संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख कृष्ण द्वादशी | गुरुवार
नक्षत्र: रेवती | योग: प्रीति | करण: तैतिल
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 मई 2026
व्यवसाय : Publishing Team
पता : Office Of Dakshin Kosal Today
यह आलेख श्रीरामचरितमानस के प्रसंगों के माध्यम से ‘देखना’ और ‘सजग दृष्टि’ के गूढ़ जीवन-दर्शन को अत्यन्त सूक्ष्मता से स्पष्ट करता है। अचल कुमार वैष्णव जी ने रावण, मारीच, हनुमान और भरत जैसे पात्रों के उदाहरणों द्वारा बताया है कि मनुष्य की दृष्टि ही उसके कर्म, विवेक और जीवन की…
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यह आलेख श्रीराम के बहुआयामी आदर्श चरित्र और गोस्वामी तुलसीदास जी के अद्भुत भाषायी कौशल का गम्भीर विवेचन प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार लोकभाषा में रचित श्रीरामचरितमानस ने राम को जन-जन तक पहुँचाया तथा पुत्र, मित्र, पति और राजा के रूप में श्रीराम ने मर्यादा…
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यह लेख भगवान श्रीराम के दिव्य एवं मानवीय चरित्र का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें उनके अवतार के ब्रह्मांडीय उद्देश्य से लेकर आदर्श आचरण, मर्यादा, धैर्य और न्याय के सिद्धांतों को समझाया गया है। रामायण को जीवन मार्गदर्शक मानते हुए यह लेख आधुनिक समाज के लिए राम के आदर्शों…
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डॉ. अदिति गौड़ के इस शोधपरक आलेख में रामकथा की उस अनन्त यात्रा का विवेचन है, जिसने भारत की सीमाओं को लांघकर विश्वभर में सांस्कृतिक सेतु का निर्माण किया। लोकजीवन, नामकरण, परम्पराओं और रामलीला के विविध रूपों के माध्यम से यह लेख श्रीराम की सर्वव्यापकता और वैश्विक प्रभाव को सजीव…
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यह लेख धर्म ग्रंथों की महत्ता, उनके जीवनदायी मूल्यों और मानव समाज के मार्गदर्शन में उनकी भूमिका को स्पष्ट करता है। वेद, पुराण, उपनिषद और गीता जैसे ग्रंथ न केवल आध्यात्मिक ज्ञान देते हैं, बल्कि वसुधैव कुटुम्बकम्, पर्यावरण संरक्षण, नारी सम्मान और परोपकार जैसे सार्वभौमिक सिद्धांतों के माध्यम से जीवन…
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यह लेख भारतीय समाज की उस मूल संरचना को स्पष्ट करता है, जिसकी आधारशिला संस्कारों पर टिकी हुई है। इसमें बताया गया है कि संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि व्यक्ति के आचरण, विचार और सामाजिक उत्तरदायित्व को दिशा देने वाली एक समग्र जीवन-पद्धति हैं। परिवार, शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक…
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डॉ. कामताप्रसाद वर्मा का यह शोधपरक लेख छत्तीसगढ़ की प्राचीन स्थापत्य और मूर्तिकला में अंकित रामकथा के विविध प्रसंगों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है। सिरपुर से लेकर जांजगीर और बस्तर तक विभिन्न मन्दिरों में उकेरे गए शिल्प इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि यहाँ की सांस्कृतिक चेतना में…
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यह लेख छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरम्पराओं और जनजीवन के विविध आयामों के माध्यम से भगवान श्रीराम की सर्वव्यापकता को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है। जन्म से मृत्यु तक, अभिवादन से संस्कारों तक और लोकगीतों से आस्था तक, यहाँ जीवन का प्रत्येक क्षण राममय है।
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यह लेख श्रीराम के चरित्र को लोककलाओं के माध्यम से जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है, जहाँ राम केवल पूजनीय देवता नहीं बल्कि जन-जन के अपने, सखा और परिवार के सदस्य बनकर उभरते हैं। मधुबनी, रामलीला, कठपुतली और लोकगीतों के जरिए यह दिखाया गया है कि भारतीय लोकसंस्कृति ने राम…
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छत्तीसगढ़ की भुंजिया जनजाति में भगवान श्रीराम केवल देवता नहीं, बल्कि परम सखा और रक्षक के रूप में पूजित हैं। यह लेख उनके अद्भुत लोकविश्वास, लाल बंगला परम्परा और लक्ष्मण रेखा से जुड़ी अनोखी कथा के माध्यम से वनवासी जीवन में रची-बसी रामभक्ति की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है।
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यह लेख हनुमान जी के व्यक्तित्व के उन गूढ़ और कम चर्चित आयामों को उजागर करता है, जो उन्हें केवल बलशाली नायक ही नहीं, बल्कि एक विद्वान, कुशल संचारक, मनोवैज्ञानिक और उत्कृष्ट कूटनीतिज्ञ के रूप में स्थापित करते हैं। हनुमान जी के वाक्-कौशल, विभीषण के साथ उनकी रणनीतिक भूमिका, संघर्ष…
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यह लेख भारत में शाक्त सम्प्रदाय की ऐतिहासिक, दार्शनिक और भौगोलिक यात्रा का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें लोक, तान्त्रिक और भक्ति परम्पराओं के साथ श्रीकुल और कालीकुल जैसे प्रमुख स्वरूपों तथा क्रान्त विभाजन के माध्यम से शक्ति साधना की विविधता को समझाया गया है। देवी को ब्रह्मांडीय ऊर्जा…
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राजस्थान के बांसवाड़ा से 14 किमी दूर उमराई ग्राम में स्थित यह भव्य शक्तिपीठ वांगड़ प्रदेश की धरोहर है। गर्भगृह में श्याम पाषाण निर्मित अष्टादश भुजा वाली सिंहवाहिनी माँ त्रिपुर सुंदरी की नयनाभिराम प्रतिमा प्रतिष्ठित है, जिनके चरणों में श्रीयंत्र अंकित है।
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निषादराज गुहा भारतीय परंपरा में अटूट भक्ति, सच्ची मित्रता और सेवा भाव के प्रतीक माने जाते हैं। छत्तीसगढ़ की राव-भाट परंपरा में भित्ति चित्रों के माध्यम से श्रीराम और निषादराज के संबंधों को जीवंत रखा गया है। निषादराज जयंती के अवसर पर उनके जन्म, पौराणिक कथाओं और सामाजिक योगदान को…
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यह लेख भारत के राष्ट्रीय पंचांग की वैज्ञानिक नींव को उजागर करता है — शक संवत पर आधारित यह पंचांग 1952 में प्रो. मेघनाद साहा की अध्यक्षता में बना, जो 30 क्षेत्रीय पंचांगों की भ्रांति को समाप्त कर पूरे भारत को एक सटीक, खगोलीय काल-सूत्र में बाँधता है।
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यह लेख भारतीय संस्कृति में वनों के महत्त्व को दर्शाता है। ऋग्वेद के अरण्यानी सूक्त से लेकर श्रीकृष्ण के गोवर्धन उपदेश तक, हमारी परम्परा ने सदैव वृक्षों को पुत्र समान माना है। विश्व वानिकी दिवस पर वन-संरक्षण का संकल्प लें।
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वैदिक काल से ध्वज राजचिह्नों में सर्वोच्च स्थान रखता था। युद्ध में योद्धाओं की पहचान, सेना का उत्साह और राजगौरव का प्रतीक यही ध्वज था। पताका, ध्वजदंड, चिह्न और अवचूल — इन अंगों से निर्मित ध्वज भारतीय साहित्य और कला दोनों में विस्तार से वर्णित है।
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यह लेख भारतीय नववर्ष की वैज्ञानिक और खगोलीय पृष्ठभूमि को समझाता है। वसंत सम्पात, मेष संक्रान्ति और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के आधार पर बैसाखी, गुड़ी पड़वा, उगादि जैसे पर्व मनाए जाते हैं। सौर और चंद्र-सौर गणना की यह परंपरा भारतीय काल-बोध की अद्वितीय वैज्ञानिक विरासत है।
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भारतीय समाज की कुछ प्रधान विशेषताओं में से एक है - गोत्र परम्परा। पाणिनि के अनुसार तीसरी पीढ़ी से आगे की संतान 'गोत्र' कहलाती है। यह व्यवस्था वंशावली पहचान, विवाह नियमन और सामाजिक संगठन का आधार रही है।
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भक्त शिरोमणि माँ कर्मा बाई की अनूठी भक्ति की कथा, जिनकी सच्ची श्रद्धा से स्वयं भगवान जगन्नाथ खिचड़ी खाने पधारते थे। जानिए कर्मा जयंती का महत्व और उनके जीवन का वह संदेश जो आज भी प्रासंगिक है।
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असम के धुबरी जिले के अशारीकांडी गांव की 'हीरामती' मिट्टी से बनी टेराकोटा कला सदियों पुरानी है। 77वें गणतंत्र दिवस परेड में इस अनूठी शिल्पकला को राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली। यह कला भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रमाण है।
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तिलक और बिन्दी केवल सौंदर्य-अलंकार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के गहन रहस्यों के प्रतीक हैं। शिव के तृतीय नेत्र से प्रेरित यह परंपरा ज्ञान, तेज और अनुराग की त्रिवेणी है। मस्तक पर धारण यह चिह्न जीवन में सांस्कृतिक दृष्टि और मंगलमय संस्कार की प्रेरणा देता है।
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जनउला छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पहेलियाँ हैं, जो हंसी-मजाक के साथ तर्कशक्ति का विकास करती हैं। ग्रामीण जीवन, प्रकृति और खेती से जुड़े ये लोकसाहित्य के रत्न पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक परंपरा से चले आ रहे हैं।
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युधिष्ठिर कलियुग से अपनी भेंट की कथा सुनाते हैं, जब एक घोड़े विक्रेता के वेश में कलियुग ने चार रहस्यमय प्रश्न पूछे। धर्मराज ने सभी प्रश्नों के उत्तर देकर कलियुग को पहचाना और उसे श्रीकृष्ण के रहते राज्य छोड़ने से मना किया।
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बुन्देलखण्ड की लोक चित्रकला सामाजिक, आध्यात्मिक एवं धार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। चौक पूरना, अल्पना, भित्ति चित्र, थापे, मेहंदी आदि उपविधाओं में दर्शन, संस्कृति एवं लोक जीवन के मूल्य समाहित हैं।
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यह निबंध स्वामी विवेकानंद द्वारा भारतीय नारी के आदर्श पर आधारित है, जिसमें उन्होंने मातृत्व को भारतीय स्त्रीत्व का केंद्र बताया है। पाश्चात्य और भारतीय नारी-आदर्शों की तुलना करते हुए उन्होंने माता के पवित्र स्थान और भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता को उजागर किया है।
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भारत की पावन धरती पर घुमंतू कलाकारों की एक अनूठी परिपाटी रही है। गाँवों की गलियों और हाट-बाज़ारों में भाँति-भाँति का स्वांग रचकर मन मोह लेने वाले ये बहुरूपिये वास्तव में हमारे लोक-इतिहास के जीवंत अभिलेख हैं। पर दक्षिण कोसल के अंचलों में रामायण और महाभारत की गाथाओं को अपनी…
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हमारी लोक परम्परा में घर की देहरी लकड़ी की चौखट से कहीं बढ़कर कुल की मर्यादा और सुख-सौभाग्य की प्रहरी है। चौखट को गोबर से लीपना, चौक पूरना, आम के पत्तों का बंदनवार सजाना आदि नानाविध तरीकों से हम अपने-अपने द्वार-बार को सजाते हैं। हमारे गाँवों में तो यह द्वार-सज्जा…
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बस्तर एक ऐसा स्थान है, जहाँ हमें आज भी भारतीय संस्कृति के मूल तत्त्वों के सहज दर्शन समाजजीवन में मिलते हैं। आइये इस लेख के माध्यम से भारतीयता के ऐसे ही एक विशिष्ट तत्त्व समरसता के प्रत्यक्ष दर्शन हम बस्तरिया लोकजीवन के विविध पक्षों में करें!
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राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर हम दक्षिण कोसल की धरती से जुड़े महान वैज्ञानिक आचार्य नागार्जुन को याद करते हैं। पारद विज्ञान, धातुशास्त्र और आयुर्वेद में उनके अद्भुत योगदान ने भारतीय विज्ञान को एक नई पहचान दी। उनका जीवन आज के युवाओं को अनुसंधान और नवाचार के लिए प्रेरित करता है।
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मंदिर केवल देवालय नहीं — वे विराट् पुरुष की देह हैं। 'भारती' पत्रिका (1964) के इस दुर्लभ लेख में जानिए गर्भगृह, विमान और गोपुरम् में छुपे उस शाश्वत दर्शन को, जो समाज को संस्कार, कला को धारा और जीवन को दिशा देता था।
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सात हजार वर्षों की गौरवशाली विरासत, सिकंदर से लेकर अंग्रेजों तक हर बार अंतिम विजय भारत की रही! सावरकर के 'भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ' की यह समीक्षा आपकी सोच बदल देगी। पढ़ें पूरी कहानी
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यह लेख राजस्थान की घुमन्तू रैबारी समुदाय की समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं का वर्णन करता है। जन्म, विवाह और मृत्यु संस्कारों से जुड़े अनोखे रीति-रिवाज, देवी-देवताओं में अटूट आस्था और सामूहिक जीवनशैली इस समुदाय की पहचान हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परम्परा से चली आ रही हैं। इस अनमोल संस्कृति को करीब…
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यह लेख गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज को समर्पित एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है। इसमें शिवाजी को केवल क्षेत्रीय नायक नहीं, बल्कि अखंड भारत की राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेख विभाजनकारी राजनीति और इतिहास में फैलाए गए मिथ्यावाद की आलोचना करते हुए…
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छत्तीसगढ़ के घने वनों में बसी बैगा जनजाति का औषधीय ज्ञान आधुनिक चिकित्सा से सदियों पहले विकसित हुआ एक जीवंत विज्ञान है। जड़ी-बूटियों, प्रकृति के साथ तादात्म्य और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिले अनुभवों पर आधारित यह परंपरा आज भी इस समुदाय के लिए जीवनरक्षा का सशक्त माध्यम है।
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अमरकंटक, मैकल पर्वत पर स्थित माँ नर्मदा का पवित्र उद्गम स्थल है। जानिए अमरकंटक की पौराणिक कथाएँ, शिवलिंग, मंदिर और ऐतिहासिक महत्व।
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कमलक्षेत्र, देवपुर और पद्मावतीपुरी के नाम से प्रसिद्ध राजिम, महानदी त्रिवेणी संगम का वह तीर्थ है जहाँ वैष्णव, शैव और साक्त परंपराएँ एक साथ सांस लेती हैं। भक्तिन राजिम की तपस्या से राजिम लोचन की प्रतिष्ठा और नगर-नामकरण की कथा जानिए।
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ऋतुराज वसंत के आगमन संग छत्तीसगढ़ की मड़ई परम्परा भी जीवंत हो उठती है। इसी पावन काल में धर्मनगरी दामाखेड़ा में ‘साहेब बंदगी’ के घोष के साथ कबीर पंथियों का विश्वप्रसिद्ध संत समागम आरंभ होता है। धरमदास से उदित नाम तक, गद्दी-परंपरा की अद्भुत कथा पढ़ें।
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छत्तीसगढ़ की धरती पर खल्लारी का जगन्नाथ मंदिर केवल उपासना स्थल नहीं, सामाजिक समरसता की जीवित परंपरा है। देवपाल मोची से आरंभ हुई यह गाथा बताती है कि आध्यात्मिक चेतना कैसे समाज को जोड़ती है। पूरी कथा पढ़ने के लिए क्लिक करें।
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औपनिवेशिक दासता के अंधकार में गोंड़ राजा डेलनशाह ने प्रतिरोध की मशाल जलाई। मदनपुर से उठी यह कथा केवल एक राजा की नहीं, बल्कि जनस्वाभिमान, बलिदान और संघर्ष की गाथा है। आगे क्या हुआ, यह जानने के लिए क्लिक करें।
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बसंत पंचमी न केवल ऋतुराज बसंत के आगमन का उत्सव है, बल्कि यह ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की उपासना और 'अबूझ मुहूर्त' का विशेष दिन है। इस ब्लॉग में जानें इस पर्व का धार्मिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक महत्व, महाकवि निराला और पृथ्वीराज चौहान से जुड़ी रोचक बातें तथा शुभ…
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छत्तीसगढ़ की धरती ने गाँधी को केवल स्वागत ही नहीं किया, बल्कि उनके सत्य, करुणा और सामाजिक जागरण के संदेश को आत्मसात भी किया। कंडेल सत्याग्रह से लेकर अछूत उद्धार यात्राओं तक, महात्मा का प्रभाव इस प्रदेश की चेतना में आज.....
