संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार
नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026
यह लेख चेन्नई स्थित तिरुवोट्टियूर के त्यागराजस्वामी मन्दिर की ऐतिहासिक और शैक्षिक भूमिका पर प्रकाश डालता है। चोल काल में यह मन्दिर केवल आस्था का केन्द्र नहीं, बल्कि ओट्रियूर मठ के माध्यम से संचालित एक जीवंत ज्ञान-पीठ था, जहाँ पाणिनीय व्याकरण, वैदिक दर्शन, मीमांसा, आयुर्वेद और शास्त्रार्थ की परम्परा को…
यह लेख हेमचन्द्र विक्रमादित्य के उपेक्षित ऐतिहासिक व्यक्तित्व, उनकी 22 विजयों, सैन्य रणनीति और दिल्ली पर अधिकार के माध्यम से भारतीय इतिहास के पुनर्पाठ की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इसमें हेमू को केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि असाधारण नेतृत्व और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया…
यह लेख छिन्दवाड़ा के गौरवशाली इतिहास, देवगढ़ के गोण्ड राजवंश, उनके स्थापत्य कौशल, जल प्रबन्धन, धार्मिक-सांस्कृतिक समरसता और जननायक बादल भोई के बलिदान को ऐतिहासिक दृष्टि से प्रस्तुत करता है।
यह लेख छत्तीसगढ़ के प्राचीन नगर मल्हार स्थित परमेसरा तालाब की पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करता है। लेखक इसे वाल्मीकि रामायण में वर्णित पंचाप्सर तीर्थ से जोड़ते हुए अचला सप्तमी स्नान, पातालेश्वर महादेव अभिषेक और दक्षिण कोसल की प्राचीन तीर्थ-परंपरा का विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम, भगवान रंगनाथ की राजसी उपासना, श्रीवैष्णव परम्परा, आलवार संतों की भक्ति और भव्य द्रविड़ स्थापत्य का अद्वितीय संगम है। कावेरी तट पर स्थित यह पावन धाम ‘भूलोक वैकुंठ’ के रूप में पूजित है।
भोरमदेव क्षेत्र की मंदिर शिल्पकला में श्रीरामकथा के विविध प्रसंगों का जीवंत अंकन मिलता है। गंडई, घटियारी और सहसपुर के मंदिरों में राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, बालि-सुग्रीव युद्ध और अशोक वाटिका जैसे प्रसंग दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक चेतना और रामभक्ति की प्राचीन परंपरा को प्रमाणित करते हैं।
यह लेख प्राचीन भारतीय मुद्राओं में भगवान श्रीराम के अंकन की शोधपूर्ण पड़ताल करता है। शुंग, कुषाण, चौहान, विजयनगर और मुगल कालीन सिक्कों के उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि श्रीराम भारतीय जनमानस, शासन परम्परा और सांस्कृतिक स्मृति में निरन्तर प्रतिष्ठित रहे हैं।
यह लेख भारत की अपहृत सांस्कृतिक धरोहरों, विशेषकर भोजशाला से सम्बद्ध माँ वाग्देवी सरस्वती की प्रतिमा की पुनर्वापसी की आवश्यकता पर केन्द्रित है। इसमें औपनिवेशिक काल में भारतीय मूर्तियों, पाण्डुलिपियों और पुरातात्त्विक सम्पदाओं की लूट, उनके विदेशों में संग्रहित होने तथा वर्तमान भारत द्वारा सांस्कृतिक धरोहरों की घर वापसी के…
यह लेख विष्णु के अवतारवाद की दार्शनिक और सांस्कृतिक व्याख्या करते हुए सृष्टि के विकास क्रम को मत्स्य से नृसिंह तक क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से नृसिंहावतार के माध्यम से भक्त प्रहलाद की रक्षा, अहंकार के विनाश और दिव्य न्याय के सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया…
डॉ. कामताप्रसाद वर्मा का यह शोधपरक लेख छत्तीसगढ़ की प्राचीन स्थापत्य और मूर्तिकला में अंकित रामकथा के विविध प्रसंगों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है। सिरपुर से लेकर जांजगीर और बस्तर तक विभिन्न मन्दिरों में उकेरे गए शिल्प इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि यहाँ की सांस्कृतिक चेतना में…
