आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

डॉ.राधाकृष्णन और भारतीय ज्ञान परम्परा

भारतीय ज्ञान परम्परा के विविध, अनुभवपरक, नैतिक और जीवन-केंद्रित स्वरूप को रेखांकित करता यह आलेख डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचारों के माध्यम से शिक्षा, चरित्र, विज्ञान, अध्यात्म, संस्कृति और परिवर्तन के संतुलित भारतीय दृष्टिकोण को सहज रूप में प्रस्तुत करता है।

छत्तीसगढ़ में ‘मानस’-गायन का सांगीतिक वैशिष्ट्य

इस लेख में डॉ. चित्तरंजन कर ने छत्तीसगढ़ में मानस गायन की समृद्ध परम्परा का विश्लेषण किया है। यह अध्ययन श्रीरामचरितमानस के गायन की क्षेत्रीय शैलियों, इसके सामाजिक महत्व और वाद्य यन्त्रों के प्रयोग पर एक गम्भीर और तथ्यपूर्ण दृष्टि डालता है।

रामलीला के संस्थापक गोस्वामी तुलसीदास जी

भारत में रामलीला की परम्परा लोकनाट्य, भक्ति और सांस्कृतिक एकता का अद्भुत संगम है। काशी, चित्रकूट और रामनगर की विविध रामलीलाएँ तुलसीदास की परम्परा, जनसहभागिता और रामकथा के व्यापक सांस्कृतिक प्रभाव को आज भी जीवित रखती हैं।

सवनाही: ग्राम देवी देवता की आराधना और ग्राम सुरक्षा की परंपरा

सवनाही छत्तीसगढ़ की ग्राम सुरक्षा, लोकआस्था और प्रकृति सम्मान से जुड़ी प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा है। इसमें बैगा, सिरहा, राउत और ग्रामीण मिलकर सामूहिक पूजा करते हैं तथा जन, पशुधन, खेती और पूरे गाँव की सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना करते हैं।

मित्रता की लोक परंपराएं

यह लेख छत्तीसगढ़ की प्राचीन 'मितानी' लोक परम्परा पर केन्द्रित है। लेख में मितान बनने की विधियों, इसके विभिन्न प्रकारों, ऐतिहासिक लोक मान्यताओं और समाज में इसके वर्तमान महत्व का तथ्यात्मक विवरण…

लोकजीवन में मितान बदने की परंपरा

आधुनिकता की दौड़ में जब आपसी सम्बन्ध कमजोर हो रहे हैं, ऐसे में इसका प्रभाव मित्रता पर भी पड़ा है। पहले मित्रता दो लोगों के साथ दो परिवारों के बीच भी होती थी। आज यह सम्बन्ध कमजोर हुआ है। ऐसे क्षेत्रों जहां पश्चिमी जगत प्रभाव कम है, वहाँ के गांवों ने हमारी भारतीय संस्कृति…

मुंशी प्रेमचन्द: भाषा, साहित्य और कथाकार

मुंशी प्रेमचन्द का साहित्य केवल कथाओं का संसार नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज के यथार्थ, संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं का जीवन्त स्वरूप है। डॉ. नेहा प्रधान का यह विशेष लेख प्रेमचन्द की भाषा दृष्टि और उनकी सशक्त सामाजिक चेतना का गम्भीर विश्लेषण करता है, जो वर्तमान परिदृश्य में भी…

मातृभाषा, स्वदेशी और नारी-कल्याण: ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी एक युग प्रवर्तक

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के शिक्षा सुधार, स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, मातृभाषा प्रेम और संथाल समाज-सेवा के प्रेरक अभियान पर केंद्रित लेख।

डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम: राष्ट्र निर्माण में विज्ञान और युवाओं की भूमिका

डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने विज्ञान, शिक्षा और युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण का आधार माना। साधारण परिवार से राष्ट्रपति पद तक पहुँचे कलाम ने आत्मनिर्भर भारत, वैज्ञानिक सोच, नवाचार, नैतिकता और विकसित भारत का सपना दिया। उनका जीवन परिश्रम, सादगी, सेवा और राष्ट्रभक्ति की प्रेरक मिसाल है।

डुंगरी भील: प्रकृति और परंपरा का अनूठा संगम

प्रस्तुत लेख में डॉ. रत्ना त्रिवेदी ने भारतीय संस्कृति की मूल एकता को रेखांकित किया है। उन्होंने गुजरात के डुंगरी भील समुदाय के माध्यम से इसे स्पष्ट किया है। यह लेख भील जनजाति की उत्पत्ति, उनके गहन प्रकृति प्रेम, आध्यात्मिक मान्यताओं और 'बाबरी' जैसी अनूठी सामाजिक परंपराओं पर प्रकाश डालता…

भारतीय संस्कृति और भाषाई विविधता

यह लेख भारत की भाषाई विविधता और उसके पीछे छिपी गहरी सांस्कृतिक एकता पर प्रकाश डालता है। जानिए कैसे रामायण, महाभारत, भक्ति परम्परा, पर्व और तीर्थयात्राएँ अलग-अलग भाषाओं के बावजूद पूरे भारतीय समाज को एक अटूट सांस्कृतिक सूत्र में पिरोती हैं।

गुरु हरगोबिंद जी की दो तलवारे: "मीरी-पीरी"अध्यात्म और साहस" का संगम

गुरु हरगोबिंद साहिब ने मीरी और पीरी के सिद्धान्त के माध्यम से सिख पन्थ को भक्ति, शक्ति, न्याय और आत्मरक्षा का नया जीवनदर्शन दिया। यह लेख उनके तेजस्वी जीवन, अकाल तख्त की स्थापना, सन्त-सिपाही परम्परा और बन्दी छोड़ बाबा के प्रेरक प्रसंग के माध्यम से उनकी अमर विरासत को प्रस्तुत…

जो हमारे हृदय में प्रकाशित हैं, वे ही राम हैं!

प्रस्तुत लेख भगवान श्रीराम और रामायण के गूढ़ आध्यात्मिक, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक स्वरूप का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। इसमें राम को आत्मा, सीता को मन, हनुमान को प्राण, लक्ष्मण को चेतना और रावण को अहंकार के प्रतीक रूप में समझाया गया है। यह आलेख बताता है कि रामायण केवल एक…

अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति: वीरांगना रानी दुर्गावती का शौर्य

प्रस्तुत लेख वीरांगना रानी दुर्गावती के अद्वितीय शौर्य, स्वाभिमान और कुशल शासन का प्रेरक वर्णन करता है। इसमें उनके युद्ध कौशल, मुगल सेना के विरुद्ध प्रतिरोध, जल प्रबन्धन, सामाजिक समरसता और मातृभूमि की रक्षा हेतु दिए गए महान बलिदान को रेखांकित किया गया है। रानी दुर्गावती का जीवन भारतीय इतिहास…

गोष्ठिपुरम दिव्यदेशम्: जहाँ आचार्य रामानुज की करुणा ने रचा भक्ति का नया इतिहास

यह लेख तमिलनाडु स्थित गोष्ठिपुरम दिव्यदेशम् की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महिमा को रेखांकित करता है। इसमें आचार्य रामानुज की अट्ठारह यात्राओं, अहंकार-त्याग, गुरु-शिष्य परम्परा और जनकल्याण हेतु मोक्ष मन्त्र को जन-जन तक पहुँचाने की करुणामयी कथा का भावपूर्ण वर्णन किया गया है।

भारतीयता के साकार रूप हैं हमारे राम

यह आलेख छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में भगवान श्रीराम की गहरी उपस्थिति को रेखांकित करता है। जन्म, नामकरण, लोकगीत, अभिवादन, कृषि, विवाह और अंतिम यात्रा तक राम का नाम यहाँ की परम्पराओं, संस्कारों और जनमानस में रचा-बसा हुआ दिखाई देता है।