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वनांचल में जन्मे लोकनायक टंट्या भील शोषण, अन्याय और अंग्रेजी अत्याचार के विरुद्ध जनक्रांति के प्रतीक बने। अदम्य साहस, अलौकिक लोकविश्वास और जनजातीय अस्मिता के इस महामानव को आज भी ‘मामा’ कहकर स्मरण किया जाता है। उनकी गाथा निमाड़ की आत्मा में आज भी जीवित है।
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वीरांगना ऊदा देवी पासी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की अदम्य योद्धा थीं, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सिकंदर बाग की लड़ाई में अद्भुत साहस का परिचय दिया। पुरुष वेश में पीपल के पेड़ पर चढ़कर 36 अंग्रेज सिपाहियों को मार गिराया। उनका जीवन नारी शक्ति की अपरिमितता और मातृभूमि के लिए…
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आदिवासी समाज प्रकृति-पूजक सनातन परम्परा का प्राचीन अवशेष है, जिसे आज विभाजनकारी प्रचारों द्वारा भ्रमित किया जा रहा है। धर्म बदला नहीं जाता, आत्मबोध और ज्ञान से समझा जाता है। हमें आत्मविश्वास, एकता और अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान को दृढ़ स्वर में स्थापित करना आवश्यक है।
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झारखंड की जनजातीय परंपराएं केवल संस्कृति नहीं, एक जीवित ग्रंथ हैं; गोत्रों की संरचना, विवाह के गीत, लोकनृत्य, सामाजिक संगठन और संघर्ष की शौर्यगाथाएं इनके ज्ञान-स्रोत हैं। यह आलेख जनजातीय अस्मिता, इतिहास और आत्मविश्वास की उसी धरोहर को समझने का एक गंभीर निमंत्रण है।
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झारखण्ड का जनजातीय समाज अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास की दिव्य समृद्धि के कारण अद्भुत और विशिष्ट स्वरूप धारण करता है। प्रोटो–ऑस्ट्रेलॉयड मूल की प्राचीन जीवंतता, मुण्डा और द्रविड़ भाषाओं की दीर्घ परंपरा, जल-जंगल-जमीन से अभिन्न उनका प्राकृतिक जीवन, तथा स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय वीरांगनाओं की अद्वितीय भूमिका इस समाज…
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यह आलेख छत्तीसगढ़ी फाग गीतों की परंपरा, स्वरूप और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालता है। इसमें ऋतुचक्र, फसलचक्र और वसंतोत्सव के साथ जुड़े फाग गीतों की सामाजिक-धार्मिक अभिव्यक्ति का विवेचन है। राधा-कृष्ण की लीलाएँ, रामकथा प्रसंग, आल्हा गायन और देवर-भाभी संवाद तक, फाग गीत ग्रामीण लोकजीवन, भक्ति और उत्सवधर्मी संस्कृति…
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क्रांतिकारी वनलता दासगुप्त ने कम उम्र में ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। हिजली जेल में अमानवीय यातनाओं के बावजूद उन्होंने कोई राज नहीं खोला। अंततः 1 जुलाई 1936 को मात्र 21 वर्ष की उम्र में उन्होंने प्राणों की आहुति दी।
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चोलकालीन कला भारतीय स्थापत्य और मूर्तिकला के उत्कर्ष का प्रतीक है। पल्लवों से विरासत में मिली कला-सम्पदा को चोल शासकों ने द्रविड़ शैली में नई ऊँचाइयाँ दीं। तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर और गंगैकोंड-चोलपुरम जैसे मंदिर उनकी वास्तु प्रतिभा के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। पत्थर और धातु की मूर्तियाँ, विशेषकर नटराज की…
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पंखराज साहेब कार्तिक उरांव वह युगपुरुष थे जिन्होंने संघर्षों की भूमि से उठकर अंतरराष्ट्रीय अभियंत्रण, जनजातीय अस्मिता और भारतीय पुनर्निर्माण को नई दिशा दी। उनकी दूरदृष्टि, तपश्चर्या और समाज-समर्पित चेतना आज भी जनजातीय उत्थान की वैचारिक धुरी बनी हुई है। पूरा जीवन प्रेरणा बनकर खड़ा है।
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असम का चाय जनजाति समुदाय कहा जाता है, औपनिवेशिक काल में विभिन्न भारतीय राज्यों से लाए गए मजदूरों का समूह है, जिन्होंने असम की चाय उद्योग, संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका संघर्ष, विद्रोह, शहादत और समृद्ध सांस्कृतिक पहचान असम के इतिहास का एक…
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भारत ने मानव संस्कृति और सभ्यता को अद्वितीय योगदान दिया है। शून्य और दशमलव प्रणाली से लेकर परमाणुवाद, संस्कृत भाषा की विराट शब्द-संपदा, शर्करा और कपास जैसी खोजों तक, भारत ने विश्व को विज्ञान, दर्शन और जीवनोपयोगी साधनों से समृद्ध किया। भारतीय चिंतन विविधता, साधना और मानवीय मूल्यों पर आधारित…
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अमर शहीद वीर नारायण सिंह छत्तीसगढ़ के प्रथम जननायक थे जिन्होंने 1856–57 के अकाल और अत्याचारों के विरुद्ध अपने प्राणों की आहुति दे दी। भूखी प्रजा के लिए व्यापारियों के गोदाम खोलने से लेकर अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष तक उनकी गाथा त्याग, साहस और जनसेवा का अमर स्मारक है…
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सन् 1910 का बस्तर भूमकाल अंग्रेजी अत्याचारों के विरुद्ध वनवासियों का सशक्त विद्रोह था, जिसका नेतृत्व वीर क्रांतिकारी गुण्डाधूर ने किया। जंगल अधिकारों, बेगारी, धर्मांतरण और शोषण से त्रस्त जनजातियों को उन्होंने संगठित किया। पारंपरिक अस्त्रों के साथ शुरू हुआ यह गुप्त संघर्ष ब्रिटिश प्रशासन को हिला गया और गुण्डाधूर…
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दक्षिणी बिहार का क्षेत्र छोटानागपुर के नाम से जाना जाता है। यहाँ रहने वाली एक पमुख जाति मुंडा कहलाती है। उलिहातू नामक ग्राम में, 15 नवम्बर 1875 को विरसा का जन्म हुआ। यह दिन पवित्र बृहस्पतिवार था। विरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा तथा माता का नाम करमी मुंडा…
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भारत के पूर्वी तट पर स्थित ओडिशा, एक ऐसी भूमि है जो अपनी अनूठी जगन्नाथ संस्कृति और गहरे आध्यात्मिक लोकाचार के लिए विश्व विख्यात है। यहाँ का जन-जीवन भगवान जगन्नाथ और देवी लक्ष्मी के इर्द-गिर्द बुना गया है। मंदिरों की भव्यता हो या लोक-कलाओं की सादगी, हर जगह एक समन्वय…
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यह लेख भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन गुमनाम नायकों को समर्पित है, जिन्होंने सरगुजा, बस्तर और मध्य छत्तीसगढ़ के जनजातीय अंचलों में अपने साहस, त्याग और स्वाभिमान से स्वतंत्रता की ज्योति प्रज्वलित की। माझी राम गोंड, महली भगत, राजनाथ भगत, राजमोहिनी देवी, मिनी माता और वीर गुंडाधूर जैसे वीरों…
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आंवला नवमी, कार्तिक मास की नवमी तिथि पर मनाया जाने वाला पर्व है, जिसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है। यह दिन त्रेतायुग के आरंभ की स्मृति से जुड़ा है और आयुर्वेद में आंवले के कायाकल्प गुणों का विशेष महत्व है। आंवला नवमी पर आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन…
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यह लेख भारतीय जनजातीय समाज के उस गौरवशाली इतिहास का अनावरण करता है जिसे प्रायः उपेक्षित कर दिया गया। निषादराज गुह, माता शबरी, रानी दुर्गावती, महारानी कमलापति और वीर नारायण सिंह जैसे व्यक्तित्वों के माध्यम से यह बताता है कि जनजातीय समाज केवल जंगलों का नहीं, भारत की आत्मा का…
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मथुरा भारत का एक प्राचीन और बहुआयामी सांस्कृतिक नगर है, जो धार्मिक, ऐतिहासिक और कलात्मक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यह नगर न केवल भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध है, बल्कि बौद्ध, जैन और वैष्णव परंपराओं का भी प्रमुख केन्द्र रहा है। कुषाण काल में मथुरा…
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कंबोडिया में भारतीय संस्कृति की छाप गहराई से दिखाई देती है। खमेर साम्राज्य के समय बने अंकोरवाट जैसे भव्य मंदिर दक्षिण भारतीय शैली का प्रतिरूप हैं। हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म, दोनों ही भारत से वहाँ पहुँचे और आज भी सांस्कृतिक संबंध जीवित हैं।
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सूर्य उपासना और लोकभक्ति का अद्भुत संगम — छठ पर्व भारतीय संस्कृति का एक ऐसा अनुष्ठान है जिसमें छठी मैय्या, जल, मिट्टी और सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। नहाय-खाय से लेकर अर्घ्य तक की यह यात्रा संयम, श्रद्धा और प्रकृति के प्रति समर्पण का प्रतीक है। बिहार…
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भरथरी भारतीय लोकगाथाओं और हिन्दी साहित्य के आदिकालीन संत-कवियों में प्रमुख माने जाते हैं। उनकी कथाएँ और पद्य लोकसाहित्य में गहरी पैठ बनाए हुए हैं। गृहस्थ जीवन से विरक्ति, पत्नी पिंगला और सामदेई से जुड़ी किंवदंतियाँ, तथा योगमार्ग की ओर उनका रुझान उन्हें जनमानस में अमर बनाता है। भरथरी की…
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द्वारिका को लेकर अनेक पुरातात्विक उत्खनन हुए हैं। प्रो. एच.डी. सांकलिया ने इसे ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी का माना, जबकि प्रो. एस.आर. राव ने 1400 ईसा पूर्व तक इसका अस्तित्व सिद्ध किया। समुद्र में मिली दीवारें, बुर्ज और व्यापारिक अवशेष द्वारिका के ऐतिहासिक सत्य को प्रमाणित करते हैं।
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डॉ. रेखा व्यास का यह लेख जीव-जंतुओं और मनुष्य के गहरे साहचर्य पर प्रकाश डालता है। इसमें बताया गया है कि प्रकृति के संतुलन और जीवों के साथ मित्रता हमारे जीवन को सुख, संतोष और संवेदनशीलता से भर देती है। जानवरों की सहज बुद्धि, सहनशीलता, निष्ठा और निश्छल प्रेम मानव…
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प्राचीन मथुरा में मित्र और दत्त राजवंशों के बाद शक क्षत्रपों का शासन प्रारम्भ हुआ। महाक्षत्रप रजुबल ने न केवल मथुरा को अपने अधीन किया बल्कि वहाँ के धार्मिक समन्वय को भी अपनाया। मथुरा में भागवत, शैव, शाक्त, जैन और बौद्ध परंपराएँ समान रूप से फल-फूल रही थीं। इसी वातावरण…
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भारतीय चित्रकला में विश्वरूप’ लेख में नीना रंजन जी ने गीता के विश्वरूप दर्शन की दार्शनिक और कलात्मक व्याख्या प्रस्तुत की है। इसमें कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिखाए गए विराट स्वरूप के ऐतिहासिक, धार्मिक और सौंदर्यपरक पहलुओं को भारतीय चित्रकला के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया है। लेख…
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कठपुतली कला भारत की प्राचीन लोककलाओं में से एक है, जिसका उल्लेख महाभारत, रामायण और पंचतंत्र जैसे ग्रंथों तक में मिलता है। लोककथाओं के अनुसार इसका उद्भव शिव-पार्वती से जुड़ा है, वहीं राजस्थान को इसका प्रमुख जन्मस्थल माना जाता है। धागा, छड़, छाया और दस्ताने जैसी विविध पद्धतियों में पाई…
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अहोई अष्टमी व्रत मातृत्व और संतान सुख की कामना से किया जाने वाला एक पवित्र पर्व है। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला यह व्रत सुहागिन महिलाएं अपनी संतान की दीर्घायु और समृद्धि के लिए करती हैं। इसे “कर्काष्टमी” भी कहा गया है। इस दिन…
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हिमाचल प्रदेश मंदिरों की भूमि है, जहाँ शिखर, पैगोडा, पहाड़ी, बौद्ध, बंगला, मुगल-सिख और शिलाचित्र शैलियों में बने मंदिर इसकी सांस्कृतिक धरोहर को संजोते हैं। काष्ठकला, नक्काशी और भित्तिचित्र यहाँ की अनूठी पहचान हैं।
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सुजननिकी या यूजैनिक्स को मानव जाति के गुणात्मक विकास का विज्ञान माना जाता है। पाश्चात्य देशों में यह विज्ञान आधुनिक तकनीकों जैसे क्लोनिंग और जीन संशोधन से जुड़ा है, जबकि भारत में वैदिक काल से ही ब्रह्मचर्य, विवाह-नियम, गोत्र परंपरा और अनुवांशिक अनुशासन के माध्यम से इसका पालन किया जाता…
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शिवलिंग केवल पूजा का प्रतीक नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का द्योतक है। संस्कृत में "लिंग" का अर्थ चिह्न है और शिवलिंग शिव के अनंत स्वरूप का प्रतीक माना गया है। शिव पुराण में इसे ज्योतिर्लिंग कथा से जोड़ा गया है, जहाँ शिव ने स्वयं को विराट स्तम्भ के रूप में…
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भारतीयता केवल भाषा या वेष-भूषा से नहीं, बल्कि उसके मूल्यों, सहिष्णुता और आध्यात्मिक परंपराओं से पहचानी जाती है। सत्य, धर्म और विविधता के सम्मान पर आधारित यह संस्कृति जगत को एकात्मता और मर्यादा का संदेश देती है।
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यह आलेख रानी दुर्गावती के साहस, शासन कौशल और बलिदान की गाथा प्रस्तुत करता है। शेरशाह सूरी और अकबर की सेनाओं का डटकर सामना करने वाली गढ़ा-मंडला की वीरांगना ने प्रजा-कल्याण और संस्कृति के संरक्षण के साथ भारतीय नारी....
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यह लेख अनिल शास्त्री द्वारा लिखित संस्मरण है, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के सादगीपूर्ण जीवन, पारिवारिक अनुभवों, त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और देशसेवा की गहरी झलक प्रस्तुत की गई है।
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झालावाड़ पुरातत्व संग्रहालय में 8वीं सदी की अद्वितीय मूर्तियाँ संरक्षित हैं। इनमें शिव-पार्वती के मिलन का प्रतीक अर्द्धनारीश्वर और भारत की एकमात्र चामुण्डा नवग्रह मूर्ति विशेष पहचान रखती हैं। ये मूर्तियाँ भारतीय मूर्तिकला की उत्कृष्ट कला और धार्मिक दर्शन को प्रदर्शित करती हैं।
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छत्तीसगढ़ की लोक आस्था में पूजित पतई माता ग्राम्य जीवन की संरक्षिका लोकदेवी मानी जाती हैं। ग्रामीण इलाकों में पतई माता की पूजा अर्चना विशेष उत्सव और मेलों के रूप में होती है, जहाँ श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ति और ग्राम रक्षा हेतु अटूट विश्वास के साथ दर्शन करने आते हैं।
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गोलू नवरात्रि का एक विशेष उत्सव है जो मुख्य रूप से तमिलनाडु में मनाया जाता है। यह महिषासुर वध और माँ दुर्गा की विजय का प्रतीक है। गोलू में मूर्तियों को सीढ़ियों पर सजाया जाता है, जो सृष्टि के संतुलन और शक्ति स्वरूपा देवी की महिमा को दर्शाता है। यह…
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छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बागबाहरा कला ग्राम में माता खल्लारी थापना, माता चंडी थापना और माता काली मंदिर स्थित हैं। इन तीनों देवियों की स्थापना आस्था, किवदंती और श्रद्धा से जुड़ी है। नवरात्रि के अवसर पर यहाँ मनोकामना ज्योति कलश प्रज्ज्वलित होते हैं और भक्तजन दूर-दूर से दर्शन करने…
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यह आलेख इतिहास और लोकसाक्ष्यों की भूमिका को स्पष्ट करता है। पारंपरिक इतिहास में सत्ता और शासकों के दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी गई है, जबकि वास्तविक इतिहास जनता के जीवन, संस्कृति और संघर्षों में निहित है। शिलालेखों और राजकीय अभिलेखों से अलग लोकगीत, कथाएँ, कहावतें, लोकनाट्य, मूर्तियाँ और चित्रांकन अधिक…
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छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के नवागढ़ तहसील स्थित बुचीपुर गाँव माँ महामाया के पावन धाम के रूप में विख्यात है। 18वीं शताब्दी से आरंभ हुई यह परंपरा आज भी भक्तों को आत्मिक शांति और मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद देती है। चैत्र और कुँवार माह में यहाँ ज्योति कलश प्रज्ज्वलित करने…
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लगातार वर्षा के बीच बिलासपुर से सीपत–बलौदा मार्ग पर स्थित ग्राम डोंगरी पहुँचे तो प्रकृति और आस्था का अनोखा संगम अनुभव हुआ। यहाँ “आदि शक्ति माँ सरई श्रृंगारिणी देवी धाम” में घने वृक्षों, भैरव बाबा मंदिर, परिमलानंद द्वार, विशाल वटवृक्ष, पवित्र सरई वृक्ष और माँ सरई श्रृंगारिणी के दिव्य मंदिर…
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छत्तीसगढ़ शक्ति उपासना की भूमि है जहां प्राचीन काल से ग्रामदेवी और कुलदेवी के रूप में देवियों की पूजा होती रही है। रतनपुर की महामाया, सरगुजा की समलेश्वरी और महामाया, चंद्रपुर की चंद्रसेनी, बस्तर की दंतेश्वरी और डोंगरगढ़ की बमलेश्वरी देवी जैसे प्रमुख शक्ति स्थल आज भी जन-आस्था के केंद्र…
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सारंगढ़ के ग्राम कनकबीरा में स्थित विंध्यवासिनी देवी मंदिर बिंझवार समाज की कुल देवी का प्राचीन आस्था केंद्र है। पूर्वजों द्वारा पत्थरों के बीच दीप जलाकर की जाने वाली पूजा परंपरा से यह स्थल जुड़ा है। 2017 में मंदिर निर्माण आरंभ हुआ और 2018 में प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई। यह…
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यह आलेख नवरात्रि के महत्व और उसकी आध्यात्मिक-सांस्कृतिक गहराई पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि नवरात्रि केवल देवी उपासना का पर्व नहीं, बल्कि शक्ति संचयन का अवसर है। माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के माध्यम से बुद्धि, श्रम, ऊर्जा और श्री जैसी त्रिगुणात्मक शक्तियों का जागरण…
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यह आलेख 'लोक विवेक' की अवधारणा को वाचिक परम्परा और भारतीय समाज के संदर्भ में समझने का प्रयास करता है। इसमें बताया गया है कि लोक विवेक केवल लिखित परम्परा से नहीं, बल्कि लोकजीवन के अनुभव, कहावतों, व्यंग्य, गीतों और मिथकीय प्रतीकों (जैसे घाघ, भड्डुरी, लाल बुझक्कड़) के माध्यम से…
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ब्रजभूमि श्रीकृष्ण की वंशी और राधा-ब्रजांगनाओं के मंजीरों से झंकृत लोकसंगीत की पवित्र भूमि है। यहां भजन, रसिया, मल्हार, धमार, बरना, देवी-गीत आदि विविध लोकगीतों में ढोलक, मंजीरा, खड़ताल, झालरि, बांसुरी, नगाड़ा, डफ, चंग और शहनाई जैसे लोकवाद्य संगति देते हैं। ब्रज के संगीत में गीत, नृत्य और वाद्य का…
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ओनाकोना, बालोद जिले का एक अद्भुत प्राकृतिक पर्यटन स्थल है जिसे "छत्तीसगढ़ का सुघ्घर ठउर" कहा जाता है। गंगरेल बांध के पार बसा यह गांव अपनी रमणीय प्राकृतिक छटा, आधा बने भव्य शिवमंदिर और शांत वातावरण के लिए प्रसिद्ध है। जल, जंगल और जमीन पर आधारित यहां की जीवनशैली, लोककथाओं…
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भारतीय प्राचीन कथाओं में सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का गहरा संदेश निहित है। वैदिक साहित्य, पुराण, रामायण, महाभारत, जैन-बौद्ध ग्रंथों और पंचतंत्र जैसी रचनाओं में प्रस्तुत कथाएं केवल मनोरंजन के लिए नहीं रची गईं, बल्कि परिवार, समाज, सहयोग, त्याग, सहिष्णुता और सद्भावना जैसे जीवन मूल्यों को स्थापित करने का माध्यम…
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काष्ठ कला का इतिहास अत्यंत प्राचीन है, जिसके प्रमाण वैदिक काल, हड़प्पा सभ्यता और मौर्यकाल तक मिलते हैं। विश्व स्तर पर मिस्र, ग्रीस, रोम और पारस में काष्ठ कला का विकास हुआ, वहीं भारत में मौर्यकालीन पाटलिपुत्र, अजन्ता-भाजा-कर्ले की गुफाओं और गुजरात की हवेलियों व मंदिरों में इसके उत्कृष्ठ नमूने…
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यह आलेख स्वामी विवेकानंद के 1893 के शिकागो धर्मसभा संभाषण के महत्व और भारत की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक परंपरा पर उनके विचारों को उजागर करता है। इसमें बताया गया है कि विवेकानंद ने भारत की पहचान धर्म, संस्कृति और वैदिक परंपरा में निहित बताई थी। उनका मानना था कि राष्ट्रीयता का मूल…
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साँझी एक प्राचीन लोक पर्व है, जो पितृपक्ष में कुँवारी कन्याओं द्वारा संध्या उपासना के रूप में मनाया जाता है। ब्रज में यह कला परंपरा श्रीराधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़कर पुष्प, रंग और जल साँझी के रूप में विकसित हुई। 18वीं सदी में महाराजा सावंतसिंह ‘नागरीदास’ ने वृंदावन के ब्रह्मकुंड…
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कैथल, हरियाणा का एक प्राचीन नगर है जिसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में "कपिस्थल" नाम से मिलता है। यहाँ बावली, कुंड और पातालेश्वर मंदिर जैसे कई स्मारक उत्तर-मध्यकालीन भारतीय संस्कृति की धरोहर हैं। लखौरी ईंटों से बने ये स्थापत्य आज भी ऐतिहासिक वैभव का परिचय देते हैं, परंतु देखरेख की कमी…
