आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार

नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार

नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम: राष्ट्र निर्माण में विज्ञान और युवाओं की भूमिका

डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने विज्ञान, शिक्षा और युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण का आधार माना। साधारण परिवार से राष्ट्रपति पद तक पहुँचे कलाम ने आत्मनिर्भर भारत, वैज्ञानिक सोच, नवाचार, नैतिकता और विकसित भारत का सपना दिया। उनका जीवन परिश्रम, सादगी, सेवा और राष्ट्रभक्ति की प्रेरक मिसाल है।

जो हमारे हृदय में प्रकाशित हैं, वे ही राम हैं!

प्रस्तुत लेख भगवान श्रीराम और रामायण के गूढ़ आध्यात्मिक, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक स्वरूप का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। इसमें राम को आत्मा, सीता को मन, हनुमान को प्राण, लक्ष्मण को चेतना और रावण को अहंकार के प्रतीक रूप में समझाया गया है। यह आलेख बताता है कि रामायण केवल एक…

अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति: वीरांगना रानी दुर्गावती का शौर्य

प्रस्तुत लेख वीरांगना रानी दुर्गावती के अद्वितीय शौर्य, स्वाभिमान और कुशल शासन का प्रेरक वर्णन करता है। इसमें उनके युद्ध कौशल, मुगल सेना के विरुद्ध प्रतिरोध, जल प्रबन्धन, सामाजिक समरसता और मातृभूमि की रक्षा हेतु दिए गए महान बलिदान को रेखांकित किया गया है। रानी दुर्गावती का जीवन भारतीय इतिहास…

गोष्ठिपुरम दिव्यदेशम्: जहाँ आचार्य रामानुज की करुणा ने रचा भक्ति का नया इतिहास

यह लेख तमिलनाडु स्थित गोष्ठिपुरम दिव्यदेशम् की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महिमा को रेखांकित करता है। इसमें आचार्य रामानुज की अट्ठारह यात्राओं, अहंकार-त्याग, गुरु-शिष्य परम्परा और जनकल्याण हेतु मोक्ष मन्त्र को जन-जन तक पहुँचाने की करुणामयी कथा का भावपूर्ण वर्णन किया गया है।

भारतीयता के साकार रूप हैं हमारे राम

यह आलेख छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में भगवान श्रीराम की गहरी उपस्थिति को रेखांकित करता है। जन्म, नामकरण, लोकगीत, अभिवादन, कृषि, विवाह और अंतिम यात्रा तक राम का नाम यहाँ की परम्पराओं, संस्कारों और जनमानस में रचा-बसा हुआ दिखाई देता है।

रानी लक्ष्मीबाई: स्वाभिमान, संघर्ष और बलिदान की गाथा

प्रस्तुत लेख झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन, शौर्य, त्याग और राष्ट्रभक्ति का प्रेरणादायी चित्रण करता है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, युद्ध-कौशल, झाँसी के अधिकार की रक्षा, दुर्गा दल के गठन और 1857 के स्वाधीनता संग्राम में उनके अदम्य नेतृत्व को रेखांकित किया गया है। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान भारतीय…

स्वाभिमान के अनन्य शिखर: महाराणा प्रताप

प्रस्तुत लेख महाराणा प्रताप के अदम्य साहस, स्वाभिमान, राष्ट्रनिष्ठा और स्वतंत्रता-संकल्प का प्रेरणादायी चित्रण करता है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, सिंहासनारोहण, हल्दीघाटी और दिवेर के युद्ध, भील समाज के सहयोग, चेतक की स्वामीभक्ति तथा भामाशाह के त्याग का वर्णन किया गया है। महाराणा प्रताप का जीवन यह संदेश देता है…

भक्ति और कर्मयोग : सामाजिक सन्तुलन का अटूट सूत्र

यह लेख चेन्नई स्थित तिरुवोट्टियूर के त्यागराजस्वामी मन्दिर की ऐतिहासिक और शैक्षिक भूमिका पर प्रकाश डालता है। चोल काल में यह मन्दिर केवल आस्था का केन्द्र नहीं, बल्कि ओट्रियूर मठ के माध्यम से संचालित एक जीवंत ज्ञान-पीठ था, जहाँ पाणिनीय व्याकरण, वैदिक दर्शन, मीमांसा, आयुर्वेद और शास्त्रार्थ की परम्परा को…

धरती आबा बिरसा मुंडा: जनजातीय अस्मिता और स्वाधीनता के अमर पुरोधा

बिरसा मुंडा भारतीय स्वाधीनता संग्राम के ऐसे अमर जननायक थे, जिन्होंने औपनिवेशिक शासन, जमीन्दारी शोषण और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के विरुद्ध जनजातीय समाज को संगठित किया। उनका उलगुलान केवल विद्रोह नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, अस्मिता और स्वाधीनता की रक्षा का ऐतिहासिक अभियान था।

