संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण चतुर्दशी | गुरुवार
नक्षत्र: उत्तराभाद्रपद | योग: इंद्र | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अप्रैल 2026
चैत्र नवरात्रि देवी उपासना का पावन पर्व है, जिसमें सरगुजा अंचल में भक्ति, परंपरा और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। नौ दिनों तक देवी के विभिन्न रूपों की पूजा-अर्चना के साथ सरगुजिहा लोकगीतों की मधुर धुन वातावरण को भक्तिमय बना देती है। यहां विशेष रूप से…
बैगा जनजातीय समुदाय में जंवारा नवरात्रि के दौरान मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान है, जो गांव की सुरक्षा, समृद्धि और देवी आराधना से जुड़ा है। इसमें जवारा बोने, जोत जलाने, जसगीत गाने और सामूहिक अनुष्ठानों के माध्यम से देवी शक्ति की उपासना की जाती है। अंत…
गणगौर भारत का एक प्रमुख सांस्कृतिक एवं धार्मिक पर्व है, जो शिव और शक्ति के एकात्म स्वरूप का प्रतीक है। यह विशेष रूप से महिलाओं और अविवाहित कन्याओं द्वारा प्रेम, समर्पण और त्याग के भाव के साथ मनाया जाता है। चैत्र मास में 18 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव…
ब्रजभूमि में होली का विशेष महत्व है। राधा-कृष्ण की दिव्य होली, बरसाने की लट्ठामार होली और वृन्दावन के उत्सव में टेसू, केसर, चन्दन जैसे प्राकृतिक रंगों की परंपरा आज भी जीवित है।
सरगुजा अंचल की जनजातियों में होली की कई अनोखी परंपराएं प्रचलित हैं। यहाँ बैकोना गांव में होली के एक दिन बाद, तो सेमरा कला में एक दिन पहले उत्सव मनाने का रिवाज है। वहीं, चेरवा जनजाति फाल्गुन शुक्ल पंचमी को होली के दस दिन पहले ही यह त्योहार मनाती है…
रक्तिम पलाश केवल एक पुष्प नहीं, अपितु ऋतुराज बसंत का दैदीप्यमान उद्घोष है। वैदिक साहित्य, आयुर्वेद और लोकपरंपराओं में इसकी पावन महिमा विस्तृत रूप से प्रतिपादित है। जानिए कैसे यह वृक्ष भारतीय संस्कृति, साधना और प्रकृति-सौंदर्य का जीवंत प्रतीक बना। सम्पूर्ण आलेख पढ़ने हेतु क्लिक करें ।
यह लेख होली के उत्सव को भारतीय ऋतुचक्र, लोकपरंपरा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करता है। छत्तीसगढ़ की जनजातीय परंपराओं, फगुआ काटने की रीति और प्राकृतिक रंगों की औषधीय विधियों के माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि भारतीय तीज-त्योहार केवल आस्था नहीं, बल्कि पर्यावरण, स्वास्थ्य और सामाजिक…
जनजातीय समाज में शिव-उपासना की प्राचीन परम्परा रही है। भारत में लगभग 705 से अधिक जनजातीय समुदाय निवास करते हैं। इनमें से अधिकांश समुदाय अपने स्थानीय नामों और स्वरूपों में महादेव की आराधना वर्ष भर करते हैं। कुछ विशेष अवसरों पर पूरा समुदाय पर्व और उत्सव के रूप में शिव-उपासना…
यह लेख मकर संक्रांति के खगोलीय आधार, उत्तरायण-दक्षिणायन के वैदिक अर्थ और ‘देवयान-पितृयान’ की मान्यता को स्पष्ट करता है। साथ ही स्नान-दान, तिल-गुड़, यज्ञ, श्राद्ध-तर्पण, पतंग परंपरा और देशभर की विविध रीति-रिवाजों पर प्रकाश डालता है।
मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का पावन पर्व है, जो ऋतु परिवर्तन, आध्यात्मिक चेतना, दान, तिल-गुड़, तीर्थ स्नान और सामाजिक सौहार्द का संदेश देता है। यह पर्व विविध नामों और परंपराओं के साथ भारत की सांस्कृतिक एकता को उजागर करता है।