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झाँसी जनपद उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पश्चिमी छोर पर स्थित है, जिसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक है। इसका प्राचीन नाम बलवंतनगर था और यह नगर ओरछा नरेश राजा वीरसिंह देव द्वारा स्थापित किया गया था। झाँसी प्रागैतिहासिक काल से मानव निवास का क्षेत्र रहा है, जहाँ पाषाणयुगीन उपकरण, ताम्रपाषाणकालीन अवशेष…
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यह आलेख पितृपक्ष की लोक-परंपरा, शास्त्रीय महत्व और सांस्कृतिक अर्थ को स्पष्ट करता है। इसमें छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन से लेकर पुराणों में वर्णित पितरों के महत्व तक की झलक मिलती है। पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता भाव किस प्रकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी संस्कारों का हिस्सा बना, इसका विस्तार से वर्णन…
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ईन्द पर्व झारखण्ड का एक प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव है जिसकी परंपरा लगभग दो हजार वर्षों से चली आ रही है। नागवंशी शासकों के काल से जुड़ा यह पर्व विभिन्न समुदायों की सहभागिता, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इन्द्रदेव की कृपा और अच्छी वर्षा की कामना…
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यह आलेख डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन, शिक्षण दर्शन और विचारों पर प्रकाश डालता है। इसमें माता-पिता और गुरु की भूमिका, गुरु-शिष्य परंपरा, शिक्षा का महत्व, तथा धर्म और विज्ञान के परस्पर पूरक संबंध को विस्तार से समझाया गया है। डॉ. राधाकृष्णन का मानना था कि शिक्षा केवल ज्ञान का…
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ओणम केरल का प्रमुख पर्व है, जो राजा महाबली की स्मृति में मनाया जाता है। यह त्यौहार दानशीलता, समानता और सामूहिक आनंद का प्रतीक है, जहाँ पुक्कलम, ओणम साद्या और वल्लमकली जैसी परंपराएँ लोगों को एकता और उदारता का संदेश देती हैं।
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यह आलेख छत्तीसगढ़ की वाचिक परंपराओं में हाना (मुहावरे/लोकोक्तियों) की महत्ता को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि कैसे हाना लोकजीवन के अनुभवों, प्रकृति, इतिहास, धर्म, समाज और पारिवारिक जीवन से जन्म लेकर छत्तीसगढ़ की संस्कृति का दर्पण बनते हैं। कम शब्दों में गहरी बात कहने की क्षमता, हास्य…
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यह आलेख गणेश चतुर्थी और गणेशोत्सव की ऐतिहासिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करता है। इसमें लोकमान्य तिलक द्वारा गणपति महोत्सव को राष्ट्रीय जागरण और सामाजिक समरसता का माध्यम बनाने की भूमिका का उल्लेख है। साथ ही महाराष्ट्र में गणपति उत्सव की पारिवारिक परंपराओं, पूजन-विधि, विसर्जन रीति और भाद्रपद…
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यह आलेख लद्दाख की समृद्ध बौद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहरों, धार्मिक प्रतीकों, नृत्य-गीतों और सामाजिक जीवन पर केंद्रित है। स्तूप, "ॐ मणि पद्मे हूं" जैसे मंत्र, गोम्पा, तांत्रिक परंपरा और पारंपरिक लोकनृत्य लद्दाख की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं। लेख में सम्राट अशोक से लेकर महायान परंपरा, तिब्बती प्रभाव और आधुनिक…
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यह आलेख स्वास्तिक चिह्न के भारतीय सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व को विस्तारपूर्वक उजागर करता है। वैदिक मंत्रों से लेकर आधुनिक परंपराओं तक, स्वास्तिक शुभता, मंगलकामना और विश्व कल्याण का प्रतीक रहा है। गणपति पूजा, विवाह, त्यौहार, वास्तु, आभूषण, व्यापार, और धार्मिक अनुष्ठानों में इसका उपयोग व्यापक रूप से होता…
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यह आलेख भारतीय संस्कृति की समृद्ध यात्रा, उसकी कलात्मक, दार्शनिक और सामाजिक विशेषताओं का व्यापक वर्णन करता है। इसमें प्राचीन भारत की मूर्तिकला, चित्रकला, नाट्यकला, नृत्यकला, शिक्षा, दर्शन और जीवन मूल्यों से लेकर वर्तमान समय में संस्कृति पर पड़ते पाश्चात्य प्रभाव तक की चर्चा की गई है। आलेख यह भी…
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छत्तीसगढ़ का तीजा व्रत महिलाओं का प्रमुख त्योहार है, जिसे सरगुजा से लेकर बस्तर तक बड़े उत्साह से मनाया जाता है। इसमें विवाहित, अविवाहित और निसंतान महिलाएं शंकर-पार्वती की पूजा कर सुहाग, संतान और मनोवांछित वर की कामना करती हैं। बस्तर अंचल में तीजा जगार का विशेष आयोजन होता है…
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यह आलेख राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में अभिव्यक्त मानव प्रेम, समता, संवेदनशीलता और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की उदात्त भावना को दर्शाता है। गुप्त जी ने धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंगों के माध्यम से मनुष्यत्व, त्याग, करुणा, और वसुधैव कुटुंबकम् की चेतना को काव्य में पिरोया। उनके राम मानव-प्रेम के…
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यह आलेख भारतीय संस्कृति की उदार, आध्यात्मिक और समन्वयकारी भावना का विश्लेषण करता है। विविधताओं में एकता, लोककलाओं, साहित्य, दर्शन, जीवन-मूल्यों और आत्मिक विकास के माध्यम से यह संस्कृति न केवल भारत को जोड़ती है, बल्कि विश्व को भी दिशा देती है। "वसुधैव कुटुंबकम" और "सर्वे भवन्तु सुखिनः" जैसे विचार…
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यह लेख स्वामी दयानंद सरस्वती की दृष्टि से पौराणिक अवतारों की वैज्ञानिक व्याख्या करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे मत्स्य से लेकर श्रीराम और श्रीकृष्ण तक के अवतार, मानव सभ्यता और प्रकृति के क्रमिक विकास का प्रतीक हैं। जल, मृदा, वनस्पति, पशु और मानव रूपी विकास की इस…
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उड़िया भाषा का विकास पूर्वमागधी अपभ्रंश से होकर 11वीं शताब्दी में प्रारंभ हुआ, जिसका प्रमाण उर्जाम शिलालेख एवं चर्यागीतिका में मिलता है। इस विस्तृत आलेख में उड़िया लोक साहित्य के विविध आयामों – जैसे लोकगीत, लोककथा, लोकनाट्य, गाथाएं, कहावतें, झूला गीत, श्रम गीत, मंत्र गीत आदि – का विश्लेषण किया…
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यह आलेख रामभक्ति काव्य की सांस्कृतिक शक्ति, ऐतिहासिक प्रामाणिकता, और भारतीय समाज में उसकी सर्वव्यापकता का विश्लेषण करता है। वैदिक युग से लेकर मध्यकालीन संत परंपरा, रामायण-महाभारत, पुराणों, दक्षिण भारतीय आलवार संतों, रामानुजाचार्य और आदिवासी परंपराओं तक राम की भक्ति ने भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में बाँधा है। यह…
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यह लेख वैदिक काल की पवित्र सरस्वती नदी के ऐतिहासिक, भूगोलिक और सांस्कृतिक महत्व को उजागर करता है। ऋग्वेद में वर्णित इस महान नदी के लुप्त हो जाने की प्रक्रिया, मार्ग परिवर्तन, भू-वैज्ञानिक परिवर्तनों और आधुनिक वैज्ञानिक खोजों के आधार पर इसका विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। सरस्वती केवल नदी…
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यह लेख पर्यटन और भारतीय साहित्य के गहरे संबंध को उजागर करता है। यात्रा के अनुभवों ने किस प्रकार धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक चेतना, साहित्यिक अभिव्यक्ति और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को जन्म दिया—लेख में इसका विश्लेषण किया गया है। भक्त कवियों से लेकर आधुनिक यात्रावृत्त लेखकों तक, भारतीय भाषाओं में यात्रा-साहित्य की…
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यह आलेख लेखक की थाईलैंड यात्रा के माध्यम से वहां की सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई परंपराओं में समाई भारतीयता की खोज है। बैंकाक की गलियों से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों और रामकीयन नाट्य मंचन तक, हर दृश्य में भारत की सांस्कृतिक छाया विद्यमान है। रामायण, संस्कृत, वैदिक परंपरा और बौद्ध दर्शन…
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यह आलेख गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित शांतिनिकेतन और विश्वभारती विश्वविद्यालय की कल्पना, स्थापना, सिद्धांतों, सांस्कृतिक चेतना और शैक्षणिक प्रयोगों की गहराई से पड़ताल करता है। यह बताता है कि किस प्रकार विश्वभारती, केवल शिक्षा का केंद्र नहीं बल्कि वैश्विक संस्कृति और भारतीय आत्मा के संगम स्थल के रूप में…
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तृश्शूर पूरम केरल का एक भव्य और जीवंत उत्सव है, जो शिवमंदिर के चारों ओर फैले परिक्रमा पथ में हाथियों की शोभायात्रा, पारंपरिक वाद्ययंत्रों की नाद लहरियों, रंग-बिरंगे छातों की छटा और रात की आतिशबाज़ी से सजीव हो उठता है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि केरलीय जनजीवन, लोककला और…
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यह आलेख 16 वर्षीय वनबाला वीरांगना दयावती कंवर के अद्भुत साहस की कहानी है, जिन्होंने 1930 में तमोरा गांव के जंगल सत्याग्रह के दौरान पुलिस के लाठीचार्ज और संगीनों के सामने डटे रहकर सत्याग्रहियों की रक्षा की। दयावती का यह बलिदान और निर्भीकता छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में…
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यह आलेख मानव सभ्यता में राज-सत्ता और धर्म-सत्ता के संबंधों, उनके संघर्षों, और 'करुणा' के सिद्धांत पर आधारित बुद्ध-दर्शन की प्रासंगिकता पर केंद्रित है। लेख बताता है कि किस प्रकार करुणा आधारित आध्यात्मिक चेतना ही समकालीन वैश्विक संकटों का समाधान बन सकती है। इसमें बौद्ध और वैदिक परंपराओं की समान…
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यह आलेख अखंड भारत दिवस (14 अगस्त) और पेशवा बाजीराव प्रथम जयंती (18 अगस्त 1700) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व सामरिक महत्व को जोड़ते हुए प्रस्तुत करता है। इसमें बाजीराव पेशवा की अखंड भारत की भू-सांस्कृतिक अवधारणा, उनकी अद्वितीय युद्धनीति, अविजित सैन्य अभियानों और भारत के व्यापक एकीकरण में उनके योगदान…
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खमरछठ (हलषष्ठी) छत्तीसगढ़ का एक अद्वितीय लोकपर्व है, जो भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को माताओं द्वारा संतान की दीर्घायु और सुखमय जीवन की कामना के लिए व्रत रूप में मनाया जाता है। इसमें हलषष्ठी देवी की पूजा, ‘सगरी’ निर्माण, पसहर चावल, भैस के दूध-दही-घी का उपयोग, और…
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यह आलेख भोजपुरी अंचल की लोकगीत परंपरा ‘पवाँरा’ पर केंद्रित है, जो गीत, कथा और नाट्य के अद्भुत समन्वय से जीवन के संस्कारों, पर्वों और सामाजिक मूल्यों को प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से शिशु जन्म जैसे अवसरों पर गाया जाने वाला यह गीत-नृत्य ग्रामीण समाज में आज भी भावनात्मक…
Read Moreयह आलेख दीपावली के सांस्कृतिक महत्व और उससे जुड़े प्रतीक चिह्नों—विशेषतः स्वस्तिक और मंगलकलश—की व्याख्या करता है। भारतीय परंपरा में इन प्रतीकों का न केवल धार्मिक उपयोग है, बल्कि वे सौंदर्य, शुभता और आध्यात्मिक चेतना का भी प्रतीक हैं। आलेख स्वस्तिक के विविध अर्थों, रूपों, धार्मिक मंत्रों और ऐतिहासिक दृष्टिकोण…
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यह आलेख छोटानागपुर के ऐतिहासिक भूगोल, जनजातीय और सदान समुदायों की सांझी सांस्कृतिक परंपराओं तथा करम-पर्व की गहराई से विवेचना करता है। करम पर्व आदिवासी और सदान हिन्दुओं की साझी श्रद्धा और सह-अस्तित्व की अनूठी मिसाल है, जिसमें लोककथाएं, झूमर, नृत्य-संगीत और धार्मिक विश्वास गहराई से जुड़े हैं। आलेख में…
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यह आलेख भारतीय दर्शन के 'सत्यं-शिवं-सुन्दरं' आदर्श को गहराई से विश्लेषित करता है, जो न केवल जीवन के आध्यात्मिक, नैतिक और सौंदर्यात्मक पक्षों को एक सूत्र में पिरोता है, बल्कि जीवन के सत्य, कल्याण और सौंदर्य की व्यापक व्याख्या भी प्रस्तुत करता है। लेख यह दर्शाता है कि यह आदर्श…
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यह आलेख सामाजिक संरचना में संस्कृति की केंद्रीय भूमिका, नैतिक मूल्यों के क्षरण, और औद्योगीकरण व पाश्चात्य प्रभाव के चलते बदलते सामाजिक संबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। लेख बताता है कि कैसे आधुनिकता के आकर्षण में हमारी सांस्कृतिक विरासत, लोककलाएँ, और पारंपरिक जीवन मूल्य धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं…
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यह आलेख समाज और संस्कृति के गहरे संबंधों पर प्रकाश डालता है। इसमें बताया गया है कि संस्कृति समाज का नैतिक और आदर्श रूप होती है, जो व्यक्ति के आचरण, विचार और जीवन-मूल्यों से निर्मित होती है। औद्योगीकरण, पाश्चात्य प्रभाव और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के चलते भारतीय समाज में पारंपरिक मूल्य…
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गढ़वाल और कुमाऊँ का मध्य हिमालयी क्षेत्र न केवल भौगोलिक दृष्टि से अद्वितीय है, बल्कि सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है। यह क्षेत्र वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक विभिन्न सभ्यताओं, जातियों और परंपराओं का संगम रहा है। यहाँ की नदियाँ, पर्वत, तीर्थ, लोक विश्वास…
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यह आलेख भारतीय लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक मूल्यों की पृष्ठभूमि में सार्वजनिक पुस्तकालयों की भूमिका पर प्रकाश डालता है। भारत की प्राचीन संस्कृति और आधुनिक शिक्षा के सेतु के रूप में पुस्तकालय एक सांस्कृतिक केंद्र बनते हैं। राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान जैसी संस्थाएं देशभर में पठन-पाठन संस्कृति के प्रचार-प्रसार और…
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यह आलेख भारतीय संस्कृति की जड़ों में प्रकृति, धर्म और नीलकंठ शिव की प्रतीकात्मकता को केंद्र में रखकर गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे पंचमहाभूतों की समरसता से संस्कृति का विकास होता है और प्रकृति से असंतुलन विकृति को जन्म देता है। आधुनिक भौतिकतावादी संस्कृति…
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इंडोनेशिया भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक है, जहां हजारों वर्षों से भारत की सनातन परंपराएं, रामायण-महाभारत की कथाएं, हिंदू देवी-देवताओं की पूजा और संस्कृत भाषा की छाप आज भी गहराई से दिखती है। बाली द्वीप का धार्मिक जीवन, जावा के रामलीला मंचन, इंडोनेशियाई मुद्रा व प्रतीक चिन्हों में भारतीय संस्कृति…
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छत्तीसगढ़िया लोक समाज में विभिन्न परंपराओं की अद्भुत छटा देखने को मिलती है। यहाँ शैव, वैष्णव और शाक्त मत के अलावा सिद्धों और नाथों का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। हरियाली अमावस्या को मनाए जाने वाले पर्व "हरेली" को कृषि यंत्रों की पूजा के साथ गांव देहात में मंत्र दीक्षा
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यह आलेख वर्षा की कामना हेतु किए जाने वाले पारंपरिक लोक अनुष्ठान "इंद्र पूजा" पर आधारित है, जो भारत के विभिन्न अंचलों में सदियों से संपन्न होता आया है। विशेषकर निमाड़ अंचल की ‘ध्रुव पूजा’ पर केंद्रित यह लेख लोकविश्वास, लोकगीतों और प्रतीकात्मक क्रियाओं के माध्यम से इंद्रदेव को मनाने…
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प्रो. कल्याणदास महंत छत्तीसगढ़ की माटी से उपजे एक ऐसे नृत्य सम्राट थे, जिन्होंने कथक नृत्य, संगीत और अभिनय के माध्यम से रायगढ़ घराने की परंपरा को देश-विदेश में सम्मान दिलाया। उन्होंने केवल मंच पर ही नहीं, बल्कि शिक्षण संस्थानों और साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों में भी अपनी कला से नई पीढ़ी…
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उन्नीसवीं शताब्दी का आरंभ अंग्रेजों द्वारा भारतीय शिक्षा, संस्कृति, परंपरा और समाज के मानसिक दमन के अभियान का समय था। गुरुकुल नष्ट कर दिये गये थे, चर्च और वायबिल आधारित शिक्षा आरंभ करदी थी। ऐसे समय में किसी ऐसे व्यक्तित्व की आवश्यकता थी, जो भारतीय समाज में आत्मविश्वास जगाकर अपने
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इसे बस्तर का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिये कि इसे जाने-समझे बिना इसकी संस्कृति, विशेषत: इसकी जनजातीय संस्कृति, के विषय में जिसके मन में जो आये कह दिया जाता रहा है। गोंड जनजाति, विशेषत: इस जनजाति की मुरिया शाखा, में प्रचलित रहे आये "घोटुल" संस्था के विषय में मानव विज्ञानी
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भारतीय संस्कृति में पक्षियों को केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं, बल्कि देवताओं के वाहन, प्रेम, बुद्धि और सामाजिक मूल्यों के प्रतीक रूप में देखा गया है। इस आलेख में वाल्मीकि से लेकर कौटिल्य तक के ग्रंथों और वेदों में वर्णित पक्षियों की गरिमा, लोक परंपराओं, साहित्यिक भावनाओं और संरक्षण की…
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छत्तीसगढ़ के गरियाबंद स्थित राजिम नगर, प्राचीन पद्मावतीपुरी, एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर है जहाँ महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों का संगम होता है। यहाँ की दिव्य कन्या माता राजिम ने भक्ति, सेवा और विद्वता से तैलिक वंश को गौरव प्रदान किया। उनका पूज्य विग्रह राजिमलोचन आज भी इस…
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सरगुजा अंचल के करमा, सुआ, शैला जैसे लोकनृत्यों में खिसरा एक हास्यप्रिय पात्र होता है, जो अपने अभिनय से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करता है। ग्रामीण सांस्कृतिक आयोजनों में आज भी खिसरा परंपरा जीवित है।
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यह लेख लोक साहित्य और लोक संस्कृति की उस जीवन्त परंपरा को उजागर करता है, जो भारतीय जनमानस की आत्मा, संवेदनाओं और संस्कारों का प्रतिबिंब है। इसमें लोकगीतों, कथाओं, गाथाओं, रीति-रिवाजों, त्योहारों और जन-विश्वासों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के गहरे अर्थ, सामाजिक मूल्य, और जीवन-दर्शन को रेखांकित किया गया…
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कवि भूषण – वीर रस के शिरोमणि, शौर्य, साहस, देशभक्ति और बलिदान की प्रेरक हिंदी कविताओं के रचयिता। उन्होंने लगभग 17वीं शताब्दी (छत्रपति शिवाजी महाराज के शासनकाल) में उनके पराक्रम, धर्मोद्धार और हिंदवी स्वराज की स्थापना पर ओजपूर्ण कविताएँ रचीं, जो राष्ट्रीय गर्व जगाती हैं। शिवा जी पर उनकी लिखी…
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जीवन अच्छी तरह से जीने के लिए, उसके बीच गुजरते हुए ऐसा बहुत कुछ जो अनावश्यक है, आवश्यक सा जान पड़ता है इसीलिए जीने के हर क्षण को उत्सव की तरह जिया जाये तो शक्ति का संचार बना रहता है। संभवतः इसीलिए ऋतुओं के अनुसार बांटी गई भारतीय आध्यात्मिक और…
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विक्रम संवत नव संवत्सर विशेष आलेख
भारत व्रत, पर्व व त्योहारों का देश है। यूं तो हम हर दिन को पावन मानते हैं। महापुरुषों के निधन के दिनों पर भी हम शोक व्यक्त करने के स्थान पर उसे पुण्यतिथि के रूप में मनाते हुए कुछ नव-संकल्पों के साथ उनके बताए…
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परम वैभवशाली भारत माता का पाथेय है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
आ सिंधु-सिंधु पर्यन्ता, यस्य भारत भूमिका। पितृभू- पुण्यभूभुश्चेव सा वै हिंदू रीति स्मृता॥ इस श्लोक के अनुसार "भारत के वह सभी लोग हिंदू हैं जो इस देश को पितृभूमि-पुण्यभूमि मानते हैं" वीर दामोदर सावरकर के इस दर्शन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक…
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डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जिन्होंने अपने छोटे से कमरे में एक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव रखी। आज देश का ही नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है। नागपुर के डॉक्टर हेडगेवार समिति मंदिर में डॉ. हेडगेवार की प्रतिमा पर किसने फूल चढ़ाये यही मीडिया के लिए कई दिनों…
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समस्त ब्रह्मांड की रीति - नीति का संचालन किसी एक नियत व्यवस्था के अंतर्गत होता है। भारतीय ऋषियों ने इस व्यवस्था को 'ऋत' कहा है। ऋत अर्थात् नैसर्गिक नियम। सूर्य, चंद्रमा, तारे, दिन-रात आदि इसी नियम द्वारा संचालित होते हैं, ऋत- वैदिक धर्म में सही प्राकृतिक व्यवस्था और संतुलन के…
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“जो आँखें देशहित जागी, वो हरगिज़ सो नहीं सकती।
जिस्म के ख़ाक होने पर भी, शोहरत खो नहीं सकती।
