आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख कृष्ण द्वादशी | गुरुवार

नक्षत्र: रेवती | योग: प्रीति | करण: तैतिल

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 मई 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख कृष्ण द्वादशी | गुरुवार

नक्षत्र: रेवती | योग: प्रीति | करण: तैतिल

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 मई 2026

भारतीय जीवन का आधार संस्कार एवं हम

यह लेख भारतीय समाज की उस मूल संरचना को स्पष्ट करता है, जिसकी आधारशिला संस्कारों पर टिकी हुई है। इसमें बताया गया है कि संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि व्यक्ति के आचरण, विचार और सामाजिक उत्तरदायित्व को दिशा देने वाली एक समग्र जीवन-पद्धति हैं। परिवार, शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक…

जहाँ भक्ति बनी प्रेम की भाषा

यह लेख रामायण के ‘प्रेम पक्ष’ को विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से उजागर करता है, जहाँ प्रेम केवल आकर्षण नहीं बल्कि त्याग, समर्पण और कर्तव्य का उच्चतम रूप बन जाता है। श्रीराम-सीता, भरत, उर्मिला और हनुमान जैसे पात्रों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि रामायण में भक्ति ही…

सीताराम की वचनबद्धता का मर्म जानना ही केवट होना है

गंगा तट पर घटित केवट और श्रीराम का यह भावपूर्ण प्रसंग निष्कलुष भक्ति, समर्पण और प्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति है। लेख दर्शाता है कि केवट का हठ वास्तव में ईश्वर के प्रति उसकी अनन्य श्रद्धा थी, जिसके सामने स्वयं प्रभु भी वश में हो जाते हैं।

गोत्रोद्भव : संस्कृत वाङ्मय

भारतीय समाज की कुछ प्रधान विशेषताओं में से एक है - गोत्र परम्परा। पाणिनि के अनुसार तीसरी पीढ़ी से आगे की संतान 'गोत्र' कहलाती है। यह व्यवस्था वंशावली पहचान, विवाह नियमन और सामाजिक संगठन का आधार रही है।

यज्ञोपवीत- एक सूत्र जो है पवित्रता का प्रतीक

यज्ञोपवीत अथवा जनेऊ सनातन परंपरा का एक अत्यंत पवित्र संस्कार है, जो उपनयन संस्कार के माध्यम से व्यक्ति को द्विजत्व प्रदान करता है। यह केवल एक सूत्र नहीं, बल्कि ज्ञान, संयम, पवित्रता और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। उपनयन संस्कार के पश्चात व्यक्ति को ब्रह्मचर्य, यज्ञ, अध्ययन और कर्तव्यबोध के…

बैगा समुदाय में गोदना का महत्व

बैगा जनजाति की गोदना परम्परा केवल शृंगार नहीं, बल्कि पहचान, आस्था और जीवन-दर्शन है। आधुनिकता के दबाव में यह अमूल्य धरोहर विलुप्ति के कगार पर है। बैगा चक क्षेत्र की इस सांस्कृतिक विरासत, मान्यताओं और विधियों को समझने के लिए यह आलेख अवश्य पढ़ें।

भारतीय समाज में जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठान - मृत्यु संस्कार

यह लेख गोंड, मुरिया और धुरवा आदि जनजातियों में प्रचलित मृतक संस्कारों का गहन विवेचन करता है। पंचतत्व, पुनर्जन्म, पितृ-पूजन और सामाजिक संतुलन से जुड़े इन संस्कारों में निहित भारतीय जीवन-दर्शन को यह स्पष्ट करता है।

भारतीय समाज में जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठान : विवाह संस्कार

भारतीय दर्शन की आश्रम व्यवस्था में विवाह संस्कार गृहस्थ आश्रम का प्रवेश-द्वार है, जो समाज, वंश और संस्कृति की निरंतरता सुनिश्चित करता है। प्रस्तुत लेख में जनजातीय समाज की विवाह परंपराओं का विवेचन है, जहाँ एकविवाह, बहुपत्नी और बहुपति विवाह सामाजिक-आर्थिक संतुलन के आधार पर प्रचलित रहे हैं। उरांव, हल्बा…

भारतीय समाज में जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठान: जन्म संस्कार

यह लेख पद्मपुराण में वर्णित चौरासी लाख योनियों की अवधारणा से प्रारंभ होकर संस्कारों के दार्शनिक अर्थ और उनके सामाजिक प्रयोजन को स्पष्ट करता है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ की विभिन्न जनजातियों बैगा, मुरिया, गोंड, धुरवा, हल्बा, धनवार आदि में प्रचलित जन्म संस्कारों का विस्तृत विवेचन करते हुए यह लेख…

वैश्विक समस्याओं के निदान में जनजातीय समाज की भूमिका

यह लेख अमृतकाल के संदर्भ में विकास की भारतीय अवधारणा को समझाते हुए बताता है कि सतत, संतुलित और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भारत के निर्माण के लिए जनजातीय समाज की जीवनदृष्टि, ज्ञानपरम्परा और प्रकृति-निष्ठ जीवनमूल्य हमारे लिए प्रेरणास्रोत बन सकते हैं।

