आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार

नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार

नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

गुजरात के वनांचलों में मनाए जाने वाला लोक पर्व: बन्दी त्योहार

गुजरात के राठ क्षेत्र का बन्दी त्योहार वनवासी समाज की प्रकृति आधारित जीवनदृष्टि का परिचय देता है। इसके नियम मानसून में स्वास्थ्य, कृषि, पशु संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और सामूहिक अनुशासन को सुरक्षित रखने वाली वैज्ञानिक समझ को उजागर करते हैं।

चंद्र ज्योति से ज्ञान ज्योति तक: गुरु पूर्णिमा का महत्व

यह लेख गुरु पूर्णिमा के सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि पूर्णिमा का प्रकाश मानव की दिनचर्या को कैसे प्रभावित करता है। यह पर्व महर्षि वेदव्यास और महान गुरु-शिष्य परंपरा को समर्पित है।

चातुर्मास : संयम, साधना और स्वास्थ्य की यात्रा।

यह लेख चातुर्मास के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय महत्व पर आधारित है। आत्म-संयम, सात्विक आहार और ध्यान पर आधारित यह प्राचीन परंपरा, आधुनिक जीवनशैली में शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और प्रकृति संरक्षण के लिए आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।

जनजाति लोक पर्व कर्मा : उत्पत्ति और महत्व

जनजाति लोक पर्व कर्मा : उत्पत्ति और महत्व

रथयात्रा विशेष: भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान "शिवरीनारायण"

रथयात्रा दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक एकता और सद्भाव का अनूठा प्रतीक है। भगवान जगन्नाथ के मूल स्थान शिवरीनारायण से जुड़ी यह प्राचीन परम्परा लोक आस्था को दर्शाती है। यह ऐतिहासिक पर्व तन्त्र पर वैष्णव मत की विजय का प्रमाण है। आइए इस लेख के माध्यम से विस्तार से चर्चा करते…

श्री जगन्नाथ उपासना: दारु ब्रह्म से रथयात्रा तक का दिव्य इतिहास

यह लेख पुरी के श्री जगन्नाथ मन्दिर के दिव्य इतिहास और मान्यताओं को प्रस्तुत करता है। इसमें 'दारु ब्रह्म' की महिमा, ऐतिहासिक शिलालेखों, नवकलेवर अनुष्ठान और विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा का सुन्दर वर्णन है। यह सन्देश देता है कि भगवान गर्भगृह तक सीमित न रहकर, जनकल्याण हेतु स्वयं भक्तों के बीच…

योगिनी एकादशी व्रत महात्म्य

भारतीय संस्कृति में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है। हर माह के दोनों पक्षों की एकादशी को यह पवित्र व्रत रखा जाता है। इन्हीं में से एक 'योगिनी एकादशी' का व्रत भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। आइए, इस लेख के माध्यम से इस व्रत की कथा और इसके माहात्म्य…

मध्यप्रदेश के तीज त्यौहारों के विविध रंग

मध्यप्रदेश के लोक पर्वों में संस्कृति, आस्था, प्रकृति, सामाजिक समरसता और लोक दर्शन का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। गणगौर, कजरियां, मड़ई, भगोरिया, गोटमार और घोटुल जैसी परम्पराएँ जनजीवन की सामूहिक चेतना को व्यक्त करती हैं, जिन्हें आधुनिकता और शहरीकरण के दौर में संरक्षित करने की आवश्यकता है।

गंगा दशहरा : मोक्षदायिनी गंगा के प्रति कृतज्ञता का पर्व

क्या कोई जलधारा सहस्राब्दियों तक पूर्णतः शुद्ध रह सकती है? देवलोक से पृथ्वी पर उतरी पतितपाविनी गंगा के इसी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य को समझने के लिए इस विशेष लेख को अवश्य पढ़ें!

हाली अमावस पर्व

यह लेख ‘हाली अमावस्या’ जैसे प्राचीन लोकपर्व के माध्यम से भारतीय कृषि परम्परा, लोक विज्ञान और प्रकृति के साथ मानव के गहरे संबंध को उजागर करता है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार हमारे पूर्वज पारम्परिक विधियों से वर्षा का अनुमान लगाते थे और कृषि उपकरणों का पूजन कर…

चैत्र नवरात्र विशेष: सरगुजा अंचल में प्रचलित शक्ति के विविध स्वरुप

चैत्र नवरात्रि देवी उपासना का पावन पर्व है, जिसमें सरगुजा अंचल में भक्ति, परंपरा और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। नौ दिनों तक देवी के विभिन्न रूपों की पूजा-अर्चना के साथ सरगुजिहा लोकगीतों की मधुर धुन वातावरण को भक्तिमय बना देती है। यहां विशेष रूप से…