आधुनिक भारत: युवा पीढ़ी और मानसिक संघर्ष की विकट चुनौतियाँ

यह लेख आधुनिक भारत की युवा पीढ़ी के मानसिक संघर्षों, भावनात्मक शून्यता और संवादहीनता की गंभीर चुनौती को रेखांकित करता है। लेखक ने सामाजिक दबाव, पारिवारिक अपेक्षाओं, बेरोजगारी और एकाकीपन के बीच युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ते संकट को भारतीय लोकपरम्परा, पौराणिक प्रसंगों और मानवीय संवेदना के आधार पर…

रानी लक्ष्मीबाई: स्वाभिमान, संघर्ष और बलिदान की गाथा

प्रस्तुत लेख झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन, शौर्य, त्याग और राष्ट्रभक्ति का प्रेरणादायी चित्रण करता है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, युद्ध-कौशल, झाँसी के अधिकार की रक्षा, दुर्गा दल के गठन और 1857 के स्वाधीनता संग्राम में उनके अदम्य नेतृत्व को रेखांकित किया गया है। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान भारतीय…

स्वाभिमान के अनन्य शिखर: महाराणा प्रताप

प्रस्तुत लेख महाराणा प्रताप के अदम्य साहस, स्वाभिमान, राष्ट्रनिष्ठा और स्वतंत्रता-संकल्प का प्रेरणादायी चित्रण करता है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, सिंहासनारोहण, हल्दीघाटी और दिवेर के युद्ध, भील समाज के सहयोग, चेतक की स्वामीभक्ति तथा भामाशाह के त्याग का वर्णन किया गया है। महाराणा प्रताप का जीवन यह संदेश देता है…

भक्ति और कर्मयोग : सामाजिक सन्तुलन का अटूट सूत्र

यह लेख चेन्नई स्थित तिरुवोट्टियूर के त्यागराजस्वामी मन्दिर की ऐतिहासिक और शैक्षिक भूमिका पर प्रकाश डालता है। चोल काल में यह मन्दिर केवल आस्था का केन्द्र नहीं, बल्कि ओट्रियूर मठ के माध्यम से संचालित एक जीवंत ज्ञान-पीठ था, जहाँ पाणिनीय व्याकरण, वैदिक दर्शन, मीमांसा, आयुर्वेद और शास्त्रार्थ की परम्परा को…

वैश्विक महासंकट और भारतीय ऋषि परम्परा के समाधान

यह लेख महामारी, आपदा और सामाजिक संकटों के संदर्भ में भारतीय ऋषि परम्परा, चरक संहिता, अथर्ववेद और पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित प्राचीन आपदा-प्रबन्धन दृष्टि का विश्लेषण करता है। इसमें बताया गया है कि संकट काल में संयम, एकान्तवास, सामाजिक अनुशासन और शास्त्रीय निर्देश समाज की रक्षा के प्रभावी साधन रहे…

धरती आबा बिरसा मुंडा: जनजातीय अस्मिता और स्वाधीनता के अमर पुरोधा

बिरसा मुंडा भारतीय स्वाधीनता संग्राम के ऐसे अमर जननायक थे, जिन्होंने औपनिवेशिक शासन, जमीन्दारी शोषण और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के विरुद्ध जनजातीय समाज को संगठित किया। उनका उलगुलान केवल विद्रोह नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, अस्मिता और स्वाधीनता की रक्षा का ऐतिहासिक अभियान था।

आठिचूड़ी: तमिल सन्त अव्वैयार के नीति सूत्र और उनका जीवन दर्शन

यह लेख तमिल सन्त कवयित्री अव्वैयार की प्रसिद्ध रचना आठिचूड़ी के नैतिक सूत्रों, जीवन दर्शन और सांस्कृतिक महत्त्व को प्रस्तुत करता है। इसमें सत्य, विनम्रता, दानशीलता, क्रोध नियंत्रण, माता-पिता के सम्मान और चरित्र निर्माण जैसे शाश्वत मूल्यों की सरल व्याख्या की गई है।

