आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख कृष्ण द्वादशी | गुरुवार

नक्षत्र: रेवती | योग: प्रीति | करण: तैतिल

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 मई 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख कृष्ण द्वादशी | गुरुवार

नक्षत्र: रेवती | योग: प्रीति | करण: तैतिल

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 मई 2026

सरगुजा अंचल के पारम्परिक लोकगीतों में रामकथा

सरगुजा अंचल के पारम्परिक लोकगीतों में रामकथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि जनजातीय जीवन, लोकस्मृतियों और सांस्कृतिक आस्था का जीवंत स्वरूप बनकर उपस्थित होती है। यह लेख उरांव, गोंड, कोडाकू और कंवर जैसी जनजातियों के लोकगीतों में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण से जुड़े प्रसंगों का अत्यन्त भावपूर्ण और शोधपरक…

बुन्देली चित्रकला

बुन्देलखण्ड की लोक चित्रकला सामाजिक, आध्यात्मिक एवं धार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। चौक पूरना, अल्पना, भित्ति चित्र, थापे, मेहंदी आदि उपविधाओं में दर्शन, संस्कृति एवं लोक जीवन के मूल्य समाहित हैं।

पंडवानी के महारानी तीजन जैसन न कोनो होइस न कभू होही

पंडवानी छत्तीसगढ़ के अनोखा एकल नाट्य-गायन कला आय, जेन मं गायन, अभिनय, संगीत अऊ कथावाचन के जबर संगम रहिथे। ए कला देवार अऊ पारधी जाति के पारंपरिक गायन ले विकसित होके दुनिया भर मं पहिचान पाय हवे। पंडवानी मं महाभारत के कथा, खास करके भीम के प्रसंग, छत्तीसगढ़ी लोक रंग…

खैरागढ़ – एशिया का प्रथम संगीत विश्वविद्यालय

खैरागढ़, छत्तीसगढ़ का नवगठित जिला होते हुए भी एशिया के प्रथम संगीत विश्वविद्यालय के कारण वैश्विक पहचान रखता है। 1956 में राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और महारानी पद्मावती देवी ने अपनी पुत्री इंदिरा की स्मृति में इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना की, जहाँ संगीत, नृत्य और ललित कलाओं…

ललितकला की नाट्यविधा को समेटे सीताबेंगरा और जोगीमारा की गुफाएं

रामगढ़ पहाड़ियों में स्थित जोगीमारा और सीताबेंगरा गुफाएँ भारत की प्राचीनतम नाट्यशालाओं के रूप में प्रसिद्ध हैं। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के ये शैल-स्थापत्य मौर्यकालीन कला, रंगमंच, भित्ति चित्रकला तथा ब्राह्मी अभिलेखों के अद्वितीय प्रमाण हैं। सूतनुका–देविदिन्न का प्रेम अभिलेख, प्राकृतिक चट्टानी मंच, दर्शक दीर्घाएँ और रंगमंचीय संरचना इन्हें भारतीय…

ढोकरा शिल्पकला – कठोर धातु से जीवन के सौम्य भावों को उकेरता जनजातीय समाज

ढोकरा कला भारत की प्राचीन लॉस्ट वैक्स तकनीक पर आधारित एक अद्भुत जनजातीय शिल्प परंपरा है, जिसने विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर और कोंडागांव को वैश्विक पहचान दिलाई। चार हजार वर्ष पुरानी यह कला आज भी जनजातीय समाज के धैर्य, सौंदर्यबोध और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखती है।

भारतीय चित्रकला: प्रागैतिहासिक धरोहर से आधुनिक संवेदना तक

यह आलेख भारतीय जनजातीय कला की उद्भव-यात्रा को प्रागैतिहासिक काल से वर्तमान तक विश्लेषित करता है। मानव जीवन और प्रकृति के अद्वैत संबंध से जन्मी यह कला आरंभ में शैलचित्रों के रूप में उभरी, जो न केवल उस युग की सांस्कृतिक धड़कन थे, बल्कि सभ्यता के विकास के मौन साक्षी…