बैगा समुदाय में जंवारा परंपरा

बैगा जनजातीय समुदाय में जंवारा नवरात्रि के दौरान मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान है, जो गांव की सुरक्षा, समृद्धि और देवी आराधना से जुड़ा है। इसमें जवारा बोने, जोत जलाने, जसगीत गाने और सामूहिक अनुष्ठानों के माध्यम से देवी शक्ति की उपासना की जाती है। अंत…

गणगौर: शिवशक्ति के एकात्म तत्व का उत्सव

गणगौर भारत का एक प्रमुख सांस्कृतिक एवं धार्मिक पर्व है, जो शिव और शक्ति के एकात्म स्वरूप का प्रतीक है। यह विशेष रूप से महिलाओं और अविवाहित कन्याओं द्वारा प्रेम, समर्पण और त्याग के भाव के साथ मनाया जाता है। चैत्र मास में 18 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव…

ब्रज के देवालयों में होली उत्सव

ब्रजभूमि में होली का विशेष महत्व है। राधा-कृष्ण की दिव्य होली, बरसाने की लट्ठामार होली और वृन्दावन के उत्सव में टेसू, केसर, चन्दन जैसे प्राकृतिक रंगों की परंपरा आज भी जीवित है।

जनजातीय समुदायों में होली का पर्व

सरगुजा अंचल की जनजातियों में होली की कई अनोखी परंपराएं प्रचलित हैं। यहाँ बैकोना गांव में होली के एक दिन बाद, तो सेमरा कला में एक दिन पहले उत्सव मनाने का रिवाज है। वहीं, चेरवा जनजाति फाल्गुन शुक्ल पंचमी को होली के दस दिन पहले ही यह त्योहार मनाती है…

होली की आभा है- पलाश

रक्तिम पलाश केवल एक पुष्प नहीं, अपितु ऋतुराज बसंत का दैदीप्यमान उद्घोष है। वैदिक साहित्य, आयुर्वेद और लोकपरंपराओं में इसकी पावन महिमा विस्तृत रूप से प्रतिपादित है। जानिए कैसे यह वृक्ष भारतीय संस्कृति, साधना और प्रकृति-सौंदर्य का जीवंत प्रतीक बना। सम्पूर्ण आलेख पढ़ने हेतु क्लिक करें ।

होली- लोकजीवन का बहुरंगी त्यौहार

यह लेख होली के उत्सव को भारतीय ऋतुचक्र, लोकपरंपरा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करता है। छत्तीसगढ़ की जनजातीय परंपराओं, फगुआ काटने की रीति और प्राकृतिक रंगों की औषधीय विधियों के माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि भारतीय तीज-त्योहार केवल आस्था नहीं, बल्कि पर्यावरण, स्वास्थ्य और सामाजिक…

जनजातीय समाज में महाशिवरात्रि का पर्व

जनजातीय समाज में शिव-उपासना की प्राचीन परम्परा रही है। भारत में लगभग 705 से अधिक जनजातीय समुदाय निवास करते हैं। इनमें से अधिकांश समुदाय अपने स्थानीय नामों और स्वरूपों में महादेव की आराधना वर्ष भर करते हैं। कुछ विशेष अवसरों पर पूरा समुदाय पर्व और उत्सव के रूप में शिव-उपासना…

छत्तीसगढ़ में संक्रांति पूजा

यह लेख मकर संक्रांति के खगोलीय आधार, उत्तरायण-दक्षिणायन के वैदिक अर्थ और ‘देवयान-पितृयान’ की मान्यता को स्पष्ट करता है। साथ ही स्नान-दान, तिल-गुड़, यज्ञ, श्राद्ध-तर्पण, पतंग परंपरा और देशभर की विविध रीति-रिवाजों पर प्रकाश डालता है।

मकर संक्रांति- सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व

मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का पावन पर्व है, जो ऋतु परिवर्तन, आध्यात्मिक चेतना, दान, तिल-गुड़, तीर्थ स्नान और सामाजिक सौहार्द का संदेश देता है। यह पर्व विविध नामों और परंपराओं के साथ भारत की सांस्कृतिक एकता को उजागर करता है।

