संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार
नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026
गंगईकोंडा चोलपुरम केवल चोल स्थापत्य का वैभव नहीं, बल्कि वैदिक शिक्षा और ज्ञान परम्परा का महत्वपूर्ण केन्द्र भी था। यहाँ वेद, वेदांग, व्याकरण, दर्शन, तर्क, खगोल और कलाओं की शिक्षा मन्दिर आधारित संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से दी जाती थी।
सवनाही छत्तीसगढ़ की ग्राम सुरक्षा, लोकआस्था और प्रकृति सम्मान से जुड़ी प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा है। इसमें बैगा, सिरहा, राउत और ग्रामीण मिलकर सामूहिक पूजा करते हैं तथा जन, पशुधन, खेती और पूरे गाँव की सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना करते हैं।
गुजरात के राठ क्षेत्र का बन्दी त्योहार वनवासी समाज की प्रकृति आधारित जीवनदृष्टि का परिचय देता है। इसके नियम मानसून में स्वास्थ्य, कृषि, पशु संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और सामूहिक अनुशासन को सुरक्षित रखने वाली वैज्ञानिक समझ को उजागर करते हैं।
मधुश्रावणी मिथिला की स्त्री-केंद्रित लोकपरंपरा है, जिसमें नवविवाहिता पूजा, लोककथा, वनस्पति-ज्ञान और पारिवारिक स्मृतियों से जुड़ती है। यह पर्व नाग पूजा, प्रकृति-सम्मान तथा मायके-ससुराल के सांस्कृतिक संबंधों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखता और स्त्रियों के मौखिक ज्ञान को आगे बढ़ाता है।
श्रीकृष्ण और अर्जुन की मित्रता प्रेम, विश्वास, मार्गदर्शन और आत्मोन्नति का शाश्वत आदर्श है। ब्राह्मण के लापता पुत्रों की कथा के माध्यम से यह लेख बताता है कि सच्चा मित्र संकट से बचाने के साथ अहंकार भी दूर करता है।
यह लेख छत्तीसगढ़ की प्राचीन 'मितानी' लोक परम्परा पर केन्द्रित है। लेख में मितान बनने की विधियों, इसके विभिन्न प्रकारों, ऐतिहासिक लोक मान्यताओं और समाज में इसके वर्तमान महत्व का तथ्यात्मक विवरण…
आधुनिकता की दौड़ में जब आपसी सम्बन्ध कमजोर हो रहे हैं, ऐसे में इसका प्रभाव मित्रता पर भी पड़ा है। पहले मित्रता दो लोगों के साथ दो परिवारों के बीच भी होती थी। आज यह सम्बन्ध कमजोर हुआ है। ऐसे क्षेत्रों जहां पश्चिमी जगत प्रभाव कम है, वहाँ के गांवों ने हमारी भारतीय संस्कृति…
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के शिक्षा सुधार, स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, मातृभाषा प्रेम और संथाल समाज-सेवा के प्रेरक अभियान पर केंद्रित लेख।
यह लेख गुरु पूर्णिमा के सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि पूर्णिमा का प्रकाश मानव की दिनचर्या को कैसे प्रभावित करता है। यह पर्व महर्षि वेदव्यास और महान गुरु-शिष्य परंपरा को समर्पित है।
गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का वह पावन पर्व है, जो शिष्य को गुरु के सान्निध्य में आत्म-साक्षात्कार का मार्ग दिखाता है। यह पर्व केवल श्रद्धा प्रदर्शन का अवसर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर छिपे अज्ञान को मिटाकर विवेक का दीप जलाने का उत्सव है।
बैगा जनजाति 9 वर्ष बाद प्रकृति को समर्पित रसनवा पर्व मनाती है। मोहती का फूल खिलने पर यह समुदाय 15 दिनों तक विशेष पूजा करता है और एक साथ कुटकी तथा शहद का प्रसाद ग्रहण करता है। यह पर्व बैगा चक क्षेत्र की प्राचीन और जीवन्त परम्परा का हिस्सा है।
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा मान्धाता और उनकी प्रजा ने श्रद्धा तथा पूर्ण निष्ठा के साथ देवशयनी एकादशी का व्रत किया। सभी ने भगवान विष्णु से राज्य और समस्त जीवों के कल्याण की प्रार्थना की। व्रत के पुण्य प्रभाव से राज्य में वर्षा हुई, सूखी नदियाँ और जलाशय फिर भरने…
यह लेख चातुर्मास के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय महत्व पर आधारित है। आत्म-संयम, सात्विक आहार और ध्यान पर आधारित यह प्राचीन परंपरा, आधुनिक जीवनशैली में शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और प्रकृति संरक्षण के लिए आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।
बारसूर का नाम बाणासुर से जुड़ा है या किसी प्राचीन शासक से? 1060 ईस्वी के शिलालेख और छिन्दककालीन नगर-नामकरण परम्परा से जानिए इसका इतिहास।
छत्तीसगढ़ का रहस लोकनाट्य श्रीकृष्ण की लीलाओं, गम्मत, संगीत, अभिनय और मूर्तिकला का अद्भुत समन्वय है। रहसबेड़ा, रासधारी, अलिखित संवाद, परिक्रमा करते वादक और स्थानीय जीवन से जुड़े प्रसंग इसे विशिष्ट बनाते हैं। यह लेख रहस की प्रस्तुति-परम्परा, कलाकारों, मंच-विधान, वेशभूषा और वर्तमान चुनौतियों का विस्तृत परिचय देता है।
