आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

पुरुषोत्तम मास: भारतीय विज्ञान और अध्यात्म की समृद्ध परम्परा का संगम

रमेश शर्मा जी का यह लेख अधिकमास अथवा पुरुषोत्तम मास के वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आधारों को स्पष्ट करता है। इसमें सूर्य और चंद्रमा की गति के अंतर से अधिकमास के निर्धारण, पुरुषोत्तम मास के धार्मिक महत्व, आरोग्य, आत्मशक्ति जागरण और समाज में सकारात्मक ऊर्जा के संदेश का संतुलित विवेचन…

धर्म ग्रंथों से सीख

यह लेख धर्म ग्रंथों की महत्ता, उनके जीवनदायी मूल्यों और मानव समाज के मार्गदर्शन में उनकी भूमिका को स्पष्ट करता है। वेद, पुराण, उपनिषद और गीता जैसे ग्रंथ न केवल आध्यात्मिक ज्ञान देते हैं, बल्कि वसुधैव कुटुम्बकम्, पर्यावरण संरक्षण, नारी सम्मान और परोपकार जैसे सार्वभौमिक सिद्धांतों के माध्यम से जीवन…

प्राचीन ध्वजों का एक अध्ययन

वैदिक काल से ध्वज राजचिह्नों में सर्वोच्च स्थान रखता था। युद्ध में योद्धाओं की पहचान, सेना का उत्साह और राजगौरव का प्रतीक यही ध्वज था। पताका, ध्वजदंड, चिह्न और अवचूल — इन अंगों से निर्मित ध्वज भारतीय साहित्य और कला दोनों में विस्तार से वर्णित है।

हड़प्पा नहीं, अब सिंधु सरस्वती सभ्यता !

भारत के प्राचीनता के प्रमाण आज विश्वपटल पर अंकित है। लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब माना जाता था कि सिकंदर के आक्रमण के पूर्व इस देश का कोई इतिहास था ही नहीं। परंतु वर्ष 1921-22 में इतिहास ने करवट ली और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा सिंधु नदे के…

पचराही का पुरातात्विक वैभव

पचराही, छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले का एक प्राचीन पुरातात्विक स्थल है, जो भोरमदेव क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को उजागर करता है। यहाँ 9वीं से 14वीं शताब्दी के फणिनागवंशीय शासन के साक्ष्य, अभिलेख, मूर्तियाँ, सिक्के और मंदिरों के अवशेष मिले हैं। ब्रिटिश काल से लेकर आधुनिक उत्खनन (2007–09) तक…

पृथ्वी के गर्भ में छुपी है: प्रथम बुनकरों की कहानी

यह आलेख सिन्धु सभ्यता की समृद्ध वस्त्र परंपरा और प्राचीन भारतीय वेशभूषा के विकास पर केंद्रित है। उत्खननों से प्राप्त पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्ध होता है कि हड़प्पाकालीन समाज कपास, रेशम और संभवतः ऊन जैसी प्राकृतिक वस्त्र सामग्रियों का उत्पादन, कताई, बुनाई, कढ़ाई और रंगाई करना जानता…

प्राचीन गुरुकुल पद्धति और शिक्षा के सरोकार

प्राचीन भारतीय गुरुकुल प्रणाली केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक आधारों पर टिकी थी। यह शिक्षा पद्धति चरित्र निर्माण, व्यावहारिक कौशल और सर्वांगीण विकास पर केंद्रित थी, जिसने भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को सदियों तक अक्षुण्ण रखा।

भारत में शिव पूजा के पुरातात्विक साक्ष्य

यह लेख शिव पूजा की प्राचीनता और उसकी सांस्कृतिक निरंतरता पर केंद्रित है। मिस्त्र और मेसोपोटामिया की तरह भारत भी विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में रहा है, पर भारत की विशिष्टता यह है कि यहाँ की परम्पराएँ आज भी जीवित हैं। ऋग्वेद से लेकर सरस्वती-सिंधु सभ्यता, गुप्तकाल, हूण और शक…

नील की गोदी में सोये मिश्र का भारत से प्राचीन सम्बन्ध

नील नदी की गोद में बसे मिश्र और भारत के प्राचीन व्यापार, संस्कृति व आध्यात्मिक संबंधों की रोचक झलक।

महानदी अपवाह तंत्र की व्यापारिक पथ प्रणाली : शोध पत्र

विश्व में प्राचीन सभ्यताओं का उदय नदियों की घाटी पर हुआ है। आरंभ में आदिम मानव के लिए स्वयं को लंबे समय तक सुरक्षित रख पाना बेहद ही चुनौती पूर्ण था। आदिम मानव का निवास जंगलों में नदी-नालों, झरनों एवं झीलों के आस पास रहा करता था।

राजिमधाम की अधिष्ठात्री देवी माता राजिम

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित राजिम नगर को प्राचीन काल में पद्मावतीपुरी और कमल क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। ईसवी सन की चौथी-पांचवीं सदी में हैहयवंशी राजा जगतपाल के काल में तैलिक वंश की दिव्य नारी पद्मावती के पुण्य स्मरण में नगर का नाम पद्मावतीपुरी पड़ा था।

नील की गोदी में सोये मिश्र का भारत से प्राचीन सम्बन्ध

नील का वरदान प्राचीन मिस्र की सभ्यता की वैज्ञानिक पड़ताल और उसकी सांस्कृतिक विरासत अपेक्षाकृत कई आयामो पर स्तुत्य है। प्राचीन मिस्रवासियों की अनेक उपलब्धियों में उत्खनन, सर्वेक्षण और निर्माण की तकनीक जिसने विशालकाय पिरामिड, मंदिर और ओबिलिस्क के निर्माण, सुनियन्त्रित सिचाई, स्वतंत्र लेखन प्रणाली, गणना विधि, एक व्यावहारिक और…

राम की दक्षिणापथ यात्रा में दक्षिण कोसल

आर्य संस्कृति के दक्षिण में प्रसार के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम की भूमिका सर्वोपरि है। ऋग्वेद में विंध्याचल के आगे क्षेत्रों का कोई उल्लेख नहीं मिलता विंध्य पर्वत से ही उत्तर व दक्षिण भारत को विभाजित किया गया है। राम ने अपने चौदह वर्ष के वनवासी जीवन में दक्षिण क्षेत्र…