संवत् 2082 विक्रमी | चैत्र कृष्ण अष्टमी | बुधवार
नक्षत्र: ज्येष्ठा | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 11 मार्च 2026
यह लेख गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज को समर्पित एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है। इसमें शिवाजी को केवल क्षेत्रीय नायक नहीं, बल्कि अखंड भारत की राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेख विभाजनकारी राजनीति और इतिहास में फैलाए गए मिथ्यावाद की आलोचना करते हुए…
धार स्थित भोजशाला को लेकर चला आ रहा विवाद भारतीय इतिहास, पुरातत्व और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ा है। परमार राजा भोज द्वारा निर्मित सरस्वती मंदिर, ASI के उत्खनन, अभिलेखीय साक्ष्यों और न्यायालयीन सर्वेक्षणों के आधार पर भोजशाला के वास्तविक ऐतिहासिक स्वरूप को समझने का यह प्रयास है।
छत्तीसगढ़ की धरती पर खल्लारी का जगन्नाथ मंदिर केवल उपासना स्थल नहीं, सामाजिक समरसता की जीवित परंपरा है। देवपाल मोची से आरंभ हुई यह गाथा बताती है कि आध्यात्मिक चेतना कैसे समाज को जोड़ती है। पूरी कथा पढ़ने के लिए क्लिक करें।
चतुर्युगी नगरी रतनपुर के इतिहास में 'ओगन पाठ देवता' का विशेष स्थान है। अंग्रेजों द्वारा खूंटाघाट निर्माण के समय विस्थापित यह देव अब भैंसाझार मार्ग पर स्थित हैं। किवदंती है कि बैलगाड़ी चालक यहाँ पहियों का 'ओगन' (तेल) चढ़ाते थे, जिससे यात्रा निर्विघ्न होती थी और हाथीपांव जैसे रोग भी…
अंग्रेजों ने भारत के जनजातीय समाज को “असभ्य” और “पिछड़ा” बताकर जिस दृष्टि से संसार को प्रभावित किया, उसी दृष्टि को हमने भी अपनी मान्यता बना लिया। परिणामस्वरूप वह समाज, जिसे वेदों ने वन्याय नमः कहकर प्रणाम किया, आज संग्रहालय की वस्तु समझा जाने लगा। यह लेख उसी औपनिवेशिक दृष्टि…
जब हम भारत के स्वाधीनता संग्राम की चर्चा करते हैं, तो अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध अपने संघर्ष का ही ब्यौरा देते हैं। इस दौरान हम अपने उस संघर्ष को विस्मृत कर देते हैं, जो हमने 9वीं सदी से 18वीं सदी तक इस्लामी आक्रमणकारियों के विरुद्ध किया था। और अंग्रेजों…
यह आलेख अखंड भारत दिवस (14 अगस्त) और पेशवा बाजीराव प्रथम जयंती (18 अगस्त 1700) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व सामरिक महत्व को जोड़ते हुए प्रस्तुत करता है। इसमें बाजीराव पेशवा की अखंड भारत की भू-सांस्कृतिक अवधारणा, उनकी अद्वितीय युद्धनीति, अविजित सैन्य अभियानों और भारत के व्यापक एकीकरण में उनके योगदान…
संत कबीर न केवल भक्ति आंदोलन के प्रखर दीप थे, बल्कि उन्होंने अपने रामभक्त स्वभाव, निर्भीकता और सत्यनिष्ठा से सिकंदर लोदी जैसे कट्टर शासक को भी पराजित किया। राम को पूर्ण परमात्मा मानने वाले कबीर ने समाज की रूढ़ियों, धर्मांधता और अत्याचार का खुलकर विरोध किया, और अपने जीवन से…