आठिचूड़ी: तमिल सन्त अव्वैयार के नीति सूत्र और उनका जीवन दर्शन

यह लेख तमिल सन्त कवयित्री अव्वैयार की प्रसिद्ध रचना आठिचूड़ी के नैतिक सूत्रों, जीवन दर्शन और सांस्कृतिक महत्त्व को प्रस्तुत करता है। इसमें सत्य, विनम्रता, दानशीलता, क्रोध नियंत्रण, माता-पिता के सम्मान और चरित्र निर्माण जैसे शाश्वत मूल्यों की सरल व्याख्या की गई है।

रामचरितमानस में पर्यावरणीय संरक्षण : वैदिक ज्ञान और रामराज्य का अद्भुत सन्देश

यह लेख रामचरितमानस में वर्णित रामराज्य के पर्यावरणीय दृष्टिकोण का विश्लेषण करता है। इसमें जल संरक्षण, वृक्षारोपण, वन्यजीवों की निर्भयता, प्रकृति और मानव के सामंजस्य तथा वर्तमान जलवायु संकट के संदर्भ में वैदिक मूल्यों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया है।

मौन का विसर्जन: हेमचन्द्र विक्रमादित्य और २२ विजयों का विस्मृत इतिहास

यह लेख हेमचन्द्र विक्रमादित्य के उपेक्षित ऐतिहासिक व्यक्तित्व, उनकी 22 विजयों, सैन्य रणनीति और दिल्ली पर अधिकार के माध्यम से भारतीय इतिहास के पुनर्पाठ की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इसमें हेमू को केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि असाधारण नेतृत्व और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया…

वनवासी राम

विशाल प्रजापत जी का यह आलेख भगवान श्रीराम के वनवासी स्वरूप, धर्मनिष्ठ आचरण, सामाजिक समरसता और लोककल्याणकारी लीलाओं का प्रेरणादायी विवेचन प्रस्तुत करता है। विराध, कबन्ध, शबरी, केवट, जटायु और सुग्रीव जैसे प्रसंगों के माध्यम से यह लेख बताता है कि श्रीराम का वनवास केवल त्याग की कथा नहीं, बल्कि…

मर्यादा पुरुषोत्तम: आदर्श जीवन का प्रतिमान

यह लेख प्रभु श्रीराम के ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ स्वरूप का प्रेरणादायी विवेचन करता है। इसमें राम के आदर्श पुत्र, शिष्य, भाई, पति, मित्र और लोकनायक रूप के साथ रामराज्य, सामाजिक समरसता, धैर्य, वीरता और आज के समय में राम के जीवन-मूल्यों की प्रासंगिकता को सरल और भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया…

वनवास की पावन यात्रा

यह लेख भगवान श्रीराम के जीवन से नेतृत्व, कर्तव्यनिष्ठा, संकट प्रबंधन, त्याग, सत्यनिष्ठा और लोककल्याण के उन आदर्शों को सामने रखता है, जो आज के समाज, प्रशासन और व्यक्तिगत जीवन के लिए भी अत्यंत प्रेरक और प्रासंगिक हैं।

श्रीराम से पढ़िए नेतृत्व के पाठ

यह लेख श्रीराम के जीवनचरित्र को नेतृत्व, संकट प्रबंधन, त्याग, राजधर्म और संस्थागत सत्यनिष्ठा के कालजयी आदर्श के रूप में प्रस्तुत करता है। डॉ. स्मिता शिने श्रीराम के निर्णयों और आचरण के माध्यम से बताती हैं कि सच्चा नेतृत्व व्यक्तिगत सुख से ऊपर उठकर लोकहित, दायित्वबोध और नैतिक प्रामाणिकता को…

वनवासी प्रभु श्रीराम: त्याग, और मर्यादा के मूर्तिमन्त रूप

यह आलेख प्रभु श्रीराम के वनवास को त्याग, धर्म, मर्यादा और लोकमंगल की अनुपम यात्रा के रूप में प्रस्तुत करता है। अयोध्या से चित्रकूट, पंचवटी और किष्किन्धा तक के प्रसंगों के माध्यम से श्रीराम के आदर्श चरित्र, सीता-लक्ष्मण की निष्ठा, जटायु की भक्ति और हनुमान मिलन की महत्ता का भावपूर्ण…

जनमानस के राम

यह लेख श्रीराम के उस विराट स्वरूप का गम्भीर विवेचन प्रस्तुत करता है, जिसने उन्हें केवल एक देवता नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस की आत्मा बना दिया। वाल्मीकि रामायण, श्रीरामचरितमानस, लोककला, भजन और गीत रामायण जैसे विविध सांस्कृतिक स्रोतों के माध्यम से लेखक ने बताया है कि श्रीराम किस प्रकार भारतीय…

प्रासंगिक कथावस्तुओं में सुन्दरकाण्ड

श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड की उस विशिष्ट साहित्यिक संरचना का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान श्रीराम को पृष्ठभूमि में रखकर हनुमान को सम्पूर्ण कथा का मुख्य नायक बना दिया है। डॉ. पी. आर. कोसरिया जी ने हनुमान के बुद्धि-कौशल, स्वामीभक्ति, पराक्रम और स्वतन्त्र नायकत्व का…