भले दौलत की ताक़त से खरीदो, सारी दुनिया को,
शहादत की मगर कोई भी क़ीमत हो नहीं सकती।। ”
भारत को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने के दो मुखर स्वर…
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(23 मार्च, बलिदान दिवस पर विशेष)
Read More‘एक जीवन और एक ध्येय’ वाले तीन मित्र भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु, इन तीनों की मित्रता क्रांति के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। बसंती चोला के इन दीवानों की ऐसी मित्रता थी जो जीवन के अंतिम क्षण तक साथ थी और बलिदान के बाद…
भारत का हृदय प्रांत छत्तीसगढ़ एक उत्सव प्रिय राज्य होने के साथ ही लोककलाओं का कुबेर भी है।इसके अधिकांश हिस्से में ग्रामीण आदिवासी निवास करते हैं।लगभग वर्ष भर यहां विविध पर्वों और उत्सवों का आयोजन होता रहता है। प्राचीन काल से ऐसे उत्सवों पर उल्लास की अभिव्यक्ति छत्तीसगढ़ के कलाकार…
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होली का त्यौहार हो और ब्रज का ध्यान न आये, ऐसा हो ही नहीं सकता। होली का ब्रज में विशेष महत्व है। इसीलिए होली और ब्रज एक दूसरे का पर्याय बन गये हैं। श्रीकृष्ण होली के नायक हैं और नायिका राधारानी हैं। राधा -कृष्ण की दिव्य होली प्रति वर्ष ब्रज…
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स्वामी दयानंद सरस्वती की आज जयंती है। स्वामी दयानंद आर्य समाज के संस्थापक, आधुनिक भारत के महान चिंतक, समाज-सुधारक और देशभक्त थे। स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में हुआ था। मूल नक्षत्र में जन्म होने के कारण उनका नाम मूलशंकर रखा गया।
स्वामी…
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भारतीय राजनीति के वृहदाकाश में दैदीप्यमान पं. दीनदयाल उपाध्याय अपने राष्ट्रीय विचारों, राष्ट्रवाद व भारतीय सनातन हिन्दू संस्कृति के मुखर पक्षधर व तदानुरुप रीति-नीति के आधुनिक राजनैतिक प्रवर्तकों में लब्ध-प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने केवल विचार ही नहीं दिए,अपितु जनसंघ व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से विचारों को धरातलीय रुप भी…
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पूरी दुनिया में श्री राम मंदिर के निर्माण को लेकर जबरजस्त उत्साह देखा जा रहा है। देश में भगवान श्री राम से जुड़ी कई कथाओं की चर्चा हो रही है लोग अपने अपने ढंग से भगवान श्री राम को अपने से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं यहां तक कि…
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लोककला मन में उठने वाले भावों को सहज रुप में अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्वत: स्थानांतरित हो जाने वाली विधा है। लोक कला हमारी संस्कृति की पहचान होती है, हमारी खुशी को प्रकट करने का माध्यम होती है।
लोककला का क्षेत्र…
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उन्होंने कहा था -ग़ुलामी के बन्धनों में जीना याने स्वयं की ज़िन्दगी को तबाह करना है। लेकिन यह भी सच है कि आज़ादी भले ही हमें प्यारी हो, पर उसे पाने का रास्ता हमेशा कठिन चुनौतियों से भरा होता है। – अपने इन्हीं विचारों पर अडिग रहते हुए लाला लाजपतराय…
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आज का भारतीय गणतंत्र स्वतंत्रता के बाद पहली बार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पुनर्स्थापना के परिप्रेक्ष्य में मनाया जा रहा है। भारतीय संविधान के निर्माता भली-भांति जानते थे कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के आदर्श विवादों को समाधान की ओर ले जाते हैं। इसीलिए संविधान की मूल हस्तलिखित प्रति में राम-दरबार…
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इतिहास साक्षी है कि पुण्यभूमि भारत की गाथा सहस्त्रों वर्षों के कठोर संघर्ष की गौरव गाथा है। इस शांतिप्रिय देश पर निरंतर कुठाराघात होने के कारण यहाँ के जनमानस में घोर निराशा छा गई थी। भारतवासियों का स्वाभिमान सो गया था, यह देश अपना गौरवशाली इतिहास, अपनी महान संस्कृति, अस्तित्व…
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महर्षि अरविन्द कहते हैं कि श्रीराम का अवतार किसी आध्यात्मिक साम्राज्य की स्थापना के लिए नहीं हुआ था। राम परमात्मा थे, जिन्होंने मानवीय मानसिकता के आधार को स्वीकार किया और उसे शोभामय सम्मान दिया। माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर कहते हैं कि संपूर्ण भारतीय समाज के लिए समान आदर्श के रूप में…
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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 75 कि मी, जिला मुख्यालय महासमुंद से 25 कि. मी. रायपुर-पदमपुर राष्ट्रीय राजमार्ग में अवस्थित खल्लारी मध्यकालीन ऐतिहासिक स्थल है। इस ऐतिहासिक स्थल के स्मरण में खल्लारी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र का गठन हुआ है जो बागबाहरा विकासखंड के अंतर्गत ग्राम पंचायत है।
इतिहासकार यहां…
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अयोध्या में रामजन्म स्थान मुक्ति के लिये सशस्त्र संघर्ष और बलिदान का ही सबसे लंबा इतिहास नहीं है। इतनी लंबी अवधि तक चलने वाली कानूनी लड़ाई का उदाहरण भी दुनियाँ में दूसरा नहीं है। कोई पाँच सौ वर्षों के कुल संघर्ष में लगभग एक सौ साठ साल कानूनी लड़ाई के…
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भारतीय संस्कृति में नदियों के संगम पर विभिन्न धार्मिक कार्यों के संपादन की प्राचीन परम्परा रही है। इसी परम्परा में संक्राति पर्वों पर स्नान-दान एवं ध्यान की परम्परा भी है। संक्रांति पर भारत में नदियों के तट पर मेले लगते हैं, हमारा छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नही है। यहाँ भी…
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प्राचीन काल से ही भारत भूमि महान ऋषि-मुनियों की जननी रही है। गुरु-शिष्य परंपरा से सुशोभित इस धरा पर अनगिनत संत और महापुरुष जन्में, जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन किया। अपने तेज, त्याग और तपस्या से संपूर्ण ब्रह्माण्ड को आलोकित किया। सदियों से ही धर्म भारत की आत्मा रही है…
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12 जनवरी युवा दिवस विशेष आलेख
‘उठो! जागो!…और लक्ष्य प्राप्ति तक रूको मत!‘ भारत की आध्यात्मिक शक्ति, सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का गौरव विश्वभर में स्थापित करते हुए मानवता के कल्याण और राष्ट्र पुनरूत्थान के प्रति जीवन समर्पित कर देने वाले युवा सन्यासी स्वामी विवेकानन्द का यह हृदयभेदी आह्वान…
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गोस्वामी तुलसीदास जी रचित श्रीरामचरितमानस में वर्णित लक्ष्मण-सुमित्रा संवाद में लक्ष्मण भावपूर्ण होकर कहते हैं-‘‘अवध तहाँ जहँ राम निवासु। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।। इसका भावार्थ है कि ‘जहाँ सूर्य का प्रकाश हो वहीं दिन होता है, इसी प्रकार जहाँ श्रीराम का निवास हो वहीं अयोध्या है।‘ मानस में इस…
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छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित राजिम नगर को प्राचीन काल में पद्मावतीपुरी और कमल क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। ईसवी सन की चौथी-पांचवीं सदी में हैहयवंशी राजा जगतपाल के काल में तैलिक वंश की दिव्य नारी पद्मावती के पुण्य स्मरण में नगर का नाम पद्मावतीपुरी पड़ा था।
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मणिपुर राज्य की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराएँ और प्राकृतिक सौन्दर्य भारतवासियों के लिए गौरव के विषय हैं, तो उसका शौर्य, साहस एवं त्याग-बलिदान से परिपूर्ण इतिहास भारतवासियों के लिए प्रेरणास्रोत है।
सन् १८९१ के एंग्लो-मणिपुर युद्ध में मणिपुर के बहादुर लोगों ने औपनिवेशिक शक्तियों का प्रतिरोध जिस वीरता और…
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‘उठो! जागो!…और लक्ष्य प्राप्ति तक रूको मत!‘ भारत की आध्यात्मिक शक्ति, सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का गौरव विश्वभर में स्थापित करते हुए मानवता के कल्याण और राष्ट्र पुनरूत्थान के प्रति जीवन समर्पित कर देने वाले युवा सन्यासी स्वामी विवेकानन्द का यह हृदयभेदी आह्वान आज भी युवा पीढ़ी को प्रेरणा…
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23 दिसंबर 1926 स्वामी श्रद्धानंद बलिदान दिवस
एडवोकेट मुंशीराम से स्वामी श्रद्धानंद तक जीवन यात्रा विश्व के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बेहद प्रेरणादायी है। स्वामी श्रद्धानंद उन बिरले महापुरुषों में से एक थे जिनका जन्म ऊंचे कुल में हुआ किन्तु बुरी लतों के कारण प्रारंभिक जीवन बहुत ही निकृष्ट किस्म…
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“जब शंकाएं मुझ पर हावी होती हैं, और निराशाएं मुझे घूरती हैं, जब दिगंत में कोई आशा की किरण मुझे नजर नहीं आती, तब मैं गीता की ओर देखता हूं।” – महात्मा गांधी।
संसार का सबसे पुराना दर्शन ग्रन्थ है भगवद्गीता। साथ ही साथ विवेक, ज्ञान एवं प्रबोधन के क्षेत्र…
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गोवा मुक्ति दिवस 19 दिसंबर 1961
भारत को जिस स्वरुप और जिन भौगोलिक सीमाओं को वर्तमान में हम देख पा रहे है वह स्वतन्त्रता प्राप्ति के बहुत बहुत बाद तक चले संघर्ष और एकीकरण के अनथक चले अभियान का परिणाम है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी बहुत से क्षेत्र ऐसे…
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नृत्य सम्राट प्रो. कल्याणदास, इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय नियुक्त बड़ी हस्तियों में थे। वे छुट्टी के दिनों में बराबर अपने निवास स्थान रायगढ़ आते थे, जहाँ उनका स्वयं का मकान है। परिवार उस समय यहीं था। उन दिनों हम लोगों की चक्रधर कला परिषद हुआ कल्याण दास महन्त लेखक के…
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स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी भारत में सुलग रही थी और राजे-रजवाड़े अंग्रेजी दमन के कारण अंग्रेजों के खिलाफ़ लामबंद हो रहे थे। उस समय यह स्वतंत्रता आन्दोलन पूरे भारत में फ़ैल रहा था। छत्तीसगढ़ अंचल भी इससे अछूता नहीं था।
यहाँ भी 1857 के आन्दोलन में स्वतंत्रता की चाह लिए…
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भारतीय संविधान के निर्माता कहे जाने वाले डॉ. भीमराव आम्बेडकर के बारे में बहुत सी भ्रातियां हैं। जैसे वह सवर्ण हिन्दुओं के विरोधी थे, वह मात्र अनुसूचित जातियों के बारे में सोचते थे और उनकी ही चिंता करते थे। पर सच्चाई इससे कोसो दूर है।
असलियत यह है कि उन्होंने…
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एक राष्ट्र के रूप में भारत ने आज तक की अपनी निंरतर ऐतिहासिक यात्रा में अनेक उतार- चढ़ाव देखे हैं। इतिहास बताता है कि देश के सांस्कृतिक-आध्यात्मिक आधार के कारण किसी एक आध्यात्मिक विभूति की उपस्थिति ने समाज को गिरावट से उबारा है। तत्कालीन समाज में व्याप्त अज्ञानता, रूढ़ि और…
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आंवला रसायन है और कल्प दृष्टा भी। उसके प्रति कायाकल्प जैसी रसायन सम्मत और आयुर्वेदिक मान्यता यूंही नहीं जुड़ गई। ऋषि च्यवन की कहानी में कितने सूत्र इस फल के गुण और उपयोग के हैं! आयुर्वेद की कहानियां हम कम ही सुनते सुनाते हैं। यह कार्तिक की कीर्ति कथा है।
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वर्ष भर की प्रतीक्षा उपरांत लो आ गई त्योहारों की रानी दीपावली। प्रकाश, पवित्रता, हर्षोल्लास और स्वच्छता का पर्व दीपावली जनमानस में उत्साह और ऊर्जा का संचार करता है। यह पर्व संपूर्ण भारत वर्ष के साथ ही विश्व के दूसरे भू भागों में भी मनाया जाता है जहां भारतवंशी रहते…
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छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का हिस्सा है सुआ गीत। यह छत्तीसगढ़ प्रदेश की गोंड जाति की स्त्रियों का प्रमुख नृत्य-गीत है लेकिन अन्य जाति के महिलाएं भी इसमें सम्मिलित होकर नृत्य करती हैं। जिसे सामूहिक रुप से किया जाता है। यह मुख्यतः महिलाओं के मनोभावों सुख-दुख आदि की अभिव्यक्ति का…
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वर्तमान बस्तर अंचल को रामायण काल में दण्डकारण्य क्षेत्र के नाम से संबोधित किया जाता था। तब का दण्डकारण्य ओड़िसा जैपुर स्टेट, आंध्रप्रदेश का गोदावरी, महाराष्ट्र का चांदा, भण्डारा छत्तीसगढ़ का सिहावा, नगरी और कांकेर से वर्तमान बस्तर तक विस्तृत फैला हुआ था। इस महाअरण्य में ऋषि-मुनि तपस्या करते थे…
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भारतीय संस्कृति में आदि काल से ही देवी देवताओं का मानव समाज में महत्त्व रहा है, भारत भूमि देवी-देवताओं तथा ऋषि मुनियों के संस्मरणों से समृद्ध है। सनातन धर्म को मानने वाले सभी समाजों एवं जातियों में मातृ शक्ति की उपासना किसी न किसी रुप में प्राचीन काल से होती…
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तीन दिनों से लगातार बारिश की झड़ी के मध्य अचानक कार्यक्रम बना कि कहीं भ्रमण पर जाया जाए। तभी मुझे सरई श्रृंगार का ध्यान आया, बहुत दिनों से वहां जाने का विचार था परंतु अवसर नहीं मिल पा रहा था, आज बारिश की झड़ी ने यह अवसर हमें दे दिया।
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पीपल का वृक्ष मौन रहकर भी अपने अस्तित्व के साथ गाँव का इतिहास, भूगोल और सम्पूर्ण सामाजिकता को समेटे हुये रहता था। गाँव का इतिहास इस वृक्ष के साथ बनता रहा था। गाँव का भूगोल यहाँ से प्रारम्भ होकर यहीं खत्म होता था, यहाँ की सामाजिकता का यह वृक्ष गवाह…
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पं. दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म 25 सितम्बर 1916 उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नगला चंद्रभान गांव में हुआ था। उनके पिता, भगवती प्रसाद, एक प्रसिद्ध ज्योतिषी थे और उसकी मां श्रीमती राम प्यारी एक धार्मिक विचारधारा वाली महिला थी। रेल की नौकरी होने के कारण उनके पिता का…
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तीजा तिहार छत्तीसगढ़ के मुख्य एंव लोक पर्वों में से एक हैं, पौराणिक मान्यतानुसार यह त्यौहार बड़े हर्षो उल्लास से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। मुख्यत:यह त्यौहार नारी शक्ति को समर्पित है। इसे हरितालिका तीज भी कहा जाता है, छत्तीसगढ़ी भाषा तीजा कहते है। तीजा त्यौहार से पहले अमावश को…
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9 सितम्बर 1968 : स्वतंत्रता संग्राम सेनानी साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी पुण्यतिथि
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम विविधता से भरा है। क्राँतिकारी और अहिसंक आँदोलन के साथ अन्य धाराओं में एक ऐसी धारा भी रही जिसने प्रत्यक्ष आँदोलनों में सहभागिता के साथ ऐसी साहित्य रचना भी की जिसने जन सामान्य को झकझोर और…
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भारतवर्ष ने जहां एक ओर विदेशी आक्रांताओं का दंश झेला, अत्याचार सहे वहीं दूसरी ओर इस पुण्यभूमि पर अनेकों महापुरुषों, ऋषि-मुनियों ने जन्म लिया। इस देवभूमि को तो साक्षात भगवानों की माता कहलाने का भी गौरव प्राप्त है और हम भरतवंशियों को भगवानों का वंशज कहलाने का परम सौभाग्य मिला…
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लोकपर्व-खमरछठ (हलषष्ठी) माताओं का संतान के लिए किया जाने वाला, छत्तीसगढ़ राज्य की अनूठी संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जिसे हर वर्ग, हर जाति मे बहूत ही सद्भाव से मनाया जाता है तथा संतान के सुखी जीवन की कामना की जाती है।
हलषष्ठी को हलछठ, कमरछठ या खमरछठ भी…
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सनातन संस्कृति में देवी - देवताओं की पूजा -अर्चना का इतिहास आदि काल से ही रहा है। भारत की संस्कृति विश्व में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। भारत वर्ष में अलग -अलग जगहों पर मंदिरों में विराजी आदि देवी शक्तियों की गाथाएं और जन श्रुतियाँ जनमानस के साथ आस्था और विश्वास…
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स्वतंत्रता आंदोलन में लाखो लोगों ने अपनी भागीदारी निभाई, उन्होंने अपने जीवन की परवाह नहीं की एवं स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। ऐसे ही एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एस सत्यमूर्ति थे, उनका का जन्म तमिलनाडु के तिरुचिराप्पल्ली ज़िले में पुदुकोटाई नामक स्थान पर 19 अगस्त, 1887 में…
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अपने शीर्षक "अमृत काल में स्वामी विवेकानंद की प्रासंगिकता" के अनुसार यह पुस्तक स्वामी विवेकानंद के कार्य और विचारों पर आधारित है, जो आधुनिक भारत के लिए अमृत कल में मार्गदर्शन का कार्य करेगी।
इस पुस्तक के माध्यम से जहाँ एक ओर अपने पाठकों को “स्वामी विवेकानंद के जागृत भारत…
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16 अगस्त 1927 हरि ठाकुर जयंती विशेष आलेख
हरि ठाकुर जी हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के श्रेष्ठ कवि तो वह थे ही, छत्तीसगढ़ के पौराणिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक और राजनीतिक इतिहास के भी वह गहन अध्येता और लेखक थे। राज्य निर्माण आंदोलन के लिए सर्वदलीय मंच के संयोजक के रूप में…
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स्वतंत्रता दिवस विशेष आलेख
आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर भारत माता को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए छत्तीसगढ़ महतारी के संतानों ने अभूतपूर्व योगदान दिया है। हमें गर्व है अपने स्वातंत्र्य-प्रिय सेनानियों पर जिन्होंने 1857 से पूर्व ही विदेशियों की सत्ता के विरोध में सशस्त्र…
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12 अगस्त स्व: हरिनाथ डे जयंती विशेष आलेख
ज़िन्दगी के सफ़र में सिर्फ़ 34 साल की उम्र तक 36 भाषाओं का ज्ञाता बनना कोई मामूली बात नहीं है। संसार में अत्यधिक विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न ऐसे विद्वान गिने -चुने ही होते हैं। यहां तक कि ऐसी महान प्रतिभाओं के बारे में…
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राजाओं के शासन काल में दक्षिण कोसल में बहुत सारी जमीदारियाँ थी। बस्तर से सरगुजा तक अगर दृष्टिपात करें तो लगभग एक सैकड़ा जमीदारियाँ होंगी, जहाँ विभिन्न जाति एवं वर्ग के जमींदार शासन करते थे। वर्तमान में यह सब इतिहास की बातें हो गई परन्तु इनकी कहानियों में रहस्य, रोमांच…
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उन्नीसवीं शताब्दी का आरंभ अंग्रेजों द्वारा भारतीय शिक्षा, संस्कृति, परंपरा और समाज के मानसिक दमन के अभियान का समय था। गुरुकुल नष्ट कर दिये गये थे, चर्च और वायबिल आधारित शिक्षा आरंभ करदी थी। ऐसे समय में किसी ऐसे व्यक्तित्व की आवश्यकता थी, जो भारतीय समाज में आत्मविश्वास जगाकर अपने…
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सावन का महीना अपनी हरितिमा और पावनता के कारण सबका मन मोह लेता है। सर्वत्र व्याप्त हरियाली और शिवमय वातावरण अत्यंत अलौकिक एवं दिव्य प्रतीत होता है। लोकजीवन भी इससे अछूता नहीं रहता। छत्तीसगढ़ में चौमासा श्रमशील किसानों के लिए अत्यंत व्यस्तता का समय होता है।
खेती किसानी का कार्य…
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सावन माह की अमावस्या को छत्तीसगढ़ में हरेली पर्व मनाया जाता है। इस पर्व के साथ जुड़ी हुई अनेक मान्यताएं लोक में प्रचलित हैं। एक मान्यतानुसार यह कृषि पर्व राजा जनक द्वारा हल चलाने के फलस्वरुप माँ सीता के प्रकट होने से जुड़ा हुआ है। ऋषि-मुनियों के रक्त से भरा…
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स्वामी विवेकानन्द ने 19 मार्च, 1894 को स्वामी रामकृष्णानन्द को लिखे पत्र में कहा था - "भारत के अंतिम छोर पर स्थित शिला पर बैठकर मेरे मन में एक योजना का उदय हुआ- मान लें कि कुछ निःस्वार्थ सन्यासी, जो दूसरों के लिए कुछ अच्छा करने की इच्छा रखते हैं…
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रानी दुर्गावती पुण्यतिथि विशेष
इतिहास में भारत भूमि पर अनेक वीरांगनाओं ने जन्म लिया तथा अपने कार्यों से इतिहास में अमर हो गई, जिन्हें हम आज भी याद करते हैं। ऐसी ही एक वीरांगना रानी दुर्गावती हैं जिन्होंने अपने राज्य की रक्षा के लिए मुगलों से युद्ध कर वीरगति को…
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भारतीय सभ्यता निर्माण में जिन कुछ प्रत्ययों का स्थाई महत्व रहा है, उन पर विमर्श की परम्परा विदेशी अनुसंधानकर्ताओं के लेखन में भी दिखाई देती है। इतिहास, संस्कृति, परम्परा और सभ्यता के प्रश्नों को लेकर अब तक जो वैचारिक व दार्शनिक चिंतन होता रहा है उससे कुछ सार्थक स्थापनाएं मुहैया…