कुरुक्षेत्र के रण से लेकर मकर संक्रांति के आध्यात्मिक अर्थ तक यह आलेख सत्ता, धर्म और चेतना के शाश्वत द्वंद्व को उजागर करता है। भीष्म की शरशय्या, उत्तरायण का दर्शन और सूर्य-संक्रांति का विज्ञान, सब एक सूत्र में पिरोया गया है। पूरा संदर्भ पढ़ने के लिए क्लिक करें।
पोंगल दक्षिण भारत का प्रमुख फसल पर्व है, जो सूर्यदेव, प्रकृति और किसानों के प्रति कृतज्ञता का भाव व्यक्त करता है। यह उत्सव कृषि, ऋतु परिवर्तन, पारिवारिक परंपराओं और सामूहिक जीवन के संतुलन का प्रतीक है, जिसमें सनातन संस्कृति की एकात्म भावना स्पष्ट रूप से झलकती है।
भारतीय संस्कृति में पर्व केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति, विज्ञान और लोकजीवन के बीच संतुलन स्थापित करने वाले जीवंत सूत्र होते हैं। भारत की परंपरा में उत्सव जीवन को समझने, ऋतुओं को पहचानने और समाज को जोड़ने का माध्यम रहे हैं। ऐसे ही पर्वों में…
लोहड़ी पंजाब और उत्तर भारत का प्रमुख लोकपर्व है, जो मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर ऋतु परिवर्तन, कृषि जीवन, श्रम-सम्मान और सामूहिक एकता का उत्सव है। अग्नि, नई फसल, लोकगीत और लोकनृत्यों के माध्यम से यह पर्व कृतज्ञता, नवऊर्जा और सामाजिक समरसता का संदेश देता है।
यह लेख मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ की परंपरा के पीछे छिपे धार्मिक, ज्योतिषीय, सामाजिक और वैज्ञानिक कारणों का विवेचन करता है। तिल-गुड़ केवल एक पर्व-व्यंजन नहीं, बल्कि ऋतु, स्वास्थ्य, दान-पुण्य और जीवन में संतुलन का गहरा सांस्कृतिक संदेश है।
दियारी छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक कृषि-पर्व है, जो नई फसल और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। यह उत्सव भारतीय संस्कृति में निहित ईशावास्य, प्रकृति-एकात्मता और सामुदायिक सहभागिता के जीवंत दर्शन को प्रकट करता है।
छेरछेरा केवल पर्व नहीं, अन्न और आत्मसम्मान की सामूहिक साधना है। जहाँ धान का दान, श्रम का सम्मान और समानता का भाव एक साथ प्रकट होता है। धरती माता की करुणा से जन्मी यह परंपरा आज भी बाँटकर जीने का संस्कार सिखाती है।
यह लेख पौष माह के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है, तथा भारत के विविध पर्वों और परंपराओं के माध्यम से सांस्कृतिक एकता, सामूहिक विकास और सनातन दर्शन के गहरे संबंध को स्पष्ट करता है।
थाईपुसम तमिल परंपरा का एक पवित्र पर्व है, जो तमिल कैलेंडर के थाई माह और हिंदू चंद्र कैलेंडर के पौष माह के आध्यात्मिक संगम को दर्शाता है। भगवान मुरुगन को समर्पित यह उत्सव भक्ति, तपस्या, कृतज्ञता और बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय का प्रतीक है।
बनशंकरी देवी अथवा शकुंभरी देवी कर्नाटक की प्रमुख आराध्य देवी हैं, जिन्हें संरक्षण, पोषण और लोककल्याण का प्रतीक माना जाता है। तिलकारण्य वन से जुड़ी उनकी पौराणिक कथा, दुर्गमासुर वध और अकाल निवारण का प्रसंग देवी के करुणामय तथा जीवनदायिनी स्वरूप को प्रकट करता है। चोलाचिगुड स्थित बनशंकरी मंदिर धार्मिक…