रामचरितमानस में पर्यावरणीय संरक्षण : वैदिक ज्ञान और रामराज्य का अद्भुत सन्देश

यह लेख रामचरितमानस में वर्णित रामराज्य के पर्यावरणीय दृष्टिकोण का विश्लेषण करता है। इसमें जल संरक्षण, वृक्षारोपण, वन्यजीवों की निर्भयता, प्रकृति और मानव के सामंजस्य तथा वर्तमान जलवायु संकट के संदर्भ में वैदिक मूल्यों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया है।

मौन का विसर्जन: हेमचन्द्र विक्रमादित्य और २२ विजयों का विस्मृत इतिहास

यह लेख हेमचन्द्र विक्रमादित्य के उपेक्षित ऐतिहासिक व्यक्तित्व, उनकी 22 विजयों, सैन्य रणनीति और दिल्ली पर अधिकार के माध्यम से भारतीय इतिहास के पुनर्पाठ की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इसमें हेमू को केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि असाधारण नेतृत्व और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया…

वनवासी राम

विशाल प्रजापत जी का यह आलेख भगवान श्रीराम के वनवासी स्वरूप, धर्मनिष्ठ आचरण, सामाजिक समरसता और लोककल्याणकारी लीलाओं का प्रेरणादायी विवेचन प्रस्तुत करता है। विराध, कबन्ध, शबरी, केवट, जटायु और सुग्रीव जैसे प्रसंगों के माध्यम से यह लेख बताता है कि श्रीराम का वनवास केवल त्याग की कथा नहीं, बल्कि…

मर्यादा पुरुषोत्तम: आदर्श जीवन का प्रतिमान

यह लेख प्रभु श्रीराम के ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ स्वरूप का प्रेरणादायी विवेचन करता है। इसमें राम के आदर्श पुत्र, शिष्य, भाई, पति, मित्र और लोकनायक रूप के साथ रामराज्य, सामाजिक समरसता, धैर्य, वीरता और आज के समय में राम के जीवन-मूल्यों की प्रासंगिकता को सरल और भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया…

वनवास की पावन यात्रा

यह लेख भगवान श्रीराम के जीवन से नेतृत्व, कर्तव्यनिष्ठा, संकट प्रबंधन, त्याग, सत्यनिष्ठा और लोककल्याण के उन आदर्शों को सामने रखता है, जो आज के समाज, प्रशासन और व्यक्तिगत जीवन के लिए भी अत्यंत प्रेरक और प्रासंगिक हैं।

श्रीराम से पढ़िए नेतृत्व के पाठ

यह लेख श्रीराम के जीवनचरित्र को नेतृत्व, संकट प्रबंधन, त्याग, राजधर्म और संस्थागत सत्यनिष्ठा के कालजयी आदर्श के रूप में प्रस्तुत करता है। डॉ. स्मिता शिने श्रीराम के निर्णयों और आचरण के माध्यम से बताती हैं कि सच्चा नेतृत्व व्यक्तिगत सुख से ऊपर उठकर लोकहित, दायित्वबोध और नैतिक प्रामाणिकता को…

वनवासी प्रभु श्रीराम: त्याग, और मर्यादा के मूर्तिमन्त रूप

यह आलेख प्रभु श्रीराम के वनवास को त्याग, धर्म, मर्यादा और लोकमंगल की अनुपम यात्रा के रूप में प्रस्तुत करता है। अयोध्या से चित्रकूट, पंचवटी और किष्किन्धा तक के प्रसंगों के माध्यम से श्रीराम के आदर्श चरित्र, सीता-लक्ष्मण की निष्ठा, जटायु की भक्ति और हनुमान मिलन की महत्ता का भावपूर्ण…