संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण चतुर्दशी | गुरुवार
नक्षत्र: उत्तराभाद्रपद | योग: इंद्र | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अप्रैल 2026
यह लेख श्रीराम के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वरूप की व्यापक व्याख्या करता है, जिसमें वेदों, उपनिषदों और विभिन्न क्षेत्रीय रामकथाओं के माध्यम से उनकी सार्वभौमिक उपस्थिति को दर्शाया गया है। विशेष रूप से असम की कार्बी जनजाति में प्रचलित ‘छाबिन आलुन’ रामायण के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया…
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वसंत ॠतु आई है, वसंत ॠतु के आगमन की प्रतीक्षा हर कोई करता है। नये पल्लव लिए वन, प्रकृति, मानव अपने पलक पांवड़े बिछाए उसका स्वागत करते दिखते हैं। भास्कर की किरणें उत्तरायण हो जाती हैं और दक्षिण दिशा से मलयाचल वायु प्रवाहित हो उठती है।
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लोकगीत और लोकनृत्यों में छत्तीसगढ़ का उल्लासित परिवेश साकार हो उठता है। जन्म से मृत्यु पर्यंत, पर्व और उत्सवों में, जीवन की विसंगतियों में होता आया लोक नृत्यों आज भी जीवंत है,समूचे जनजीवन में। ऐसा ही एक लोक नृत्य है करमा, जो विविध परिवेश में प्रचलित है।
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बस्तर के वनवासी अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों को संजोए हुए होली मनाते हैं, दंतेवाड़ा के माई मंदिर में। छत्तीसगढ़ के बस्तर का दंतेवाड़ा जहां विराजी हैं वनवासियों की आराध्य मां दंतेश्वरी देवी। डंकिनी- शंखिनी नदी संगम के तट पर बसा है दंतेवाड़ा। हर बरस माता के दरबार में होली मनाने आ…
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पानी सहेजते तालाब सदियों बनते रहे हैं जो अतीत की धरोहर बनें हमारी जीवनचर्या का कभी एक अभिन्न अंग थे। तालाब बनवाना, कुआं खुदवाना एक धार्मिक कार्य था। जहां नदियां नहीं थी वहां तालाब ही सब की प्यास बुझाते थे। छत्तीसगढ़ में हजारों हजार तालाब समय समय पर बनाएं गये…
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आर्य संस्कृति के दक्षिण में प्रसार के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम की भूमिका सर्वोपरि है। ऋग्वेद में विंध्याचल के आगे क्षेत्रों का कोई उल्लेख नहीं मिलता विंध्य पर्वत से ही उत्तर व दक्षिण भारत को विभाजित किया गया है। राम ने अपने चौदह वर्ष के वनवासी जीवन में दक्षिण क्षेत्र…
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प्रकृति से लेकर चराचर जगत का अभिनव स्वरूप जब नित निखरता सृजन की ओर अग्रसर होता है तो ऐसे समय में ऋतुराज वसंत का पदार्पण होता है। सूर्य देव के उत्तरायण होते ही समूची प्रकृति भी अपना कलेवर बदलती मनमोहक हो उठती है। वसंत के आगमन से पेड़- पौधों के…
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हमारी धरती धन-धान्य से सदैव भरी रहे अक्षय रहे अक्षय तृतीया का पर्व इन्हीं महत्व को उजागर करता है। छत्तीसगढ़ में अक्ती त्यौहार के साथ खेती किसानी की शुरुआत होती है। किसान अच्छी फसल के लिए धरती माता, बैल, खेती-बाड़ी के औजार और बीजों की पूजा अर्चना कर आशीर्वाद लेते…
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आदि शक्ति मां के 51 शक्ति पीठ कहे गए हैं। पुराणों में माता के शक्तिपीठों का नाम दिये गये हैं उनमें से दो शक्तिपीठ अज्ञात कहें गये हैं। 'पंचसागर शक्तिपीठ' छत्तीसगढ़ में विद्यमान हैं। पौराणिक आख्यानों के अनुसार पंचसागर शक्तिपीठ का जो वर्णन मिलता है वैसा ही स्वरूप छत्तीसगढ़ के…
