संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया | शनिवार
नक्षत्र: हस्त | योग: शुभ | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 12 सितंबर 2026
शिक्षा : पीएचडी,, एमए (इतिहास, हिन्दी), बीजेएमसी, बैचलर इन नैचुरोपैथी, बैचलर इन श्रीमद्भगवद्गीता
प्रमुख रचनाएँ :
व्यवसाय : आचार्य, करियर पॉइण्ट महाविद्यालय कोटा राजस्थान
पता : कोटा राजस्थान
इस लेख में डॉ. नेहा प्रधान ने कोटा की विशिष्ट 'चित्रपूजा' और कृष्णभक्ति परंपरा का वर्णन किया है। वल्लभ संप्रदाय की प्रथम पीठ 'मथुराधीश मंदिर' के प्रभाव से कोटा की चित्रकला केवल कला न रहकर आराधना का माध्यम बन गई। चित्रों को भगवान स्वरूप ('चित्र जी') मानकर पूजने की इस…
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मधुश्रावणी मिथिला की स्त्री-केंद्रित लोकपरंपरा है, जिसमें नवविवाहिता पूजा, लोककथा, वनस्पति-ज्ञान और पारिवारिक स्मृतियों से जुड़ती है। यह पर्व नाग पूजा, प्रकृति-सम्मान तथा मायके-ससुराल के सांस्कृतिक संबंधों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखता और स्त्रियों के मौखिक ज्ञान को आगे बढ़ाता है।
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मुंशी प्रेमचन्द का साहित्य केवल कथाओं का संसार नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज के यथार्थ, संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं का जीवन्त स्वरूप है। डॉ. नेहा प्रधान का यह विशेष लेख प्रेमचन्द की भाषा दृष्टि और उनकी सशक्त सामाजिक चेतना का गम्भीर विश्लेषण करता है, जो वर्तमान परिदृश्य में भी…
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यह लेख गुरु पूर्णिमा के सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि पूर्णिमा का प्रकाश मानव की दिनचर्या को कैसे प्रभावित करता है। यह पर्व महर्षि वेदव्यास और महान गुरु-शिष्य परंपरा को समर्पित है।
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यह लेख चातुर्मास के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय महत्व पर आधारित है। आत्म-संयम, सात्विक आहार और ध्यान पर आधारित यह प्राचीन परंपरा, आधुनिक जीवनशैली में शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और प्रकृति संरक्षण के लिए आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।
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यह लेख पुरी के श्री जगन्नाथ मन्दिर के दिव्य इतिहास और मान्यताओं को प्रस्तुत करता है। इसमें 'दारु ब्रह्म' की महिमा, ऐतिहासिक शिलालेखों, नवकलेवर अनुष्ठान और विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा का सुन्दर वर्णन है। यह सन्देश देता है कि भगवान गर्भगृह तक सीमित न रहकर, जनकल्याण हेतु स्वयं भक्तों के बीच…
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प्रस्तुत लेख बूंदी क्षेत्र के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों और वर्तमान जनजातीय जीवन शैली के बीच सांस्कृतिक निरंतरता का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसमें भील, मीणा, गरासिया और सहरिया जनजातियों की लोककला, प्रकृति-पूजा, सामूहिक नृत्य, प्रतीकात्मक चित्रण और भित्ति सज्जा को प्राचीन शैलचित्रों से जोड़ते हुए भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों…
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भारतीय लोकजीवन में भगवान श्रीराम केवल आराध्य देव नहीं, बल्कि संस्कृति, नैतिकता और लोकआस्था के जीवंत प्रतीक हैं। यह लेख भजन, रामलीला और लोकगीतों के माध्यम से भारतीय समाज में रामकथा की अखंड परम्परा और श्रीराम के आदर्शों की शाश्वत उपस्थिति को अत्यन्त भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।
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सिल्क मार्ग केवल व्यापार का पथ ही नहीं, वह सुरों, वाद्यों और संस्कृतियों का जीवंत संगम था। भारत, चीन, फ्रांस और मध्य एशिया में संगीत कैसे यात्राओं के साथ रूपांतरित हुआ, यह आलेख उसी साझा मानवीय रचनात्मकता और सांस्कृतिक संवाद की कथा खोलता है।
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