आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल अष्टमी | रविवार

नक्षत्र: उत्तराषाढ़ा | योग: सुकर्मा | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 18 अक्टूबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल अष्टमी | रविवार

नक्षत्र: उत्तराषाढ़ा | योग: सुकर्मा | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 18 अक्टूबर 2026

दक्षिण कोसल का वन वैभव : उदंती अभयारण्य

उदंती अभयारण्य वर्ष 1984 में 237.5 वर्ग किमी के क्षेत्रफ़ल में स्थापित किया गया है। छत्तीसगढ़ उड़ीसा से लगे रायपुर-देवभोग मार्ग पर स्थित है। समुद्र सतह से इसकी ऊंचाई 320 से 370 मी है। अभयारण्य का तापमान न्यूनतम 7 सेंटीग्रेड से अधिकतम 40 सेंटीग्रेड रहता है। पश्चिम से पूर्व की…

हाथी किला एवं रतनपुर के प्राचीन स्थल

बिलासपुर-कोरबा मुख्यमार्ग पर 25 किमी की दूरी पर प्राचीन नगर रतनपुर स्थित है। पौराणिक ग्रंथ महाभारत, जैमिनी पुराण आदि में इसे राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। त्रिपुरी के कलचुरियों ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर दीर्घकाल तक शासन किया। इसे चतुर्युगी नगरी भी कहा जाता है, जिसका तात्पर्य है…

छत्तीसगढ़ पर्यटन के विभिन्न आयाम

पर्यटन दिवस विशेष आलेख

पर्यटन की दृष्टि से हम देखें तो छत्तीसगढ़ प्रकृति की लाडली संतान है। जिस तरह एक माता अपनी संतानों में से किसी एक संतान से विशेष अनुराग एवं स्नेह रखती है, उसी तरह प्रकृति भी छत्तीसगढ़ की धरती से अपना विशेष अनुराग प्रकट करती है। इस…

ग्रामीण संस्कृति का अविभाज्य अंग वनवृक्ष साल

वृक्ष हमारी संस्कृति एवं जीवन का अभिन्न अंग है, इनके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जब हम लद्धाख के वृक्ष विहीन पर्वतों एवं भूमि को देखते हैं तो लगता है किसी दूसरे ग्रह पर पहुंच गए, जहां जीवन नहीं है। इन वृक्षों में जीवन का सार…

भारतीय प्राचीन साहित्य में पर्यावरण संरक्षण का महत्व

प्रकृति और मानव का अटूट संबंध सृष्टि के निर्माण के साथ ही चला आ रहा है। धरती सदैव ही समस्त जीव-जन्तुओं का भरण-पोषण करने वाली रही है। 'क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा, पंच रचित अति अधम सरीरा ।' इन पाँच तत्वों से सृष्टि की संरचना हुई है। बिना प्रकृति के…

जैव जगत एवं पुरातत्व का सजीव संग्रहालय : बार नवापारा अभयारण्य

छत्तीसगढ़ के अन्यान्य वनांचलों की ही भांति बारनवापारा को भी एक रहस्यपूर्ण, अलग-थलग, सजीव व सतत् सृजनशील तथा बेदाग हरापन लिए बीहड़ वन क्षेत्र के रूप में सहृदय दर्शक सहज अनुभव करता है। जिस वन्य परिवेश के प्रत्यक्षानुभव प्राप्त करने हेतु छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर से बारनवापारा की यात्रा…

बस्तर की वनवासी संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग : साजा वृक्ष

बस्तर में निवासरत विभिन्न जाति एवं जनजाति के लोग प्रकृति आधारित जीवन-यापन करते है। ये लोग आदिकाल से प्रकृति के सान्निध्य में रहते हुये उसके साथ जीने की कला स्वमेव ही सीख लिए हैं। यहाँ के रहवासियों का मुख्य व्यवसाय वनोपज, लघुवनोपज संग्रहण कर उसे बेच कर आय कमाना है…

