संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण शुक्ल चतुर्थी | रविवार
नक्षत्र: हस्त | योग: साध्य | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अगस्त 2026
यह लेख जगतजननी की पावन प्राकट्य स्थली पुरैना के धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है। श्रद्धा, भक्ति और लोकआस्था से जुड़ा यह स्थल भक्तों के लिए दिव्य अनुभूति और मातृशक्ति की उपासना का प्रमुख केंद्र है।
यह आलेख छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में भगवान श्रीराम की गहरी उपस्थिति को रेखांकित करता है। जन्म, नामकरण, लोकगीत, अभिवादन, कृषि, विवाह और अंतिम यात्रा तक राम का नाम यहाँ की परम्पराओं, संस्कारों और जनमानस में रचा-बसा हुआ दिखाई देता है।
प्रस्तुत लेख झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन, शौर्य, त्याग और राष्ट्रभक्ति का प्रेरणादायी चित्रण करता है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, युद्ध-कौशल, झाँसी के अधिकार की रक्षा, दुर्गा दल के गठन और 1857 के स्वाधीनता संग्राम में उनके अदम्य नेतृत्व को रेखांकित किया गया है। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान भारतीय…
प्रस्तुत लेख महाराणा प्रताप के अदम्य साहस, स्वाभिमान, राष्ट्रनिष्ठा और स्वतंत्रता-संकल्प का प्रेरणादायी चित्रण करता है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, सिंहासनारोहण, हल्दीघाटी और दिवेर के युद्ध, भील समाज के सहयोग, चेतक की स्वामीभक्ति तथा भामाशाह के त्याग का वर्णन किया गया है। महाराणा प्रताप का जीवन यह संदेश देता है…
यह लेख चेन्नई स्थित तिरुवोट्टियूर के त्यागराजस्वामी मन्दिर की ऐतिहासिक और शैक्षिक भूमिका पर प्रकाश डालता है। चोल काल में यह मन्दिर केवल आस्था का केन्द्र नहीं, बल्कि ओट्रियूर मठ के माध्यम से संचालित एक जीवंत ज्ञान-पीठ था, जहाँ पाणिनीय व्याकरण, वैदिक दर्शन, मीमांसा, आयुर्वेद और शास्त्रार्थ की परम्परा को…
यह लेख राष्ट्रीय सीमाओं, पासपोर्ट-वीज़ा व्यवस्था, संकीर्ण राष्ट्रवाद और वैश्विकता के बीच फँसी मानवीय संवेदनाओं का गहन विश्लेषण करता है। लेखक बताता है कि तकनीक ने दुनिया को वैश्विक ग्राम तो बना दिया है, पर मानवता आज भी सीमाओं, भय, पहचान और कट्टरपन्थ की बेड़ियों में जकड़ी हुई है। लेख…
यह लेख महामारी, आपदा और सामाजिक संकटों के संदर्भ में भारतीय ऋषि परम्परा, चरक संहिता, अथर्ववेद और पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित प्राचीन आपदा-प्रबन्धन दृष्टि का विश्लेषण करता है। इसमें बताया गया है कि संकट काल में संयम, एकान्तवास, सामाजिक अनुशासन और शास्त्रीय निर्देश समाज की रक्षा के प्रभावी साधन रहे…
यह लेख डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ परिचय’ के माध्यम से छत्तीसगढ़ के इतिहास, लोककथाओं, नामकरण, शैलचित्रों, रियासतों और सांस्कृतिक चेतना का विवेचन करता है। इसमें जनश्रुतियों और ऐतिहासिक सन्दर्भों के आधार पर छत्तीसगढ़ की गौरवपूर्ण परम्परा को समझने का प्रयास किया गया है।
यह लेख तमिल सन्त कवयित्री अव्वैयार की प्रसिद्ध रचना आठिचूड़ी के नैतिक सूत्रों, जीवन दर्शन और सांस्कृतिक महत्त्व को प्रस्तुत करता है। इसमें सत्य, विनम्रता, दानशीलता, क्रोध नियंत्रण, माता-पिता के सम्मान और चरित्र निर्माण जैसे शाश्वत मूल्यों की सरल व्याख्या की गई है।
विशाल प्रजापत जी का यह आलेख भगवान श्रीराम के वनवासी स्वरूप, धर्मनिष्ठ आचरण, सामाजिक समरसता और लोककल्याणकारी लीलाओं का प्रेरणादायी विवेचन प्रस्तुत करता है। विराध, कबन्ध, शबरी, केवट, जटायु और सुग्रीव जैसे प्रसंगों के माध्यम से यह लेख बताता है कि श्रीराम का वनवास केवल त्याग की कथा नहीं, बल्कि…
कांचीपुरम का कैलाशनाथर मन्दिर केवल भगवान शिव की उपासना का पवित्र केन्द्र नहीं, अपितु प्राचीन भारत की ज्ञान परम्परा का भी महान प्रतीक है। पल्लव काल में यह मन्दिर शिक्षा, साधना और संस्कृति का ऐसा केन्द्र बना जहाँ देशभर से विद्यार्थी आकर तर्कशास्त्र, राजनीति, चिकित्सा, व्याकरण और वेद-वेदांगों का अध्ययन…
यह लेख प्रभु श्रीराम के ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ स्वरूप का प्रेरणादायी विवेचन करता है। इसमें राम के आदर्श पुत्र, शिष्य, भाई, पति, मित्र और लोकनायक रूप के साथ रामराज्य, सामाजिक समरसता, धैर्य, वीरता और आज के समय में राम के जीवन-मूल्यों की प्रासंगिकता को सरल और भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया…
