संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार
नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026
भारत का वर्तमान मानचित्र प्राचीन जम्बूद्वीप का एक हिस्सा है। देश ने सन् 1946 और 1947 ईस्वी में बँटवारे का दर्द झेला। इस दौरान पश्चिम और पूर्व पाकिस्तान के रूप में एक बड़ा भूभाग देश से अलग हो गया। भारतीय समाज के लिए अपने इतिहास और संघर्षों को याद रखना हमारा कर्तव्य…
यह लेख छत्तीसगढ़ के समाज सुधारक सन्त गहिरा गुरु के जीवन पर आधारित है। इसमें स्वतन्त्रता संग्राम, महात्मा गान्धी से उनके सम्बन्ध, पर्यावरण संरक्षण और समाज सुधार में उनके योगदान की तथ्यात्मक जानकारी दी गई है।
यह लेख भारत की राजनीतिक स्वतन्त्रता और समाज की मानसिक परतन्त्रता का अध्ययन करता है। इसमें सामाजिक पूर्वाग्रहों, सम्प्रदायवाद और सोशल मीडिया की प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न मानसिक बन्धनों का तथ्यात्मक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
सन् 1947 ईस्वी के भारत विभाजन, लाखों लोगों के विस्थापन और शरणार्थियों के संघर्ष पर आधारित एक तथ्यात्मक आलेख। यह लेख बँटवारे के समय हुई हिंसा, सरकारी अव्यवस्था और बंगाल एवं पंजाब की त्रासदी का गम्भीर ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
इस लेख में भारत की राजनीतिक स्वतन्त्रता के साथ आर्थिक स्वाधीनता और स्वदेशी के महत्व पर गम्भीर चर्चा की गई है। लेखक ने ऐतिहासिक सन्दर्भों के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत को ही सच्ची स्वतन्त्रता का मूल आधार बताया है।
यह लेख स्वतन्त्रता और स्वाधीनता के वास्तविक अर्थ का विश्लेषण करता है। इसमें ऐतिहासिक और दार्शनिक सन्दर्भों के माध्यम से आत्म अनुशासन और समाज में सात्विक बन्धनों के महत्व को स्पष्ट किया गया है।
यह लेख 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिवीर समशेर सिंह पारधी और पारधी समुदाय के योगदान को सामने लाता है। इसमें उनके रणकौशल, संगठन, बलिदान और जनजातीय स्वाभिमान की उस गौरवगाथा का स्मरण है।
प्रस्तुत लेख कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि तथा सैनिकों के त्याग का वर्णन करता है। यह लेख बताता है कि कारगिल युद्ध राष्ट्र की रक्षा और नागरिक कर्तव्य के बीच एक गहरा सम्बन्ध स्थापित करता है।
यह लेख चन्द्रशेखर आजाद के साहस और भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में उनकी भूमिका पर आधारित है। असहयोग आन्दोलन की विफलता से लेकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के नेतृत्व तक, यह लेख उनके त्याग को सामने लाता है। यह विचारों के टकराव के बीच क्रान्तिकारियों के बलिदान की जानकारी देता है।
पूर्वोत्तर भारत के उन वीर योद्धाओं की गौरवशाली गाथा जानें, जिन्होंने मुगलों और अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। लचित बरफूकन, वीर टिकेन्द्रजीत और अन्य बलिदानियों का प्रेरणादायक इतिहास पढ़ें।
प्रस्तुत लेख वीरांगना रानी दुर्गावती के अद्वितीय शौर्य, स्वाभिमान और कुशल शासन का प्रेरक वर्णन करता है। इसमें उनके युद्ध कौशल, मुगल सेना के विरुद्ध प्रतिरोध, जल प्रबन्धन, सामाजिक समरसता और मातृभूमि की रक्षा हेतु दिए गए महान बलिदान को रेखांकित किया गया है। रानी दुर्गावती का जीवन भारतीय इतिहास…
प्रस्तुत लेख झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन, शौर्य, त्याग और राष्ट्रभक्ति का प्रेरणादायी चित्रण करता है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, युद्ध-कौशल, झाँसी के अधिकार की रक्षा, दुर्गा दल के गठन और 1857 के स्वाधीनता संग्राम में उनके अदम्य नेतृत्व को रेखांकित किया गया है। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान भारतीय…
बिरसा मुंडा भारतीय स्वाधीनता संग्राम के ऐसे अमर जननायक थे, जिन्होंने औपनिवेशिक शासन, जमीन्दारी शोषण और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के विरुद्ध जनजातीय समाज को संगठित किया। उनका उलगुलान केवल विद्रोह नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, अस्मिता और स्वाधीनता की रक्षा का ऐतिहासिक अभियान था।
यह लेख महाराजा रणजीत सिंह के विश्वस्त सेनानायक सरदार हरि सिंह नलवा के जीवन, युद्ध-कौशल, कश्मीर-पेशावर विजय, जमरुद के बलिदान और उनके निर्माण कार्यों का प्रेरक वर्णन करता है।
पृथ्वीसिंह आजाद (1892-1989) गदर पार्टी के संस्थापक सदस्य और महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने अमेरिका, रूस और भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। सेलुलर जेल में कठोर सजा भोगी। स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा के सदस्य बने और 1977 में पद्म भूषण से सम्मानित हुए।