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भारत के राष्ट्रीय आंदोलन पर स्वामी विवेकानंद के प्रभाव का वर्णन स्वयं स्वतंत्रता के नायकों ने किया है। गांधीजी जब 1901 में पहली बार कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लेने कलकत्ता पहुंचे तो उन्होंने स्वामी जी से मिलने का प्रयास भी किया था। अपनी आत्मकथा में गांधी लिखते हैं कि उत्साह…
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बुद्धं शरणम् गच्छामि, धम्मम शरणम गच्छामि, संघम शरणम् गच्छामि का मूल महामंत्र का शंखानिनाद करने वाले महात्मा बुद्ध भगवान विष्णु के नवमें अवतार थे। अवतार सदा से धर्म की स्थापना एवं अधर्म के विनाश के लिए होते आये हैं।
सदियों से अनेक वैशाख पूर्णिमायें इस धरती पर आई और चली…
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यह भारत भूमि की विशेषता है कि उसे समयानुकूल राजनीतिक, बौद्धिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक नेतृत्व प्राप्त होता रहा है। भारत को राजनीतिक रूप से एकसूत्र में बांधने का प्रश्न उठा, तब आचार्य चाणक्य सामने आए। विदेशी दमनकारी शक्तियों के सामने भारत के सामर्थ्य को प्रकट करने के लिए चंद्रगुप्त मौर्य…
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चिरमिरी बरतुंगा कालरी में प्राचीन देवालय के अवशेष स्थित हैं। भग्नावशेषों में यहाँ बहुत सारे सती स्तंभ हैं, जो इस क्षेत्र में फ़ैले हुए हैं। यहाँ नवरात्रि में जातीय एवं जनजातीय समाज के लोग सती माता की आराधना एवं उपासना करते हैं। प्राचीन सती मंदिर बरतुंगा चैत्र नवरात्र के दिनों…
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हाफ नदी के सुरम्य तट पर बेमेतरा जिला के नवागढ़ तहसील में बसा छोटा सा गांव बुचीपुर है। यह गांव छत्तीसगढ़ के अन्य गांव के समान ही खेती किसानी वाला गांव है, परंतु इसकी प्रसिद्धि यहां विराजमान माँ महामाया के नाम से दूर-दूर तक है। दूर-दूर से यहां श्रद्धालु आते…
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लोककला मन में उठने वाले भावों को सहज रुप में अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्वत: स्थानांतरित हो जाने वाली विधा है। लोक कला हमारी संस्कृति की पहचान होती है, हमारी खुशी को प्रकट करने का माध्यम होती है।
लोककला का क्षेत्र…
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"घोड़ा रोवय घोड़ासार म, हाथी रोवय हाथीसार म …मोर रानी ये या, महलों में रोवय …" भरथरी की विधा में इस गीत का राग-संगीत तबले की थाप, बांसुरी के सुर में जीवन की सच्चाई को ब्यक्त करता है। छत्तीसगढ़ को इतिहास को झांक कर देंखें तो यहाँ का इतिहास यहाँ…
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"मेरा विश्वास आधुनिक पीढ़ी में है, युवा पीढ़ी में है, इन्हीं में से मेरे कार्यकर्ता निकलेंगे जो सिंह की तरह हर समस्या का समाधान कर देंगे।" - स्वामी विवेकानन्द
स्वामी विवेकानन्द ‘आयु में कम, किन्तु ज्ञान में असीम थे’। मात्र 39 वर्ष के अपने जीवन काल में स्वामीजी ने विश्वभर…
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इसे बस्तर का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिये कि इसे जाने-समझे बिना इसकी संस्कृति, विशेषत: इसकी जनजातीय संस्कृति, के विषय में जिसके मन में जो आये कह दिया जाता रहा है। गोंड जनजाति, विशेषत: इस जनजाति की मुरिया शाखा, में प्रचलित रहे आये "घोटुल" संस्था के विषय में मानव विज्ञानी…
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२५ दिसम्बर को दुनियाभर में “क्रिसमस” पर्व की धूम रहती है। भारत में भी जगह-जगह क्रिसमस की शुभकामनाओं वाले पोस्टर्स, बैनर, ग्रीटिंग्स का वातावरण बनाया जाता है। किन्तु हे भारत ! क्या तुम्हें स्मरण है कि २५ दिसम्बर, हम भारतीयों के लिए क्या महत्त्व रखता है? इस बात को समझना…
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भिखारी छंद में एक भिखारी की याचना
कैसा कलयुग आया, घड़ा पाप का भरता।
धर्म मर्म बिन समझे, मानुष लड़ता मरता।।
लगता भगवन तेरी, माया ने भरमाया।
नासमझों ने तेरे , रूपों को ठुकराया।।
कल तक वे करते थे, हे प्रभु पूजा तेरी।
सहसा कुछ लोगों ने, झट इनकी मति…
कार्तिक एकादशी से छत्तीसगढ़ के गाँवों और नगरों की गलियों में उल्लास और आनंद से सराबोर राउतों की टोलियाँ अपने संग गड़वा बाजा की मनमोहक थाप पर झूमते-नाचते हुए जब निकलती हैं तब समझिये राउत समाज का देवारी पर्व प्रारंभ हो गया है। इस पर्व में राउत नाचा का आयोजन…
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महासमुंद जिला बने 27 माह 25 दिन ही हुए थे कि राज्यों के पुनर्गठन पश्चात 01 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ देश का 26वां राज्य बना। 06 जुलाई 1998 के पूर्व यह रायपुर जिले का एक तहसील हुआ करता था। 1873-74 में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अधिकारी जे.डी. बेगलर जब मध्य…
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जनजातीय अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर को को झारखंड के जनजाति दम्पति सुगना और करमी के घर हुआ था। मुंडा समाज को जल, जमीन, जंगल का हक दिलाने के लिए संघर्ष करते-करते मात्र 25 वर्ष की आयु में लोगों ने उनको भगवान…
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"यदि मेरे पास शक्ति है तथा मैं इसका प्रयोग कर सकता हूँ तो मुझे धर्म-परिवर्तन को रोकना चाहिए। हिंदू परिवारों में मिशनरी के आगमन का अर्थ वेशभूषा, तौर-तरीके, भाषा, खान-पान में परिवर्तन के कारण परिवार का विघटन है।" -गांधीजी 'हरिजन', 5 नवम्बर 1935
स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव अर्थात 75 वीं…
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सिक्ख धर्म के संस्थापक आदि गुरु नानक देव जी मानवीय कल्याण के प्रबल पक्षधर थे। जिन्होंने समकालीन सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक परिस्थितियों की विसंगतियों, विडम्बनाओं, विषमताओं धार्मिक आडम्बरों , कर्मकांडों, अंधविश्वासों तथा जातीय अहंकार के विरुद्ध लोक चेतना जागृत की तथा इसके साथ ही…
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छत्तीसगढ़ में दीपावली पर गौमय से आंगन लीपने की परम्परा है, माना जाता है कि गोबर से लिपे पुते घर आंगन में लक्ष्मी का आगमन होता है। गाय को गौधन कहा जाता है तथा उसके मूत्र, गोबर, घी, दूध, दही को पंचगव्य कहा गया है। गाय के पंच गव्य से…
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महकती बगिया है यहां के प्रत्येक त्योहारों का अपना अलग ही महत्व है। बारहों महीने मनाए जाने वाले स्थानीय लोक पर्व तीज त्योहारों के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश भर में मनाएं जाने वाले प्रमुख त्योहारों जैसे रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, दशहरा, होली आदि को भी यहां उत्साह पूर्वक मनाया जाता…
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जनजातीय धार्मिक मान्यताओं में महादेव का प्रमुख स्थान है। प्रायः अधिकांश वनवासी जातियों की उत्पत्ति की मूल कथा में माता पार्वती एवं भगवान शंकर का वर्णन मिलता है। वे अपने आराध्य देव की पूजा-अर्चना अपने-अपने ढंग से करते हैं। ‘गौरा उत्सव’ गोंड जाति का एक प्रमुख पर्व है। ‘गौरा’ का…
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छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का हिस्सा है सुआ गीत। यह छत्तीसगढ़ प्रदेश की गोंड जाति की स्त्रियों का प्रमुख नृत्य-गीत है लेकिन अन्य जाति के महिलाएं भी इसमें सम्मिलित होकर नृत्य करती हैं। जिसे सामूहिक रुप से किया जाता है। यह मुख्यतः महिलाओं के मनोभावों सुख-दुख आदि की अभिव्यक्ति का…
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हमारे देश भारत एवं विदेशों में भी आदि शक्ति जगतजननी मां जगदंबा शक्तिपीठों में विराजमान हैं। जहाँ उन्हें कई नाम एवं कई रूपों में बारहों महीने पूजा जाता हैं और चैत कुंवार के नवरात्रि में विशेष पूजा अर्चना की जाती है। जहां श्रद्धालु जन भारी संख्या में मनोकामना पूर्ति हेतु…
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पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा संघ शिक्षा वर्ग, बौद्धिक वर्ग मैसूर, मई 19, 1967 को दिया गया व्याख्यान
प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में सुख की भावना लेकर चलता है। मानव ही नहीं, तो प्राणिमात्र सुख के लिए लालयित है। दुःख को टालना और सुख को प्राप्त करना, यह एक उसकी स्वाभाविक…
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भीतर अपने टटोल के देख।
मुख से राम तू बोल के देख।
स्पष्ट नजर आयेगी दुनिया,
अंतस द्वार तू खोल के देख।
राम नाम का ले हाथ तराजू,
खुद को ही तू तोल के देख।
है कीमत तेरा कितना प्यारे,
जा बाजार तू मोल के देख।
कितना मीठा कड़ुवा है…
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लोक गीतों का साहित्य एवं अनुसंधान दोनों दृष्टियों से महत्व है। छत्तीसगढ़ अंचल ऐसे लोक गीतों से भरे-पूरे हैं, ग्राम्य एवं आदिम दोनों संस्कृतियों का घर है छत्तीसगढ़। गीत और नृत्य जहां एक ओर हमारे लिए मनोरंजन के साधन हैं, वहीं दूसरी ओर वे कला के विशिष्ट अवयव बन जाते…
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नागरिक निर्माणकर्ताओं को नमन, ‘अध्यापक और अध्यापन’ दोनों में कोई खास असमानता नहीं होती, एक समान ही होते हैं। क्योंकि ये दोनों हर किसी के जीवन का हिस्सा रहे होते हैं। इंसान के जीवन में शुरू से तरक्की-समृद्धि के वास्तविक पथ धारक टीचर ही रहे हैं जिनके जरिए इंसान खुद…
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जब तक नहीं विचार मिलेगा।
बदतर यह संसार मिलेगा।
अफवाहों के बाजारों में,
है भारी कालाबाजारी।
भाईचारे का अभाव है,
सस्ती में तलवार दुधारी।
गोली, बम, बारूद जखीरा,
जगह-जगह अंगार मिलेगा।
जब तक नहीं विचार मिलेगा।
बदतर यह संसार मिलेगा।
शरद पूर्णिमा है महलों में,
बाहर गहन अमावस काली।
कहीं…
छत्तीसगढ़ में निवासरत राउत जाति जोकि अपने को यदुवंशी मानते हैं तथा भगवान श्रीकृष्ण को अपना पूर्वज मानकर उनकी पूजा करते हैं साथ ही उनकी बाँसुरी के प्रति अटूट श्रद्धा रखते हैं। इनके प्रिय गीत बाँस गीत के गायन के साथ एक लगभग दो हाथ लम्बी मोटे बाँस की बनाई…
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भारत की ऋषि संस्कृति में संस्कारों का बहुत महत्व है। वस्तुतः संस्कृति एवं संस्कार अन्योन्याश्रित होते है। संस्कारो से है संस्कृति का निर्माण होता है। सम् की आवृति करके सम्यक संस्कार से ही संस्कृति का निर्माण होता जाता है। संस्कारों से आत्मा और अंत:करण की शुद्धि होती है। सम्यक कृति…
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विभाजन विभिषिक स्मृति दिवस 14 अगस्त : विशेष आलेख
देश का विभाजन एक अमानवीय त्रासदी थी जो अपने साथ भारतवर्ष का दुर्भाग्य भी लेकर आई थी। विश्व इतिहास के किसी दौर में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है कि आप आजादी के लिए संघर्ष करें, आंदोलन चलाएं और जब आजाद…
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पौराणिक काळ से ही देवी देवताओ की पूजा, प्रकृति के रूप में किसी न किसी पेड पौधे , फळ फुल आदि के रूप में पुरी आस्था के साथ किया जाता है। इसी पर आधारित ग्रामीण आंचलो में भोजली बोने की परंपरा पुरे श्रद्धा के साथ किया जाता है।
श्रावण मास…
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शराब, मय, मयकदा, रिन्द, जाम, पैमाना, सुराही, साकी आदि विषय-वस्तु पर हजारों गजलें बनी, फिल्मों के गीत बने, कव्वालियाँ बनी। बच्चन ने अपनी मधुशाला में इस विषय-वस्तु में जीवन-दर्शन दिखाया। सभी संत, महात्माओं, ज्ञानियों और विचारकों ने शराब को सामाजिक बुराई ही बताया है। छत्तीसगढ़ी कविताओं में मदिरा का गुणगान…
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छत्तीसगढ़ की प्राचीनता और उसकी महत्ता के संदर्भ में अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं। इसके बावजूद प्राचीन काल के संदर्भ में कोई उपयुक्त रुप से कालक्रमानुसार वृतांत नहीं मिला है जिससे क्रमबध्द प्रामाणिक इतिहास की पुनर्रचना की जा सके। इसके लिए एक अंश तक ही पौराणिक साहित्य पर निर्भर किया जाता…
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महानद्यामुपस्पृश्य तर्पयेत पितृदेवता:।
अक्षयान प्राप्नुयाल्वोकान कुलं चेव समुध्दरेत्॥
(महाभारत, वनपर्व, तीर्थ यात्रा पर्व, अ-84)
अर्थात महानदी में स्नान करके जो देवताओं और पितरों का तर्पण करता है, वह अक्षय लोकों को प्राप्त होता है, और अपने कुल का भी उध्दार करता है।
महानदी का कोसल के लिए वही महत्व है…
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हिन्दू धर्म में अक्षय तृतीया का महत्व बहुत ही अधिक है। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु के छठवें अवतार के रूप में भगवान परशुराम जी बैशाख शुक्ल तृतीया को अवतरित हुए, हिंदु धर्म के मुताबिक प्रथम पर्व है, इसे अक्षय तृतीया अर्थात ऐसा तिथि जो समृद्धि, आशा, आनन्द सफलता जो…
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सरगुजा अंचल में निवासरत पंडो जनजाति का लाटा त्यौहार चैत्र माह में मनाया जाता है। लोक त्यौहारों में लाटा त्योहार मनाने प्रथा प्राचीन से रही है। पंडो वनवासी समुदाय के लोग इस त्यौहार को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। दरअसल यह त्योहार चैत्र शुक्ल पक्ष के नवरात्रि के समय…
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भारत के सम्बन्ध में विद्वानों का मानना है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के नागरिक जिन देवताओं की पूजा-अर्चना करते थे वे आगामी वैदिक सभ्यता में पशुपति और रुद्र कहलाएं तथा वे जिस मातृका की उपासना करते थे वे वैदिक सभ्यता में देवी का आरम्भिक रुप बनी। भारतीय इतिहास गवाह…
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स्वाभिमान जागा लोगों का, भगवा ध्वज लहराया है।
रामराज्य की आहट लेकर, नया सवेरा आया है ।
जाति- पाँति के बंधन टूटे, टूट गई मन की जड़ता।
ज्वार उठा भाईचारे का, धुल गई कड़वी कटूता।
निर्भय होकर नर- नारी सब, अपने दायित्व निभाते
उत्पीड़न करने वालों का, नहीं कहीं भय-साया…
आदिकाल से छत्तीसगढ अंचल धार्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। यहां अनेक राजवंशों के साथ विविध आयामी संस्कृतियां पल्लवित व पुष्पित हुई हैं। यह पावन भूमि रामायणकालीन घटनाओं से भी जुड़ी हुई है। यही कारण है कि छत्तीसगढ में शैव, वैष्णव, जैन एवं बौध्द धर्मों का समन्वय रहा है।
वैष्णव…
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रघुकुल गौरव, अवध सिया के,
दशरथ कोशला राम लिखूं।
या रावण हंता, दुष्ट दलंता,
लंका विजई सम्मान लिखूं।
है अनुज दुलारे भरत भाल,
जिन पर मैं अपना स्वास लिखू।
है अनुज दुलारे लखन लाल,
जिन पर मैं अपना विश्वास लिखूं।
ये सम्मानित राघव रघु कुल,
ना काम क्रोध मद लोभ…
पूरे उत्तर भारत में मुगलों का शासन था। औरंगजेब जैसा राजा दिल्ली के तख्त पर था। दक्षिण में निजामशाही थी। हिन्दू धर्म खतरे में था। छोटे-बड़े हिन्दू राजा, सेनापति जो अपना पराक्रम, शौर्य मुगलों के लिए खर्च करते थे। ऐसे समय पर 15 वर्षीय बालक शिवाजी सामान्य परिवारों के अपने…
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रंगमंच या नाट्योत्सव भारत की प्राचीन परम्परा है, इसके साथ ही अन्य सभ्यताओं में भी नाटको एवं प्रहसनों का उल्लेख मिलता है। इनका आयोजन मनोरंजनार्थ होता था, नाटकों प्रहसनों के साथ नृत्य का प्रदर्शन हर्ष उल्लास, खुशी को व्यक्त करने के लिए उत्सव रुप में किया जाता था और अद्यतन…
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पूर्वोत्तर के जनजातीय क्षेत्रों में एक लोकोक्ति बड़ी ही प्रचलित है - “सोत पो, तेरह नाती ; तेहे करीबा कूँहिंयार खेती।” अर्थात स्त्री यथेष्ट संख्या में जब बच्चों को जन्म देगी तब ही समाज में खेती सफल होगी। पूर्वोत्तर के हाड़तोड़ श्रम करने वाले समाज में यह कहावत परिस्थितिवश ही…
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अठारहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों का राज्य विस्तार इतना अधिक था कि उनके राज्य में कभी सूरज अस्त नहीं होता था, ऐसे विशाल साम्राज्य को चुनौती देकर उनके विरुध्द विद्रोह का शंखनाद करने वाली छ्त्तीसगढ में एक छोटी-सी रियासत थी सोनाखान। सोनाखान की शल्य-श्यामला भूमि में वीर…
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स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी हैं, जिन्होंने हिमालय की कंदराओं में जाकर स्वयं के मोक्ष के प्रयास नहीं किये बल्कि भारत के उत्थान के लिए अपना जीवन खपा दिया। विश्व धर्म सम्मलेन के मंच से दुनिया को भारत के ‘स्व’ से परिचित कराने का सामर्थ्य स्वामी विवेकानंद में ही था, क्योंकि…
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दक्षिण कोसल के वनों की पहचान साल यानी सरई, सखुआ और न जाने स्थानीय लोग इसे क्या-क्या नाम से जानते-पहचानते हैं। साल जिसका वैज्ञानिक नाम सोरिया रोबस्टा है। अपनी सैकड़ों खूबियों की वजह से आज यह वृक्ष न सिर्फ पवित्र माना जाता है, यह पूजनीय भी है। आदिकाल से यह…
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कैसी विडेबना रही कि स्वतंत्र भारत के 14 वर्षों तक एक बड़ा भू-भाग पुर्तगाल के अधीन रहा। 19 दिसंबर 1961 का वह दिन था जब पणजी में तिरंगा लहराया। उससे पहले स्थानीय निवासियों पर अनेक तरह के प्रतिबंध थे, सेंसरशिप का आलम तो यह था कि विवाह के निमंत्रण पत्रों…
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रायपुर से 140 कि.मी. एवं डोंगरगढ से 40 कि.मी. की दूरी पर स्थित खैरागढ, इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय के लिए प्रसिध्द है। स्वाधीनता से पूर्व खैरागढ एक रियासत थी। खैरागढ रियासत की राजकुमारी इंदिरा की स्मृति में स्थापित खैरागढ का इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, एशिया महाद्वीप का इकलौता…
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छत्तीसगढ़ को संत महात्माओं की जन्म स्थली कहा जाता है। यहाँ की शस्य श्यामला पावन भूमि में अनेकों संत महात्माओं का जन्म हुआ। उनमें 18 वीं शताब्दी के महान संत सतनाम सम्प्रदाय के प्रणेता, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत गुरु घासीदास का जन्म माघ पूर्णिमा 18 दिसम्बर 1756 को महानदी के…
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हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है। बताया जाता है कि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण के मुख से गीता के उपदेश निकले थे। पूरे विश्व भर में मात्र श्रीमद भगवत गीता ही एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जिसकी…
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कबीर तहां न जाइए, जहाँ सिद्ध को गाँव, स्वामी कहे न बैठना, फिर फिर पूछे नांव।
इष्ट मिले अरु मन मिले मिले सकल रस रीति, कहैं कबीर तहां जाइए, जंह संतान की प्रीति।
बाबासाहेब अम्बेडकर के कांग्रेस से जुड़ाव को कबीर के इन दोहों के माध्यम से पुर्णतः प्रकट किया…
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आदिकाल से ग्रामदेव डीह-डिहारिन आदि दैवीय शक्तियों की विशेष कृपा दृष्टि, अनुकम्पा जन सामान्य पर बनी रहती थी और आज़ भी बनी रहती है। एक खास अवसर पर इन देवी-देवताओं की पूजा आराधना श्रृद्धालु ग्रामवासियों द्वारा की जाती है। ऐसा ही एक देवस्थान लखनपुर- मुख्यालय से महज तीन किमी की…
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एक राष्ट्र के रूप में भारत ने आज तक की अपनी निंरतर ऐतिहासिक यात्रा में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। इतिहास बताता है कि देश के सांस्कृतिक-आध्यात्मिक आधार के कारण किसी एक आध्यात्मिक विभूति की उपस्थिति ने समाज को पतन से उबारा है। तत्कालीन समाज में व्याप्त अज्ञानता, रूढ़ि और कर्मकांड…
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सीतानदी अभयारण्य की स्थापना 1974 में हुई थी एवं इसका क्षेत्रफ़ल 553 .36 वर्ग किमी है। यहाँ की विशेषताओं में 1600 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा, तापमान न्यूनतम 8.5 से अधिकतम 44.5 डिग्री सेल्सियस पर रहता है।
सीतानदी के आधार पर अभयारण्य को सीतानदी नाम दिया गया है। जो कि अभयारण्य में…
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भगवा ध्वज लहराए, भगवा ध्वज फहराए।
सप्त सिंधु की लहर-लहर में, नव ऊर्जा भर जाए।
घर-घर के आंगन में गूँजे,
उत्सव की किलकारें।
द्वार-द्वार में फूल बिछे हों,
नाचें झूम बहारें।
हर्षित मन का कोना कोना, मंद मंद मुस्काए।
भगवा ध्वज लहराए, भगवा ध्वज फहराए।
अंबर-धरती, दसों दिशा में,
वेद…
पचराही, छत्तीसगढ के कबीरधाम जिला मुख्यलय से लगभग 45 कि॰ मी॰ दूर हांप नदी के किनारे मैकल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसा एक छोटा सा गांव है। प्राचीन नाम पंचराहों का अपभंश पचराही से समझा जा सकता है। क्योंकि यहां से पांच राहे निकलती है।
जिनमे रतनपुर, मंडला, सहसपुर…
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नित वाणी में तेज भरो माँ!
