संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार
नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026
भोरमदेव के मड़वा महल अभिलेख और फणिनागवंशी इतिहास की अनजानी कड़ियाँ। भोणिंगदेव और महाराजा सतीम जैसे शासकों से जुड़ी अभिलेखीय साक्ष्य, सिक्के और ऐतिहासिक संभावनाएँ इस आलेख में समाहित हैं। छत्तीसगढ़ के मध्यकालीन राजवंशों की गूढ़ परतों को समझने हेतु पूरा लेख अवश्य पढ़ें।
कर्मा पर्व मध्य भारत, विशेषकर छत्तीसगढ़ और झारखंड के गोंड, उरांव, बैगा आदि समाज का प्रमुख प्रकृति-पूजा आधारित त्योहार है। कर्म/करम वृक्ष की पूजा से सुख, समृद्धि व फसल उन्नति की कामना की जाती है। आइए जाने कर्म-सिद्धांत से जुड़ा यह पर्व सामूहिक उत्सव से जीवन में कैसे शांति-उन्नति लाता…
पचराही, छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले का एक प्राचीन पुरातात्विक स्थल है, जो भोरमदेव क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को उजागर करता है। यहाँ 9वीं से 14वीं शताब्दी के फणिनागवंशीय शासन के साक्ष्य, अभिलेख, मूर्तियाँ, सिक्के और मंदिरों के अवशेष मिले हैं। ब्रिटिश काल से लेकर आधुनिक उत्खनन (2007–09) तक…
आंवला नवमी, कार्तिक मास की नवमी तिथि पर मनाया जाने वाला पर्व है, जिसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है। यह दिन त्रेतायुग के आरंभ की स्मृति से जुड़ा है और आयुर्वेद में आंवले के कायाकल्प गुणों का विशेष महत्व है। आंवला नवमी पर आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन…
यह आलेख 'लोक विवेक' की अवधारणा को वाचिक परम्परा और भारतीय समाज के संदर्भ में समझने का प्रयास करता है। इसमें बताया गया है कि लोक विवेक केवल लिखित परम्परा से नहीं, बल्कि लोकजीवन के अनुभव, कहावतों, व्यंग्य, गीतों और मिथकीय प्रतीकों (जैसे घाघ, भड्डुरी, लाल बुझक्कड़) के माध्यम से…
भोरमदेव मंदिर, जिसे अक्सर "छत्तीसगढ़ का खजुराहो" कहा जाता है, अपनी अद्वितीय स्थापत्य शैली और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। 11वीं–12वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर फणिनागवंशी शासकों और कलचुरियों के सांस्कृतिक-संबंधों को दर्शाता है। मंदिर के नामकरण और निर्माता को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं, पर अभिलेखीय…
यह आलेख हिंदी दिवस के महत्व और हिंदी भाषा की विकास यात्रा पर केंद्रित है। इसमें संस्कृत से लेकर प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक हिंदी तक की भाषाई प्रगति को रेखांकित किया गया है। स्वतंत्रता पश्चात संविधान सभा द्वारा हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने की ऐतिहासिक प्रक्रिया, गांधी जी और…
झाँसी जनपद उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पश्चिमी छोर पर स्थित है, जिसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक है। इसका प्राचीन नाम बलवंतनगर था और यह नगर ओरछा नरेश राजा वीरसिंह देव द्वारा स्थापित किया गया था। झाँसी प्रागैतिहासिक काल से मानव निवास का क्षेत्र रहा है, जहाँ पाषाणयुगीन उपकरण, ताम्रपाषाणकालीन अवशेष…
ईन्द पर्व झारखण्ड का एक प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव है जिसकी परंपरा लगभग दो हजार वर्षों से चली आ रही है। नागवंशी शासकों के काल से जुड़ा यह पर्व विभिन्न समुदायों की सहभागिता, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इन्द्रदेव की कृपा और अच्छी वर्षा की कामना…
