संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार
नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026
यह लेख राष्ट्रीय सीमाओं, पासपोर्ट-वीज़ा व्यवस्था, संकीर्ण राष्ट्रवाद और वैश्विकता के बीच फँसी मानवीय संवेदनाओं का गहन विश्लेषण करता है। लेखक बताता है कि तकनीक ने दुनिया को वैश्विक ग्राम तो बना दिया है, पर मानवता आज भी सीमाओं, भय, पहचान और कट्टरपन्थ की बेड़ियों में जकड़ी हुई है। लेख…
यह लेख डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ परिचय’ के माध्यम से छत्तीसगढ़ के इतिहास, लोककथाओं, नामकरण, शैलचित्रों, रियासतों और सांस्कृतिक चेतना का विवेचन करता है। इसमें जनश्रुतियों और ऐतिहासिक सन्दर्भों के आधार पर छत्तीसगढ़ की गौरवपूर्ण परम्परा को समझने का प्रयास किया गया है।
मेवाड़ की गवरी परम्परा में सींग वाले सिंह के रूप में नरसिंह की आदिम लोक-कल्पना दिखाई देती है। यह लेख लोकनाट्य, जनजातीय आस्था और प्राचीन प्रतीक-चेतना के माध्यम से नरसिंह स्वरूप की सांस्कृतिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।
यह लेख रामचरितमानस में वर्णित रामराज्य के पर्यावरणीय दृष्टिकोण का विश्लेषण करता है। इसमें जल संरक्षण, वृक्षारोपण, वन्यजीवों की निर्भयता, प्रकृति और मानव के सामंजस्य तथा वर्तमान जलवायु संकट के संदर्भ में वैदिक मूल्यों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया है।
यह लेख छिन्दवाड़ा के गौरवशाली इतिहास, देवगढ़ के गोण्ड राजवंश, उनके स्थापत्य कौशल, जल प्रबन्धन, धार्मिक-सांस्कृतिक समरसता और जननायक बादल भोई के बलिदान को ऐतिहासिक दृष्टि से प्रस्तुत करता है।
रमेश शर्मा जी का यह लेख अधिकमास अथवा पुरुषोत्तम मास के वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आधारों को स्पष्ट करता है। इसमें सूर्य और चंद्रमा की गति के अंतर से अधिकमास के निर्धारण, पुरुषोत्तम मास के धार्मिक महत्व, आरोग्य, आत्मशक्ति जागरण और समाज में सकारात्मक ऊर्जा के संदेश का संतुलित विवेचन…
कांचीपुरम का कैलाशनाथर मन्दिर केवल भगवान शिव की उपासना का पवित्र केन्द्र नहीं, अपितु प्राचीन भारत की ज्ञान परम्परा का भी महान प्रतीक है। पल्लव काल में यह मन्दिर शिक्षा, साधना और संस्कृति का ऐसा केन्द्र बना जहाँ देशभर से विद्यार्थी आकर तर्कशास्त्र, राजनीति, चिकित्सा, व्याकरण और वेद-वेदांगों का अध्ययन…
क्या कोई जलधारा सहस्राब्दियों तक पूर्णतः शुद्ध रह सकती है? देवलोक से पृथ्वी पर उतरी पतितपाविनी गंगा के इसी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य को समझने के लिए इस विशेष लेख को अवश्य पढ़ें!