छत्तीसगढ़ी फाग गीत

यह आलेख छत्तीसगढ़ी फाग गीतों की परंपरा, स्वरूप और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालता है। इसमें ऋतुचक्र, फसलचक्र और वसंतोत्सव के साथ जुड़े फाग गीतों की सामाजिक-धार्मिक अभिव्यक्ति का विवेचन है। राधा-कृष्ण की लीलाएँ, रामकथा प्रसंग, आल्हा गायन और देवर-भाभी संवाद तक, फाग गीत ग्रामीण लोकजीवन, भक्ति और उत्सवधर्मी संस्कृति…

आत्मिक अलंकार- गोदना

गोदना केवल अलंकरण नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की आत्मा से जुड़ी प्राचीन कला परंपरा है। यह सौंदर्य, पहचान, आस्था और उपचार—चारों आयामों को समेटे हुए पीढ़ियों से जनजातीय जीवन में रची-बसी है। शरीर पर उकेरे गए ये चिन्ह संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिकता का अनोखा संगम प्रस्तुत करते हैं।

लोकगाथा भरथरी

भरथरी भारतीय लोकगाथाओं और हिन्दी साहित्य के आदिकालीन संत-कवियों में प्रमुख माने जाते हैं। उनकी कथाएँ और पद्य लोकसाहित्य में गहरी पैठ बनाए हुए हैं। गृहस्थ जीवन से विरक्ति, पत्नी पिंगला और सामदेई से जुड़ी किंवदंतियाँ, तथा योगमार्ग की ओर उनका रुझान उन्हें जनमानस में अमर बनाता है। भरथरी की…

कृष्ण का विश्वरूप: माध्यम -चित्रकला

भारतीय चित्रकला में विश्वरूप’ लेख में नीना रंजन जी ने गीता के विश्वरूप दर्शन की दार्शनिक और कलात्मक व्याख्या प्रस्तुत की है। इसमें कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिखाए गए विराट स्वरूप के ऐतिहासिक, धार्मिक और सौंदर्यपरक पहलुओं को भारतीय चित्रकला के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया है। लेख…

कठपुतलियों की ऐतिहासिकता

कठपुतली कला भारत की प्राचीन लोककलाओं में से एक है, जिसका उल्लेख महाभारत, रामायण और पंचतंत्र जैसे ग्रंथों तक में मिलता है। लोककथाओं के अनुसार इसका उद्भव शिव-पार्वती से जुड़ा है, वहीं राजस्थान को इसका प्रमुख जन्मस्थल माना जाता है। धागा, छड़, छाया और दस्ताने जैसी विविध पद्धतियों में पाई…

शिवलिंग की प्रतीकात्मकता

शिवलिंग केवल पूजा का प्रतीक नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का द्योतक है। संस्कृत में "लिंग" का अर्थ चिह्न है और शिवलिंग शिव के अनंत स्वरूप का प्रतीक माना गया है। शिव पुराण में इसे ज्योतिर्लिंग कथा से जोड़ा गया है, जहाँ शिव ने स्वयं को विराट स्तम्भ के रूप में…

ब्रज के प्रमुख लोकवाद्य

ब्रजभूमि श्रीकृष्ण की वंशी और राधा-ब्रजांगनाओं के मंजीरों से झंकृत लोकसंगीत की पवित्र भूमि है। यहां भजन, रसिया, मल्हार, धमार, बरना, देवी-गीत आदि विविध लोकगीतों में ढोलक, मंजीरा, खड़ताल, झालरि, बांसुरी, नगाड़ा, डफ, चंग और शहनाई जैसे लोकवाद्य संगति देते हैं। ब्रज के संगीत में गीत, नृत्य और वाद्य का…

