आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

चैतुरगढ़ की महामाया माई

कलचुरी राजवंश की माता महिषासुरमर्दिनी चैतुरगढ़ में आज महामाया देवी के नाम से पूजनीय है। परंपरागत परिधान से मंदिर में माता अपने परंपरागत परिधान से सुसज्जित हैं, जो 12 भुजी हैं, जो सदैव वस्त्रों से ढके रहते हैं। पूर्वाभिमुख विराजी माता को सूरज की पहली किरण उनके चरण पखारने को…

महानदी तट पर स्थित चंद्रहासिनी देवी

भारत के सम्बन्ध में विद्वानों का मानना है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के नागरिक जिन देवताओं की पूजा-अर्चना करते थे वे आगामी वैदिक सभ्यता में पशुपति और रुद्र कहलाएं तथा वे जिस मातृका की उपासना करते थे वे वैदिक सभ्यता में देवी का आरम्भिक रुप बनी। भारतीय इतिहास गवाह…

सरई वृक्ष में विराजमान सरई श्रृंगारिणी माता

सरई श्रृंगारिणी माता का मंदिर 22•9'82"उत्तरी अक्षांश और 82•32'9" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से लगभग 910 फिट की ऊँचाई पर बलौदा ब्लाक के ग्राम डोंगरी में स्थित है। सरई श्रृंगारिणी डोंगरी में सरई पेड़ में विराजमान है। अंचल के लोगों की सरई श्रृंगारिणी माता के प्रति अपार श्रद्घा और…

रहस्यमयी साधना स्थली को समेटे हुए देवरानी जेठानी मंदिर

शैव और शक्ति साधना का प्राचीनतम मंदिर है देवरानी जेठानी, जहां शैव तंत्र और शाक्त साधना का रहस्यमय स्वरूप एकाकार दिखता है। शिव की दस महाविद्या देवियों में से तारा देवी और धूमावती देवी इन मंदिरों में प्रतिष्ठापित रही हैं। मंदिर अपने आप में अदभुत, अनूठी मूर्तियों के साथ रहस्यमय…

समग्र सृष्टि के रचयिता देव शिल्पी विश्वकर्मा

माघ सुदी त्रयोदशी विश्वकर्मा जयंती पर विशेष आलेख

सृजन एवं निर्माण का के देवता भगवान विश्वकर्मा है, इसके साथ ॠग्वेद के मंत्र दृष्टा ॠषि भगवान विश्वकर्मा भी हैं। ऋग्वेद मे विश्वकर्मा सुक्त के नाम से 11 ऋचाऐं लिखी हुई है। जिनके प्रत्येक मन्त्र पर लिखा है ऋषि विश्वकर्मा भौवन देवता…

पुरातात्विक धरोहर कपिलेश्वर मंदिर समूह बालोद

बालोद, दुर्ग नगर से दल्ली राजहरा मार्ग पर लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बालोद में दल्ली चौक से दायें तरफ लगभग 2 किलोमीटर दूरी पर उत्तरी सीमांत में पुरातत्वीय स्मारकों का एक समूह स्थित है जिसे कपिलेश्वर मंदिर समूह के नाम से जाना जाता है। इस समूह…

नगपुरा का श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ

दुर्ग से 14 किमी दूरी पर स्थित यह स्थल आध्यात्मिक भावभूमि का परिचय देता है। शिवनाथ नदी के पश्चिमी तट पर स्थित नगपुरा में कलचुरि कालीन जैन स्थापत्य कला का इतिहास सजीव होता है। राष्ट्रीय राजमार्ग 6 से लगी हुई दुर्ग-जालबांधा सड़क पर स्थित श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ का प्रवेश…

आदिमानवों की शरणस्थली हितापुंगार घुमर

बस्तर अपनी जनजातीय संस्कृति एवं प्राकृतिक सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है । बस्तर का प्रवेश द्वार केसकाल ही बस्तर की जनजातीय कला एवं संस्कृति, धरोहर के रूप में अनेक प्राचीन भग्नावशेष, कल-कल छल-छल करते झरने एवं जलप्रपात बस्तर की प्राकृतिक एवं पुरातात्विक वैभव का आभास करा देता है।