11 फरवरी हमें उस अग्निपुत्र का स्मरण कराता है, जिसने वनांचल से उठकर साम्राज्यवादी अन्याय को ललकारा। तिलका मांझी ने सिद्ध किया कि स्वाधीनता भिक्षा नहीं, साहस से अर्जित अधिकार है। उनका जीवन त्याग, स्वाभिमान और राष्ट्रनिष्ठा का ज्वलंत मंत्र है।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में रामगढ़ की रानी अवंती बाई लोधी के अद्भुत शौर्य, बलिदान और अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का प्रामाणिक ऐतिहासिक विवरण।
औपनिवेशिक दासता के अंधकार में गोंड़ राजा डेलनशाह ने प्रतिरोध की मशाल जलाई। मदनपुर से उठी यह कथा केवल एक राजा की नहीं, बल्कि जनस्वाभिमान, बलिदान और संघर्ष की गाथा है। आगे क्या हुआ, यह जानने के लिए क्लिक करें।
यह लेख खादी को केवल वस्त्र नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत स्मृति, स्वदेशी आंदोलन, गांधी दर्शन और आत्मनिर्भरता की चेतना के रूप में प्रस्तुत करता है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आधुनिक ‘खादी इंडिया’ ब्रांड तक, खादी की ऐतिहासिक यात्रा, सामाजिक भूमिका और समकालीन महत्व का समग्र विवेचन इसमें किया…
वीरांगना ऊदा देवी पासी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की अदम्य योद्धा थीं, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सिकंदर बाग की लड़ाई में अद्भुत साहस का परिचय दिया। पुरुष वेश में पीपल के पेड़ पर चढ़कर 36 अंग्रेज सिपाहियों को मार गिराया। उनका जीवन नारी शक्ति की अपरिमितता और मातृभूमि के लिए…
गुरु गोविंद सिंह जी का जीवन केवल वीरता की गाथा नहीं, बल्कि धर्म, त्याग और राष्ट्रजागरण का अमर संदेश है। उन्होंने अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध “सवा लाख से एक लड़ाऊं” की भावना से खालसा पंथ की स्थापना की, जिसने भारतीय आत्मा को पुनः जागृत किया
असम का चाय जनजाति समुदाय कहा जाता है, औपनिवेशिक काल में विभिन्न भारतीय राज्यों से लाए गए मजदूरों का समूह है, जिन्होंने असम की चाय उद्योग, संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका संघर्ष, विद्रोह, शहादत और समृद्ध सांस्कृतिक पहचान असम के इतिहास का एक…
सोलहवीं शताब्दी में पुर्तगालियों के विरुद्ध लगभग चालीस वर्षों तक संघर्ष करने वाली भारत की प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी रानी अब्बक्का चौटा की इस विस्तृत कथा में उनके साहस, सैन्य नेतृत्व, समुद्री रणनीति, प्रशासनिक कुशलता और ऐतिहासिक योगदान का गहन वर्णन किया गया है। यह लेख इस विस्मृत वीरांगना की…
भगवान बिरसा मुंडा ने न केवल अंग्रेज़ों के खिलाफ बल्कि ईसाई मिशनरियों और धर्मांतरण के षड्यंत्रों के विरुद्ध भी महान संघर्ष किया। उनका ‘उलगुलान’ सिर्फ विद्रोह नहीं, बल्कि भारतीय जनजातीय समाज की संस्कृति, स्वधर्म और जल-जंगल-जमीन की रक्षा का पुकार था। आज उनका विचार और बलिदान भारत की एकता के…
जनजातीय गौरव दिवस: हमारे महापुरुषों और राष्ट्रीय-गौरव के स्मरण का दिन _जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन महापुरुषों और जनजातीय समाज की सांस्कृतिक विरासत को उत्सव के रूप में मनाने का दिन है। आइये…
जनजातीय महापुरुषों और सामाजिक गौरव का पुनर्स्मरण: जनजातीय गौरव दिवस जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है। बिरसा मुंडा जी के जन्म दिवस को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रूप में स्वीकार किया गया है। यह दिन केवल…
यह लेख जनजातीय समाज के जीवन-मूल्यों, देवत्व, न्याय व्यवस्था और सामाजिक संतुलन का विश्लेषण करता है। यह दिखाता है कि जिन्हें पिछड़ा कहा गया, वही समाज आज भी मानवता, समानता और सामूहिक जीवन के उच्चतम आदर्शों को जीवित रखे हुए है।
यह लेख जनजातीय समाज की ज्ञान परम्परा, तकनीकी कौशल और जीवनदृष्टि पर प्रकाश डालता है। यह दिखाता है कि खनिज, औषधि, स्थापत्य और पर्यावरण-संरक्षण में जनजातीय समाज का ज्ञान आज भी भारत के सतत विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधार बन सकता है।
दक्षिणी बिहार का क्षेत्र छोटानागपुर के नाम से जाना जाता है। यहाँ रहने वाली एक पमुख जाति मुंडा कहलाती है। उलिहातू नामक ग्राम में, 15 नवम्बर 1875 को विरसा का जन्म हुआ। यह दिन पवित्र बृहस्पतिवार था। विरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा तथा माता का नाम करमी मुंडा…
यह लेख भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन गुमनाम नायकों को समर्पित है, जिन्होंने सरगुजा, बस्तर और मध्य छत्तीसगढ़ के जनजातीय अंचलों में अपने साहस, त्याग और स्वाभिमान से स्वतंत्रता की ज्योति प्रज्वलित की। माझी राम गोंड, महली भगत, राजनाथ भगत, राजमोहिनी देवी, मिनी माता और वीर गुंडाधूर जैसे वीरों…