संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026
3 सितम्बर 1857 चौदह वर्षीय बालिका अंग्रेजों ने कठोर यातनाएँ देकर जिन्दा जलाया
पराधीनता काल के भीषण अत्याचारों से केवल सल्तनकाल का इतिहास ही रक्त रंजित नहीं है, अंग्रेजी शासन काल में भी दर्जनों ऐसी क्रूरतम घटनाएँ इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं जिन्हें पढ़कर आज भी प्रत्येक भारतीय आत्मा…
2 सितंबर 2000 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल का निर्वाण दिवस
श्रीकृष्ण सरल की कविता ग्यारहवीं की हिन्दी पाठ्य पुस्तक में थी, हम उसे पढ़ते थे। 1983 में एक दिन श्रीकृष्ण सरल जी स्वयं मेरे स्कूल में पधारे। क्लास में आकर उन्होंने "अमर शहीदों का चारण" नामक कविता…
क्रांतिकारी बीनादास का जन्म 24अगस्त 1911
स्वतंत्रता के जो सुनहरे दिन हम आज देख रहे हैं उसके पीछे कितने बलिदान हुये और कितने बलिदानियों की क्या गति बनीं इसका आज की पीढ़ी को होश तक नहीं। ऐसी ही बलिदानी हैं क्राँतिकारी बीनादास। जिन्होंने बंगाल के अत्याचारी गवर्नर स्टेनली को गोली…
अगस्त 1946 : पाकिस्तान की माँग के लिये मुस्लिम लीग का डायरेक्ट एक्शन
पन्द्रह अगस्त 1947 को भारतीय स्वतंत्रता और यह वर्तमान स्वरूप सरलता से नहीं मिला। यह दिन मानों रक्त के सागर से तैरकर आया है। बलिदानियों ने जितना बलिदान विदेशी आक्रांताओं से मुक्ति के लिये दिया। उतना ही…
स्वतंत्रता आंदोलन में लाखो लोगों ने अपनी भागीदारी निभाई, उन्होंने अपने जीवन की परवाह नहीं की एवं स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। ऐसे ही एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एस सत्यमूर्ति थे, उनका का जन्म तमिलनाडु के तिरुचिराप्पल्ली ज़िले में पुदुकोटाई नामक स्थान पर 19 अगस्त, 1887 में…
17 अगस्त 1909 : सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी मदन लाल ढींगरा का बलिदान
स्वत्व और स्वाभिमान रक्षा के लिये क्राँतिकारियों ने केवल भारत की धरती पर ही अंग्रेज अधिकारियों को गोली मारकर मौत की नींद नहीं सुलाया अपितु लंदन में भी क्रूर अंग्रेजों के सीने में गोली उतारी है। क्राँतिकारी मदन लाल…
स्वतंत्रता दिवस विशेष आलेख
आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर भारत माता को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए छत्तीसगढ़ महतारी के संतानों ने अभूतपूर्व योगदान दिया है। हमें गर्व है अपने स्वातंत्र्य-प्रिय सेनानियों पर जिन्होंने 1857 से पूर्व ही विदेशियों की सत्ता के विरोध में सशस्त्र…
स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ भी कभी पीछे नहीं रहा है। छत्तीसगढ़ के साथ ही पूरे देश के आंदोलन में इस भूमि के सिपाही सपूत सक्रिय रूप से भाग लेते रहे लेकिन उनका समुचित मूल्यांकन आज तक नहीं हो सका है। 1856-57 में सोनाखान के वीर सपूत नारायण सिंह ने अंग्रेज…
भारतीय इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटना भारत की स्वतंत्रता है। जो ब्रिटिश शासन के विरूद्ध एक अत्यंत कठिन और लंबी लड़ाई का अंत था। स्वतंत्रता किसी भी देश के नागरिकों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के अनुरूप कार्य कर अपनी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं शिक्षा इत्यादि सभी क्षेत्रों में सर्वांगीण…
वर्तमान पीढ़ी को स्वतंत्रता मायने ही नहीं जानती, क्योकि इनका जन्म स्वतंत्र भारत में हुआ है। इस स्वतंत्रता को प्राप्त करने में पूर्व की पीढ़ी ने कितने कष्ट सहे और क्या-क्या अत्याचार झेले, इसके विषय में वर्तमान पीढ़ी को जानना आवश्यक है तभी स्वतंत्रता का सही मुल्यांकन कर उसकी रक्षा…
