संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख कृष्ण द्वादशी | गुरुवार
नक्षत्र: रेवती | योग: प्रीति | करण: तैतिल
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 मई 2026
यह आलेख भोजपुरी अंचल की लोकगीत परंपरा ‘पवाँरा’ पर केंद्रित है, जो गीत, कथा और नाट्य के अद्भुत समन्वय से जीवन के संस्कारों, पर्वों और सामाजिक मूल्यों को प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से शिशु जन्म जैसे अवसरों पर गाया जाने वाला यह गीत-नृत्य ग्रामीण समाज में आज भी भावनात्मक…
साहित्य समाज का पहरुआ होता है। चाहे वह गीत, कविता, कहानी, निबंंध, नाटक या किसी अन्य साहित्यिक विधा में क्यों न हो। वह तो युगबोध का प्रतीक होता है। कवि वर्तमान को गाता है लेकिन वह भविष्य का दृष्टा होता है। साहित्य जो भी कहता है निरपेक्ष भाव से कहता…
साहित्य समाज का पहरुआ होता है। चाहे वह गीत, कविता, कहानी, निबंध, नाटक या किसी अन्य साहित्यिक विधा में क्यों न हो। वह तो युगबोध का प्रतीक होता है। कवि वर्तमान को गाता है लेकिन वह भविष्य का दृष्टा होता है। साहित्य जो भी कहता है निरपेक्ष भाव से कहता…
भीतर अपने टटोल के देख।
मुख से राम तू बोल के देख।
स्पष्ट नजर आयेगी दुनिया,
अंतस द्वार तू खोल के देख।
राम नाम का ले हाथ तराजू,
खुद को ही तू तोल के देख।
है कीमत तेरा कितना प्यारे,
जा बाजार तू मोल के देख।
कितना मीठा कड़ुवा है…
रघुकुल गौरव, अवध सिया के,
दशरथ कोशला राम लिखूं।
या रावण हंता, दुष्ट दलंता,
लंका विजई सम्मान लिखूं।
है अनुज दुलारे भरत भाल,
जिन पर मैं अपना स्वास लिखू।
है अनुज दुलारे लखन लाल,
जिन पर मैं अपना विश्वास लिखूं।
ये सम्मानित राघव रघु कुल,
ना काम क्रोध मद लोभ…
भगवा ध्वज लहराए, भगवा ध्वज फहराए।
सप्त सिंधु की लहर-लहर में, नव ऊर्जा भर जाए।
घर-घर के आंगन में गूँजे,
उत्सव की किलकारें।
द्वार-द्वार में फूल बिछे हों,
नाचें झूम बहारें।
हर्षित मन का कोना कोना, मंद मंद मुस्काए।
भगवा ध्वज लहराए, भगवा ध्वज फहराए।
अंबर-धरती, दसों दिशा में,
वेद…
एक नवंबर 2020 को पृथक राज्य बनने से पूर्व छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का अविभाज्य अंग था। प्राकृतिक सौंदर्य एवं अपार खनिज संपदा तथा समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक भंडार होने के बावजूद पहले उसकी कोई अलग पहचान से नहीं थी। दुष्यंत कुमार का यह शेर छ.ग. पर सटीक बैठता था और कई…
लोक गीत लोक जीवन के अन्तर्मन की अतल गहराइयों से उपजी भावानुभूति है। इसलिए लोकगीतों में लोक समाज का क्रिया-व्यापार, जय-पराजय, हर्ष-विषाद उत्थान-पतन, सुख-दुख सब समाहित रहता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है कि "ये गीत प्रकृति के उद्गम और आर्येत्तर के वेद है।" उक्त कथन लोक गीत की…
प्रकृति मनुष्य को सहचरी है, यह सर्वविदित है। किन्तु मनुष्य प्रकृति का कितना सहचर है? यह प्रश्न हमें निरूत्तर कर देता है। हम सोचने के लिए विवश हो जाते हैं कि सचमुच प्रकृति जिस तरह से अपने दायित्वों का निर्वाह कर रही हैं? क्या मनुष्य प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों…
हमारा भारत देश उत्सवों एवं पर्वों का देश है, यहाँ की संस्कृति में बारहों मास उल्लास की व्यवस्था है। ॠतुओं के अनुसार एवं ॠतु परिवर्तन पर त्यौहार मनाए जाते हैं, जो समाज को सांस्कृतिक शिक्षा देते हैं तथा संस्कृति को समृद्ध करते हैं। फ़ाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली मनाई…
ग़ज़ल इशारों की भाषा है। सूफ़ी नज़्मों और ग़ज़लों में भी इशारों-इशारों में रूहानी प्रेम के जरिए ईश्वर तक पहुँचने की बात होती है। सूफ़ी एक स्वभाव का नाम है। सूफ़ी रचनाओं का सार भी यही है कि ईश्वरीय प्रेम के लिए धरती पर इंसान और इंसान के बीच परस्पर…
लोगों के कंठ में लोकगीत समाहित रहते है, जो साहित्य की एक विधा है। हर एक भाषा के अपने लोकगीत है जो ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं द्वारा विशेष अवसर पर गाये जाते है। जिसका अपना एक विशेष महत्व होता है, श्रीराम ऐसे महान विभुति है जिनके व्यक्तितव से सारा संसार…