सुजननिकी (यूजैनिक्स): हिन्दुओं में विवाह प्रणाली का मूलभूत आधार-एक परिचर्चा

सुजननिकी या यूजैनिक्स को मानव जाति के गुणात्मक विकास का विज्ञान माना जाता है। पाश्चात्य देशों में यह विज्ञान आधुनिक तकनीकों जैसे क्लोनिंग और जीन संशोधन से जुड़ा है, जबकि भारत में वैदिक काल से ही ब्रह्मचर्य, विवाह-नियम, गोत्र परंपरा और अनुवांशिक अनुशासन के माध्यम से इसका पालन किया जाता…

पितर पूजन का पर्व : पितृ पक्ष

यह आलेख पितृपक्ष की लोक-परंपरा, शास्त्रीय महत्व और सांस्कृतिक अर्थ को स्पष्ट करता है। इसमें छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन से लेकर पुराणों में वर्णित पितरों के महत्व तक की झलक मिलती है। पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता भाव किस प्रकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी संस्कारों का हिस्सा बना, इसका विस्तार से वर्णन…

सामाजिकता और संस्कृति

यह आलेख सामाजिक संरचना में संस्कृति की केंद्रीय भूमिका, नैतिक मूल्यों के क्षरण, और औद्योगीकरण व पाश्चात्य प्रभाव के चलते बदलते सामाजिक संबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। लेख बताता है कि कैसे आधुनिकता के आकर्षण में हमारी सांस्कृतिक विरासत, लोककलाएँ, और पारंपरिक जीवन मूल्य धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं…

सामाजिकता और संस्कृति

यह आलेख समाज और संस्कृति के गहरे संबंधों पर प्रकाश डालता है। इसमें बताया गया है कि संस्कृति समाज का नैतिक और आदर्श रूप होती है, जो व्यक्ति के आचरण, विचार और जीवन-मूल्यों से निर्मित होती है। औद्योगीकरण, पाश्चात्य प्रभाव और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के चलते भारतीय समाज में पारंपरिक मूल्य…

सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य एवं पुस्तकालय

यह आलेख भारतीय लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक मूल्यों की पृष्ठभूमि में सार्वजनिक पुस्तकालयों की भूमिका पर प्रकाश डालता है। भारत की प्राचीन संस्कृति और आधुनिक शिक्षा के सेतु के रूप में पुस्तकालय एक सांस्कृतिक केंद्र बनते हैं। राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान जैसी संस्थाएं देशभर में पठन-पाठन संस्कृति के प्रचार-प्रसार और…

पंढरपुर वारी दिंडी यात्रा: सामाजिक समरसता का वैर्श्विक आदर्श

पंढरपुर वारी दिंडी यात्रा भारत की सामाजिक समरसता, भक्ति परंपरा और संत संस्कृति का जीवंत प्रमाण है। महाराष्ट्र में विठ्ठल-रुक्मिणी के दर्शन हेतु लाखों श्रद्धालु हर वर्ष पैदल यात्रा कर पंढरपुर पहुँचते हैं। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि जाति-पंथ से परे भारत की एकता, अनुशासन और निःस्वार्थ भक्ति…

"धर्मेण जयति राष्ट्रम्"

धर्म ही राष्ट्र की विजय, सुरक्षा और समृद्धि का मूल है। सनातन संस्कृति, वेदों की परंपरा और भारतीय जीवन मूल्यों के संरक्षण से ही भारत का यश, गौरव और अस्तित्व सुरक्षित रह सकता है। यही समय है जब हर भारतीय को धर्म, संगठन और राष्ट्र रक्षा के संकल्प के साथ…

धर्म का व्यावहारिक व वैज्ञानिक स्वरूप

भारतीय धर्म का स्वरूप केवल आस्था या पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि यह एक अत्यंत व्यावहारिक और वैज्ञानिक जीवन पद्धति है। छांदोग्य उपनिषद से लेकर आधुनिक विज्ञान तक, हर स्तर पर यह प्रमाणित होता रहा है कि हमारे धार्मिक प्रतीक, रीतियाँ और क्रियाएं — जैसे वैश्वानर विद्या, यज्ञ, मंत्र, हवन…

बांस के मंडप से चौदह देवताओं तक: जमातिया समुदाय की विवाह पद्धति

त्रिपुरा की जमातिया समुदाय अपनी सामाजिक व्यवस्था, भाषा, धार्मिक मान्यताओं और वैवाहिक परंपराओं और भारतीय जीवन मूल्यों के लिए जानी जाती है। यह आलेख जमातिया समुदाय में प्रचलित विवाह की विविध पद्धतियों—जैसे सेवा आधारित विवाह, वधू-मूल्य विवाह, प्रेम विवाह, और माता-पिता द्वारा तय विवाह—के साथ-साथ उससे जुड़े सामाजिक नियम, रस्में…