केसकाल में…

कला एवं संगीत को समर्पित एशिया महाद्वीप का एकमात्र विश्वविद्यालय

रायपुर से 140 कि.मी. एवं डोंगरगढ से 40 कि.मी. की दूरी पर स्थित खैरागढ, इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय के लिए प्रसिध्द है। स्वाधीनता से पूर्व खैरागढ एक रियासत थी। खैरागढ रियासत की राजकुमारी इंदिरा की स्मृति में स्थापित खैरागढ का इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, एशिया महाद्वीप का इकलौता…

गुरु घासीदास की जन्मस्थली गिरौदपुरी

छत्तीसगढ़ को संत महात्माओं की जन्म स्थली कहा जाता है। यहाँ की शस्य श्यामला पावन भूमि में अनेकों संत महात्माओं का जन्म हुआ। उनमें 18 वीं शताब्दी के महान संत सतनाम सम्प्रदाय के प्रणेता, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत गुरु घासीदास का जन्म माघ पूर्णिमा 18 दिसम्बर 1756 को महानदी के…

कबीरपंथियों के आस्था का केन्द्र दामाखेड़ा

छत्तीसगढ़ में कबीरपंथियों की तीर्थ स्थली दामाखेड़ा, रायपुर बिलासपुर मार्ग पर सिमगा से 10 किमी दूरी पर एक छोटा सा ग्राम है। यह कबीरपंथियों की आस्था का सबसे बड़ा केन्द्र माना जाता है। कबीर साहब के सत्य, ज्ञान तथा मानवतावादी सिद्धांतों पर आधारित दामाखेड़ा में कबीर मठ की स्थापना वर्ष…

दक्षिण कोसल के वैष्णव पंथ का प्रमुख नगर शिवरीनारायण

आदिकाल से छत्तीसगढ़ अंचल धार्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। यहाँ अनेक राजवंशों के साथ विविध आयामी संस्कृतियाँ पल्लवित एवं पुष्पित हुई। यह पावन भूमि रामायणकालीन घटनाओं से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध एवं शाक्त पंथों का समन्वय रहा है।

वैष्णव पंथ…

हाथी किला एवं रतनपुर के प्राचीन स्थल

बिलासपुर-कोरबा मुख्यमार्ग पर 25 किमी की दूरी पर प्राचीन नगर रतनपुर स्थित है। पौराणिक ग्रंथ महाभारत, जैमिनी पुराण आदि में इसे राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। त्रिपुरी के कलचुरियों ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर दीर्घकाल तक शासन किया। इसे चतुर्युगी नगरी भी कहा जाता है, जिसका तात्पर्य है…

छत्तीसगढ़ का सीतानदी अभयारण्य

सीतानदी अभयारण्य की स्थापना 1974 में हुई थी एवं इसका क्षेत्रफ़ल 553 .36 वर्ग किमी है। यहाँ की विशेषताओं में 1600 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा, तापमान न्यूनतम 8.5 से अधिकतम 44.5 डिग्री सेल्सियस पर रहता है।

सीतानदी के आधार पर अभयारण्य को सीतानदी नाम दिया गया है। जो कि अभयारण्य में…

फणिनागवंशियों के नगर पचराही का पुरातात्विक वैभव

पचराही, छत्तीसगढ के कबीरधाम जिला मुख्यलय से लगभग 45 कि॰ मी॰ दूर हांप नदी के किनारे मैकल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसा एक छोटा सा गांव है। प्राचीन नाम पंचराहों का अपभंश पचराही से समझा जा सकता है। क्योंकि यहां से पांच राहे निकलती है।