गुजरात की काष्ठ कला

काष्ठ कला का इतिहास अत्यंत प्राचीन है, जिसके प्रमाण वैदिक काल, हड़प्पा सभ्यता और मौर्यकाल तक मिलते हैं। विश्व स्तर पर मिस्र, ग्रीस, रोम और पारस में काष्ठ कला का विकास हुआ, वहीं भारत में मौर्यकालीन पाटलिपुत्र, अजन्ता-भाजा-कर्ले की गुफाओं और गुजरात की हवेलियों व मंदिरों में इसके उत्कृष्ठ नमूने…

लद्दाख का सांस्कृतिक महत्त्व

यह आलेख लद्दाख की समृद्ध बौद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहरों, धार्मिक प्रतीकों, नृत्य-गीतों और सामाजिक जीवन पर केंद्रित है। स्तूप, "ॐ मणि पद्मे हूं" जैसे मंत्र, गोम्पा, तांत्रिक परंपरा और पारंपरिक लोकनृत्य लद्दाख की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं। लेख में सम्राट अशोक से लेकर महायान परंपरा, तिब्बती प्रभाव और आधुनिक…

भारतीय संस्कृति का स्वरूप

यह आलेख भारतीय संस्कृति की समृद्ध यात्रा, उसकी कलात्मक, दार्शनिक और सामाजिक विशेषताओं का व्यापक वर्णन करता है। इसमें प्राचीन भारत की मूर्तिकला, चित्रकला, नाट्यकला, नृत्यकला, शिक्षा, दर्शन और जीवन मूल्यों से लेकर वर्तमान समय में संस्कृति पर पड़ते पाश्चात्य प्रभाव तक की चर्चा की गई है। आलेख यह भी…

रामलीला का लोकनाट्य स्वरूप

रामलीला भारत की सबसे लोकप्रिय लोकनाट्य परंपरा है, जो भगवान राम के जीवन, आदर्शों और विजय की कथा को नाटकीय रूप में प्रस्तुत करती है। यह न केवल भारत में बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में भी विविध रूपों में प्रचलित है। रामलीला केवल मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक, धार्मिक…

संगीत और नृत्य का संगम प्रो. कल्याणदास महंत

प्रो. कल्याणदास महंत छत्तीसगढ़ की माटी से उपजे एक ऐसे नृत्य सम्राट थे, जिन्होंने कथक नृत्य, संगीत और अभिनय के माध्यम से रायगढ़ घराने की परंपरा को देश-विदेश में सम्मान दिलाया। उन्होंने केवल मंच पर ही नहीं, बल्कि शिक्षण संस्थानों और साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों में भी अपनी कला से नई पीढ़ी…

जनिये बस्तर के घोटुल को

इसे बस्तर का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिये कि इसे जाने-समझे बिना इसकी संस्कृति, विशेषत: इसकी जनजातीय संस्कृति, के विषय में जिसके मन में जो आये कह दिया जाता रहा है। गोंड जनजाति, विशेषत: इस जनजाति की मुरिया शाखा, में प्रचलित रहे आये "घोटुल" संस्था के विषय में मानव विज्ञानी

सरगुजा के लोकनृत्य का प्रमुख पात्र "खिसरा"

सरगुजा अंचल के करमा, सुआ, शैला जैसे लोकनृत्यों में खिसरा एक हास्यप्रिय पात्र होता है, जो अपने अभिनय से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करता है। ग्रामीण सांस्कृतिक आयोजनों में आज भी खिसरा परंपरा जीवित है।

छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक वैभव : बांसगीत

बाँसगीत छत्तीसगढ़ की यादव जाति की लोकपरंपरा है, जिसमें बाँसुरी की धुन पर भक्ति, लोककथा और वीरता की गाथाएं गाई जाती हैं। यह विलुप्त होती सांस्कृतिक विरासत संरक्षण की आवश्यकता है।