उत्तरायण में भीष्म पितामह का संदेश

कुरुक्षेत्र के रण से लेकर मकर संक्रांति के आध्यात्मिक अर्थ तक यह आलेख सत्ता, धर्म और चेतना के शाश्वत द्वंद्व को उजागर करता है। भीष्म की शरशय्या, उत्तरायण का दर्शन और सूर्य-संक्रांति का विज्ञान, सब एक सूत्र में पिरोया गया है। पूरा संदर्भ पढ़ने के लिए क्लिक करें।

पोंगल: प्रकृति, सूर्य और परिश्रम के प्रति कृतज्ञता का उत्सव

पोंगल दक्षिण भारत का प्रमुख फसल पर्व है, जो सूर्यदेव, प्रकृति और किसानों के प्रति कृतज्ञता का भाव व्यक्त करता है। यह उत्सव कृषि, ऋतु परिवर्तन, पारिवारिक परंपराओं और सामूहिक जीवन के संतुलन का प्रतीक है, जिसमें सनातन संस्कृति की एकात्म भावना स्पष्ट रूप से झलकती है।

मकर संक्रांति: छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल) की लोक-संस्कृति, खगोलीय विज्ञान और एक बचपन की जिज्ञासा

भारतीय संस्कृति में पर्व केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति, विज्ञान और लोकजीवन के बीच संतुलन स्थापित करने वाले जीवंत सूत्र होते हैं। भारत की परंपरा में उत्सव जीवन को समझने, ऋतुओं को पहचानने और समाज को जोड़ने का माध्यम रहे हैं। ऐसे ही पर्वों में…

लोहड़ी: ऋतु, कृषि और सामूहिक चेतना का उत्सव

लोहड़ी पंजाब और उत्तर भारत का प्रमुख लोकपर्व है, जो मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर ऋतु परिवर्तन, कृषि जीवन, श्रम-सम्मान और सामूहिक एकता का उत्सव है। अग्नि, नई फसल, लोकगीत और लोकनृत्यों के माध्यम से यह पर्व कृतज्ञता, नवऊर्जा और सामाजिक समरसता का संदेश देता है।

क्या है तिल-गुड़ का विज्ञान

यह लेख मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ की परंपरा के पीछे छिपे धार्मिक, ज्योतिषीय, सामाजिक और वैज्ञानिक कारणों का विवेचन करता है। तिल-गुड़ केवल एक पर्व-व्यंजन नहीं, बल्कि ऋतु, स्वास्थ्य, दान-पुण्य और जीवन में संतुलन का गहरा सांस्कृतिक संदेश है।

ईशावास्योपनिषद के श्लोक को चरितार्थ करता त्यौहार- दियारी

दियारी छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक कृषि-पर्व है, जो नई फसल और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। यह उत्सव भारतीय संस्कृति में निहित ईशावास्य, प्रकृति-एकात्मता और सामुदायिक सहभागिता के जीवंत दर्शन को प्रकट करता है।

छेरछेरा: पौष पूर्णिमा पर लोकआस्था का पर्व

छेरछेरा केवल पर्व नहीं, अन्न और आत्मसम्मान की सामूहिक साधना है। जहाँ धान का दान, श्रम का सम्मान और समानता का भाव एक साथ प्रकट होता है। धरती माता की करुणा से जन्मी यह परंपरा आज भी बाँटकर जीने का संस्कार सिखाती है।

पौष माह और उसकी महत्ता

यह लेख पौष माह के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है, तथा भारत के विविध पर्वों और परंपराओं के माध्यम से सांस्कृतिक एकता, सामूहिक विकास और सनातन दर्शन के गहरे संबंध को स्पष्ट करता है।

थाईपुसम- तमिल परम्परा का एक पवित्र पर्व

थाईपुसम तमिल परंपरा का एक पवित्र पर्व है, जो तमिल कैलेंडर के थाई माह और हिंदू चंद्र कैलेंडर के पौष माह के आध्यात्मिक संगम को दर्शाता है। भगवान मुरुगन को समर्पित यह उत्सव भक्ति, तपस्या, कृतज्ञता और बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय का प्रतीक है।

पूस माह में पूजी जाती हैं बनशंकरी देवी

बनशंकरी देवी अथवा शकुंभरी देवी कर्नाटक की प्रमुख आराध्य देवी हैं, जिन्हें संरक्षण, पोषण और लोककल्याण का प्रतीक माना जाता है। तिलकारण्य वन से जुड़ी उनकी पौराणिक कथा, दुर्गमासुर वध और अकाल निवारण का प्रसंग देवी के करुणामय तथा जीवनदायिनी स्वरूप को प्रकट करता है। चोलाचिगुड स्थित बनशंकरी मंदिर धार्मिक…