जिनमे रतनपुर, मंडला, सहसपुर…

संतान सुख देने वाली देवी रमईपाट

हमारा छत्तीसगढ़, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की ननिहाल, जो अतीत में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। यहां भगवान श्रीराम से जुड़ी अनेक घटनाएं घटित हुई है। यह पुण्य धरा भगवान श्रीराम से जुड़ी अनेक घटनाओं का साक्षी रही है।

कदम कदम पर बिखरी लोकगाथाओं में रामायण से…

कोरबा की सर्वमंगला माई

कोरबा में हसदेव मंदिर के दाहिने तट पर विराजित माँ सर्वमंगला देवी कोरबा जमींदार परिवार की कुलदेवी है। कोरबा जब कोरवाडीह था, तब यहाँ कोरबा जमींदार के द्वारा राजमहल और सर्वमंगला मंदिर की स्थापना सोलहवीं शताब्दी सन् 1520 ईसवी में दीवान जोगीराय (जोगीदास) जी के द्वारा करवाया गया था।

पहले…

छत्तीसगढ़ पर्यटन के विभिन्न आयाम

पर्यटन दिवस विशेष आलेख

पर्यटन की दृष्टि से हम देखें तो छत्तीसगढ़ प्रकृति की लाडली संतान है। जिस तरह एक माता अपनी संतानों में से किसी एक संतान से विशेष अनुराग एवं स्नेह रखती है, उसी तरह प्रकृति भी छत्तीसगढ़ की धरती से अपना विशेष अनुराग प्रकट करती है। इस…

कोडाखड़का घुमर का अनछुआ सौंदर्य एवं शैलचित्र

बस्तर अपनी नैसर्गिक सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है। केशकाल को बस्तर का प्रवेश द्वार कहा जाता है, यहीं से बस्तर की प्राकृतिक सुन्दरता अपनी झलक दिखा जाती है। बारह मोड़ों वाली घाटी, ऊँचे-ऊँचे साल के वृक्ष, टाटमारी, नलाझर, मांझिनगढ़ और कुएमारी जैसे अनेक मारी (पठार) हैं। मारी में अनेक शैलचित्र…

छत्तीसगढ़ का पर्यटन स्थल : बैताल रानी घाट

प्रकृति जीवन है, हमारा प्राण है। प्राण के बिना हम अपने होने की कल्पना भी नहीं कर सकते। जो प्रकृति के निकट हैं, प्रकृति से जुड़े हुए हैं। वे सुरक्षित हैं। जो प्रकृति से कट गए हैं, या जो दूर हो रहे है, उनका जीवन खतरे में है। इसका प्रत्यक्ष…

उड़न खटोले पर बैठी दक्षिण कोसल की एक प्राचीन प्रेम कथा

तत्कालीन दक्षिण कोसल एवं वर्तमान छत्तीसगढ़ की एक ऐसी अमर प्रेम कथा जो पूरे देश भर में सुनी सुनाई जाती है। कामकंदला की प्रेम गाथा को अपने समय के दिग्गज विद्वानों ने लिखा। लोक गाथाओं में रची बसी माधवनल और कामकंदला की प्रेम कथा जनमानस में आज भी छाई हुई…

एक ऐसा स्थान जहाँ के पत्थर बोलते हैं

भारत में बहुत सारे स्थान ऐसे हैं जहाँ बोलते हुए पत्थर पाये जाते हैं, पत्थरों पर आघात करने से धातु जैसी ध्वनि निकलती है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा का ठिनठिनी पखना हो या कर्णाटक के हम्पी का विट्ठल मंदिर या महानवमी डिबा के पास का हाथी। इन पर चोट करने से…

सरोवरों-तालाबों की प्राचीन संस्कृति एवं समृद्ध परम्परा : छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में तालाबों के साथ अनेक किंवदंतियां जुड़ी हुई है और इनके नामकरण में धार्मिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक बोध होते हैं। प्रदेश की जीवन दायिनी सरोवर लोक कथाओं तथा लोक मंगल से जुड़े हुए हैं। यहा तालाबों की बहुलता के पृष्ठभूमि में प्राकृतिक भू-संरचना, उष्ण-कटिबंधीय जलवायु नगर और ग्रामों का…