यह आलेख राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में अभिव्यक्त मानव प्रेम, समता, संवेदनशीलता और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की उदात्त भावना को दर्शाता है। गुप्त जी ने धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंगों के माध्यम से मनुष्यत्व, त्याग, करुणा, और वसुधैव कुटुंबकम् की चेतना को काव्य में पिरोया। उनके राम मानव-प्रेम के…
यह लेख स्वामी दयानंद सरस्वती की दृष्टि से पौराणिक अवतारों की वैज्ञानिक व्याख्या करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे मत्स्य से लेकर श्रीराम और श्रीकृष्ण तक के अवतार, मानव सभ्यता और प्रकृति के क्रमिक विकास का प्रतीक हैं। जल, मृदा, वनस्पति, पशु और मानव रूपी विकास की इस…
उड़िया भाषा का विकास पूर्वमागधी अपभ्रंश से होकर 11वीं शताब्दी में प्रारंभ हुआ, जिसका प्रमाण उर्जाम शिलालेख एवं चर्यागीतिका में मिलता है। इस विस्तृत आलेख में उड़िया लोक साहित्य के विविध आयामों – जैसे लोकगीत, लोककथा, लोकनाट्य, गाथाएं, कहावतें, झूला गीत, श्रम गीत, मंत्र गीत आदि – का विश्लेषण किया…
यह लेख पर्यटन और भारतीय साहित्य के गहरे संबंध को उजागर करता है। यात्रा के अनुभवों ने किस प्रकार धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक चेतना, साहित्यिक अभिव्यक्ति और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को जन्म दिया—लेख में इसका विश्लेषण किया गया है। भक्त कवियों से लेकर आधुनिक यात्रावृत्त लेखकों तक, भारतीय भाषाओं में यात्रा-साहित्य की…
प्राची घाटी ओडिशा का एक प्राचीन सांस्कृतिक परिदृश्य है, जो कलिंग सभ्यता की जीवंत विरासत, मंदिर वास्तुकला, और जैन, बौद्ध, शैव, शक्त और वैष्णव संप्रदायों के सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व को प्रदर्शित करता है। यह सदियों से चली आ रही आध्यात्मिक भक्ति और कलात्मक उत्कृष्टता का जीवंत प्रमाण है। हाल के पुरातात्विक…
18 जून सन्, 1576 हल्दीघाटी के महान् युद्ध और हिंदुत्व की विजय स्मृति में सादर समर्पित -प्रामाणिक शोध
महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में मंडनगढ से पांच मील की दूरी पर आंबवडे नामक देहात है। भीमराव अंबेडकर घराने का मूल गांव यही था। इस घर आने का कुल नाम सकपाल था। कुलदेवी की पालकी रखने का सम्मान इस महार घराने का था। महार जाति मजबूत कद काठी, जोरदार आवाज…
गौरक्षा का ऐतिहसिक आँदोलन इन्हीं नेतृत्व में हुआ
धर्म सम्राट करपात्रीजी महाराज एक महान सन्त, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनका पूरा जीवन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की प्रतिष्ठापना और स्वत्व जागरण के लिये समर्पित रहा। इतिहास प्रसिद्ध गौरक्षा आँदोलन उन्हीं के आव्हान पर हुआ था। वे उतना ही भोजन ग्रहण करते…
23 दिसंबर 1926 स्वामी श्रद्धानंद बलिदान दिवस
एडवोकेट मुंशीराम से स्वामी श्रद्धानंद तक जीवन यात्रा विश्व के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बेहद प्रेरणादायी है। स्वामी श्रद्धानंद उन बिरले महापुरुषों में से एक थे जिनका जन्म ऊंचे कुल में हुआ किन्तु बुरी लतों के कारण प्रारंभिक जीवन बहुत ही निकृष्ट किस्म…
