संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार
नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026
बिरसा मुंडा भारतीय स्वाधीनता संग्राम के ऐसे अमर जननायक थे, जिन्होंने औपनिवेशिक शासन, जमीन्दारी शोषण और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के विरुद्ध जनजातीय समाज को संगठित किया। उनका उलगुलान केवल विद्रोह नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, अस्मिता और स्वाधीनता की रक्षा का ऐतिहासिक अभियान था।
यह लेख महाराजा रणजीत सिंह के विश्वस्त सेनानायक सरदार हरि सिंह नलवा के जीवन, युद्ध-कौशल, कश्मीर-पेशावर विजय, जमरुद के बलिदान और उनके निर्माण कार्यों का प्रेरक वर्णन करता है।
पृथ्वीसिंह आजाद (1892-1989) गदर पार्टी के संस्थापक सदस्य और महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने अमेरिका, रूस और भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। सेलुलर जेल में कठोर सजा भोगी। स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा के सदस्य बने और 1977 में पद्म भूषण से सम्मानित हुए।
11 फरवरी हमें उस अग्निपुत्र का स्मरण कराता है, जिसने वनांचल से उठकर साम्राज्यवादी अन्याय को ललकारा। तिलका मांझी ने सिद्ध किया कि स्वाधीनता भिक्षा नहीं, साहस से अर्जित अधिकार है। उनका जीवन त्याग, स्वाभिमान और राष्ट्रनिष्ठा का ज्वलंत मंत्र है।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में रामगढ़ की रानी अवंती बाई लोधी के अद्भुत शौर्य, बलिदान और अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का प्रामाणिक ऐतिहासिक विवरण।
औपनिवेशिक दासता के अंधकार में गोंड़ राजा डेलनशाह ने प्रतिरोध की मशाल जलाई। मदनपुर से उठी यह कथा केवल एक राजा की नहीं, बल्कि जनस्वाभिमान, बलिदान और संघर्ष की गाथा है। आगे क्या हुआ, यह जानने के लिए क्लिक करें।
यह लेख खादी को केवल वस्त्र नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत स्मृति, स्वदेशी आंदोलन, गांधी दर्शन और आत्मनिर्भरता की चेतना के रूप में प्रस्तुत करता है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आधुनिक ‘खादी इंडिया’ ब्रांड तक, खादी की ऐतिहासिक यात्रा, सामाजिक भूमिका और समकालीन महत्व का समग्र विवेचन इसमें किया…
वीरांगना ऊदा देवी पासी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की अदम्य योद्धा थीं, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सिकंदर बाग की लड़ाई में अद्भुत साहस का परिचय दिया। पुरुष वेश में पीपल के पेड़ पर चढ़कर 36 अंग्रेज सिपाहियों को मार गिराया। उनका जीवन नारी शक्ति की अपरिमितता और मातृभूमि के लिए…
गुरु गोविंद सिंह जी का जीवन केवल वीरता की गाथा नहीं, बल्कि धर्म, त्याग और राष्ट्रजागरण का अमर संदेश है। उन्होंने अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध “सवा लाख से एक लड़ाऊं” की भावना से खालसा पंथ की स्थापना की, जिसने भारतीय आत्मा को पुनः जागृत किया
असम का चाय जनजाति समुदाय कहा जाता है, औपनिवेशिक काल में विभिन्न भारतीय राज्यों से लाए गए मजदूरों का समूह है, जिन्होंने असम की चाय उद्योग, संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका संघर्ष, विद्रोह, शहादत और समृद्ध सांस्कृतिक पहचान असम के इतिहास का एक…
सोलहवीं शताब्दी में पुर्तगालियों के विरुद्ध लगभग चालीस वर्षों तक संघर्ष करने वाली भारत की प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी रानी अब्बक्का चौटा की इस विस्तृत कथा में उनके साहस, सैन्य नेतृत्व, समुद्री रणनीति, प्रशासनिक कुशलता और ऐतिहासिक योगदान का गहन वर्णन किया गया है। यह लेख इस विस्मृत वीरांगना की…
भगवान बिरसा मुंडा ने न केवल अंग्रेज़ों के खिलाफ बल्कि ईसाई मिशनरियों और धर्मांतरण के षड्यंत्रों के विरुद्ध भी महान संघर्ष किया। उनका ‘उलगुलान’ सिर्फ विद्रोह नहीं, बल्कि भारतीय जनजातीय समाज की संस्कृति, स्वधर्म और जल-जंगल-जमीन की रक्षा का पुकार था। आज उनका विचार और बलिदान भारत की एकता के…
जनजातीय गौरव दिवस: हमारे महापुरुषों और राष्ट्रीय-गौरव के स्मरण का दिन _जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन महापुरुषों और जनजातीय समाज की सांस्कृतिक विरासत को उत्सव के रूप में मनाने का दिन है। आइये…
जनजातीय महापुरुषों और सामाजिक गौरव का पुनर्स्मरण: जनजातीय गौरव दिवस जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है। बिरसा मुंडा जी के जन्म दिवस को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रूप में स्वीकार किया गया है। यह दिन केवल…
यह लेख जनजातीय समाज के जीवन-मूल्यों, देवत्व, न्याय व्यवस्था और सामाजिक संतुलन का विश्लेषण करता है। यह दिखाता है कि जिन्हें पिछड़ा कहा गया, वही समाज आज भी मानवता, समानता और सामूहिक जीवन के उच्चतम आदर्शों को जीवित रखे हुए है।