भारतीय संस्कृति के परम आदर्श एवं युग पुरुष श्रीराम

महर्षि अरविन्द कहते हैं कि श्रीराम का अवतार किसी आध्यात्मिक साम्राज्य की स्थापना के लिए नहीं हुआ था। राम परमात्मा थे, जिन्होंने मानवीय मानसिकता के आधार को स्वीकार किया और उसे शोभामय सम्मान दिया। माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर कहते हैं कि संपूर्ण भारतीय समाज के लिए समान आदर्श के रूप में…

नारी मनोव्यथा की अभिव्यक्ति सुआ गीत

छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का हिस्सा है सुआ गीत। यह छत्तीसगढ़ प्रदेश की गोंड जाति की स्त्रियों का प्रमुख नृत्य-गीत है लेकिन अन्य जाति के महिलाएं भी इसमें सम्मिलित होकर नृत्य करती हैं। जिसे सामूहिक रुप से किया जाता है। यह मुख्यतः महिलाओं के मनोभावों सुख-दुख आदि की अभिव्यक्ति का…

कवर्धा राज का दशहरा उत्सव

हमारा देश सनातन काल से सौर, गाणपत्य, शैव, वैष्णव, शाक्त आदि पंच धार्मिक परम्पराओं का वाहक रहा है। यहाँ पर्वों एवं त्यौहारों की कोई कमी नहीं है, सप्ताह के प्रत्येक दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित होते हैं। विक्रम संवत की प्रत्येक तिथियाँ भी अपनी विशिष्टता लिए हुए हैं…

जीवन का सुख

पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा संघ शिक्षा वर्ग, बौद्धिक वर्ग मैसूर, मई 19, 1967 को दिया गया व्याख्यान

प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में सुख की भावना लेकर चलता है। मानव ही नहीं, तो प्राणिमात्र सुख के लिए लालयित है। दुःख को टालना और सुख को प्राप्त करना, यह एक उसकी स्वाभाविक…

मुख से राम तू बोल के देख

भीतर अपने टटोल के देख।
मुख से राम तू बोल के देख।

स्पष्ट नजर आयेगी दुनिया,
अंतस द्वार तू खोल के देख।

राम नाम का ले हाथ तराजू,
खुद को ही तू तोल के देख।

है कीमत तेरा कितना प्यारे,
जा बाजार तू मोल के देख।

कितना मीठा कड़ुवा है…

नागरिक निर्माण में शिक्षकों की अकल्पनीय भूमिका

नागरिक निर्माणकर्ताओं को नमन, ‘अध्यापक और अध्यापन’ दोनों में कोई खास असमानता नहीं होती, एक समान ही होते हैं। क्योंकि ये दोनों हर किसी के जीवन का हिस्सा रहे होते हैं। इंसान के जीवन में शुरू से तरक्की-समृद्धि के वास्तविक पथ धारक टीचर ही रहे हैं जिनके जरिए इंसान खुद…

छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक वैभव : बांसगीत

छत्तीसगढ़ में निवासरत राउत जाति जोकि अपने को यदुवंशी मानते हैं तथा भगवान श्रीकृष्ण को अपना पूर्वज मानकर उनकी पूजा करते हैं साथ ही उनकी बाँसुरी के प्रति अटूट श्रद्धा रखते हैं। इनके प्रिय गीत बाँस गीत के गायन के साथ एक लगभग दो हाथ लम्बी मोटे बाँस की बनाई…

हेमाद्रि संकल्प और ऋषि पंचमी

भारत की ऋषि संस्कृति में संस्कारों का बहुत महत्व है। वस्तुतः संस्कृति एवं संस्कार अन्योन्याश्रित होते है। संस्कारो से है संस्कृति का निर्माण होता है। सम् की आवृति करके सम्यक संस्कार से ही संस्कृति का निर्माण होता जाता है। संस्कारों से आत्मा और अंत:करण की शुद्धि होती है। सम्यक कृति…

छत्तीसगढ़ का प्रमुख त्यौहार पोला

प्रकृति को सहेजती सनातन परंपरा और धार्मिक रीति-रिवाजों में हमारी भावनाएं मूर्त रूप ले लेती हैं, इन्हीं भावों को साकार करते हैं हमारे पर्व। भारत की गोधन संस्कृति में गाय और गोवंश जीवन जगत की मूलाधार रही है। गाय गौ माता और खेती किसानी में बैल किसानों के जीवन का…

छत्तीसगढ में मित्रता का प्राचीन पर्व

पौराणिक काळ से ही देवी देवताओ की पूजा, प्रकृति के रूप में किसी न किसी पेड पौधे , फळ फुल आदि के रूप में पुरी आस्था के साथ किया जाता है। इसी पर आधारित ग्रामीण आंचलो में भोजली बोने की परंपरा पुरे श्रद्धा के साथ किया जाता है।

श्रावण मास…

नृत्य, नाटक का विकास एवं सीता बेंगरा

मानव जीवन में नृत्य, अभिनय का महत्व हमें आदिमानवों की शरणस्थली शैलाश्रयों में चित्रित शैलचित्रों से ज्ञात होता है। हजारों हजार साल प्राचीन शैलचित्रों में आदिमानवों ने अपनी कला बिखेरते हुए तत्कालीन समय की गतिविधियों को चित्रित किया, जिससे हमें वर्तमान में उनके जीवन के विषय में ज्ञाता होता है…