस्तावेज है।
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मदकू द्वीप छत्तीसगढ़ का एक अद्वितीय धार्मिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहर-स्थल है जहाँ पंचदेव उपासना, कल्चुरी कालीन मंदिरों के अवशेष, शिव–विष्णु संगम परंपरा और दुर्लभ औषधीय वनस्पतियाँ एक साथ मिलकर सनातन संस्कृति का जीवंत स्वरूप प्रस्तुत करती हैं। यह स्थल माण्डुक्य ऋषि, मुण्डकोपनिषद् और “सत्यमेव जयते” की प्राचीन परंपरा से…
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रामगढ़ पहाड़ियों में स्थित जोगीमारा और सीताबेंगरा गुफाएँ भारत की प्राचीनतम नाट्यशालाओं के रूप में प्रसिद्ध हैं। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के ये शैल-स्थापत्य मौर्यकालीन कला, रंगमंच, भित्ति चित्रकला तथा ब्राह्मी अभिलेखों के अद्वितीय प्रमाण हैं। सूतनुका–देविदिन्न का प्रेम अभिलेख, प्राकृतिक चट्टानी मंच, दर्शक दीर्घाएँ और रंगमंचीय संरचना इन्हें भारतीय…
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ढोकरा कला भारत की प्राचीन लॉस्ट वैक्स तकनीक पर आधारित एक अद्भुत जनजातीय शिल्प परंपरा है, जिसने विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर और कोंडागांव को वैश्विक पहचान दिलाई। चार हजार वर्ष पुरानी यह कला आज भी जनजातीय समाज के धैर्य, सौंदर्यबोध और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखती है।
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यह आलेख भारतीय जनजातीय कला की उद्भव-यात्रा को प्रागैतिहासिक काल से वर्तमान तक विश्लेषित करता है। मानव जीवन और प्रकृति के अद्वैत संबंध से जन्मी यह कला आरंभ में शैलचित्रों के रूप में उभरी, जो न केवल उस युग की सांस्कृतिक धड़कन थे, बल्कि सभ्यता के विकास के मौन साक्षी…
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दक्षिण कोसल और रामायण का प्राचीन संबंध छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर को विशिष्ट बनाता है। दण्डकारण्य, शबरी, श्रृंगी ऋषि, वाल्मीकि आश्रम और रामनामी परंपरा जैसे अनेक प्रमाण इस भूमि को रामायणकालीन विरासत का जीवित आधार बनाते हैं।
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यह लेख जनजातीय समाज की प्राचीन न्याय व्यवस्था का परिचय कराता है, जिसमें मुण्डा–उराँव जैसे समुदायों की स्वशासन पर आधारित पंचायत संरचना, पदानुक्रम, निर्णय-प्रक्रिया और सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं के सामूहिक स्वरूप को समझाया गया है। बिना लिखित कानून के भी यह समाज न्याय, सहमति और पारदर्शिता पर आधारित एक सुव्यवस्थित और…
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डोंगरदेव की परंपरा भारत के जनजातीय समाज में प्रकृति-पूजा के उस गहरे दर्शन को प्रकट करती है जहाँ पर्वत देवालय माने जाते हैं और प्रकृति स्वयं देवत्व का स्वरूप बन जाती है। महाराष्ट्र के सह्याद्री से लेकर झारखण्ड के मारंग बुरु और बस्तर के डूंगरी तक यह समान विश्वास मिलता…
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जनजातीय समाज भारतीय संस्कृति का मूल आधार है जिसने आज भी सनातन परंपरा के सभी तत्वों को जीवंत रखा है। जीवन के विभिन्न संस्कार–जन्म, नामकरण, विवाह और मृत्यु–इनके लोकगीतों, नृत्य, कथाओं और रीति-रिवाजों में भारतीय दर्शन की स्पष्ट छाप मिलती है। प्रकृति के साथ गहरे संबंध, पंचतत्वों का सम्मान, पुनर्जन्म…
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गोदना केवल अलंकरण नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की आत्मा से जुड़ी प्राचीन कला परंपरा है। यह सौंदर्य, पहचान, आस्था और उपचार—चारों आयामों को समेटे हुए पीढ़ियों से जनजातीय जीवन में रची-बसी है। शरीर पर उकेरे गए ये चिन्ह संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिकता का अनोखा संगम प्रस्तुत करते हैं।
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यह लेख बताता है कि जनजातीय समाज केवल प्रकृति-आधारित जीवनशैली का उदाहरण नहीं, बल्कि सनातन धर्म के मूल दर्शन, गोत्र व्यवस्था, प्रकृति पूजन और पितृसम्मान की जीवित परंपरा का शाश्वत आधार है। इतिहास, शास्त्र और संस्कृति – सभी इस समाज की गौरवशाली आध्यात्मिक विरासत की पुष्टि करते हैं।
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भाई दूज भारत का एक पावन पर्व है जो दीपावली के अंतिम दिन भाई-बहन के अटूट स्नेह, विश्वास और पारिवारिक एकता का प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी दीर्घायु और समृद्धि की कामना करती हैं, वहीं भाई अपनी बहनों की रक्षा का वचन…
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शरद पूर्णिमा भारतीय परंपराओं का ऐसा पर्व है जिसमें धार्मिक आस्था, वैज्ञानिक दृष्टि और सांस्कृतिक विविधता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। इसे कौमुदी पूर्णिमा, कोजागरी पूर्णिमा, कुमार पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से युक्त होकर अमृतवर्षा करता है…
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