प्राचीन चित्रांकन परम्परा में श्रीराम

भारतीय चित्रकला परंपरा में श्रीराम न केवल लोककथाओं और धर्मग्रंथों के नायक हैं, बल्कि लघुचित्रों, भित्तिचित्रों और सचित्र ग्रंथों में भी वे आदर्श, भक्ति और लोक आस्था के प्रतीक रूप में अंकित हुए हैं। मध्यकाल में रामायण के प्रसंगों को मेवाड़, कांगड़ा, बसोहली, मालवा, बुंदेलखंड, राजस्थानी, पहाड़ी व दक्षिण भारतीय…

नृत्य के माध्यम से लोकमंगल की कामना: करमा नृत्य की परंपरा

लोकगीत और लोकनृत्यों में छत्तीसगढ़ का उल्लासित परिवेश साकार हो उठता है। जन्म से मृत्यु पर्यंत, पर्व और उत्सवों में, जीवन की विसंगतियों में होता आया लोक नृत्यों आज भी जीवंत है,समूचे जनजीवन में। ऐसा ही एक लोक नृत्य है करमा, जो विविध परिवेश में प्रचलित है।

छत्तीसगढ़ में लोक नाट्य की विधाएं

छत्तीसगढ़ का लोकनाट्य मूलः ग्राम्य जन-जीवन और लोक कलाकारों का उत्पाद है। यह गाँवों से निकलकर नगरों और महा नगरों तक पहुँचा और ख्याति प्राप्त करते हुए एक लम्बी यात्रा की। छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के अन्य प्रांतों के भी लोकनाट्य वाचिक परंपरा के ही उद्भव हैं। वाचिक परंपरा से

छत्तीसगढ़ी नाचा और गम्मत : हमारी धरोहर

भारत का हृदय प्रांत छत्तीसगढ़ एक उत्सव प्रिय राज्य होने के साथ ही लोककलाओं का कुबेर भी है।इसके अधिकांश हिस्से में ग्रामीण आदिवासी निवास करते हैं।लगभग वर्ष भर यहां विविध पर्वों और उत्सवों का आयोजन होता रहता है। प्राचीन काल से ऐसे उत्सवों पर उल्लास की अभिव्यक्ति छत्तीसगढ़ के कलाकार…

छत्तीसगढ़ी संस्कृति में रचे बसे लोकगीत

लोककला मन में उठने वाले भावों को सहज रुप में अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्वत: स्थानांतरित हो जाने वाली विधा है। लोक कला हमारी संस्कृति की पहचान होती है, हमारी खुशी को प्रकट करने का माध्यम होती है।

लोककला का क्षेत्र…

छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का दर्पण है सुआ गीत

छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का हिस्सा है सुआ गीत। यह छत्तीसगढ़ प्रदेश की गोंड जाति की स्त्रियों का प्रमुख नृत्य-गीत है लेकिन अन्य जाति के महिलाएं भी इसमें सम्मिलित होकर नृत्य करती हैं। जिसे सामूहिक रुप से किया जाता है। यह मुख्यतः महिलाओं के मनोभावों सुख-दुख आदि की अभिव्यक्ति का…

बस्तर अंचल में रामलीला मंचन की परम्परा

वर्तमान बस्तर अंचल को रामायण काल में दण्डकारण्य क्षेत्र के नाम से संबोधित किया जाता था। तब का दण्डकारण्य ओड़िसा जैपुर स्टेट, आंध्रप्रदेश का गोदावरी, महाराष्ट्र का चांदा, भण्डारा छत्तीसगढ़ का सिहावा, नगरी और कांकेर से वर्तमान बस्तर तक विस्तृत फैला हुआ था। इस महाअरण्य में ऋषि-मुनि तपस्या करते थे…

छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में नदियों का महत्व

भारतीय संस्कृति में नदियों का बड़ा सम्मान जनक स्थान है। नदियों को माँ कहकर इनकी पूजा की जाती है। ये हमारा पोषण अपने अमृत समान जल से करती हैं। अन्य सभ्यताओं में देखें तो उनमें नदियों का केवल लौकिक महत्व है। लेकिन भारत में लौकिक जीवन के साथ– साथ पारलौकिक…