आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार

नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार

नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

बैगा समुदाय की परम्परागत"मड़ई"

छत्तीसगढ़ के बैगा चक क्षेत्र में आयोजित मड़ई मेला केवल हाट या उत्सव नहीं, बल्कि बैगा जनजाति की धार्मिक आस्था, सामाजिक परंपराओं और विवाह प्रथाओं का जीवंत केंद्र है। यह मेला देव आराधना, लोकनृत्य, सामूहिक उल्लास और आदिवासी सांस्कृतिक पहचान का अनूठा प्रदर्शन प्रस्तुत करता है।

विश्व प्रसिद्ध नागौर पशु मेला

राजस्थान हमारी भारतीय संस्कृति का वह जीवंत केंद्र है, जहां आज भी भारतीय जीवन दर्शन का मूल दर्शन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यहां होने वाले उत्सव और मेले हमारी परंपरा और भारतीय संस्कृति की चेतना को समेटे हुए है। आइए जानते है, नागौर के विश्व प्रसिद्ध पशु…

रामगढ़ का रामनवमी मेला

कालीदास की तपोभूमि कहे जाने वाले विश्व प्रसिद्ध रामगिरि रामगढ़ पर्वत पर मेला लगने का शुभारंभ कब से हुआ इसका कोई लिखित एतिहासिक प्रमाण तो नहीं मिलता और ना ही कोई चश्मदीद गवाह बाकी है। अपितु अंदाजा लगाया जाता है कि उस जमाने में कल्चुरी राजाओं के बाद के हुक्मरानों…

पीथमपुर धूल पंचमी मेले में शिव बारात

इतिहास इस बात का साक्षी है कि छत्तीसगढ़ की भूमि अनादि काल से ही अपनी परंपरा, समर्पण की भावना, सरलता और कलाओं की विपुलता के कारण सारे देश के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। यहां के लोगों का भोलापन, यहां के शासकों की वचनबद्धता, दानशीलता और प्रकृति के निश्छल…

मड़ई में गाली देने की परम्परा

बस्तर के वनवासी अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों को संजोए हुए होली मनाते हैं, दंतेवाड़ा के माई मंदिर में। छत्तीसगढ़ के बस्तर का दंतेवाड़ा जहां विराजी हैं वनवासियों की आराध्य मां दंतेश्वरी देवी। डंकिनी- शंखिनी नदी संगम के तट पर बसा है दंतेवाड़ा। हर बरस माता के दरबार में होली मनाने आ…

पुन्नी मेला अब पुन: राजिम कुंभ

माघ पूर्णिमा को मेले तो बहुत सारे भरते हैं, परन्तु राजिम मेले का अलग ही महत्व है। राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है, यहाँ पैरी, सोंढूर एवं महानदी मिलकर त्रिवेणी संगम का निर्माण करती हैं। भारतीय संस्कृति में जहाँ तीन नदियों का संगम होता वह स्थान तीर्थ की…

शिवरीनारायण का माघी मेला

महानदी के तट पर स्थित प्राचीन, प्राकृतिक छटा से भरपूर और छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी के नाम से विख्यात् शिवरीनारायण जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से 60 कि. मी., बिलासपुर से 64 कि. मी., कोरबा से 110 कि. मी., रायगढ़ से व्हाया सारंगढ़ 110 कि. मी. और राजधानी रायपुर से व्हाया बलौदाबाजार 140…

राजिम मेला : ऐतिहासिक महत्व एवं संदर्भ

ग्रामीण भारत के सामाजिक जीवन में मेला-मड़ई, संत-समागम का विशेष स्थान रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व जब कृषि और ग्रामीण विकास नहीं हुआ था तब किसान वर्षा ऋतु में कृषि कार्य प्रारम्भ कर बसंत ऋतु के पूर्व समाप्त कर लेते थे। इस दोनों ऋतुओं के बीच के 4 माह में…

लोक का सांस्कृतिक उत्सव: मड़ई

लोक बड़ा उदार होता है। यह उदारता उसके संस्कारों में समाहित रहती है तथा यह उदारता आचार-विचार, रहन-सहन, क्रिया-व्यवहार व तीज-त्यौहार में झलकती है। जो आगे चलकर लोक संस्कृति के रूप में अपनी विराटता को प्रकट करती है। यह विराटता लोक संस्कृतिक उत्सवों में स्पष्ट दिखाई पड़ती है।

छत्तीसगढ़ में…

छत्तीसगढ़ का एक ऐसा वन्यग्राम जहाँ गांधी जी की पुण्यतिथि को प्रतिवर्ष भरता है मेला

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मोहनदास करमचंद गांधी एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके विराट व्यक्तित्व के आगे विश्व का बड़े से बड़ा व्यक्ति भी बौना दिखाई देता है। यह एक करिश्माई व्यक्तित्व था जिसने पूरी दुनिया को सत्य और अहिंसा के पथ पर चलने का पाठ…

कोण्डागाँव का मावली मेला, जहाँ एकत्रित होते हैं देवी-देवता

नारायणपुर मड़ई के पश्चात कोण्डागांव का प्रसिद्ध मावली मेला कल प्रारंभ हुआ, यह मेला होली के एक सप्ताह पूर्व भरता है। फ़ागुन माह में आयोजित होने वाले इस मेले की विशेषता यह है कि यहाँ कई परगनों के देवी देवता इकट्ठे होते हैं। मेले का अर्थ ही सम्मिलन होता है…

छेरछेरा पुन्नी : बच्चों में मनुष्यता जगाने का पर्व

हमारे देश की परम्परा तीज त्यौहारों, उत्सवों, मेलों की है। मनुष्य हमेशा उत्सव में रहना चाहता है, कहा जाए तो हमारी परम्परमा में वर्ष के सभी दिन उत्सवों के हैं। इन्हीं उत्सवों में हम छत्तीसगढ़ में छेरछेरा पुन्नी मनाते हैं। इस त्यौहार में बच्चे बड़े उत्साह से भाग लेते हैं।