एक नहीं, नौ माताओं की, मुझको अद्भुत शक्ति मिले ।
नित वाणी में तेज भरो माँ, मुझको नव-अभिव्यक्ति मिले।।
'शैलपुत्री' औ 'ब्रह्मचारिणी', 'चंद्रघटा' का वंदन है।
'कुष्मुण्डा', 'स्कन्दमात' औ 'कात्यायनी' शुभदर्शन है।
'कालरात्रि', ओ 'महागौरी' तू, 'सिद्धिदात्री' की भक्ति मिले।।
एक नहीं नौ माताओं…
बहुत से व्यक्ति किसी विधा-विशेष में दक्ष होते हैं, उन्हें हम उनकी विशेष विधा के कारण पहचानते हैं। कुछ व्यक्ति अनेक विधाओं में दक्ष होते हैं, उन्हें हम बहु-आयामी प्रतिभा के रूप में जानते हैं। बहुत से प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ति केवल अपनी प्रतिभा के प्रचार-प्रसार में…
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जो पत्थरों से जितना रहे दूर
उतने रहे असभ्य
उतने रहे क्रूर।
जो पत्थरों से करते रहे प्यार
चिनते रहे दीवार
बन बैठे सरदार।
फेंकते रहे पत्थर होते रहे दूर,
नियति ने सपने भी
किये चूर चूर।
पत्थरों को रगड़ पैदा की आग,
उन्ही की बुझी भूख,
उन्ही के जागे…
बात वर्ष 1928 की है, एक 24 वर्षीय नवयुवक का विवाह होने जा रहा था। नवयुवक था अत्यंत आदर्शवादी। अपने तत्वों के अनुसार जीवन जीने वाला। समाज में समानता स्थापित हो इसलिए उसने अपना उपनाम का भी त्याग कर दिया था। काशी विद्यापीठ से स्नातक पदवी प्राप्त करने के पश्चात्…
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(आधार छंद - वीर छंद )
सुरसरी गंगे पतित पावनी, जन-जन का करती उद्धार।
सदा धवल विमले शुभ शीतल, महिमा जिसकी अपरंपार।
क्यों मानव अब भस्मासुर बन, नाच रहा है कचरा डाल।
विकट कारखाने शहरों का, मिला रहे हैं मल विकराल।
पावन जल को जहर बनाना , कर देंगे जब…
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आत्मविश्वास,कर्मठता, दृढ़निश्चय, लगन , निष्ठा, त्याग, समाज कल्याण और राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता जैसे शब्द जहाँ बहुतायत श्रेष्ठ व्यक्तित्व के लोगों का मान बढ़ाते हैं, वहीं पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी के जीवन से जुड़कर इन शब्दों की महत्ता और भी बढ़ जाती है। पंडित दीन दयाल उपाध्याय का जन्म…
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बस्तर अपनी नैसर्गिक सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है। केशकाल को बस्तर का प्रवेश द्वार कहा जाता है, यहीं से बस्तर की प्राकृतिक सुन्दरता अपनी झलक दिखा जाती है। बारह मोड़ों वाली घाटी, ऊँचे-ऊँचे साल के वृक्ष, टाटमारी, नलाझर, मांझिनगढ़ और कुएमारी जैसे अनेक मारी (पठार) हैं। मारी में अनेक शैलचित्र…
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हमारे अनेक विद्वान साहित्यकारों और महान नेताओं ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में महिमामण्डित किया है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय एकता की भाषा भी कहा है। उनके विचारों से हम सहमत भी हैं। हमने 15 अगस्त 2021 को अपनी आजादी के 74 साल पूरे कर लिए और हिन्दी को राजभाषा…
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खेतों में नयी फसल के आगमन पर उत्साह और उत्सवों के साथ देवी अन्नपूर्णा के स्वागत की हमारे देश में एक लम्बी परम्परा है। अलग-अलग मौसमों में अलग-अलग फसलों के पकने की खुशी में देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग ढंग से और अलग-अलग नामों से त्यौहार मनाए जाते हैं…
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दक्षिण कोसल/छत्तीसगढ़ प्रदेश के पूर्व में झारखण्ड और उड़ीसा, उत्तर में उत्तरप्रदेश, पश्चिम में महाराष्ट्र एवं मध्यप्रदेश और दक्षिण में आन्ध्रप्रदेश तथा तेलंगाना की सीमाएं हैं। रींवा ( 21*21’ उत्तरी अक्षाश एवं 81*83’ पूर्वी देशांश ) के मध्य छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले से 25 कि. मी. दूरी पर पूर्वी दिशा…
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मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जननी, महारानी कौशिल्या का मायका दक्षिण कोसल जिसे छत्तीसगढ़ के रूप में जाना जाता है, सदैव राष्ट्रीय सांस्कृतिक भावधारा का संवाहक रहा है।
पुण्य सलिला महानदी, शिवनाथ, सोंढुर, अरपा, पैरी, इंद्रावती आदि नदियों से आप्लावित यह उर्वर भूमि अपनी कृषि आधारित ग्रामीण पृष्ठभूमि के लिए…
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वर्तमान बस्तर को पहले चक्रकाट, महाकान्तार, महावन, दण्डकारण्य, आटविक राज्य आदि नाम से संम्बोधित किया जाता था। अचल में प्रचलित एक किंवदन्ती के अनुसार वारंगल के राजा प्रताप रुद्रदेव का भाई अन्नमदेव राज्य स्थापना की नीयत से यहां आया तो बाँस तरी में (बाँस झुरमुट के नीचे) अपना पहला पड़ाव…
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प्राचीनकाल से देवी देवताओं की पूजा के साथ प्रकृति की पूजा किसी न किसी रुप में की जाती है। पेड पौधे, फल फुल आदि के रूप में पूर्ण आस्था के साथ आराधना की जाती है। इसी पर आधारित ग्रामीण आंचल में भोजली बोने की परंपरा का निर्वहन पूर्ण श्रद्धा के…
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बस्तर भूषण को बस्तर का प्रथम प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। इस गंथ के लेखक ने अपने मित्र तहसीलदार द्वारा साझा किया गया एक संस्मरण का उल्लेख करते हुए लिखते हैं- "एक मित्र जो कोण्डागाँव में तहसीलदार थे, मुझसे कहते थे कि बड़ाडोंगर (बस्तर रियासत में दो डोंगर है, अर्थात…
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"जिस रोज 144 दफा लगाया गया था, उस रोज तमोरा गांव में सभा थी। वहां पर मैं, मेरी माँ और कुछ अन्य स्त्रियां सभा में गई। हम लोगों को सभा में जाने से किसी ने रोका नहीं। कुरुभाठा, ढोंगा, धौराभाठा, डूमरडीह इत्यादि के लोगों को डोर लगा के रोक रहे…
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छत्तीसगढ़िया लोक समाज में विभिन्न परंपराओं की अद्भुत छटा देखने को मिलती है। यहाँ शैव, वैष्णव और शाक्त मत के अलावा सिद्धों और नाथों का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। हरियाली अमावस्या को मनाए जाने वाले पर्व "हरेली" को कृषि यंत्रों की पूजा के साथ गांव देहात में मंत्र दीक्षा…
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कुछ वर्षों से भारत में प्रतिवर्ष 9 अगस्त को मूल निवासी दिवस को आदिवासी दिवस के रूप में मनाने की परम्परा प्रारंभ होती दिखाई देती है, परंतु इस विषय पर जानकारी का विस्तार सामान्य जन के बीच पूर्ण रूप से नहीं है। ये क्या दिवस है ? यह दिवस क्यों…
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छत्तीसगढ़ की कृषि आधारित संस्कृति, रीति-रिवाज और पर्व अनूठे हैं। यहां पर प्रचलित लोक पर्वों में लोक मंगल कामना सदैव रहती है। यहां जड़-चेतन सभी उपयोगी संसाधनों की विभिन्न लोक पर्वों में पूजा की जाती है। चाहे वह कृषि का औजार हो या जीव-जंतु या प्रकृति देव।
छत्तीसगढ़ में चौमासा…
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छत्तीसगढ़ अंचल में सरगुजा से लेकर बस्तर प्राचीन शिवलिंग पाये जाते हैं। यह वही दण्डकारण्य का क्षेत्र है जो भगवान राम की लीला स्थली रही है तथा बस्तर में उत्तर से लेकर दक्षिण तक प्राचीन शिवालयों के भग्नावशेष पाए जाते हैं। श्रावण मास में बस्तर की हरियाली देखते ही बनती…
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भारत में बहुत सारे स्थान ऐसे हैं जहाँ बोलते हुए पत्थर पाये जाते हैं, पत्थरों पर आघात करने से धातु जैसी ध्वनि निकलती है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा का ठिनठिनी पखना हो या कर्णाटक के हम्पी का विट्ठल मंदिर या महानवमी डिबा के पास का हाथी। इन पर चोट करने से…
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झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम हिन्दुस्तान की अद्वितीय वीरांगना के रूप में लिया जाता है। उनकी महत्ता का प्रमाण यही है कि सन् 1943 में जब नेता जी सुभाषचंद बोस ने सिंगापुर में आजाद हिंद फौज में स्त्रियों की एक रेजीमेंट बनाई तो उसका नाम ‘‘रानी झांसी रेजीमेंट’’ रखा…
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लक्ष्मी जी की उत्पत्ति के बारे में कहा गया है कि देवों तथा असुरों द्वारा समुद्र मंथन करते समय उससे उत्पन्न हुये चौदह रत्नों में से लक्ष्मी जी भी एक रत्न थीं। वे कमल के आसन पर बैठी हुई कमल पुष्प हाथ में धारण किये हुये प्रकट हुई थीं। लक्ष्मी…
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*फारुखअहमदखान -
केवल ‘महान‘ कह देने से या लिख देने से कोई ‘महान‘ नहीं हो जाता है। ‘महान‘ अथवा ‘महानता‘ का भावार्थ, ‘उत्कृष्ट, अति उत्तम, सर्वश्रेष्ठ तथा बहुत बढ़िया/शानदार, उद्देश्यपूर्ण कर्म, जिसमें व्यक्ति विशेष, स्वयं का त्याग/बलिदान/नि:स्वार्थ भाव/सहायता या भागीदारी प्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित हो और जिसकी एक स्वर में…
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झारखंड के छोटा नागपुर स्थित उलीहातु गाँव में 15 नवम्बर, 1875 को जन्में बिरसा मुंडा को जनजातीय समाज सहित संपूर्ण देश ने अपना भगवान माना है। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के धनी बिरसा ने ईसाई षड्यंत्रों, सामाजिक कुरीतियों आदि को अपने तर्कों से पटखनी दी और जमकर प्रतिकार किया। वहीं…
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छत्तीसगढ़ में तालाबों के साथ अनेक किंवदंतियां जुड़ी हुई है और इनके नामकरण में धार्मिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक बोध होते हैं। प्रदेश की जीवन दायिनी सरोवर लोक कथाओं तथा लोक मंगल से जुड़े हुए हैं। यहा तालाबों की बहुलता के पृष्ठभूमि में प्राकृतिक भू-संरचना, उष्ण-कटिबंधीय जलवायु नगर और ग्रामों का…
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भारतीय धर्म दर्शन तो सनातन है, अगर ऋग्वेद को भारतीय सभ्यता और धर्म का आधार मानें तो कम से कम 10,000 वर्ष से देश के सामाजिक, सांस्कृतिक तत्वों की निरंतरता बनी हुई है। किसी देश में रहने वाले लोगों की पहचान का आधार उनकी भाषा है जैसे फ्रांस के लोग…
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मनुष्य की बसाहट के लिए स्थान विशेष पर जल की उपलब्धा होना आवश्यक है। प्राचीन काल में मनुष्य वहीं बसता था जहाँ प्राकृतिक रुप जल का स्रोत होता था। पूरे भारत में जहाँ भी हम देखते है वहाँ प्राचीन काल की बसाहट जल स्रोतो के समीप ही पाई जाती है…
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वनवासी बाहुल जिला सरगुजा की प्राकृतिक सौम्यता हरियाली लोक जीवन की झांकी, सांस्कृतिक परंपराएं, रीति-रिवाज एवं पुरातात्विक स्थल बरबस ही मनमोह लेते हैं। वैसे तो सरगुजा की लोक संस्कृति में अनेकों त्योहार पर्व मनाए जाते हैं उनमें कठोरी पूजा मनाए जाने की परंपरा प्राचीन काल से रही है। हर साल…
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राजिम त्रिवेणी संगम स्थित यह मंदिर राज्य संरक्षित स्मारक है। तथापि धार्मिक स्थल होने के कारण यह मंदिर पूजित है। इस मंदिर की व्यवस्था, पूजा तथा सामान्य देखभाल स्थानीय ट्रस्ट के अधिन है। यहॉं पर नियमित रूप से दर्शनार्थी आते रहते हैं। शिवरात्रि के पर्व पर राजिम में विशाल मेला…
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भारत का सांस्कृतिक इतिहास अत्यंत गौरवशाली है। यहाँ प्रचलित संस्कारों, गीतों, लोकाचारों, अनुष्ठानों, व्रत और तीज-त्यौहारों में कथाओं-गाथाओं का बड़ा प्रासंगिक व मार्मिक समायोजन होता है। इन्ही गाथाओं को पुनः स्मरण करने के लिए ही तीज-त्यौहार व पर्व मनाए जाते हैं। वैसे भी भारत पर्वों व उत्सवों का देश है…
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हमारे देश में मूर्ति पूजा के रूप में महावीर हनुमान की पूजा अत्यधिक होती है क्योंकि प्रत्येक शहर, कस्बों तथा गांवों में भी हनुमान की पूजा का प्रचलन आज भी देखने को मिलता है। हनुमान त्रेतायुग में भगवान राम के परम भक्त तथा महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ…
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लखनपुर उदयपुर ब्लाक मुख्यालय की सरहद पर बिलासपुर मुख्य मार्ग पर स्थित ग्राम जेजगा मे अंचल की आराध्य देवी माता रामपुरहीन सिद्ध पीठ के रूप में विराजमान है। ऐसी मान्यता है कि यहां से कोई भी श्रद्धालु-भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। माता रामपुरहीन को अनेकों नाम जैसे डोंडराही अर्थात (अल्हड…
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सियादेई बालोद जिले का प्रसिद्ध धार्मिक एवं पर्यटन स्थल है। नवरात्रि में यहाँ दर्शनार्थी श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है, वैसे तो आस पास के क्षेत्र से बारहों महीने यहाँ पर्यटक एवं श्रद्धालु दर्शनार्थ आते हैं, परन्तु नवरात्रि पर्व पर बड़ी संख्या में आराधक पहुंचते हैं। यह स्थान बालोद जिला मुख्यालय…
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रायपुर से जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 30 पर विकास खंड मुख्यालय फरसगांव स्थित है। यहां से लगभग 16 कि. मी. दूर पश्चिम दिशा में पहाड़ियों से घिरा बड़ेडोंगर नामक गांव है, जहां पहले बस्तर की राजधानी हुआ करती थी। ग्राम बड़ेडोंगर के भैंसा दोंद डोंगरी ( महिषा द्वंद्व ) नामक…
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प्राचीन काल से छत्तीसगढ़ अपनी शाक्त परम्परा के लिए विख्यात है, यहाँ अधिकांश देवियाँ डोंगरी में विराजित हैं। इस लिए देव स्थलों में मनमोहक नयनाभिराम प्राकृतिक सौंदर्य की भरमार है। यहां का लोक जीवन, गांव, नदी-नाले, जंगल और पहाड़ श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
आस्थावान छत्तीसगढ़ के लोकमानस पर…
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भारत देश के हृदय स्थल में स्थित प्राचीन दक्षिण कोसल क्षेत्र जिसे अब छत्तीसगढ के नाम से जाना जाता है, इस छत्तीसगढ राज्य के हृदय स्थल में बसे तथा राज्य की राजधानी होने का गौरव प्राप्त रायपुर शहर वर्तमान ही नहीं बल्कि प्राचीन समय से ही प्राप्त है । लोकमत…
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छत्तीसगढ की पावन धरा पर स्थित धार्मिक स्थल डोंगरगढ़ से लगभग 14 कि0मी0 उत्तर दिशा की ओर जाने वाले सडक मार्ग पर, भण्डारपूर नामक ग्राम के समीप स्थित है ग्राम करेला, जिसे भंडारपुर करेला के नाम से भी जाना जाता है। यह ग्राम खैरागढ तहसील व पोस्ट ढारा के अंतर्गत…
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आदिशक्ति जगदंबा भवानी माता भिन्न-भिन्न नाम रूपों में विभिन्न स्थानों पर विराजित हैं। छत्तीसगढ़ में माता की विशेष कृपा है। यहां माता रानी बमलाई, चंद्रहासिनी, महामाया, बिलाई माता, मावली दाई के रूप में भक्तों की पीड़ा हरती है। ऐसा ही करूणामयी एक रूप रानी माता के नाम से विख्यात है…
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भक्त माता कर्मा जयंती चैत्र मास कृष्ण पक्ष एकादशी के दिन मनाई जाती है जिसे पापमोचनी एकादशी भी कहा जाता है । छत्तीसगढ़ में इस परंपरा की शुरुआत साहू समाज द्वारा सन 1974 में रायपुर से की गई थी । बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश के किसी सामाजिक पत्रिका…
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छत्तीसगढ़ के गाथा- गीत "दसमत कैना" में उड़ीसा के अन्त्यज समाज और छत्तीसगढ़ के द्विज समाज की तत्कालीन सामाजिक व्यवस्थाएँ स्पष्ट रूप से देखने में आती हैं। गाथा से जुड़े सामाजिक सन्दर्भों का बिन्दुवार वर्णन निम्नानुसार है –
सामूहिकता, सहकारिता और व्यवसाय - नौ लाख ओड़िया लोगों का एक साथ…
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रामायण महाकाव्य केवल भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में पसन्द की जाती है, सूरीनाम, फिजी, गुयाना, मॉरीशस, वेस्टइंडीज आदि देशों के प्रवासियों ने रामायण को अपने हृदय में बसाया है। बहुत से एशियाई देशों में रामायण को अपनी भाषा में अनुवादित कर अपने धार्मिक ग्रन्थ के रूप में…
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छत्तीसगढ़ प्रदेश के अन्तर्गत जांजगीर-चांपा जिला मुख्यालय से शिवरीनारायण सड़क मार्ग पर स्थित ग्राम खरोद लगभग 35 कि.मी. दूरी पर स्थित है। बिलासपुर जिला मुख्यालय से खरोद की दूरी लगभग 62 कि.मी. तथा रायपुर से वाया कसडोल शिवरीनारायण होकर खरोद लगभग 140 कि.मी. दूरी पर है। यहां पर पहुंचने के…
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भारतवर्ष के लगभग मध्य में स्थित छत्तीसगढ़ राज्य के अन्तर्गत रायगढ़ जिला प्रागैतिहासिक काल के भित्ति चित्रों के लिये प्रसिद्ध है जिसके प्रमाण सिंघनपुर तथा कबरा पहाड़ में मिलते हैं। पाषाण युग के बाद ताम्रयुग तथा वैदिक काल में छत्तीसगढ़ की स्थिति के बारे में कोई सूचना नहीं मिलती…
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जंगल में गुजरते हुए पहाड़ की चढ़ाई, ऊपर पठारी भाग में चौरस मैदान और चौरस मैदान के नीचे सभी ओर गहरी खाई, मैदान से खाई के बीच बेतरतीब पत्थरों की दीवार। दीवार में प्राकृतिक रुप से बने अनेक गुफानुमा स्थान। 8-10 वर्ग कि.मी. का पठारी क्षेत्र पूर्णतः वीरान किन्तु चारों…
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महाशिवरात्रि पर्व पर त्रेतायुग के नायक भगवान श्रीराम के वनवास काल स्थल एवं 5वीं-6वीं शताब्दी के प्राचीन प्रसिद्ध शिवधाम गढधनौरा गोबरहीन में मेला लगता है। श्रद्धालु शिवभक्तों, प्रकृति से प्रेम करने वाले प्रकृति प्रेमियों एवं सभ्यता संस्कृति इतिहास में अभिरूचि रखने वाले जिज्ञासुओं की भारी भीड़ के चलते यंहा पर…
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Read Moreछत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर अंचल को भारत के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाला रास्ता केशकाल की घाटी से गुजरता है एक तरह से यह घाटी वहाँ की जीवन-रेखा है। यह घाटी अपनी घुमावदार सड़क और प्राकृतिक सुंदरता के लिये जानी जाती है। प्रस्तुत है उसी घाटी की सड़क की छोटी…
छत्तीसगढ़ राज्य पुरातत्व की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। यहां पर लगभग 5-6वीं शताब्दी ई. से लेकर अभी तक रामायण के कथानकों से सम्बंधित दृश्य मंदिरों तथा प्रतिमाओं में उत्कीर्ण किये गये हैं जो आज भी विद्यमान हैं। तुलसीकृत रामचरित मानस के किष्किन्धाकाण्ड मे उल्लेखित जानकारी के अनुसार राम वनगमन…
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अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के साथ राम की पुरातन एवं सनातन ऐतिहासिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्थापना भी हो जाएगी। अब विभिन्न रामायणों में दर्ज उस विज्ञान की वैज्ञानिकताओं को भी मान्यता देने की आवश्यकता है, जिन्हें वामपंथी पूर्वाग्रहों के चलते वैज्ञानिक एवं बुद्धिजीवी न केवल नकारते रहे…