कल्प वृक्ष सल्फी से जुड़े बस्तर के वनवासी आर्थिक - सामाजिक सरोकार

बस्तर के ग्रामीण परिवेश में सल्फी का अत्यधिक महत्व है। यह वृक्ष जिस घर में होता है, उस घर का कुछ वर्षो में आर्थिक रूप से  काया कल्प हो जाता है। प्रकृति के साथ सन्तुलन बनाते हुये बस्तर का ग्रामीण इसे सहेजने की कला स्वमेव सीख गया है। इसलिये अपने…

जनजातीय संस्कृति में निहित टोटमवाद और पर्यावरण संरक्षण

भारतीय संस्कृति में वृक्षों की बड़ी महत्ता है। वृक्षों को ‘देव’ माना गया है। हमारी संस्कृति में पीपल, बरगद, नीम, आम, आंवला इत्यादि वृक्ष पूजनीय है, इन्हें ग्राम्य वृक्ष माना गया है। इसी कारण वृक्षों को न ही काटने की परंपरा है न ही जलाने की। आज भी गाँव में…

प्रकृति की अनुपम भेंट कांगेर वैली एवं उसकी अद्भुत गुफ़ाएं

कांगेर वैली राष्ट्रीय उद्यान छत्तीसगढ़ प्रदेश के बस्तर जिले के जिला मुख्यालय जगदलपुर में स्थित है। राष्ट्रीय उद्यान को कांगेर नदी से अपना नाम मिलता है, जो उत्तर-पश्चिम से दक्षिण पूर्व दिशा में केंद्र से बहती है। वर्ष 1982 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के तहत राष्ट्रीय उद्यान अधिसूचित किया…

इतिहास का साक्षी बाम्हनसरा का वट वृक्ष एवं बस्तरहीन देवी

छत्तीसगढ़ स्थित महासमुन्द जिले के अंतिम छोर उड़ीसा सीमा पर राष्ट्रीय राज मार्ग 353 से लगा जनजातीय बाहुल्य ग्राम बाम्हनसरा विकास खण्ड बागबाहरा है। इसके प्राचीन वट वृक्ष ने सैकड़ो वर्षो के इतिहास को संजो रखा है। यह विशाल वट वृक्ष उत्तरी अक्षांश 20°58'21'' पूर्वी देशांश 82°29' 54''पर राष्ट्रीय राजमार्ग…

अमुआ के डाली पे बैठी कोयलिया काली : खास आम

आम लोगों का आम, खास लोगों का आम, आम तो आम ही है पर आम खाने वाले लोग खास ही होते हैं। अब समय है वृक्षों पर आम के पकने का। इससे पहले तो कृत्रिम रुप से पकाए आम बाजारों में भरे पड़े है। पर उनमें वो मजा कहाँ जो…

प्रकृति का अजूबा मंडीप खोल : छत्तीसगढ़

प्रकृति ज्ञान और आनंद का स्रोत है। प्रकृति मनुष्य को सदैव अपनी ओर आकर्षित करती है। प्रकृति के आकर्षण ने मनुष्य की जिज्ञासा व उत्सुकता को हरदम प्रेरित किया है। इसी प्रेरणा के फलस्वरूप मनुष्य प्रकृति के रहस्यों को जान-समझ कर ही ज्ञानवान बना है। प्रकृति के हर उपादान उसे…

प्रकृति का आभूषण कटुमकसा घुमर : बस्तर

पहाड़ियाँ, घाटियाँ, जंगल, पठार, नदियाँ, झरने आदि न जाने कितने प्रकार के गहनों से सजाकर प्रकृति ने बस्तर को खूबसूरत बना दिया है। बस्तर के इन्हीं आभूषणों में से एक है, कटुमकसा घुमर। कुएमारी (पठार) से बहता हुआ एक नाला घोड़ाझर गाँव की सीमा में आता है।

यहाँ एक जलप्रपात…

दक्षिण कोसल की जोंक नदी घाटी सभ्यता एवं जलमार्गी व्यापार

प्राचीनकाल से मानव ने सभ्यता एवं संस्कृति का विकास नदियों की घाटियों में किया तथा यहीं से उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी। नदी घाटियों में प्राचीन मानव के बसाहट के प्रमाण मिलते हैं। कालांतर में नदियों के तटवर्ती क्षेत्र आवागमन की दृष्टि से सुविधाजनक एवं व्यापार के केंद्र बने…