यह शोधपरक लेख असम में रामकथा की समृद्ध परम्परा और उसके स्थानीय स्वरूपों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। माधव कन्दली, श्रीमन्त शंकरदेव और माधवदेव जैसे संतों एवं कवियों द्वारा रामायण को असमिया लोकजीवन के अनुरूप ढालकर जन-जन तक पहुँचाने की प्रक्रिया का अत्यन्त सारगर्भित विवेचन किया गया है।
बैगा जनजातीय समुदाय में जंवारा नवरात्रि के दौरान मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान है, जो गांव की सुरक्षा, समृद्धि और देवी आराधना से जुड़ा है। इसमें जवारा बोने, जोत जलाने, जसगीत गाने और सामूहिक अनुष्ठानों के माध्यम से देवी शक्ति की उपासना की जाती है। अंत…
असम के धुबरी जिले के अशारीकांडी गांव की 'हीरामती' मिट्टी से बनी टेराकोटा कला सदियों पुरानी है। 77वें गणतंत्र दिवस परेड में इस अनूठी शिल्पकला को राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली। यह कला भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रमाण है।
पीथमपुर (जांजगीर-चांपा, छ.ग.) में हसदेव नदी तट पर स्थित काल कालेश्वरनाथ मंदिर में फाल्गुन पूर्णिमा से 15 दिवसीय भव्य मेला लगता है। धूल पंचमी पर निकलने वाली शिव बारात और नागा साधुओं की उपस्थिति इसे अविस्मरणीय बनाती है।
अजयमेरु की अजेय पर्वतीय अस्मिता, चौहान-कालीन स्थापत्य की गौरवगाथा, मुगलकालीन परकोटों की सामरिक संरचना तथा राजवंशीय हवेलियों का वैभव—इन सबका समन्वित इतिहास अजमेर की दीर्घ सांस्कृतिक चेतना का दर्पण है। इसके द्वारों और कोठियों में निहित विरासत को जानने हेतु पूर्ण आलेख अवश्य पढ़ें।
अमरकंटक, मैकल पर्वत पर स्थित माँ नर्मदा का पवित्र उद्गम स्थल है। जानिए अमरकंटक की पौराणिक कथाएँ, शिवलिंग, मंदिर और ऐतिहासिक महत्व।
कमलक्षेत्र, देवपुर और पद्मावतीपुरी के नाम से प्रसिद्ध राजिम, महानदी त्रिवेणी संगम का वह तीर्थ है जहाँ वैष्णव, शैव और साक्त परंपराएँ एक साथ सांस लेती हैं। भक्तिन राजिम की तपस्या से राजिम लोचन की प्रतिष्ठा और नगर-नामकरण की कथा जानिए।
कोणार्क का सूर्य मंदिर प्राचीन भारतीय स्थापत्य, खगोल विज्ञान और आध्यात्मिक दर्शन का अद्वितीय उदाहरण है। रथनुमा संरचना, प्रतीकात्मक पहिए और सूर्य उपासना से जुड़ी यह विश्व धरोहर भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक ऊँचाई को दर्शाती है।
यह आलेख बांस शिल्प को भारतीय हस्तकला, वनोत्पाद आधारित ग्रामोद्योग और आत्मनिर्भर भारत के संदर्भ में प्रस्तुत करता है। इसमें बांस की पर्यावरणीय उपयोगिता, सांस्कृतिक महत्त्व, आर्थिक योगदान, जनजातीय कारीगरों की भूमिका और ग्रामीण रोजगार सृजन में इसकी बढ़ती संभावनाओं का समग्र विवेचन किया गया है।
छत्तीसगढ़ के सिरपुर (प्राचीन श्रीपुर) का इतिहास 6वीं से 8वीं शताब्दी के स्वर्णकाल से जुड़ा है। महानदी के तट पर बसा यह नगर धर्म, शिक्षा, कला, बौद्ध विहारों और अद्वितीय स्थापत्य का प्रमुख केंद्र रहा है। लक्ष्मण मंदिर, सुरंग टीला, आनंद प्रभुकुटी विहार और राजप्रासाद के अवशेष सिरपुर के गौरवशाली…
यह लेख “समय” की वैज्ञानिक व सांस्कृतिक महत्ता पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा केवल खगोलीय गणना नहीं, बल्कि सृष्टि, ऋतु परिवर्तन और प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक है। यह पर्व जीवन, कृषि और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है।
छत्तीसगढ़ प्राकृतिक सौंदर्य, घने वनों, जलप्रपातों, तीर्थस्थलों और जीवंत लोकसंस्कृति का अद्वितीय संगम है। यह राज्य इको-टूरिज्म, वेलनेस टूरिज्म, आध्यात्मिक यात्रा और साहसिक पर्यटन की अपार संभावनाओं के साथ भारत के पर्यटन मानचित्र पर एक विशिष्ट पहचान स्थापित करता है।