आज हिंदी दिवस है, हिंदी हमारे देश के अधिकांश भू-भाग पर बोली जाने वाली, व्यवहरित होने वाली भाषा है। यह नागरी लिपि में लिखी जाती है। वर्तमान में बहुसंख्यक लोगों के आम व्यवहार में होने के कारण यह भारत में रोजगार की भाषा भी है। एक भाषा के रूप में…
हिंदी साहित्य की प्रतिभाशाली कवयित्री एवं छायावाद के चार प्रमुख आधार स्तंभों में से एक तथा आधुनिक युग की मीरा कही जाने वाली महादेवी वर्मा का जन्म उत्तरप्रदेश के फ़ारुखाबाद में एक कायस्थ परिवार में 26 मार्च1907 को हुआ था। सात पीढ़ियों बाद पुत्री जन्म से इनके बाबा बाबू बाँके…
श्रावण मास के श्रुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भारत में नाग पंचमी मनाने की परम्परा है। हमारी सनातन परम्परा में नागों को देवता माना गया है, इसलिए इनकी पूजा के लिए एक दिन निर्धारित किया गया है। नाग पंचमी का संबंध सिर्फ एक सर्प विशेष से नहीं है प्रत्युत…
स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ भी कभी पीछे नहीं रहा है। छत्तीसगढ़ के साथ ही पूरे देश के आंदोलन में इस भूमि के सिपाही सपूत सक्रिय रूप से भाग लेते रहे लेकिन उनका समुचित मूल्यांकन आज तक नहीं हो सका है। 1856-57 में सोनाखान के वीर सपूत नारायण सिंह ने अंग्रेज…
14 अगस्त : भारत विभाजन विभिषिका स्मृति दिवस
संसार में भारत अकेला ऐसा देश है जिसका इतिहास यदि सर्वोच्च गौरव से भरा है तो सर्वाधिक दर्द से भी। यह गौरव है पूरे संसार को शब्द, गणना और ज्ञान विज्ञान से अवगत कराने का और दर्द है निरंतर आक्रमणों और अपनी…
स्वामी विवेकानन्द ने 19 मार्च, 1894 को स्वामी रामकृष्णानन्द को लिखे पत्र में कहा था - "भारत के अंतिम छोर पर स्थित शिला पर बैठकर मेरे मन में एक योजना का उदय हुआ- मान लें कि कुछ निःस्वार्थ सन्यासी, जो दूसरों के लिए कुछ अच्छा करने की इच्छा रखते हैं…
जीवन के लिए गति आवश्यक है। गति से ऊर्जा मिलती है। केवल मनुष्य ही नही, अपितु प्रकृति के लिए यह आवश्यक है। ग्रह-उपग्रह, नक्षत्र सब गतिमान हैं। इनकी यह गतिमानता जीव-जन्तुओं व प्रकृति के अन्य उपादानों में ऊर्जा भरती है। समूची सृष्टि गति के अधीन है। गति भी कैसी? रैखिक…
साहित्य समाज का पहरुआ होता है। चाहे वह गीत, कविता, कहानी, निबंध, नाटक या किसी अन्य साहित्यिक विधा में क्यों न हो। वह तो युगबोध का प्रतीक होता है। कवि वर्तमान को गाता है लेकिन वह भविष्य का दृष्टा होता है। साहित्य जो भी कहता है निरपेक्ष भाव से कहता…
पर्यावरण दिवस विशेष आलेख
भारतीय संस्कृति में नदियों का बड़ा सम्मान जनक स्थान है। नदियों को माँ कहकर इनकी पूजा की जाती है। ये हमारा पोषण अपने अमृत समान जल से करती हैं। अन्य सभ्यताओं में देखें तो उनमें नदियों का केवल लौकिक महत्व है। लेकिन भारत में लौकिक जीवन…
अभिनय मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। हर्ष, उल्लास और खुशी से झूमते, नाचते-गाते मनुष्य की सहज अभिव्यक्ति है अभिनय। छत्तीसगढ़ के लोक जीवन की झांकी गांवों के खेतों, खलिहानों, गली, चौराहों और घरों में स्पष्ट देखी जा सकती है। इस ग्रामीण अभिव्यक्ति को 'लोक नाट्य' कहा जाता है।
छत्तीसगढ़ में…
भारतीय संस्कृति में अन्य प्राकृतिक उपादानों की तरह नदियों का भी अपना अलग महत्व है। वेद-पुराणों में नदियों की यशोगाथा विद्यमान है। नदियाँ हमारे लिए प्राणदायिनी माता की तरह हैं। नदियों के साथ हमारे सदैव से भावनात्मक संबंध रहे हैं, औऱ हमने नत-मस्तक होकर उनके प्रति अपनी श्रद्धा व आस्था…