सुरही नदी के तीर देऊर भाना के पुरातात्विक अवशेष

गंडई की सुरही नदी सदानीरा है। बड़ी-बड़ी नदियाँ भीषण गर्मी में सूख जाती हैं, परन्तु सुरही नदी में जल प्रवाह बारहों महीने बना रहता है। सुरही नदी अपने उद्गम बंजारी से लेकर संगम कौहागुड़ी (शिवनाथ नदी) तक अनेकों पुरातातविक स्थलों को अपने आँचल में सेमेटी हुई है। गंडई अंचल अपनी…

प्राकृतिक सुषमा से आच्छादित जिला जशपुर : पर्यटन

पर्यटन की दृष्टि से जशपुर जिला नैसर्गिक वातावरण से समृद्ध है, अगर निस्रर्ग के समीप कुछ दिन व्यतीत करना है तो आप जशपुर का चयन कर सकते हैं। जशपुर में सुंदर पाटों (पठारों) के वन एवं प्राकृतिक झरनों के साथ मंदिर देवाला भी हैं, जो कि पुरातात्विक महत्व के हैं…

बरन-बरन तरु फुले उपवन वन : वसंतोत्सव विशेष

भारतवर्ष मे ऋतु परिवर्तन के साथ त्यौहार मनाने की परंम्परा है। ऋतुओं के विभाजन में बसंत ऋतु का विशेष महत्व है क्योंकि इस ॠतु का सौंदर्य अनुपम एवं छटा निराली होती है। शीत ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ॠतु की आहट की धमक के बीच का काल वसंत काल होता…

सखि वसन्त आया

वसंत के आते ही मौसम ख़ुशगवार हो जाता है, गुलाबी ठंड के साथ चारों ओर रंग बिरगें फ़ूलों की भरमार हो जाती है। खेतों में फ़ूली हुई पीली सरसों की आभा निराली हो जाती है लगता है कि धरती पीत वस्त्र धारण कर नवयौवना सी इठला रही है। रंग बिरंगी…

कलचुरीकालीन छत्तीसगढ़ का एक गढ़ : मोंहदीगढ़

विद्वानों का मत है कि मध्यकाल में कलचुरीकालीन छत्तीसगढ़ों को लेकर छत्तीसगढ़ का नामकरण हुआ। ये गढ़ कलचुरी शासन काल में प्रशासन की महत्वपूर्ण इकाई थे। कालांतर में कलचुरी दो शाखाओं में विभक्त हुए, शिवनाथ नदी के उत्तर में रतनपुर शाखा एवं दक्षिण में रायपुर शाखा का निर्माण हुआ।

मोंहदीगढ़
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सभ्यता एवं लोक संस्कृति संवाहक चित्रोत्पला गंगा महानदी

नदियाँ हमारी धरती को प्रकृति की सबसे बड़ी सौगात हैं। जरा सोचिए! एक नदी के कितने नाम हो सकते हैं? छत्तीसगढ़ और ओड़िशा की जीवन रेखा 885 किलोमीटर की महानदी के भी कई नाम हैं। इसकी महिमा अपरम्पार है। इसके किनारों पर इसका उद्गम वह नहीं है, जिसे आम तौर…

बीरनपाल की झारगयाइन देवी जातरा : बस्तर

बस्तर का आदिवासी समुदाय देवी देवताओं की मान्यतानुसार कार्य करता है, वर्ष में इन देवी देवताओं की आराधना करने के लिए जातरा पर्व का आयोजन विभिन्न परगनों में होता है। एक परगना में परगना में चालिस पचास गांवों का समूह होता है, जो अपने आराध्य देवी-देवता को प्रशन्न करने के…