तमिलनाडु का उत्तरमेरूर मन्दिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय प्रशासन और शिक्षा का जीवन्त प्रमाण है। 10वीं शताब्दी में यह चोल साम्राज्य का मुख्य केन्द्र था, जहाँ आम नागरिकों को सुशासन, न्याय और चुनाव प्रक्रिया सिखाई जाती थी।
रथयात्रा दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक एकता और सद्भाव का अनूठा प्रतीक है। भगवान जगन्नाथ के मूल स्थान शिवरीनारायण से जुड़ी यह प्राचीन परम्परा लोक आस्था को दर्शाती है। यह ऐतिहासिक पर्व तन्त्र पर वैष्णव मत की विजय का प्रमाण है। आइए इस लेख के माध्यम से विस्तार से चर्चा करते…
यह लेख पुरी के श्री जगन्नाथ मन्दिर के दिव्य इतिहास और मान्यताओं को प्रस्तुत करता है। इसमें 'दारु ब्रह्म' की महिमा, ऐतिहासिक शिलालेखों, नवकलेवर अनुष्ठान और विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा का सुन्दर वर्णन है। यह सन्देश देता है कि भगवान गर्भगृह तक सीमित न रहकर, जनकल्याण हेतु स्वयं भक्तों के बीच…
ओडिशा के पवित्र श्रीक्षेत्र पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मान लेना इसके वास्तविक स्वरूप को सीमित करना होगा; असल में यह भारतीय संस्कृति की उस समावेशी विचारधारा का जीता-जागता प्रमाण है जो सबको साथ लेकर चलती है। प्रस्तुत लेख इसी ऐतिहासिक महापर्व के बहुआयामी स्वरूप पर…
चिदम्बरम का नटराज मन्दिर केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि पंचतत्त्व, चेतना और आत्मबोध का जीवित प्रतीक है। आनी उथिरम की आध्यात्मिक परम्परा के माध्यम से यह लेख पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश के मानव जीवन से सम्बन्ध तथा चिदम्बर रहस्यम के गूढ़ अर्थ को समझाता है।
बैगा समाज में विवाह और बेटी की विदाई के समय गाए जाने वाले बिलमा गीत, बिरहा नृत्य, उसके शब्दार्थ और भावार्थ के बारे में विस्तार से जानिए।
भारतीय संस्कृति में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है। हर माह के दोनों पक्षों की एकादशी को यह पवित्र व्रत रखा जाता है। इन्हीं में से एक 'योगिनी एकादशी' का व्रत भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। आइए, इस लेख के माध्यम से इस व्रत की कथा और इसके माहात्म्य…
यह लेख भारत की भाषाई विविधता और उसके पीछे छिपी गहरी सांस्कृतिक एकता पर प्रकाश डालता है। जानिए कैसे रामायण, महाभारत, भक्ति परम्परा, पर्व और तीर्थयात्राएँ अलग-अलग भाषाओं के बावजूद पूरे भारतीय समाज को एक अटूट सांस्कृतिक सूत्र में पिरोती हैं।
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर का मुख्य आधार लोक कलाएँ हैं। इनमें पंडवानी का स्थान विशिष्ट है। यह महाभारत पर आधारित एक पारम्परिक लोकगाथा है। कलाकार इसके माध्यम से कथा और अभिनय का सीधा प्रदर्शन करके लोक परम्परा को सहेजते हैं।
विष्णु के उस अद्भुत अवतार के बारे में जानिए जिसने नृसिंह के क्रोध को भी शांत कर दिया। गण्डभेरुण्ड की पौराणिक कथा, मूर्तिकला और इतिहास पर आधारित एक विस्तृत शोध।
यह लेख भारतीय नाट्यशास्त्र में वाचिक अभिनय के महत्त्व को सामने लाता है। यह लेख औपनिवेशिक सोच को चुनौती देकर सिद्ध करता है कि संवाद और वाणी ही हमारी प्राचीन कला का मूल आधार हैं। दक्षिण कोसल टुडे इस प्रामाणिक अध्ययन का पूर्ण स्वागत करता है।
यह आलेख सनातन परम्परा में गायत्री मन्त्र की आध्यात्मिक महिमा, वैदिक महत्व और साधना शक्ति को विस्तार से प्रस्तुत करता है। चारों वेदों के सार माने जाने वाले इस महामन्त्र की 24 अक्षरीय संरचना, ऋषियों एवं आधुनिक संतों के विचारों तथा पुष्कर में सम्पन्न 200 कुंडीय विराट गायत्री पुरश्चरण महायज्ञ…
सद्गुरु कबीर साहेब भारतीय संत परंपरा के अद्वितीय युग-दृष्टा संत हैं। यह लेख कबीर पंथ की उत्पत्ति, प्रमुख गद्दियों, गुरु-परंपराओं और दामाखेड़ा, खरसिया, नादिया तथा बुरहानपुर जैसे महत्वपूर्ण केंद्रों के माध्यम से कबीर विचारधारा के विस्तार को सरल रूप में प्रस्तुत करता है।
प्रस्तुत लेख में विल्लुपुरम जिले के एन्नायिरम मन्दिर की विस्तृत पड़ताल की गई है। यह मन्दिर चोल काल में एक प्रमुख विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात था। राजेन्द्र चोल प्रथम के संरक्षण में यहाँ ज्ञान और शोध की जो सुदीर्घ परम्परा विकसित हुई वह आज भी हमें विस्मित करती है।