13 अगस्त 1668 - वीर ठाकुर दुर्गादास राठौड़ जन्म दिवस आलेख
निसंदेह भारत में परतंत्रता का अंधकार सबसे लंबा रहा। असाधारण दमन और अत्याचार हुये पर भारतीय मेधा ने दासत्व को कभी स्वीकार नहीं किया। भारत भूमि ने प्रत्येक कालखंड में ऐसे वीरों को जन्म दिया जिन्होंने आक्रांताओं और अनाचारियों…
12 अगस्त 1942 : क्राँतिकारी लाल पद्मधर सिंह और बालवीर रमेशदत्त का बलिदान
स्वतंत्रता आँदोलन में संघर्ष की अहिसंक धारा में भी सैकड़ों बलिदान हुये हैं। 1942 के भारत छोड़ो आँदोलन में ही देश के पचास से अधिक स्थानों पर गोलियाँ चलीं और सौ से अधिक सेनानी बलिदान हुये। अंग्रेजों…
हुतात्मा खुदीराम बोस बलिदान दिवस विशेष आलेख
दुनियाँ में ऐसा कोई देश नहीं जो कभी न परतंत्रता के अंधकार में डूबा न हो। उनमें अधिकांश का स्वरूप ही बदल गया। उन देशों की अपनी संस्कृति का आज कोई अता पता नहीं है। लेकिन दासत्व के लंबे अंधकार के बाद भी…
भारत को स्वतंत्रता सरलता से नहीं मिली। इसके लिये असंख्य बलिदान हुये हैं। यह बलिदान दोनों प्रकार के। एक वे जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया और दूसरे वे जिन्होंने देश स्वाधीनता का जन जागरण करने के लिये अपने संपूर्ण जीवन का समर्पण किया।
श्यामलाल जी गुप्त ऐसे ही महामना…
भारत के स्वाधीनता आँदोलन में 9 अगस्त वह ऐतिहासिक तिथि है जब स्वतंत्रता के लिये निर्णायक संघर्ष का उद्घोष हुआ था। इसलिए इसे अगस्त क्रान्ति कहा जाता है।
स्वाधीनता आँदोलन के इतिहास में यह नौ अगस्त की तिथि दो महत्वपूर्ण स्मृतियों से जुड़ी है। पहली तिथि 9 अगस्त 1925 है…
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जो सशस्त्र क्राँतिकारी सामने आये और उनके जीवन का बलिदान हुआ। इनके साथ ऐसे क्राँतिकारी भी असंख्य हैं जिन्होंने क्राँतिकारियों को शस्त्र और अन्य साधन उपलब्ध कराये। इनमें एक प्रमुख नाम प्रेमकृष्ण खन्ना हैं। जिन्होंने न केवल चंद्रशेखर आजाद को माउजर पिस्टल उपलब्ध कराई अपितु काकोरी…
31 जुलाई 1940 : क्रान्तिकारी ऊधमसिंह का बलिदान दिवस
कुछ क्रांतिकारी ऐसे हुए हैं जिन्होंने शांति के जगह क्रांति का रास्ता अपनाया, उन्होंने अंग्रेजों की नेस्तनाबूत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, ऐसे ही क्रान्तिकारी थे ऊधमसिंह, जिनको लंदन में 31 जुलाई 1940 को फांसी दी गई थी। सरदार…
अंग्रेजी सत्ता ने भारत में अपनी जड़ों को गहरा करने के लिये व्यापार को माध्यम बनाया था। उन्होंने पहले विदेशी वस्तुओं का आकर्षण पैदा किया फिर स्वदेशी उत्पाद का दमन किया। 1857 में क्रान्ति की असफलता के बाद इस तथ्य अनेक महापुरुषों ने पहचाना उनमें सबसे प्रमुख थे गणेश वासुदेव…
महान क्राँतिकारी चन्द्रशेखर आजाद एक ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व के धनी थे कि उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारत के संपूर्ण क्राँतिकारी आँदोलन कारियों को एकजुट किया तथा बंगाल से पंजाब तक अंग्रेजी शासन की जड़ें हिला दीं। उनका जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के अंतर्गत ग्राम…
22 जुलाई, बलिदान दिवस विशेष आलेख
भारत तो स्वतंत्रता सैकड़ों वर्षों के संघर्ष एवं लाखों की संख्या में बलिदानों को उपरांत प्राप्त हुई। जिनमें कुछ बलिदानियों का नाम तो लोग जानते हैं परन्तु असंख्य ऐसे हैं, जिनके विषय में बहुत कम ही ज्ञात हो पता है। हम प्रसिद्ध एवं सिद्ध…