यह लेख जनजातीय समाज की ज्ञान परम्परा, तकनीकी कौशल और जीवनदृष्टि पर प्रकाश डालता है। यह दिखाता है कि खनिज, औषधि, स्थापत्य और पर्यावरण-संरक्षण में जनजातीय समाज का ज्ञान आज भी भारत के सतत विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधार बन सकता है।
दक्षिणी बिहार का क्षेत्र छोटानागपुर के नाम से जाना जाता है। यहाँ रहने वाली एक पमुख जाति मुंडा कहलाती है। उलिहातू नामक ग्राम में, 15 नवम्बर 1875 को विरसा का जन्म हुआ। यह दिन पवित्र बृहस्पतिवार था। विरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा तथा माता का नाम करमी मुंडा…
यह लेख भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन गुमनाम नायकों को समर्पित है, जिन्होंने सरगुजा, बस्तर और मध्य छत्तीसगढ़ के जनजातीय अंचलों में अपने साहस, त्याग और स्वाभिमान से स्वतंत्रता की ज्योति प्रज्वलित की। माझी राम गोंड, महली भगत, राजनाथ भगत, राजमोहिनी देवी, मिनी माता और वीर गुंडाधूर जैसे वीरों…
जब हम किसी समाज को समझना चाहते हैं, तो हम सर्वप्रथम उस समाज के इतिहास को देखते हैं। जैसे राजपूतों को समझने के लिए हम इतिहास में उन्हें देखते हैं। हम इतिहास में पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप जैसे शूरवीरों की ओर देखते हैं। मराठों को समझने के लिए वीर शिवाजी…
जब हम भारत के स्वाधीनता संग्राम की चर्चा करते हैं, तो अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध अपने संघर्ष का ही ब्यौरा देते हैं। इस दौरान हम अपने उस संघर्ष को विस्मृत कर देते हैं, जो हमने 9वीं सदी से 18वीं सदी तक इस्लामी आक्रमणकारियों के विरुद्ध किया था। और अंग्रेजों…
इतिहास को ठीक-ठीक न जानने के कारण जब हम स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं, तो केवल अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध संघर्ष को ही देखते हैं, और उसमें भी 1857 से 1947 तक का ही। 1857 के संग्राम को ही हम अज्ञानवश भारतीयों द्वारा अंग्रेजों के प्रतिकार का पहला प्रयास…
यह आलेख 16 वर्षीय वनबाला वीरांगना दयावती कंवर के अद्भुत साहस की कहानी है, जिन्होंने 1930 में तमोरा गांव के जंगल सत्याग्रह के दौरान पुलिस के लाठीचार्ज और संगीनों के सामने डटे रहकर सत्याग्रहियों की रक्षा की। दयावती का यह बलिदान और निर्भीकता छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में…
18 जून सन्, 1576 हल्दीघाटी के महान् युद्ध और हिंदुत्व की विजय स्मृति में सादर समर्पित -प्रामाणिक शोध
अमर क्रान्तिकारी बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 छोटा नागपुर कहे जाने वाले क्षेत्र में हुआ था । यह क्षेत्र अब झारखंड में है । उनकी माता सुगना देवी और पिता करमी मुंडा का गाँव झारखंड प्रांत के रांची जिले में पड़ता है । उनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम साल्वा…
26 अप्रैल 1858 : सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी बाबू कुँअर सिंह का बलिदान
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में ऐसे असंख्य बलिदानी हुये जिन्होंने न अपने परिवार की चिंता की न आयु बाधा बनी। वे भारत की स्वाधीनता के लिये न्यौछावर हो गये। ऐसे ही बलिदानी थे बाबू कुँअर सिंह, जिन्होंने हाथ में बंदूक…
23 अप्रैल 1880 : सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी तेलंगा खड़िया का बलिदान
भारत पर आक्रमण चाहे सल्तनतकाल काल का रहा हो अथवा अंग्रेजीकाल का। वन्य अंचलों ने कभी दासत्व को स्वीकार नहीं किया और स्वाधीनता केलिए सदैव संघर्ष किया और बलिदान हुये। ऐसे ही संघर्ष के नायक हैं तेलंगा खड़िया जिन्होंने वनवासी…
19 अप्रैल 1910 : तीन महान क्राँतिकारियों अनंत लक्ष्मण कान्हेरे, विनायक नारायण देशपाँडे और कृष्ण गोपाल कर्वे का बलिदान
भारतीय स्वाधीनता संघर्ष में अनंत वीरों का बलिदान हुआ है। कुछ के तो नाम तक नहीं मिलते और जिनके नाम मिलते हैं उनका विवरण नहीं मिलता। नासिक में ऐसे ही क्राँतिकारियों…
परम वैभवशाली भारत माता का पाथेय है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
आ सिंधु-सिंधु पर्यन्ता, यस्य भारत भूमिका। पितृभू- पुण्यभूभुश्चेव सा वै हिंदू रीति स्मृता॥ इस श्लोक के अनुसार "भारत के वह सभी लोग हिंदू हैं जो इस देश को पितृभूमि-पुण्यभूमि मानते हैं" वीर दामोदर सावरकर के इस दर्शन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक…
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 1857 की क्रान्ति को सब जानते हैं। यह एक ऐसा सशस्त्र संघर्ष था जो पूरे देश में एक साथ हुआ। इसमें सैनिकों और स्वाभिमान सम्पन्न रियासतों ने हिस्सा लिया। असंख्य प्राणों की आहूतियाँ हुईं थी। इस संघर्ष का सूत्रपात करने वाले स्वाभिमानी सिपाही मंगल पाण्डेय थे…
6 अप्रैल 1929 : महाशय राजपाल का बलिदान
दासता के दिनों में भारतीय अस्मिता पर चौतरफा हमला हुआ है। आक्रांताओं ने केवल सत्ताओं को ही ध्वस्त नहीं किया अपितु भारतीय संस्कृति और साहित्य को भी विकृत करने का प्रयास किया है। एक ओर यदि भारतीय जन स्वाधीनता संघर्ष के लिये…