सरगुजा अंचल के पारम्परिक लोकगीतों में रामकथा

सरगुजा अंचल के पारम्परिक लोकगीतों में रामकथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि जनजातीय जीवन, लोकस्मृतियों और सांस्कृतिक आस्था का जीवंत स्वरूप बनकर उपस्थित होती है। यह लेख उरांव, गोंड, कोडाकू और कंवर जैसी जनजातियों के लोकगीतों में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण से जुड़े प्रसंगों का अत्यन्त भावपूर्ण और शोधपरक…

नीति, न्याय, नेतृत्व और श्रीराम

यह लेख भगवान श्रीराम के दिव्य एवं मानवीय चरित्र का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें उनके अवतार के ब्रह्मांडीय उद्देश्य से लेकर आदर्श आचरण, मर्यादा, धैर्य और न्याय के सिद्धांतों को समझाया गया है। रामायण को जीवन मार्गदर्शक मानते हुए यह लेख आधुनिक समाज के लिए राम के आदर्शों…

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में राम

यह लेख भगवान श्रीराम के मानवीय और लोकनिष्ठ स्वरूप को उजागर करता है, जिसमें दक्षिण कोसल के ‘भांचा राम’, रामनामी सम्प्रदाय की निर्गुण भक्ति और भक्ति आन्दोलन की परंपरा के माध्यम से यह बताया गया है कि किस प्रकार ईश्वर लोकजीवन में रच-बसकर जनमानस का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं।

भजन, रामलीला और लोकगीतों में राम

भारतीय लोकजीवन में भगवान श्रीराम केवल आराध्य देव नहीं, बल्कि संस्कृति, नैतिकता और लोकआस्था के जीवंत प्रतीक हैं। यह लेख भजन, रामलीला और लोकगीतों के माध्यम से भारतीय समाज में रामकथा की अखंड परम्परा और श्रीराम के आदर्शों की शाश्वत उपस्थिति को अत्यन्त भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।

अवसाद और मानसिक अस्थिरता के कालखण्ड में : युवाओं के समक्ष स्थितप्रज्ञ राम का आदर्श

यह लेख आधुनिक युवा पीढ़ी के मानसिक अवसाद, अस्थिरता और दिशाहीनता के संदर्भ में भगवान श्रीराम के ‘स्थितप्रज्ञ’ व्यक्तित्व का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लेखक ने रामायण के प्रसंगों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, आत्मसंयम, कर्मयोग और दायित्वबोध किस प्रकार जीवन को…

विश्व के कबीर पंथियों का संत समागम

छत्तीसगढ़ की धर्मनगरी दामाखेड़ा में आयोजित कबीर पंथियों का संत समागम आध्यात्मिकता, परंपरा और सांस्कृतिक एकता का अद्वितीय संगम है। वसंत पंचमी से माघ पूर्णिमा तक चलने वाले इस आयोजन में विश्वभर से संत और अनुयायी एकत्र होकर कबीर वाणी, सत्यनाम और साधना की परंपरा को जीवंत करते हैं। यह…

बलिदान दिवस : वीर हरिसिंह नलवा

यह लेख महाराजा रणजीत सिंह के विश्वस्त सेनानायक सरदार हरि सिंह नलवा के जीवन, युद्ध-कौशल, कश्मीर-पेशावर विजय, जमरुद के बलिदान और उनके निर्माण कार्यों का प्रेरक वर्णन करता है।

जहाँ भक्ति बनी प्रेम की भाषा

यह लेख रामायण के ‘प्रेम पक्ष’ को विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से उजागर करता है, जहाँ प्रेम केवल आकर्षण नहीं बल्कि त्याग, समर्पण और कर्तव्य का उच्चतम रूप बन जाता है। श्रीराम-सीता, भरत, उर्मिला और हनुमान जैसे पात्रों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि रामायण में भक्ति ही…

छत्तीसगढ़ की स्थापत्यकला में रामकथा

डॉ. कामताप्रसाद वर्मा का यह शोधपरक लेख छत्तीसगढ़ की प्राचीन स्थापत्य और मूर्तिकला में अंकित रामकथा के विविध प्रसंगों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है। सिरपुर से लेकर जांजगीर और बस्तर तक विभिन्न मन्दिरों में उकेरे गए शिल्प इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि यहाँ की सांस्कृतिक चेतना में…

सूर्योदय से सूर्यास्त व जन्म से मृत्यु तक सर्वव्यापी राम

यह लेख छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरम्पराओं और जनजीवन के विविध आयामों के माध्यम से भगवान श्रीराम की सर्वव्यापकता को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है। जन्म से मृत्यु तक, अभिवादन से संस्कारों तक और लोकगीतों से आस्था तक, यहाँ जीवन का प्रत्येक क्षण राममय है।

शास्त्र और शस्त्र के अनुपम संगम परशुराम

भगवान परशुराम का जीवन केवल एक योद्धा की गाथा नहीं, बल्कि ज्ञान, तप और धर्म की रक्षा का अद्वितीय संगम है। इस लेख में उनके जन्म, शिक्षा, संघर्ष और दुष्टों के विनाश के माध्यम से यह बताया गया है कि शक्ति और ज्ञान का संतुलन ही धर्म की स्थापना का…