छत्तीसगढ़ के इतिहास में नई कड़ियाँ जोड़ता डमरुगढ़

डमरु उत्खनन से जुड़ती है इतिहास की विलुप्त कड़ियाँ छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात राज्य सरकार ने प्रदेश के पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन एवं संरक्षण पर विशेष ध्यान केन्द्रित किया। इसके फ़लस्वरुप सिरपुर, मदकूद्वीप, पचराही में उत्खनन कार्य हुआ तथा तरीघाट, छीता बाड़ी राजिम तथा डमरु में उत्खनन कार्य हुआ…

खरदूषण की नगरी खरोद का पुरातत्वीय वैभव

छत्तीसगढ़ प्रदेश के अन्तर्गत जांजगीर-चांपा जिला मुख्यालय से शिवरीनारायण सड़क मार्ग पर स्थित ग्राम खरोद लगभग 35 कि.मी. दूरी पर स्थित है। बिलासपुर जिला मुख्यालय से खरोद की दूरी लगभग 62 कि.मी. तथा रायपुर से वाया कसडोल शिवरीनारायण होकर खरोद लगभग 140 कि.मी. दूरी पर है। यहां पर पहुंचने के…

जानी अनजानी कथा केशकाल की

छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर अंचल को भारत के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाला रास्ता केशकाल की घाटी से गुजरता है एक तरह से यह घाटी वहाँ की जीवन-रेखा है। यह घाटी अपनी घुमावदार सड़क और प्राकृतिक सुंदरता के लिये जानी जाती है। प्रस्तुत है उसी घाटी की सड़क की छोटी…

लखनपुर में लाख पोखरा : तालाबों की नगरी

आदि मानव के बसेरे हमको नदी-नालों के किनारे ही प्राप्त होते हैं, जिन्हें नदी घाटी सभ्यता का नाम दिया गया है। नदी नालों के समीप बसेरा होने का एकमात्र कारण जल की उपलब्धता है, किसी भी प्राणी के प्राणों के संचालन के लिए जल अत्यावश्यक तत्व है। सभ्यता के विकास…

प्राकृतिक हरितिमा और भौगोलिक सौंदर्य का अतुलनीय संगम : कुआँ धाँस

छत्तीसगढ़ अपनी प्राकृतिक और नैसर्गिक सम्पदा के लिए देश के साथ-साथ पूरे विश्व में जाना जाता है। यहाँ के जंगलों, पहाडों और झरनों की प्रसिद्धि से पयर्टक और प्रकृति प्रेमी चिर परिचित हैं। बस्तर से लेकर सरगुजा और रायगढ़ से लेकर डोंगरगढ़ के ओर-छोर तक यहाँ प्राकृतिक सुषमा बिखरी हुई…

अंधेरे में प्रकाश की किरण: सिरती लिंगी

सनातन की जड़ें बहुत गहरी हैं, ईसाईयों का तथाकथित प्रेम का संदेश एवं औरंगजेबी तलवारें भी इसे नहीं उखाड़ पाई। सदियों की नाकामी के बाद भी इनके प्रयास निरंतर जारी हैं। ऐसे में कोई व्यक्ति इनके सामने सीना तान कर चट्टान की तरह खड़ा हो जाए तो चर्चा का विषय…

केशकाल का भव्य झरना : उमरादाह

प्रकृति की अपार खूबसूरती से भरा बस्तर संभाग अपने अकूत प्राकृतिक सौंदर्य और खनिज संपदा के लिए जाना जाता है। इसी क्रम में अविभाजित बस्तर जिले से मुक्त होकर बने नवीन जिले कोंडागांव में पर्यटन की अपार संभावनाएं है, जिसका सिरमौर केशकाल विकासखंड है।

विगत एक दो वर्षों में चर्चा…