अंग्रेजों ने भारत के जनजातीय समाज को “असभ्य” और “पिछड़ा” बताकर जिस दृष्टि से संसार को प्रभावित किया, उसी दृष्टि को हमने भी अपनी मान्यता बना लिया। परिणामस्वरूप वह समाज, जिसे वेदों ने वन्याय नमः कहकर प्रणाम किया, आज संग्रहालय की वस्तु समझा जाने लगा। यह लेख उसी औपनिवेशिक दृष्टि…
यह लेख तुलसी-पूजा को भारतीय प्रकृति-उपासना की जीवंत परम्परा के रूप में प्रस्तुत करता है; सिंधु–वैदिक संकेतों, पौराणिक आख्यानों, गृह-आंगन के तुलसी चौरे, लोक-उत्सवों और आयुर्वेदिक दृष्टि के आधार पर बताता है कि भारतीय संस्कृति में भक्ति, नैतिकता और पारिस्थितिकी एक ही सांस्कृतिक सूत्र में गुँथे हुए हैं।
मथुरा भारत का एक प्राचीन और बहुआयामी सांस्कृतिक नगर है, जो धार्मिक, ऐतिहासिक और कलात्मक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यह नगर न केवल भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध है, बल्कि बौद्ध, जैन और वैष्णव परंपराओं का भी प्रमुख केन्द्र रहा है। कुषाण काल में मथुरा…
राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ स्थित माँ बमलेश्वरी मंदिर छत्तीसगढ़ का प्रमुख शक्तिपीठ है। प्राकृतिक सुषमा से घिरे इस तीर्थस्थल पर नवरात्रि में लाखों श्रद्धालु दर्शन हेतु पहुँचते हैं। लगभग एक हजार सीढ़ियों पर स्थित यह मंदिर आस्था, इतिहास और संस्कृति का संगम है और पूरे प्रदेश का धर्म एवं भक्ति…
छत्तीसगढ़ शक्ति उपासना की भूमि है जहां प्राचीन काल से ग्रामदेवी और कुलदेवी के रूप में देवियों की पूजा होती रही है। रतनपुर की महामाया, सरगुजा की समलेश्वरी और महामाया, चंद्रपुर की चंद्रसेनी, बस्तर की दंतेश्वरी और डोंगरगढ़ की बमलेश्वरी देवी जैसे प्रमुख शक्ति स्थल आज भी जन-आस्था के केंद्र…
यह आलेख भगवान विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर सृष्टि के महान शिल्पी एवं देव अभियंता भगवान विश्वकर्मा की महिमा और योगदान को उजागर करता है। वैदिक साहित्य से लेकर पुराणों तक विश्वकर्मा को समस्त सृष्टि का रचयिता और दिव्य शिल्पकार माना गया है। प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल और आधुनिक…
ओनाकोना, बालोद जिले का एक अद्भुत प्राकृतिक पर्यटन स्थल है जिसे "छत्तीसगढ़ का सुघ्घर ठउर" कहा जाता है। गंगरेल बांध के पार बसा यह गांव अपनी रमणीय प्राकृतिक छटा, आधा बने भव्य शिवमंदिर और शांत वातावरण के लिए प्रसिद्ध है। जल, जंगल और जमीन पर आधारित यहां की जीवनशैली, लोककथाओं…
यह लेख पर्यटन और भारतीय साहित्य के गहरे संबंध को उजागर करता है। यात्रा के अनुभवों ने किस प्रकार धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक चेतना, साहित्यिक अभिव्यक्ति और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को जन्म दिया—लेख में इसका विश्लेषण किया गया है। भक्त कवियों से लेकर आधुनिक यात्रावृत्त लेखकों तक, भारतीय भाषाओं में यात्रा-साहित्य की…
छत्तीसगढ़ के गंडई क्षेत्र में स्थित नर्मदा कुण्ड न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह अद्वितीय पौराणिक कथाओं, ऐतिहासिक घटनाओं और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक भी है, जहाँ श्रद्धालु आज भी पवित्र स्नान और माता नर्मदा के दर्शन हेतु पहुँचते हैं।
यह लेख भारत की प्राचीन और उन्नत खेती की परंपरा का प्रमाण प्रस्तुत करता है। मेहरगढ़ से लेकर कौटिल्य के अर्थशास्त्र और वराहमिहिर की भविष्यवाणियों तक, यह लेख बताता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में हजारों वर्ष पूर्व वैज्ञानिक पद्धति से खेती होती थी। भारत ही वह भूमि है, जहां मानव…