8 जनवरी 1026 को महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला कर भीषण लूट और नरसंहार किया। हजारों श्रद्धालुओं की हत्या हुई और महिलाओं को बंदी बनाकर गुलाम बनाया गया। आज का मंदिर स्वतंत्रता के बाद सरदार पटेल और के.एम. मुंशी के प्रयासों से पुनः निर्मित हुआ।
रानी दुर्गावती एक वीरांगना और कुशल शासिका थीं, जिन्होंने मुगलों से लोहा लेते हुए मातृभूमि की रक्षा में वीरगति पाई। उनका जीवन त्याग, साहस और स्वाभिमान का प्रेरणादायक प्रतीक है।
सिखों के पांचवें गुरु श्री अर्जुन देव साहिब का जन्म वैशाख वदी 7, संवत 1620 तिथि को अमृतसर में हुआ था। जो कि 2024 में 30 अप्रेल के दिन है। इनके पिता सिख धर्म के चौथे गुरु रामदास जी थे। अर्जुन देव जी का धर्म के प्रति समर्पण, निर्मल हृदय…
28 अप्रैल 1740 सुप्रसिद्ध सेनानायक बाजीराव पेशवा का खरगौन में निधन
पिछले डेढ़ हजार वर्षों में पूरे संसार का स्वरूप बदल गया है। 132 देश एक राह पर, 57 देश दूसरी राह पर और अन्य देश भी अपनी अलग-अलग राहों पर हैं। इन सभी देशों उनकी मौलिक संस्कृति के कोई…
17 मार्च 1527 : खानवा के युद्ध में अज्जा झाला का बलिदान
पिछले डेढ़ हजार वर्षों दुनियाँ के दो सौ देशों के स्वरूप और संस्कृति बदल गई। लेकिन विध्वंस की आँधी और विभाजन की त्रासदी के बीच भी भारत की संस्कृति अक्षुण्ण है। यह उन बलिदानियों के कारण संभव हो…
हिन्दू वीर महाराणा प्रताप पुण्यतिथि 19 जनवरी विशेष आलेख
भारतीय इतिहास के एक प्रकाशमान नक्षत्र हैं चित्तौड़ के राणा प्रताप। जो न किसी प्रलोभन से झुके और न किसी बड़े आक्रमण से भयभीत हुये। उन्होंने स्वाधीनता और स्वाभिमान के लिये जीवन भर संघर्ष किया और अकबर को पराजित किया।
मुगल…
17 जनवरी 1601 : मुगलों की लूट का क्रूर रक्त रंजित इतिहास
बचपन की पाठ्यपुस्तकों में मुगल बादशाह अकबर को महान पढ़ा था। उन पुस्तकों में कुछ उदाहरण भी थे। इस कारण अकबर को और समझने की जिज्ञासा सदैव बनी रही। आगे चलकर उनकी महानता की अनेक कहानियाँ भी पढ़ी…
10 जनवरी 1760 दत्ता जी शिन्दे बलिदान
भारतीय स्वतंत्रता का संघर्ष साधारण नहीं है। इसमें असंख्य बलिदान हुये हैं और सबसे बड़ी त्रासदी यह कि बाह्य आक्रमणकारियों की सहायता अनेक स्वदेशी राजाओं और सेनानायकों ने की है। विदेशी आक्रांता यदि भारत में सफल हुये हैं तो स्थानीय लोगों की सहायता…
7 जनवरी 1738 : भोपाल युद्ध और दोराहा संधि
इतिहास के पन्नों में एक ओर आक्रांताओं के क्रूरतम अत्याचार और विध्वंस का वर्णन है तो दूसरी ओर भारतीयों के शौर्य का विवरण भी। भोपाल के समीप हुआ यह एक ऐसा युद्ध था जिसमें मुगल, निजाम हैदराबाद, अवध एवं भोपाल नबाब…
1 जनवरी 1670 : वीर गोकुल सिंह जाट बलिदान दिवस
स्वाधीनता और स्वाभिमान के संघर्ष में असंख्य बलिदान हुये हैं। इतिहास की पुस्तकों में उनका विवरण नगण्य मिलता है। ऐसा ही बलिदान तिलपत में वीर गोकुल सिंह जाट का हुआ। यह बलिदान साधारण नहीं था। बंदी बनाकर ऐसी क्रूरतम मौत…
दिसम्बर माह की 21 से लेकर 27 के बीच गुरु गोविन्द सिंह के चारों पुत्रों को दी गई क्रूरतम यातनाओं और बलिदान की स्मृतियाँ तिथियाँ हैं। ऐसा उदाहरण विश्व के किसी इतिहास में नहीं मिलता। इनमें 26 दिसम्बर के दिन दो अबोध साहबजादों का बलिदान हुआ। ये बलिदान राष्ट्र और…