दक्षिण कोसल के यायावर व्याध : सरगुजा एक अध्ययन

छत्तीसगढ़ प्रदेश प्राकृतिक सुषमा से आच्छादित प्रदेश है, यहाँ के कुल क्षेत्रफ़ल का 43.85% वन हैं, जो सरगुजा से बस्तर तक फ़ैला हुआ है एवं इन वनों भिन्न-भिन्न जनजातियाँ निवास करती हैं। छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियों में माड़िया, मुरिया, दोरला, उरांव, कंवर, बिंझवार, बैगा, भतरा, कमार, हल्बा, सवरा, नागेशिया, मंझवार…

बस्तर का नवाखाई त्यौहार एवं परम्परा

बस्तर अंचल के खेतीहर किसान उदार प्रकृति के प्रति सदैव कृतज्ञ रही है। उनकी संस्कृति में प्रकृति से उपजे उपादानों के लिए, नयी फसल के आने पर उसे ग्रहण करने से पूर्व समारोह पूर्वक कृतज्ञता अर्पण करता है। वैसे तो बस्तर अंचल में बारहों मास प्रकृति से प्राप्त किसी न…

प्रकृति के प्रति प्रेम एवं कृतज्ञता व्यक्त करने का त्यौहार है हरेली

सावन का महीना प्रारंभ होते ही चारों तरफ़ हरियाली छा जाती है। नदी-नाले प्रवाहमान हो जाते हैं तो मेंढकों के टर्राने के लिए डबरा-खोचका भर जाते हैं। जहाँ तक नजर जाए वहाँ तक हरियाली रहती है। आँखों को सुकून मिलता है तो मन-तन भी हरिया जाता है। यही समय होता…

क्या आप जानते हैं तंत्र-मंत्र से गांव कब क्यों और कैसे बांधा जाता है?

सावन माह लगते ही सवनाही तिहार मनाने का समय आ गया। सावन के पहले रविवार से गाँव-गाँव में सवनाही मनाने का कार्य प्रारंभ हो चुका है। इस दौरान ग्रामवासी गाँव एवं खार (खेत) में स्थिति समस्त देवी-देवताओं की आराधना कर उन्हें प्रसन्न करने का यत्न करते हैं, जिससे गाँव में…

बरषा काल मेघ नभ छाए, बीर बहूटी परम सुहाए

मानस में भगवान श्री राम, लक्ष्मण जी से कहते हैं - बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए। ग्रीष्म ॠतु की भयंकर तपन के पश्चात बरसात देवताओं से लेकर मनुष्य एवं चराचर जगत को सुहानी लगती है। वर्षा की पहली फ़ुहार के साथ प्रकृति अंगड़ाई लेती है और…

प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण का पर्व वट सावित्री पूर्णिमा

आदि मानव सभ्यता के विकास के क्रम में ही प्रकृति का महत्व जान गया था, जिसमें नदी, पहाड़, वृक्ष, वन, वायु, अग्नि आकाशादि तत्वों की उसने पहचान कर ली थी और इनका प्रताप भी देख चुका था। इनको उसने देवता माना एवं इनकी तृप्ति का वैज्ञानिक साधन यज्ञ के रुप…

ऐसा स्थान जहाँ जंगली भालू का कुनबा पीने आता है शीतल पेय

मनुष्य के पास वह कला है, जिससे उसने बड़े से बड़े एवं हिंसक पशुओं को भी पालतु बना लिया। पालतु बनाकर उसे अपनी जीविका से भी जोड़ लिया। परन्तु हम एक ऐसे हिंसक प्राणी का जिक्र कर रहे हैं जो अपनी बसाहट में रहने के साथ हिंसक प्रवृत्ति को भूलकर…

पर्यावरण : प्रकृति के सानिध्य ने बचाए कैंसर से प्राण

जिन्दगी कैरमबोर्ड जैसी होती है, बोर्ड पर जमी हुई गोटियाँ मनुष्य के पारिवारिक सपने। जरा भी ठोकर लगी और सपने कैरम की गोटियों की मानिंद बिखर जाते हैं। बिरले ही होते हैं जो जीवन की गोटियों को फ़िर से जमाने की और नया खेल शुरु करने की हिम्मत जुटा पाते…