संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार
नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026
राजस्थान के ग्रामीण अंचल में मनाया जाने वाला गाँव बारणे लोकोत्सव ग्राम देवताओं, पशुधन, फसलों और प्रकृति की सुरक्षा से जुड़ी सामुदायिक परंपरा है। पूजा, ग्राम-सीमा शुद्धिकरण, दाल-बाटी-चूरमा सहभोज और सामूहिक सहभागिता इसके प्रमुख सांस्कृतिक आयाम हैं और सामाजिक एकता।
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भारतीय ज्ञान परम्परा के विविध, अनुभवपरक, नैतिक और जीवन-केंद्रित स्वरूप को रेखांकित करता यह आलेख डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचारों के माध्यम से शिक्षा, चरित्र, विज्ञान, अध्यात्म, संस्कृति और परिवर्तन के संतुलित भारतीय दृष्टिकोण को सहज रूप में प्रस्तुत करता है।
Read Moreबघेरा की पुरातात्विक विरासत, बलराम प्रतिमाओं, दाऊजी मन्दिर, हलषष्ठी विधान और राजस्थान की लोक-आस्थाओं पर केन्द्रित यह आलेख विष्णु-अवतार परंपरा, प्रतिमा-विज्ञान तथा केकड़ी क्षेत्र में बलराम उपासना के सांस्कृतिक, धार्मिक और लोकजीवन से जुड़े स्वरूपों का समग्र परिचय कराता है।
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कजली तीज भारतीय नारी, दाम्पत्य, प्रकृति और लोक आस्था का समन्वित पर्व है। नीमडी माता की पूजा, चन्द्र अर्घ्य, लोकगीत, व्रत और पर्यावरण चेतना के माध्यम से यह परंपरा सांस्कृतिक निरंतरता और प्रकृति संरक्षण का संदेश देती है।
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भारतीय सभ्यता के निर्माण में वनवासी आखेटकों, निषादों और किरातों ने प्रकृति ज्ञान, धनुर्विद्या तथा सीमांत सुरक्षा से महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। शिव के किरात रूप, कन्नप्प नयनार और प्राचीन वाङ्मय के प्रसंगों के माध्यम से यह लेख उनकी सांस्कृतिक प्रतिष्ठा और प्रेरक जीवनदृष्टि को रेखांकित करता है।
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यह आलेख सनातन परम्परा में गायत्री मन्त्र की आध्यात्मिक महिमा, वैदिक महत्व और साधना शक्ति को विस्तार से प्रस्तुत करता है। चारों वेदों के सार माने जाने वाले इस महामन्त्र की 24 अक्षरीय संरचना, ऋषियों एवं आधुनिक संतों के विचारों तथा पुष्कर में सम्पन्न 200 कुंडीय विराट गायत्री पुरश्चरण महायज्ञ…
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यह लेख रामचरितमानस में वर्णित रामराज्य के पर्यावरणीय दृष्टिकोण का विश्लेषण करता है। इसमें जल संरक्षण, वृक्षारोपण, वन्यजीवों की निर्भयता, प्रकृति और मानव के सामंजस्य तथा वर्तमान जलवायु संकट के संदर्भ में वैदिक मूल्यों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया है।
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क्या कोई जलधारा सहस्राब्दियों तक पूर्णतः शुद्ध रह सकती है? देवलोक से पृथ्वी पर उतरी पतितपाविनी गंगा के इसी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य को समझने के लिए इस विशेष लेख को अवश्य पढ़ें!
Read Moreयह लेख विष्णु के अवतारवाद की दार्शनिक और सांस्कृतिक व्याख्या करते हुए सृष्टि के विकास क्रम को मत्स्य से नृसिंह तक क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से नृसिंहावतार के माध्यम से भक्त प्रहलाद की रक्षा, अहंकार के विनाश और दिव्य न्याय के सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया…
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रक्तिम पलाश केवल एक पुष्प नहीं, अपितु ऋतुराज बसंत का दैदीप्यमान उद्घोष है। वैदिक साहित्य, आयुर्वेद और लोकपरंपराओं में इसकी पावन महिमा विस्तृत रूप से प्रतिपादित है। जानिए कैसे यह वृक्ष भारतीय संस्कृति, साधना और प्रकृति-सौंदर्य का जीवंत प्रतीक बना। सम्पूर्ण आलेख पढ़ने हेतु क्लिक करें ।
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अजयमेरु की अजेय पर्वतीय अस्मिता, चौहान-कालीन स्थापत्य की गौरवगाथा, मुगलकालीन परकोटों की सामरिक संरचना तथा राजवंशीय हवेलियों का वैभव—इन सबका समन्वित इतिहास अजमेर की दीर्घ सांस्कृतिक चेतना का दर्पण है। इसके द्वारों और कोठियों में निहित विरासत को जानने हेतु पूर्ण आलेख अवश्य पढ़ें।
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राजस्थान हमारी भारतीय संस्कृति का वह जीवंत केंद्र है, जहां आज भी भारतीय जीवन दर्शन का मूल दर्शन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यहां होने वाले उत्सव और मेले हमारी परंपरा और भारतीय संस्कृति की चेतना को समेटे हुए है। आइए जानते है, नागौर के विश्व प्रसिद्ध पशु…
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यह लेख राजस्थान के नागौर स्थित दधिमती शक्तिपीठ के प्रतिहारकालीन मंदिर स्थापत्य में उत्कीर्ण रामकथा मूर्ति फलकों का सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत करता है। इसमें श्रीराम के वनवास, सीता हरण, सुग्रीव संवाद, सेतुबन्ध, लक्ष्मण शक्ति और राम-रावण युद्ध जैसे प्रसंगों के शिल्पांकन के माध्यम से भारतीय मंदिर कला में रामायण परम्परा…
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