यह लेख “समय” की वैज्ञानिक व सांस्कृतिक महत्ता पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा केवल खगोलीय गणना नहीं, बल्कि सृष्टि, ऋतु परिवर्तन और प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक है। यह पर्व जीवन, कृषि और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है।
जनजातीय गौरव दिवस: हमारे महापुरुषों और राष्ट्रीय-गौरव के स्मरण का दिन _जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन महापुरुषों और जनजातीय समाज की सांस्कृतिक विरासत को उत्सव के रूप में मनाने का दिन है। आइये…
यह लेख तुलसी-पूजा को भारतीय प्रकृति-उपासना की जीवंत परम्परा के रूप में प्रस्तुत करता है; सिंधु–वैदिक संकेतों, पौराणिक आख्यानों, गृह-आंगन के तुलसी चौरे, लोक-उत्सवों और आयुर्वेदिक दृष्टि के आधार पर बताता है कि भारतीय संस्कृति में भक्ति, नैतिकता और पारिस्थितिकी एक ही सांस्कृतिक सूत्र में गुँथे हुए हैं।
भारतीय संस्कृति में सूर्य उपासना की परंपरा अत्यंत प्राचीन और व्यापक रही है। वेदों, पुराणों और लोक परंपराओं में सूर्य को जीवन और ऊर्जा का स्रोत माना गया है। छत्तीसगढ़ में सूर्य उपासना के असंख्य पुरातात्त्विक, अभिलेखीय और लोकसांस्कृतिक साक्ष्य मिलते हैं—सिंघनपुर के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों से लेकर भोरमदेव, सिरपुर, जांजगीर…
सूर्य उपासना और लोकभक्ति का अद्भुत संगम — छठ पर्व भारतीय संस्कृति का एक ऐसा अनुष्ठान है जिसमें छठी मैय्या, जल, मिट्टी और सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। नहाय-खाय से लेकर अर्घ्य तक की यह यात्रा संयम, श्रद्धा और प्रकृति के प्रति समर्पण का प्रतीक है। बिहार…
ब्रजभूमि में जब इंद्र की पूजा को चुनौती देते हुए मात्र सात वर्ष के बालक कृष्ण ने कहा “अब ब्रज इंद्र नहीं, गोवर्धन की पूजा करेगा”। यही क्षण था जब प्रकृति, पशुधन और मनुष्य के बीच समरसता का पर्व जन्मा "गोपोत्सव"।
छत्तीसगढ़ में दीपावली पर मनाया जाने वाला गौरा-गौरी उत्सव शिव–पार्वती के दिव्य विवाह का लोक उत्सव है। फूल कूटाई, मिट्टी-जल पूजा, दूधफरा प्रसाद, गड़वा बाजा-अनुष्ठान, सुआ नृत्य और शोभायात्रा से सामाजिक समरसता, प्रकृति उपासना और समृद्धि की कामना झलकती है।
भारत में शारदीय नवसस्येष्टि (दीपावली) प्रमुख पर्व है, भारतीय संस्कृति का महाउत्सव है। दीपावली भारतीय जीवन-दर्शन के चार प्रमुख पर्वों में से एक है, जो ऋतु परिवर्तन के अवसर पर मनाए जाते हैं।
भील-भिलाला, कोरकू, गोंड और भारिया जैसे विभिन्न जनजातीय समाजों में दीपावली का उत्सव न केवल प्रकाश और समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि यह उनके जीवन दर्शन, सांस्कृतिक मूल्यों और प्रकृति के साथ आवद्धता की अनूठी झलक भी प्रस्तुत करता है। यह लेख इन विविद जनजातीय परंपराओं के माध्यम से दीपावली के…
नरक चतुर्दशी दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाती है। यह दिन असत्य, अंधकार और नकारात्मकता पर सत्य, प्रकाश और पवित्रता की विजय का प्रतीक है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है, जो आत्मशुद्धि और प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता…