आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार

नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार

नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

बैगा समुदाय की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति

छत्तीसगढ़ के घने वनों में बसी बैगा जनजाति का औषधीय ज्ञान आधुनिक चिकित्सा से सदियों पहले विकसित हुआ एक जीवंत विज्ञान है। जड़ी-बूटियों, प्रकृति के साथ तादात्म्य और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिले अनुभवों पर आधारित यह परंपरा आज भी इस समुदाय के लिए जीवनरक्षा का सशक्त माध्यम है।

तकनीकी को आधार देती पुरातन ज्ञान परंपरा- ग्रामोद्योग भाग 4

पीतल उद्योग और बढ़ईगिरी जैसे पारंपरिक ग्रामोद्योग भारतीय संस्कृति, कौशल और आधुनिक इंजीनियरिंग विकास के बीच सेतु का कार्य करते हैं। ये उद्योग कम पूंजी में अधिक रोजगार, पर्यावरणीय टिकाऊपन और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का सशक्त मॉडल प्रस्तुत करते हैं।

कृषि, अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा- ग्रामोद्योग भाग 3

कृषि आधारित ग्रामोद्योग भारत की अर्थव्यवस्था की वह सुदृढ़ नींव हैं, जो कम पूंजी में रोजगार, आत्मनिर्भरता और ग्रामीण समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती हैं। ये उद्योग विकास, संवेदनाओं और स्वदेशी शक्ति का संतुलित मॉडल प्रस्तुत करते हैं।

विश्व प्रसिद्ध नागौर पशु मेला

राजस्थान हमारी भारतीय संस्कृति का वह जीवंत केंद्र है, जहां आज भी भारतीय जीवन दर्शन का मूल दर्शन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यहां होने वाले उत्सव और मेले हमारी परंपरा और भारतीय संस्कृति की चेतना को समेटे हुए है। आइए जानते है, नागौर के विश्व प्रसिद्ध पशु…

भारतीय मापन पद्धति में रत्ती का महत्व

रत्ती एक पौधे का बीज है, जो आमतौर पर पहाड़ी और वन क्षेत्रों में पाया जाता है। यह प्राचीन भारतीय मापन पद्धति के एक इकाई के रूप में प्रचलित थी। इसका उपयोग आयुर्वेद में किया जाता है। आइए इस बहुमूल्य बीज गूंजा/रत्ती के बारे में जाने।

उन्नत खेती का अविष्कारक - भारत

यह लेख भारत की प्राचीन और उन्नत खेती की परंपरा का प्रमाण प्रस्तुत करता है। मेहरगढ़ से लेकर कौटिल्य के अर्थशास्त्र और वराहमिहिर की भविष्यवाणियों तक, यह लेख बताता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में हजारों वर्ष पूर्व वैज्ञानिक पद्धति से खेती होती थी। भारत ही वह भूमि है, जहां मानव…

विलुप्त होती भारत की कलीगर जाति एवं व्यवसाय

वैदिक काल में समाज का मार्गदर्शन करते हुए ॠषियों ने पुरुषार्थ चतुष्टय एवं चतुर्वर्ण की व्यवस्था दी। जिससे मानव को जीवन निर्वहन के लिए दिशा मिल सके। इसके पश्चात आगामी काल में कर्म के आधार पर जातियों का निर्माण प्रारंभ हुआ। नवीन अविष्कार होते और नवीन जातियों का निर्माण होता…