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प्रकृति को सहेजती सनातन परंपरा और धार्मिक रीति-रिवाजों में हमारी भावनाएं मूर्त रूप ले लेती हैं, इन्हीं भावों को साकार करते हैं हमारे पर्व। भारत की गोधन संस्कृति में गाय और गोवंश जीवन जगत की मूलाधार रही है। गाय गौ माता और खेती किसानी में बैल किसानों के जीवन का…
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प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त कर करने के लिए छत्तीसगढ़ में मनाया जाता है हरेली का त्यौहार। छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार हरेली सावन मास की अमावस्या को मनाया जाता है। खेती किसानी का काम जब संपन्न हो जाता है और इस दिन कृषि औजारों को साफ कर उनकी पूजा की…
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छत्तीसगढ़ में प्रेम को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है, दक्षिण कोसल के शासक राजा हर्षगुप्त की स्मृति संजोए हुए महारानी वासटा देवी ने बनवाया था लक्ष्मण मंदिर। लगभग सोलह सौ साल पहले प्राचीन नगरी श्रीपुर में निर्मित मंदिर आज भी अपने अनुपम वैभव को समेटे हुए है।
महारानी वासटा देवी…
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सबसे सुंदर रंग-बिरंगी तितली कौन-सी है! सुन्दर तितली का चयन विश्व सुंदरी की तर्ज पर हुआ। तितली सुन्दरी प्रतियोगिता में 'ऑरेंज ऑकलीफ' ने बाजी मारी और उसका नाम भारत की राष्ट्रीय तितली में दर्ज हो गया। छत्तीसगढ़ के भोरमदेव अभ्यारण में पाई जाने वाली तितली को राष्ट्रीय तितली का खिताब…
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आठ वर्ष की आयु में दक्षिण से निकले और नर्मदा तट के ओमकारेश्वर में गुरु गोविंदपाद के आश्रम पर जा पहुंचे। जहां समाधिस्थ गुरु ने पूछा, "बालक! तुम कौन हो"?
बालक शंकर ने उत्तर दिया," स्वामी! मैं ना तो मैं पृथ्वी हूं, ना जल हूं ना अग्नि, ना वायु, ना…
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कलचुरी राजवंश की माता महिषासुरमर्दिनी चैतुरगढ़ में आज महामाया देवी के नाम से पूजनीय है। परंपरागत परिधान से मंदिर में माता अपने परंपरागत परिधान से सुसज्जित हैं, जो 12 भुजी हैं, जो सदैव वस्त्रों से ढके रहते हैं। पूर्वाभिमुख विराजी माता को सूरज की पहली किरण उनके चरण पखारने को…
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बस्तर प्राचीनकाल में दंडकारण्य कहलाता था। छत्तीसगढ़ के दक्षिण में ”बस्तर“ ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। आदिम युग से अर्वाचीन काल तक बस्तर में अनेक राजवंशों का उत्थान और पतन हुआ। बस्तर के विशाल अंचल को देवी-देवताओं की धरा कहें तो कोई अतिशोक्ति नहीं हैं।
बस्तर की देवियां-…
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शैव और शक्ति साधना का प्राचीनतम मंदिर है देवरानी जेठानी, जहां शैव तंत्र और शाक्त साधना का रहस्यमय स्वरूप एकाकार दिखता है। शिव की दस महाविद्या देवियों में से तारा देवी और धूमावती देवी इन मंदिरों में प्रतिष्ठापित रही हैं। मंदिर अपने आप में अदभुत, अनूठी मूर्तियों के साथ रहस्यमय…
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होली हंसी- ठिठोली और रंग -मस्ती से सराबोर होती है। बस्तर के जनजातीय समाज द्वारा होली अपने अलग अंदाज में मनाई जाती है। वनवासी अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों को संजोए हुए होली मनाते हैं, दंतेवाड़ा के माई दरबार में। छत्तीसगढ़ के बस्तर में दंतेवाड़ा जहां बिराजी हैं आदिवासियों की आराध्य देवी…