तिरुपुल्लाणी स्थित ‘आदि जगन्नाथ पेरुमल मन्दिर’ भगवान श्रीराम के उस दुर्लभ क्रोधित स्वरूप का साक्षी है, जब उन्होंने समुद्र के अहंकार को चुनौती दी थी। यह लेख श्रीराम के प्रेम, संकल्प, शरणागति और करुणा के अद्भुत प्रसंगों को प्रस्तुत करता है, जिसमें रामसेतु निर्माण, विभीषण की शरणागति और ‘दर्भशयनम’ रूप…
उदयपुर के निकट नागदा स्थित सास-बहू मन्दिर की हजार वर्ष पुरानी पाषाण शिल्पकला में रामायण के विविध प्रसंगों का अद्भुत अंकन भारतीय सांस्कृतिक चेतना की अनुपम अभिव्यक्ति है। गुहिलकालीन इस मन्दिर में श्रीराम के वनवास, किष्किन्धा और लंका काण्ड के दृश्य अत्यन्त सूक्ष्मता और सजीवता के साथ उकेरे गए हैं…
अजयमेरु की अजेय पर्वतीय अस्मिता, चौहान-कालीन स्थापत्य की गौरवगाथा, मुगलकालीन परकोटों की सामरिक संरचना तथा राजवंशीय हवेलियों का वैभव—इन सबका समन्वित इतिहास अजमेर की दीर्घ सांस्कृतिक चेतना का दर्पण है। इसके द्वारों और कोठियों में निहित विरासत को जानने हेतु पूर्ण आलेख अवश्य पढ़ें।
गुजरात के मेहसाणा जिले में स्थित मोढेरा का सूर्य मंदिर भारतीय स्थापत्य, खगोल विज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान परंपरा का अद्भुत उदाहरण है। सोलंकी शासक भीम प्रथम द्वारा 11वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर मारू-गुर्जर शैली, सूर्य उपासना, ज्यामितीय संरचना और खगोलीय सटीकता का अनुपम संगम प्रस्तुत करता है। सूर्यकुंड, नृत्यमंडप…
कोणार्क का सूर्य मंदिर प्राचीन भारतीय स्थापत्य, खगोल विज्ञान और आध्यात्मिक दर्शन का अद्वितीय उदाहरण है। रथनुमा संरचना, प्रतीकात्मक पहिए और सूर्य उपासना से जुड़ी यह विश्व धरोहर भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक ऊँचाई को दर्शाती है।
धार स्थित भोजशाला को लेकर चला आ रहा विवाद भारतीय इतिहास, पुरातत्व और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ा है। परमार राजा भोज द्वारा निर्मित सरस्वती मंदिर, ASI के उत्खनन, अभिलेखीय साक्ष्यों और न्यायालयीन सर्वेक्षणों के आधार पर भोजशाला के वास्तविक ऐतिहासिक स्वरूप को समझने का यह प्रयास है।
छत्तीसगढ़ की धरती पर खल्लारी का जगन्नाथ मंदिर केवल उपासना स्थल नहीं, सामाजिक समरसता की जीवित परंपरा है। देवपाल मोची से आरंभ हुई यह गाथा बताती है कि आध्यात्मिक चेतना कैसे समाज को जोड़ती है। पूरी कथा पढ़ने के लिए क्लिक करें।
भोरमदेव के मड़वा महल अभिलेख और फणिनागवंशी इतिहास की अनजानी कड़ियाँ। भोणिंगदेव और महाराजा सतीम जैसे शासकों से जुड़ी अभिलेखीय साक्ष्य, सिक्के और ऐतिहासिक संभावनाएँ इस आलेख में समाहित हैं। छत्तीसगढ़ के मध्यकालीन राजवंशों की गूढ़ परतों को समझने हेतु पूरा लेख अवश्य पढ़ें।
चतुर्युगी नगरी रतनपुर के इतिहास में 'ओगन पाठ देवता' का विशेष स्थान है। अंग्रेजों द्वारा खूंटाघाट निर्माण के समय विस्थापित यह देव अब भैंसाझार मार्ग पर स्थित हैं। किवदंती है कि बैलगाड़ी चालक यहाँ पहियों का 'ओगन' (तेल) चढ़ाते थे, जिससे यात्रा निर्विघ्न होती थी और हाथीपांव जैसे रोग भी…
छत्तीसगढ़ के सिरपुर (प्राचीन श्रीपुर) का इतिहास 6वीं से 8वीं शताब्दी के स्वर्णकाल से जुड़ा है। महानदी के तट पर बसा यह नगर धर्म, शिक्षा, कला, बौद्ध विहारों और अद्वितीय स्थापत्य का प्रमुख केंद्र रहा है। लक्ष्मण मंदिर, सुरंग टीला, आनंद प्रभुकुटी विहार और राजप्रासाद के अवशेष सिरपुर के गौरवशाली…