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ग्रामीण भारत के सामाजिक जीवन में मेला-मड़ई, संत-समागम का विशेष स्थान रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व जब कृषि और ग्रामीण विकास नहीं हुआ था तब किसान वर्षा ऋतु में कृषि कार्य प्रारम्भ कर बसंत ऋतु के पूर्व समाप्त कर लेते थे। इस दोनों ऋतुओं के बीच के 4 माह में…
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छत्तीसगढ़ के अन्यान्य वनांचलों की ही भांति बारनवापारा को भी एक रहस्यपूर्ण, अलग-थलग, सजीव व सतत् सृजनशील तथा बेदाग हरापन लिए बीहड़ वन क्षेत्र के रूप में सहृदय दर्शक सहज अनुभव करता है। जिस वन्य परिवेश के प्रत्यक्षानुभव प्राप्त करने हेतु छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर से बारनवापारा की यात्रा…
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छत्तीसगढ़ के उत्तर पश्चिम सीमांत भाग में स्थित कोरिया जिले का भरतपुर तहसील प्राकृतिक सौदंर्य, पुरातत्वीय धरोहर एवं जनजातीय/सांस्कृतिक विविधताओं से परिपूर्ण भू-भाग है। जन मानस में यह भू-भाग राम के वनगमन मार्ग तथा महाभारत कालीन दंतकथाओं से जुड़ा हुआ है। नवीन सर्वेक्षण से इस क्षेत्र से प्रागैतिहासिक काल के…
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मल्हार छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर जिले में 21090’ उत्तरी अक्षांस तथा 82020’ पूर्वी देशांतर में स्थित है। मल्हार बिलासपुर से मस्तूरी होते हुये लगभग 32 कि.मी. दूरी पर पक्के सड़क मार्ग पर स्थित हैं कल्चुरि शासक पृथ्वीदेव द्वितीय के कल्चुरि संवत् 915 (1163 ई.) का शिलालेख जो कि मल्हार से…
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इसे बस्तर का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिये कि इसे जाने-समझे बिना इसकी संस्कृति, विशेषत: इसकी वनवासी संस्कृति, के विषय में जिसके मन में जो आये कह दिया जाता रहा है। गोंड जनजाति, विशेषत: इस जनजाति की मुरिया शाखा, में प्रचलित रहे आये "घोटुल" संस्था के विषय में मानव विज्ञानी…
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मनुष्य की पहचान कही जाने वाली मानव संस्कृति और इसमें रची-बसी कृत कला रूपों की प्रेरणा स्रोत एवं मूल आधार विषयक सवाल पर अध्ययन कर हम पाते है कि आनंद उत्सर्जना के हेतु, सृजित समग्र सृष्टि की मूल स्रोत है प्रकृति, जिसका आधार परम्तत्व माना जाता है।
शिक्षा-दीक्षा के द्वारा…
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बस्तर में निवासरत विभिन्न जाति एवं जनजाति के लोग प्रकृति आधारित जीवन-यापन करते है। ये लोग आदिकाल से प्रकृति के सान्निध्य में रहते हुये उसके साथ जीने की कला स्वमेव ही सीख लिए हैं। यहाँ के रहवासियों का मुख्य व्यवसाय वनोपज, लघुवनोपज संग्रहण कर उसे बेच कर आय कमाना है…
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भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मोहनदास करमचंद गांधी एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके विराट व्यक्तित्व के आगे विश्व का बड़े से बड़ा व्यक्ति भी बौना दिखाई देता है। यह एक करिश्माई व्यक्तित्व था जिसने पूरी दुनिया को सत्य और अहिंसा के पथ पर चलने का पाठ…
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भारत के स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़वासियों की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। वर्तमान छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम 1857 से पूर्व प्रारम्भ हो चुका था, तत्कालीन समय में यह जमींदारी क्षेत्र था तथा कलचुरियों, मराठों एवं अंग्रेजों के अधीन रहा। कभी मराठों से स्वतंत्रता पाने के लिए यहाँ…
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गुरु गोविंद सिंह जी के 354 वें प्रकाश पर्व पर विशेष आलेख
हिन्दू जाग्रत है तो भारत सुरक्षित है। भारत का धर्म और संस्कृति सुरक्षित है। किन्तु जब भारत की रक्षा करनेवाले ही हताश, निराश और ध्येय विहीन रहेंगे तो भला राष्ट्र कैसे सुरक्षित रह सकता है। इसलिए प्रत्येक भारतवासी…
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भारत ही स्वामीजी का महानतम भाव था। ...भारत ही उनके हृदय में धड़कता था, भारत ही उनकी धमनियों में प्रवाहित होता था, भारत ही उनका दिवा-स्वप्न था और भारत ही उनकी सनक थी। इतना ही नहीं, वे स्वयं भारत बन गए थे। वे भारत की सजीव प्रतिमूर्ति थे। वे स्वयं…
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आदि मानव के बसेरे हमको नदी-नालों के किनारे ही प्राप्त होते हैं, जिन्हें नदी घाटी सभ्यता का नाम दिया गया है। नदी नालों के समीप बसेरा होने का एकमात्र कारण जल की उपलब्धता है, किसी भी प्राणी के प्राणों के संचालन के लिए जल अत्यावश्यक तत्व है। सभ्यता के विकास…
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संत कवि पवन दीवान की जयंती एक जनवरी पर विशेष आलेख -स्वराज करुण
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए अपनी मर्मस्पर्शी और ओजस्वी कविताओं के माध्यम से कई दशकों तक जन -जागरण में लगे पवन दीवान आज अगर हमारे बीच होते तो 76 साल के हो चुके होते । लेकिन तब…
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आज से लगभग सत्तर साल पहले जशपुर का वनवासी अंचल जब अशिक्षा, निर्धनता, बेकारी झेल रहा था और ईसाई मिशनरियां इसका फ़ायदा उठाकर उन्हें बेरोकटोक षड़यंत्रपूर्वक धर्मांतरित कर रही थी तब एक युवा वहाँ नौकरी करने आया था, जब उसने यह सब देखा तो नौकरी छोड़कर निर्धन एवं अशिक्षित वनवासियों…
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बस्तर रियासत पर रतनपुर के कलचुरि शासन के प्रभाव से सम्बन्धित कई तरह की कहानियाँ चलन में है; अत: थोडी बात कलचुरियों की। लगभग दसवी शताब्दी में त्रिपुरी से आ कर कलचुरियों की एक शाखा नें दक्षिण कोसल पर विजय हासिल की तथा कलिंगराज (1000-1020 ई.) नें अपनी सत्ता स्थापित…
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मित्र का सभी मनुष्य के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान होता है। किसी व्यक्ति के मित्रों के व्यक्तित्व से ही संबंधित व्यक्ति के व्यक्तित्व का अंदाजा सहज रूप से लगाया जा सकता है। सरल शब्दों में कहा जाये तो दो मित्र एक दूसरे का प्रतिबिंब होते हैं। ये एक ऐसा नाता…
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गुरु घासीदास जी के पूर्वज उत्तरी भारत में हरियाणा के नारनौल के निवासी थे। वे सतनाम संप्रदाय से संबंधित थे। सन् 1672 में मुगल बादशाह औरंगजेब से युद्ध के बाद नारनौल के सतनामी यहां से पलायन कर गए। इनमें से कुछ उत्तर प्रदेश में जा बसे और कुछ उड़ीसा के…
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आज कल राजनीतिक फायदे के लिए एक नई थ्योरी गढ़ी जा रही है -"जय भीम-जय मीम"। यानी चुनावी सियासत के लिए भारत के मुसलमानों और दलितों को एक हो जाना चाहिए। झूठी औऱ प्रयोजित आर्य इन्वेजन थ्योरी के खारिज होने के…
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गुरु नानक देव जी का जन्मदिन प्रति वर्ष कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। गुरु नानक देव सिख धर्म के प्रथम गुरु हैं। सिख धर्म की स्थापना गुरु नानक देव ने ही की थी। गुरु नानक देव ने अपने पारिवारिक जीवन के सुख का ध्यान न करते…
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सनातन धर्म मे बारह महीनों का अपना अलग अलग महत्त्व है लेकिन समस्त मासों में कार्तिक मास को अत्यधिक पुण्यप्रद माना गया है। इस माह मे स्नान, दान व दीपदान के अलावा समस्त प्रमुख तीज त्योहार होते है।
इस कार्तिक मास में बैकुंठ चतुर्दशी का विशेष महत्व है। इस दिन…
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करम डार पूजा पर्व छत्तीसगढ़ के जनजातीय समाज का बहुप्रचलित उत्सव है। कर्मा जनजातीय समाज की संस्कृति का प्रतीक भी माना जाता है जो कि प्रकृति के प्रति पूर्णरूप से समर्पित है। इस त्योहार मे एक विशेष प्रकार का नृत्य किया जाता है जिसे कर्मा नृत्य कहते हैं। यह उत्सव…
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झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम हिन्दुस्तान की अद्वितीय वीरांगना के रूप में लिया जाता है। उनकी महत्ता का प्रमाण यही है कि सन् 1943 में जब नेता जी सुभाषचंद बोस ने सिंगापुर में आजाद हिंद फौज में स्त्रियों की एक रेजीमेंट बनाई तो उसका नाम ‘‘रानी झांसी रेजीमेंट’’ रखा…
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गौरा पूजा विशुद्ध रुप से आदिम संस्कृति की पूजा है, इस पर्व को जनजातीय समाज के प्रत्येक जाति के लोग मनाते है और क्षेत्र अनुसार दिवाली से 5 दिन पूर्व से पूस पुन्नी तक मनाया जाता है। जैसे रायपुर राज मे दिवाली प्रमुख है, बिलासपुर राज मे देव उठनी, बनगवां…
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यम द्वितीया या भाई दूज के दिन ही चित्रगुप्त पूजा होती है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को चित्रगुप्त पूजा होती है। दिवाली के बाद चित्रगुप्त पूजा का खास महत्व होता है। चित्रगुप्त की पूजा प्राचीन काल से ही होती है लेकिन गुप्तकाल में इनके पूजा को…
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छोटा नागपुर के अधिकतर वनवासी सन 1890-92 के कालखंड में चर्च के पादरियों के बहकावे में आकर ईसाई हो गये थे। बिरसा का परिवार में इसमें शामिल था परंतु शीघ्र ही ईसाई पादरियों की असलियत भांप कर बिरसा न केवल ईसाई मत त्यागकर हिंदू धर्म में लौट आये वरन उन्होंने…
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दीपावली के अगले दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा किया जाता है। विष्णु पुराण, वराह पुराण तथा पदम् पुराण के अनुसार इसे अन्नकूट भी कहा जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार भगवान कृष्ण के द्वारा सबसे पहले गोवर्धन पूजा की शुरुआत की गईं तब से यह पर्व मनाया…
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प्रकृति की अपार खूबसूरती से भरा बस्तर संभाग अपने अकूत प्राकृतिक सौंदर्य और खनिज संपदा के लिए जाना जाता है। इसी क्रम में अविभाजित बस्तर जिले से मुक्त होकर बने नवीन जिले कोंडागांव में पर्यटन की अपार संभावनाएं है, जिसका सिरमौर केशकाल विकासखंड है।
विगत एक दो वर्षों में चर्चा…
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प्राचीनकाल से भारत भूमि में संत-महात्माओं, ॠषि-मुनियों की सुदीर्घ परम्परा रही है। संत-महात्माओं के आशीषों के फ़लों की किंदन्तियो, किस्से कहानियों के रुप में वर्तमान में चर्चा होती है तो उनके द्वारा दिए गये शापों की भी चर्चा होती है। ऐसा ही एक शाप लखनपुर को मिला था।
जानकारों की…
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पृथक छत्तीसगढ़ राज्य का सपना हमारे पुरखों ने देखा था और उस सुनहरे स्वप्न को हकीकत का अमलीजामा पहनाने के लिए संघर्ष और आंदोलन का एक लंबा दौर चला। पं.सुंदरलाल छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के प्रथम स्वप्नदृष्टा थे तत्पश्चात डॉ खूबचंद बघेल, संत पवन दीवान, ठाकुर रामकृष्ण सिंह और श्री चंदूलाल…
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स्वामी विवेकानन्द ने भगिनी निवेदिता से कहा था कि ‘भविष्य की भारत-संतानों के लिए तुम एकाधार में जननी, सेविका और सखा बन जाओ।' अपने गुरुदेव के इस निर्देश का उन्होंने अक्षरश: पालन किया था। भारत की लज्जा और गर्व निवेदिता की व्यक्तिगत लज्जा और गर्व बन गये थे।
किसी भी…
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छत्तीसगढ़ अंचल की शाक्त परम्परा में शक्ति के कई रुप हैं, रजवाड़ों एवं गाँवों में शक्ति की उपासना भिन्न भिन्न रुपों में की जाती है। ऐसी ही एक शक्ति हैं खल्लारी माता। खल्लारी में माता जी की पूजा अर्चना तो प्रतिदिन होती ही है चैत और कुआंर कि नवरात्रि में…
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भारत एवं छत्तीसगढ़ राज्य के कई रियासतकालीन दशहरा उत्सव प्रसिद्ध हैं, इन्ही में एक छत्तीसगढ़ के जशपुर का ऐतिहासिक एवं रियासतकालीन दशहरा महोत्सव भी आता है। अन्य क्षेत्रों की भांति शारदीय नवरात्रि के पहले ही दिन से यहां का ऐतिहासिक दशहरा उत्सव प्रारंभ होता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण…
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रायगढ़ जिले में सारंगढ़ से सोलह किलोमीटर की दूरी पर इस जिले का सबसे बड़ा गाँव कोसीर स्थित है। कोसीर की जनसंख्या लगभग दस हजार की है । गांव में जातिगत दृष्टि से जनजातीय समुदाय, सतनामी, वैष्णव, कहरा, केंवट, मरार, कलार, रावत, चन्द्रनाहू, कुर्मी, धोबी, नाई, लोहार, पनका, सारथी कुछ…
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रतनपुर पूरे भारत वर्ष में न केवल ऐतिहासिक नगरी के रुप में प्रसिद्ध है, अपितु धार्मिक नगरी के रुप में भी प्रसिद्ध है। कलचुरि राजवंश के शासकों ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर पूरे छत्तीसगढ़ प्रदेश पर एक लम्बे समय लगभग 700 वर्षों तक शासन किया। जो भारतीय इतिहास में…
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छत्तीसगढ़ का धमधा ऐतिहासिक तथ्यों और खूबियों के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन सबसे अनोखा यहां का त्रिमूर्ति महामाया मंदिर है। जी हां, यह अनोखा इसलिए क्योंकि यहां तीन देवियों का संगम है, जो दूसरी जगह देखने को नहीं मिलता। यहां एक ही गर्भगृह में तीन देवियों- महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती…
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भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा की शक्ति को समाप्त किए बिना अंग्रेज पूरे देश को चिरकाल तक अपना गुलाम नहीं बना सकते थे, यही आशय भारत में एक सर्वेक्षण के बाद लॉर्ड मैकॉले के ब्रिटिश संसद में दिए गए भाषण में था। भारत अपने प्राचीन ज्ञान परंपरा और विरासत पर…
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आत्मविश्वास,कर्मठता, दृढ़निश्चय, लगन, निष्ठा, त्याग, समाज कल्याण और राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता जैसे शब्द जहाँ बहुतायत श्रेष्ठ व्यक्तित्व के लोगों का मान बढ़ाते हैं, वहीं पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के जीवन से जुड़कर इन शब्दों की महत्ता और भी बढ़ जाती है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916…
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तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी के अंतिम दिवस दिनाँक 31 /8/ 2020 दिन सोमवार को सुबह 10:00 बजे से लेकर 11:00 बजे तक तीसरे दिन के पहले सत्र और कुल वेबीनार छठवें अकादमिक सत्र का प्रारंभ हुआ। इस सत्र का…
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अंतर्रष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन "लोक परंपरा एवं लोक साहित्य में राम कथा" पर दिनाँक 30/8/2020 को सुबह 11:00 से 12:30 के मध्य तृतीय अकादमिक सत्र का प्रारंभ किया गया। जिस…
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तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दिनाँक 29-31 अगस्त, 2020के मध्य हुआ। इस वेबीनार का विषय छत्तीसगढ़ में (दक्षिण कोसल में) रामकथा की व्याप्ति एवं प्रभाव रहा है। लोक साहित्य में छत्तीसगढ़ की संस्कृति राम की भूमि के रूप में…
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आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की कोई तिथि। अभी सूर्योदय में कुछ पल शेष है। छत्तीसगढ़ के एक गाँव का घर। गृहलक्ष्मी रसोईघर के सामने के स्थल को गोबर से लीपती है। उस पर चावल के आटे से चौक पूरती है, पुष्पों का आसन बिछाती है। पुत्र बाल-सुलभ जिज्ञासा से…
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राज्यपाल ‘‘दक्षिण कोसल में राम कथा की व्याप्ति एवं प्रभाव’’ विषय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय वेब शोध संगोष्ठी में हुई शामिल
रायपुर, 31 अगस्त 2020/ छत्तीसगढ़ के कण-कण में राम बसे हैं। यहां के लोगों की जीवन शैली पूरी तरह से राममय हैं। उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा…
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जग में ऊंची प्रेम सगाई, दुर्योधन के मेवा त्यागे, साग बिदूर घर खाई, जग में ऊंची प्रेम सगाई। जीवन में प्रेम का महत्व इतना होता है कि वह मनुष्य की जीवन लता को सींचता है और पुष्ट कर…
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भगवान राम की एतिहासिकता को लेकर लम्बे समय समय से एक दीर्घकालिक बहस विद्वानों के बीच होती रही है और राम मंदिर तथा राम सेतु जैसे मुद्दों ने इस चर्चा को व्यापक बनाने का काम किया है। किंतु आम जन-मानस को भगवान राम की ऐतिहासिकता जैसे विषयों से बहुत सरोकार…
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गोंड़ समाज में राम इस प्रकार व्याप्त हैं, जैसे हनुमान जी के अंदर श्री राम बसते है। अगर कोई अंतर है तो यह कि जिस प्रकार हनुमान जी श्राप के कारण अपनी याददास्त भूल जाते थे उसी प्रकार गोंड़ समाज श्रीराम को धारण करते हुए ही जीवन जीता है। पर…
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हरेली का त्यौहार छत्तीसगढ़ में प्राचीनकाल से धूमधाम से मनाया जाता है, इस दिन किसान अपने कृषि उपकरणों की पूजा के साथ देवताधामी को सुमरता है और बाल गोपाल गेड़ी चढ़कर उत्सव मनाते हैं। गांवों में इस दिन विभिन्न खेलकूदों का आयोजन किया जाता है। रोटी, पीठा, चीला के स्वाद…
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दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़) प्रांत प्राचीनकाल से दो बातों के लिए प्रसिद्ध है, पहला धान की खेती और दूसरा माता कौसल्या की जन्मभूमि याने भगवान राम की ननिहाल। यहाँ का कृषक धान एवं राम, दोनों से जुड़ा हुआ है। यहाँ धान की खेती प्रचूर मात्रा में होती है, इसके साथ ही…
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कांगेर वैली राष्ट्रीय उद्यान छत्तीसगढ़ प्रदेश के बस्तर जिले के जिला मुख्यालय जगदलपुर में स्थित है। राष्ट्रीय उद्यान को कांगेर नदी से अपना नाम मिलता है, जो उत्तर-पश्चिम से दक्षिण पूर्व दिशा में केंद्र से बहती है। वर्ष 1982 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के तहत राष्ट्रीय उद्यान अधिसूचित किया…
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भगवा ध्वज को अपना गुरू माना है तथा गुरू पूर्णिमा के अवसर पर देश भर में गुरू दक्षिणाओं के कार्यक्रम होते हैं। प्रश्न यह है कि संघ ने भगवा धवज को ही अपना गुरू क्यों माना है?
संघ की प्रत्येक शाखा 'व्यास पूर्णिमा'/ गुरू…
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वाचिक परम्पराएं सभी संस्कृतियों का एक महत्वपूर्ण अंग होती हैं। लिखित भाषा का प्रयोग न करने वाले लोक समुदाय में संस्कृति का ढांचा अधिकतर मौखिक परम्परा पर आधारित होता है। कथा, गाथा, गीत, भजन, नाटिका, प्रहसन, मुहावरा, लोकोक्ति, मंत्र आदि रूपों में मौखिक साधनों द्वारा परम्परा का संचार ही वाचिक…
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भारतवर्ष का हिमालय क्षेत्र सदैव से ऋषि-मुनियों तथा संतों को आकर्षित करने वाला रहा है। ऋषि अष्टावक्र, देवऋषि नारद, महर्षि व्यास, परसुराम, गुरु गोरखनाथ, मछिंदरनाथ इत्यादि ने हिमालय को अपनी साधना हेतु चुना।
अतएव हिन्दू संस्कृति में देवऋषि नारद का शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि वे ब्रह्मा जी के…
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लोकमान्यता है कि केरल प्रदेश के श्रीमद्बषाद्रि पर्वत पर भगवान् शंकर स्वयंभू लिंग रूप में प्रकट हुए और वहीं राजा राजशेखरन ने एक मन्दिर का निर्माण इस ज्योतिर्लिंग पर करा दिया था। इस मन्दिर के निकट ही एक 'कालडि' नामक ग्राम है। आचार्य शंकर का जन्म इसी कालडि ग्राम में…
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भारत जैसे बड़े देश में व् दुनिया भर में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा अथवा महत्वपूर्ण स्तम्भ बताया जाता है. मीडिया मतलब हर वह माध्यम है जिससे जनता तक जानकारियाँ, विचार व् नीतियाँ पहुँच सके. इस मीडिया के तंत्र में समाचार पत्र, पुस्तक, पत्रिकाएं, टेलीवीजन, रेडियो, इन्टरनेट इत्यादि हैं. टीवी…
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दक्षिण कोसल का इतिहास, संस्कृति, सभ्यता एवं समाज विषयक राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का दो दिवसीय आयोजन 5 एवं 6 नवम्बर 2019 को गुरु घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय में सेंटर फ़ॉर स्टडीज ऑन हॉलेस्टिक डेवलपमेंट, रायपुर एवं गुरु घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर के संयुक्त तत्वाधान में हो रहा है।

इस संगोष्ठी में…
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बस्तर का आदिवासी समुदाय देवी देवताओं की मान्यतानुसार कार्य करता है, वर्ष में इन देवी देवताओं की आराधना करने के लिए जातरा पर्व का आयोजन विभिन्न परगनों में होता है। एक परगना में परगना में चालिस पचास गांवों का समूह होता है, जो अपने आराध्य देवी-देवता को प्रशन्न करने के…
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बात सितरम गाँव की है जिसके निकट एक पहाड़ी टीले पर बस्तर की एक चर्चित प्राचीन परलकोट जमींदारी का किला अवस्थित था। यह स्थान वीर गेन्दसिंह की शहादत स्थली के रूप में भी जाना जाता है चूंकि यहीं एक इमली के पेड़ पर लटका कर आंग्ल-मराठा शासन (1819 से 1842…
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दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा जिला) के बारसूर को बिखरी हुई विरासतों का नगर कहना ही उचित होगा। एक दौर में एक सौ सैंतालिस तालाब और इतने ही मंदिरों वाला नगर बारसूर आज बस्तर के प्रमुख पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। कोई इस नगरी को दैत्य वाणासुर की नगरी कहता है…
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आज के समय में दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय हो गया है। यहाँ दंतेश्वरी मंदिर की अवस्थिति के कारण इसे एक धार्मिक पर्यटन नगर होने का गौरव प्राप्त है। राजा की कुल अधिष्टात्री देवी का क्षेत्र यहाँ होने के होने के कारण दंतेवाड़ा को रियासत काल में भी विशेष दर्जा प्राप्त था…
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दुनिया के इतिहास में मोहनदास करमचंद गाँधी, जिन्हें हम महात्मा गाँधी के रूप में जानते एवं पहचानते है, एक अमिट नाम है। भारत में अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों में महात्मा गाँधी ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे पूरे देश के भीतर एक राजनैतिक, सामाजिक एवं…
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छत्तीसगढ़ अंचल के अन्य त्यौहारों में तीजा व्रत भी प्रमुख त्यौहार है। यह त्यौहार भासो मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को प्रदेश के सरगुजा क्षेत्र से लेकर बस्तर तक मनाया जाता है। पोला तिहार से इस पर्व की तैयारी प्रारंभ हो जाती है। विवाहित बेटियाँ-बहने अपने भाई के आने…
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पर्वतीय उपत्यकाओं और सुरम्य वन प्रांतर में बसा सम्पूर्ण केशकाल क्षेत्र प्रकृति एवं पुरातत्व के अतुल वैभव से भरा पड़ा है । इस क्षेत्र में अनेक स्थानों पर प्राचीन मंदिरों के भग्नावशेष, पाषाणकालीन अवशेष, प्रतिमाओं एवं शैलचित्रों आदि की प्राप्ति हुई है, जो बाहरी दुनियाँ से अज्ञात है या…
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जनजातियां विश्व के लगभग सभी भागों में पायी जाती है, भारत में जनजातियों की संख्याअफ्रीका बाद दूसरे स्थान पर है। प्राचीन महाकाव्य साहित्य में भारत में निवासरत विभिन्न जनजातियों जैसे भारत, भील, कोल, किरात, किन्नरी, मत्स्य व निषाद आदि का वर्णन मिलता है। प्रत्येक जनजाति की अपनी स्वयं की प्रशासन…
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क्या लोग थे वो ,जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी जनता के नाम कर दी और जो आजीवन आम जनता के हितों के लिए संघर्ष करते रहे ,जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी का एक -एक पल देश और समाज की सेवा में लगा दिया ,जिन्होंने अपने संघर्षों से इतिहास बनाया और जिनका जीवन ही…
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बस्तर अंचल में रथयात्रा उत्सव का श्रीगणेश चालुक्य राजवंश के महाराजा पुरूषोत्तम देव की जगन्नाथपुरी यात्रा के पश्चात् हुआ। लोकमतानुसार ओड़िसा में सर्वप्रथम राजा इन्द्रद्युम्न ने रथयात्रा प्रारंभ की थी, उनकी पत्नी का नाम ‘गुण्डिचा’ था। ओड़िसा में गुण्डिचा कहा जाने वाला यह पर्व कालान्तर में परिवर्तन के साथ बस्तर…
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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 25 किमी की दूरी पर रींवा गढ़ में एक टीले का उत्खनन हो रहा है। यहाँ उत्खनन के द्वारा इतिहास की किताब के अज्ञात पृष्ठ अनावृत हो रहे हैं। खुरपी से खुरचकर धरती की परतों के नीचे छिपा इतिहास परतों से बाहर लाया रहा है।
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राजा-रानी की कहानियाँ लोक का एक अंग है, दादी-नानी की कहानियों में भी राजा-रानी होते थे। जब किसी स्थल का पुरातात्विक उत्खनन प्रारंभ होता है। राजा-रानी एक बार फ़िर जीवित हो जाते हैं। कहीं राजा की मोतियों की माला मिलती है तो कहीं रानी का बाजूबंद और मुंदरी। फ़िर प्रमाण…
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मानसून की पहली फ़ुहार के साथ वर्षा ॠतु आगमन हो गया है। मई-जून की भीषण गर्मी में जिस तरह लोगों ने जल संकट का सामना किया उसे देखकर लगता है कि आने वाले भविष्य में जल संकट भयानक रुप लेने वाला है। वर्षा जल का संग्रहण आवश्यक हो गया है…
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भारत में कोई ऐसा व्यक्ति हुआ है, जिसके साहित्य पर सबसे अधिक पीएचडी हुई हैं, उसका नाम कबीर है। कबीर भारत की संत परम्परा से आते हैं और आडम्बर के विरुद्ध समाज को मथ डालते हैं। उसके पश्चात जो नवनीत निकल कर आता है, उसे कबीर विचार धारा कहा जाता…
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छोटू - बड़े भैया, ये AIT क्या होता है?
बड़कू - AIT यानी Aryan Invasion Theory, यह एक प्रकार का सिद्धांत है |
छोटू - ये सिद्धांत क्या होता है?
बड़कू - सिद्धांत यानी एक कल्पना या एक अटकल जिससे किसी घटना का स्पष्टीकरण दिया जा सकता है, जैसे कि…
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केदारनाथ के नाम से ही स्पष्ट है कि यह एक शिवालय है, जो छत्तीसगढ़ के जिला मुख्यालय रायगढ़ से ओड़िशा के जिला मुख्यालय बरगढ़ जाने वाले रास्ते में तहसील मुख्यालय अम्बाभोना में मुख्य सड़क के किनारे स्थित है। पश्चिम ओड़िशा का यह इलाका कभी दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़) में समाहित था।
मनुष्य के पास वह कला है, जिससे उसने बड़े से बड़े एवं हिंसक पशुओं को भी पालतु बना लिया। पालतु बनाकर उसे अपनी जीविका से भी जोड़ लिया। परन्तु हम एक ऐसे हिंसक प्राणी का जिक्र कर रहे हैं जो अपनी बसाहट में रहने के साथ हिंसक प्रवृत्ति को भूलकर…
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बैगा जनजाति भारत के मध्य प्रांतर क्षेत्र की प्रमुख जनजाति है, ये अपने पहनावे, खान-पान, तीज-त्यौहार, आवास-व्यवहार अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। छत्तीसगढ़ अंचल में ये कवर्धा जिले एवं उसके अगल-बगल के जिलों में निवास करते हैं तथा इनका विस्तार छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे हुए मध्यप्रदेश के कुछ जिलों…
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नारायणपुर मड़ई के पश्चात कोण्डागांव का प्रसिद्ध मावली मेला कल प्रारंभ हुआ, यह मेला होली के एक सप्ताह पूर्व भरता है। फ़ागुन माह में आयोजित होने वाले इस मेले की विशेषता यह है कि यहाँ कई परगनों के देवी देवता इकट्ठे होते हैं। मेले का अर्थ ही सम्मिलन होता है…
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छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले व मध्यप्रदेश के डिंडोरी जिले के साथ अन्य आस-पास के जिलों में भी बैगा जनजाति निवास करती है। इन जिलों की सीमा में प्रतिवर्ष पर्व विशेष पर मेला-मड़ई का आयोजन होता है। जहाँ बैगा पहुंच कर मेले का आनंद लेते हैं। यह मेले मड़ई इनके जीवन…
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एन राम ने डॉक्टर्ड डॉक्यूमेंट के आधार पर फेक न्यूज़ तैयार किया। 2014 में इलेक्शन के पूर्व शेखर गुप्ता ने फेक न्यूज़ बनाकर बड़े अंग्रेजी अखबार में तत्कालीन सेना प्रमुख बीके सिंह के लिए अफवाह फैलाई कि सेना सत्ता पर कब्जा करने के लिए कूंच कर चुकी है। फेक न्यूज़ का…
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छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की केशकाल घाटी के नीचे बीहड़ वन में गौरगांव से 6 किमी की दूरी पर हिंगलाज माता का स्थान है। यहाँ प्रतिवर्ष भादो जात्रा का आयोजन किया जाता है, जिसमें 56 गांव के सोरी कुल के आदिवासी भाग लेते हैं। देवी हिंगलाज पौराणिक परम्परा से आती…
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बहरहाल पुनः प्राचीन नाम के साथ प्रयागराज के संगम तट पर कुंभ मेला शुरू हो चुका है और इस समय इसकी भव्यता और दिव्यता दोनों ही चर्चा का विषय बने हुये हैं। नाम परिवर्तन के आकर्षण मे अथवा अर्धकुंभ की व्यापकता को बढ़ाने के लिए अब यह सर्वत्र कुम्भ मेले…
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सरगुजा अंचल में कई लोकपर्व मनाएं जाते हैं, इन लोक पर्वों में "छेरता" का अपना ही महत्व है। इसे मैदानी छत्तीसगढ़ में "छेरछेरा" भी कहा जाता है। इस लोकपर्व को देशी पूस माह की शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस त्यौहार को समाज के सभी वर्ग परम्परागत रुप से…
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पृथ्वी की उत्पत्ति के उपरांत ही देश, काल के अनुसार ही दुनिया भर में स्थानों के नाम समय-समय पर बदलते रहे है। हमारे लेख का विषय छत्तीसगढ़, जिसे दक्षिण कोसल का नाम इतिहासकार देते हैं और आज भी दक्षिण कोसल ही छत्तीसगढ़ क्षेत्र की पहचान के रूप में मान्य है…
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नवयुग के निर्माता स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा था, “मैं भविष्य को नहीं देखता, न ही उसे जानने की चिन्ता करता हूं। किन्तु, एक दृश्य मैं अपने मन:चक्षुओं से स्पष्ट देख रहा हूं, यह प्राचीन मातृभूमि एक बार पुन: जाग गई है और अपने सिंहासन पर आसीन है - पहले से…
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छत्तीसगढ़ का प्रयाग राजिम एक पवित्र सांस्कृतिक एवं एतिहासिक नगरी है जो अपने आप में गौरवशाली पुरातन इतिहास व परम्पराओं को आत्मसात किये हुये है । इसे भगवान विष्णु की नगरी भी कहा जाता है । विशेषकर माघ पूर्णिमा से शिवरात्रि तक सांस्कृतिक एकता के पवित्र बंधन में बंधे हुए…
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जनजातीय कबीलों के अपने सांस्कृतिक रीति रिवाज होते हैं, जो उनके कबीले में पीढ़ी दर पीढ़ी चले आते हैं तथा ये कबीले परम्परागत रुप से अपनी संस्कृति से बंधे होते हैं। दक्षिण कोसल में बहुत सारी जनजातियाँ निवास करती हैं, उनमें से एक बैगा जनजाति है। बैगा जनजाति का विस्तार…
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आदिवासी बहुल बस्तर अंचल में यहाँ की मूल जनजातीय भाषा गोंडी (मैदानी गोंडी, अबुझमाड़ी गोंडी) के साथ-साथ हल्बी, भतरी, दोरली, धुरवी, परजी, चँडारी, लोहारी, पनकी, कोस्टी, बस्तरी, घड़वी, पारदी, अँदकुरी, मिरगानी, ओझी, बंजारी, लमानी, पण्डई या बामनी आदि जनजातीय एवं लोक-भाषाएँ बोली जाती रही हैं। प्राय: सभी लोक-भाषाएँ सम्बन्धित जनजातियों/जातियों…
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छत्तीसगढ के रायपुर जिले के अभनपुर ब्लॉक के ग्राम चांपाझर में पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मभूमि स्थित है। देश-विदेश से बहुतायत में तीर्थ यात्री दर्शनार्थ आते है पुण्य लाभ प्राप्त करने। कहते हैं कि कभी इस क्षेत्र में चम्पावन होने के कारण इसका नाम चांपाझर पड़ा। कालांतर में…
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मेकलसुता रेवा का उद्गम स्थल अमरकंटक है, यहां प्राचीन काल के अवशेष मिलते हैं तथा यह ॠषि मुनियों की तपोस्थली रही है। इतिहास से ज्ञात होता है कि वैदिक काल में महर्षि अगस्त्य के नेतृत्व में ‘यदु कबीला’ इस क्षेत्र में आकर बसा और यहीं से इस क्षेत्र में अन्यों का…
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प्राचीन देवालय, शिवालय स्थापत्य एवं शिल्पकला की दृष्टि से समृद्ध होते हैं। इनके स्थापत्य में शिल्पशास्त्र के साथ शिल्पविज्ञान का प्रयोग होता था। जिसके प्रमाण हमें दक्षिण कोसल के मंदिरों में दिखाई देते हैं। वर्तमान छत्तीसगढ़ में हमें उत्खनन में कई अद्भुत प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं, जिसमें से मल्हार से…
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आज कार्तिक शुक्ल एकादशी है, चार महीने की योग निद्रा के पश्चात भगवान विष्णु जी के जागने का दिन है। हिन्दू परम्पराओं में यह दिन मांगलिक कार्यों का प्रारंभ माना जाता है। इस दिन से विवाहादि का प्रारंभ होता है। इस दिन तुलसी विवाह किया जाता है। [caption id="attachment_558" align="aligncenter…
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पुरातन काल से बस्तर एक समृद्ध राज्य रहा है, यहाँ नलवंश, गंगवंश, नागवंश एवं काकतीय वंश के शासकों ने राज किया है। इन राजवंशों की अनेक स्मृतियाँ (पुरावशेष) अंचल में बिखरे पड़ी हैं। ग्राम अड़ेंगा में नलयुगीन राजाओं के काल में प्रचलित 32 स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त हुई थी। नलवंशी राजाओं…
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