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सृष्टि के प्रारंभ में विंध्याचल के दक्षिण का भू-भाग सबसे पहले अस्तित्व में आया। मानव सभ्यता के उदगम का यही स्थान बना। वैज्ञानिक मतों के अनुसार सिहावा पर्वत (शुक्तिमत) जो 'बस्तर क्रेटॉन' के अंतर्गत है, यह आद्य महाकल्प में निर्मित चट्टानों से बना है। जिस की औसत आयु 300 करोड़…
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बहुत पुरानी बात है जब बालाघाट लांजीगढ़ रियासत के राजा सिंहलसाय ध्रुव थे। राजा राजा की रानी गागिन अपूर्व सुंदरी थी। लांजीगढ़ पहाड़ी और दुर्गम जंगलों से घिरा था। यहां गेहूं ज्वार और बाजरा की खेती होती थी, भरपूर फसल होने के कारण लांजीगढ़ एक मजबूत रियासत मानी जाती थी…
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पहले पहल शायद आदि मानव ने अपने आप को प्रकृति के अनुकूल बनाने के लिए मुखौटों का उपयोग किया होगा, वह इसलिए कि शिकार करना आसान हो। और फिर मुखौटे आदिम जनजीवन की धार्मिक अवधारणाओं को भी अभिव्यक्ति देते रहे। जनजातियों के नृत्य, नाट्य और पारंपरिक उत्सवों में मुखौटों का…
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भारत के पर्व प्रकृति को संजोते हैं, जीवों को संरक्षित करते हैं। सदियों से चले आये पर्वों के रीति रिवाज को जब हम तिलांजलि दे रहे हैं तब उनकी महत्ता हमारे सामने आ रही है। हलषष्ठी एक ऐसा ही त्यौहार है जिसमें जैव विविधता, भू-जल को संरक्षित कर व्यवहारिक रूप…
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तत्कालीन दक्षिण कोसल एवं वर्तमान छत्तीसगढ़ की एक ऐसी अमर प्रेम कथा जो पूरे देश भर में सुनी सुनाई जाती है। कामकंदला की प्रेम गाथा को अपने समय के दिग्गज विद्वानों ने लिखा। लोक गाथाओं में रची बसी माधवनल और कामकंदला की प्रेम कथा जनमानस में आज भी छाई हुई…
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छत्तीसगढ़ के भू-भाग से मानव सभ्यता का इतिहास जुड़ा हुआ है। इस संदर्भ के पुरातात्विक साक्ष्य मिलते हैं। धार्मिक और पौराणिक ग्रंथों में छत्तीसगढ़ का उल्लेख मिलता है। सभ्यता की शुरूआत होने का यहां संकेत मिलता है। इसे ऋषि-मुनियों की तपोस्थली भी कहा गया है। जीव जंतुओं और वनस्पतियों की…
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बस्तर का दंतेवाड़ा जहां विराजमान है काकतीय राजवंश की कुलदेवी मां दंतेश्वरी। डकनी, शंखनी और धनकिनी नदी संगम तट पर माता का मंदिर अपनी पारंपरिक शैली में बना है वनवासियों की आराध्या दंतेश्वरी माई के दरबार से बस्तर के हर तीज-त्यौहार और उत्सव प्रारंभ होते हैं। अपनी समृद्ध वास्तु कला…
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शिव और शक्ति से उद्भूत लिंगेश्वरी देवी (लिंगई माता) लिंग स्वरूपा जहां विराजमान हैं। लगभग दो फुट का प्रस्तर लिंग शिव स्वरूप लिए हुए है, जिसमें समाहित शक्ति लिंगेश्वरी देवी का सिंगार लिए हुए हैं। जहां शिव और शक्ति एकाकार हुए हैं यही अद्भुत रूप लौकिक जगत के लिए दर्शनीय…
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मंदिरों की नगरी सिंगारपुर जहाँ विराजी हैं मावली माता। कई शताब्दी पूर्व बंजारों की अधिष्ठात्री देवी अब समूचे अंचल की आराध्या हो गई हैं। भक्तों की आस्था के साथ लोक विश्वास में मावली माता सभी मनोरथ को पूर्ण करने वाली हैं। सिंगारपुर में मंदिर के समीप कई समाजों के मंदिर…
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भगवान श्री राम मनुष्य के जीवन सुख दुख के साथी हैं, मनुष्य सुख हो या दुख दोनों में उन्हें याद करता है। श्री राम को सदा याद रहते हैं, कभी विस्मृत नहीं होते। वे लोक संस्कृति में समाये हुए हैं, कहा जा सकता है कि रोम रोम में बसे बसे…
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