भारत के जनजातीय समाज को समझने के लिए पुरातात्विक साक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं। नागपुर, हटा और हरियागढ़ जैसे क्षेत्रों में मिले किले, बावड़ियाँ, स्थापत्य, शिल्पकला एवं प्राचीन तकनीकी कौशल यह प्रमाणित करते हैं कि गोंड और धुरवा जैसे समाज न केवल उन्नत नगर-निर्माता थे, बल्कि सुरक्षा, जल-संचार…
मदकू द्वीप छत्तीसगढ़ का एक अद्वितीय धार्मिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहर-स्थल है जहाँ पंचदेव उपासना, कल्चुरी कालीन मंदिरों के अवशेष, शिव–विष्णु संगम परंपरा और दुर्लभ औषधीय वनस्पतियाँ एक साथ मिलकर सनातन संस्कृति का जीवंत स्वरूप प्रस्तुत करती हैं। यह स्थल माण्डुक्य ऋषि, मुण्डकोपनिषद् और “सत्यमेव जयते” की प्राचीन परंपरा से…
रामगढ़ पहाड़ियों में स्थित जोगीमारा और सीताबेंगरा गुफाएँ भारत की प्राचीनतम नाट्यशालाओं के रूप में प्रसिद्ध हैं। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के ये शैल-स्थापत्य मौर्यकालीन कला, रंगमंच, भित्ति चित्रकला तथा ब्राह्मी अभिलेखों के अद्वितीय प्रमाण हैं। सूतनुका–देविदिन्न का प्रेम अभिलेख, प्राकृतिक चट्टानी मंच, दर्शक दीर्घाएँ और रंगमंचीय संरचना इन्हें भारतीय…
भारत के प्राचीनता के प्रमाण आज विश्वपटल पर अंकित है। लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब माना जाता था कि सिकंदर के आक्रमण के पूर्व इस देश का कोई इतिहास था ही नहीं। परंतु वर्ष 1921-22 में इतिहास ने करवट ली और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा सिंधु नदे के…
पचराही, छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले का एक प्राचीन पुरातात्विक स्थल है, जो भोरमदेव क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को उजागर करता है। यहाँ 9वीं से 14वीं शताब्दी के फणिनागवंशीय शासन के साक्ष्य, अभिलेख, मूर्तियाँ, सिक्के और मंदिरों के अवशेष मिले हैं। ब्रिटिश काल से लेकर आधुनिक उत्खनन (2007–09) तक…
मथुरा भारत का एक प्राचीन और बहुआयामी सांस्कृतिक नगर है, जो धार्मिक, ऐतिहासिक और कलात्मक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यह नगर न केवल भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध है, बल्कि बौद्ध, जैन और वैष्णव परंपराओं का भी प्रमुख केन्द्र रहा है। कुषाण काल में मथुरा…
कंबोडिया में भारतीय संस्कृति की छाप गहराई से दिखाई देती है। खमेर साम्राज्य के समय बने अंकोरवाट जैसे भव्य मंदिर दक्षिण भारतीय शैली का प्रतिरूप हैं। हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म, दोनों ही भारत से वहाँ पहुँचे और आज भी सांस्कृतिक संबंध जीवित हैं।
भारतीय संस्कृति में सूर्य उपासना की परंपरा अत्यंत प्राचीन और व्यापक रही है। वेदों, पुराणों और लोक परंपराओं में सूर्य को जीवन और ऊर्जा का स्रोत माना गया है। छत्तीसगढ़ में सूर्य उपासना के असंख्य पुरातात्त्विक, अभिलेखीय और लोकसांस्कृतिक साक्ष्य मिलते हैं—सिंघनपुर के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों से लेकर भोरमदेव, सिरपुर, जांजगीर…
द्वारिका को लेकर अनेक पुरातात्विक उत्खनन हुए हैं। प्रो. एच.डी. सांकलिया ने इसे ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी का माना, जबकि प्रो. एस.आर. राव ने 1400 ईसा पूर्व तक इसका अस्तित्व सिद्ध किया। समुद्र में मिली दीवारें, बुर्ज और व्यापारिक अवशेष द्वारिका के ऐतिहासिक सत्य को प्रमाणित करते हैं।
प्राचीन मथुरा में मित्र और दत्त राजवंशों के बाद शक क्षत्रपों का शासन प्रारम्भ हुआ। महाक्षत्रप रजुबल ने न केवल मथुरा को अपने अधीन किया बल्कि वहाँ के धार्मिक समन्वय को भी अपनाया। मथुरा में भागवत, शैव, शाक्त, जैन और बौद्ध परंपराएँ समान रूप से फल-फूल रही थीं। इसी वातावरण…