17 से 21 जुलाई 1857 : अंग्रेजों द्वारा कानपुर में भीषण नरसंहार
जलियाँवाला बाग में हुये सामूहिक नरसंहार को सब जानते हैं। पर अंग्रेजों ने इससे पहले और इससे भीषण नरसंहार भी किये हैं। इनमें एक भीषण नरसंहार जुलाई 1857 को कानपुर में हुआ। इसमें लगभग बीस हजार से अधिक…
भारतीय इतिहास में ज्ञात होता है कि जिन लोंगो ने हमें स्वतंत्र बनाने के लिये अपना जीवन न्योछावर किया, अंग्रेजों की अमानवीय यातनाएं सहीं उनके साथ स्वतंत्रता के बाद भी कैसा व्यवहार हुआ। इनमें से एक हैं सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त।
उन्हें स्वतंत्रता के बाद भी आजीविका के लिये भीषण…
9 जुलाई 1301 से 11 जुलाई 1301 को रणथंबोर में जौहर
सवाई माधोपुर से लगभग छह मील दूर रणथम्भौर दुर्ग अरावली पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा विकट दुर्ग है। रणथम्भौर का वास्तविक नाम रन्त:पुर है, अर्थात ‘रण की घाटी में स्थित नगर’। इस दुर्ग का निर्माण राजा सज्जन वीर सिंह नागिल…
6 जुलाई 1905 जन्म दिवस विशेष आलेख
भारतीय स्वाधीनता संघर्ष की सफलता में उस भावना की भूमिका महत्वपूर्ण है जिसने समाज में स्वत्व का वोध कराया। यदि हम केवल आधुनिक संघर्ष का ही स्मरण करें तो हम पायेंगे कि आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती से लेकर राष्ट्रीय स्वयं…
रानी दुर्गावती पुण्यतिथि विशेष
इतिहास में भारत भूमि पर अनेक वीरांगनाओं ने जन्म लिया तथा अपने कार्यों से इतिहास में अमर हो गई, जिन्हें हम आज भी याद करते हैं। ऐसी ही एक वीरांगना रानी दुर्गावती हैं जिन्होंने अपने राज्य की रक्षा के लिए मुगलों से युद्ध कर वीरगति को…
23 जून 1953 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान: विशेष आलेख
सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्राँतिकारी विचारक डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 23 जुलाई 1901 को बंगाल के अति प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता आशुतोष मुखर्जी सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् और बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे…
भारतीय इतिहास में जीजाबाई एक ऐसी आदर्श माता हैं जिन्होंने अपने पुत्र जन्म से पहले एक ऐसे संकल्पवान पुत्र की कामना की थी जो भारत में स्वत्व आधारित स्वराज्य की स्थापना करे। माता की इसी कल्पना को शिवाजी महाराज ने हिन्दवी स्वराज्य के रूप में आकार दिया और माता अपने…
क्राँतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11जून 1897 को शाहजहांपुर के खिरनी बाग में हुआ था। उनके पिता का नाम पं मुरलीधर और माता का नाम देवी मूलमती था। परिवार की पृष्ठभूमि आध्यात्मिक और वैदिक थी। पूजन पाठ और सात्विकता उन्हें विरासत में मिली थी।
कविता और लेखन की क्षमता…
भारतीय स्वाभिमान और स्वातंत्र्य बोध जागरण के लिए यूँ तो करोड़ों महापुरुषों के जीवन का बलिदान हुआ है किन्तु उनमें कुछ ऐसे हैं जिनके जीवन की प्रत्येक श्वाँस राष्ट्र के लिये समर्पित रही। स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ऐसे ही महान विभूति थे जिनके जीवन का प्रतिक्षण राष्ट्र और स्वत्व बोध कराने…
भारत के राष्ट्रीय आंदोलन पर स्वामी विवेकानंद के प्रभाव का वर्णन स्वयं स्वतंत्रता के नायकों ने किया है। गांधीजी जब 1901 में पहली बार कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लेने कलकत्ता पहुंचे तो उन्होंने स्वामी जी से मिलने का प्रयास भी किया था। अपनी आत्मकथा में गांधी लिखते हैं कि उत्साह…