5 अक्टुबर रानी दुर्गावती जन्म दिवस विशेष
रानी दुर्गावती हमारे देश की वो वीरांगना है, जो अपने राज्य की रक्षा के लिए मुगलों से युद्ध कर वीरगति को प्राप्त हो गई। वे बहुत ही बहादुर और साहसी महिला थीं, जिन्होंने अपने पति की मृत्यु के बाद न केवल उनका राज्य…
सामान्यतः हम रानी दुर्गावती को गोंडवाना की महारानी के रूप में जानते हैं और यह भी जानते हैं कि उन्होंने अकबर के आक्रमण का पुरजोर उत्तर दिया था। वे आसफ खाँ की उस कुटिल रणनीति का शिकार बनीं थीं जो उसने जबलपुर के नरई नाले पर धोखे की जमावट की…
27 सितम्बर 1310 सिवाणा में पहला जौहर
मध्यकाल में हुये भीषण विध्वंस और नरसंहार के बीच रोंगटे खड़े कर देने वाली ऐसी अगणित वीरगाथाएँ हैं जिनमें अपने स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा केलिये क्षत्रियों ने केशरिया बाना धारण कर बलिदान दिया और क्षत्राणियों ने अपनी सखी सहेलियों सहित अग्नि में…
13 अगस्त 1668 - वीर ठाकुर दुर्गादास राठौड़ जन्म दिवस आलेख
निसंदेह भारत में परतंत्रता का अंधकार सबसे लंबा रहा। असाधारण दमन और अत्याचार हुये पर भारतीय मेधा ने दासत्व को कभी स्वीकार नहीं किया। भारत भूमि ने प्रत्येक कालखंड में ऐसे वीरों को जन्म दिया जिन्होंने आक्रांताओं और अनाचारियों…
9 जुलाई 1301 से 11 जुलाई 1301 को रणथंबोर में जौहर
सवाई माधोपुर से लगभग छह मील दूर रणथम्भौर दुर्ग अरावली पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा विकट दुर्ग है। रणथम्भौर का वास्तविक नाम रन्त:पुर है, अर्थात ‘रण की घाटी में स्थित नगर’। इस दुर्ग का निर्माण राजा सज्जन वीर सिंह नागिल…
रानी दुर्गावती पुण्यतिथि विशेष
इतिहास में भारत भूमि पर अनेक वीरांगनाओं ने जन्म लिया तथा अपने कार्यों से इतिहास में अमर हो गई, जिन्हें हम आज भी याद करते हैं। ऐसी ही एक वीरांगना रानी दुर्गावती हैं जिन्होंने अपने राज्य की रक्षा के लिए मुगलों से युद्ध कर वीरगति को…
सल्तनत काल के इतिहास में भारत का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ हमलावरों से अपने स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिये भारतीय नारियों ने अग्नि में प्रवेश न किया हो । फिर कुछ ऐसे जौहर हैं जिनकी गाथा से आज भी रोंगटे खड़े होते हैं। ऐसा ही एक जौहर…
पिछले डेढ़ हजार वर्षों में पूरे संसार का स्वरूप बदल गया है । 132 देश एक राह पर, 57 देश दूसरी राह पर और अन्य देश भी अपनी अलग-अलग राहों पर हैं। इन सभी देशों उनकी मौलिक संस्कृति के कोई चिन्ह शेष नहीं किंतु हजार आक्रमणों के बाद यदि भारत…
चिरमिरी बरतुंगा कालरी में प्राचीन देवालय के अवशेष स्थित हैं। भग्नावशेषों में यहाँ बहुत सारे सती स्तंभ हैं, जो इस क्षेत्र में फ़ैले हुए हैं। यहाँ नवरात्रि में जातीय एवं जनजातीय समाज के लोग सती माता की आराधना एवं उपासना करते हैं। प्राचीन सती मंदिर बरतुंगा चैत्र नवरात्र के दिनों…