यह लेख श्रीराम के जीवनचरित्र को नेतृत्व, संकट प्रबंधन, त्याग, राजधर्म और संस्थागत सत्यनिष्ठा के कालजयी आदर्श के रूप में प्रस्तुत करता है। डॉ. स्मिता शिने श्रीराम के निर्णयों और आचरण के माध्यम से बताती हैं कि सच्चा नेतृत्व व्यक्तिगत सुख से ऊपर उठकर लोकहित, दायित्वबोध और नैतिक प्रामाणिकता को…
यह लेख छत्तीसगढ़ के प्राचीन नगर मल्हार स्थित परमेसरा तालाब की पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करता है। लेखक इसे वाल्मीकि रामायण में वर्णित पंचाप्सर तीर्थ से जोड़ते हुए अचला सप्तमी स्नान, पातालेश्वर महादेव अभिषेक और दक्षिण कोसल की प्राचीन तीर्थ-परंपरा का विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम, भगवान रंगनाथ की राजसी उपासना, श्रीवैष्णव परम्परा, आलवार संतों की भक्ति और भव्य द्रविड़ स्थापत्य का अद्वितीय संगम है। कावेरी तट पर स्थित यह पावन धाम ‘भूलोक वैकुंठ’ के रूप में पूजित है।
भोरमदेव क्षेत्र की मंदिर शिल्पकला में श्रीरामकथा के विविध प्रसंगों का जीवंत अंकन मिलता है। गंडई, घटियारी और सहसपुर के मंदिरों में राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, बालि-सुग्रीव युद्ध और अशोक वाटिका जैसे प्रसंग दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक चेतना और रामभक्ति की प्राचीन परंपरा को प्रमाणित करते हैं।
यह आलेख प्रभु श्रीराम के वनवास को त्याग, धर्म, मर्यादा और लोकमंगल की अनुपम यात्रा के रूप में प्रस्तुत करता है। अयोध्या से चित्रकूट, पंचवटी और किष्किन्धा तक के प्रसंगों के माध्यम से श्रीराम के आदर्श चरित्र, सीता-लक्ष्मण की निष्ठा, जटायु की भक्ति और हनुमान मिलन की महत्ता का भावपूर्ण…
यह आलेख कोटा चित्र शैली में भगवान श्रीराम के विविध प्रसंगों का कलात्मक और सांस्कृतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अहिल्या उद्धार, राम-हनुमान मिलन, पुष्पक विमान, लव-कुश प्रसंग और राम दरबार जैसे चित्रों के माध्यम से कोटा शैली की भक्ति, समरसता, लोकसंस्कार और भारतीय कला परम्परा की गहन अभिव्यक्ति को रेखांकित…
यह लेख छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, परम्पराओं, गीतों, उत्सवों और जनजीवन में भगवान श्रीराम की गहरी उपस्थिति को रेखांकित करता है। दक्षिण कोसल को श्रीराम के ननिहाल और वनगमन के सहचर के रूप में प्रस्तुत करते हुए यह आलेख बताता है कि जन्म से मृत्यु तक यहाँ का लोकजीवन किस…
यह आलेख त्यागमूर्ति श्रवणा, अर्थात् शबरी के जीवन, करुणा, सेवा, अटूट भक्ति और सामाजिक समरसता की प्रेरक कथा प्रस्तुत करता है। पशु-हिंसा के विरोध में गृहत्याग से लेकर मतंग ऋषि की सेवा और श्रीराम के दर्शन तक, श्रवणा का जीवन निःस्वार्थ प्रेम, धैर्य और भक्ति की अनुपम मिसाल है।
यह लेख श्रीराम के उस विराट स्वरूप का गम्भीर विवेचन प्रस्तुत करता है, जिसने उन्हें केवल एक देवता नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस की आत्मा बना दिया। वाल्मीकि रामायण, श्रीरामचरितमानस, लोककला, भजन और गीत रामायण जैसे विविध सांस्कृतिक स्रोतों के माध्यम से लेखक ने बताया है कि श्रीराम किस प्रकार भारतीय…
श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड की उस विशिष्ट साहित्यिक संरचना का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान श्रीराम को पृष्ठभूमि में रखकर हनुमान को सम्पूर्ण कथा का मुख्य नायक बना दिया है। डॉ. पी. आर. कोसरिया जी ने हनुमान के बुद्धि-कौशल, स्वामीभक्ति, पराक्रम और स्वतन्त्र नायकत्व का…
यह आलेख श्रीरामचरितमानस के प्रसंगों के माध्यम से ‘देखना’ और ‘सजग दृष्टि’ के गूढ़ जीवन-दर्शन को अत्यन्त सूक्ष्मता से स्पष्ट करता है। अचल कुमार वैष्णव जी ने रावण, मारीच, हनुमान और भरत जैसे पात्रों के उदाहरणों द्वारा बताया है कि मनुष्य की दृष्टि ही उसके कर्म, विवेक और जीवन की…
सरगुजा अंचल के पारम्परिक लोकगीतों में रामकथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि जनजातीय जीवन, लोकस्मृतियों और सांस्कृतिक आस्था का जीवंत स्वरूप बनकर उपस्थित होती है। यह लेख उरांव, गोंड, कोडाकू और कंवर जैसी जनजातियों के लोकगीतों में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण से जुड़े प्रसंगों का अत्यन्त भावपूर्ण और शोधपरक…
यह लेख भगवान श्रीराम के दिव्य एवं मानवीय चरित्र का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें उनके अवतार के ब्रह्मांडीय उद्देश्य से लेकर आदर्श आचरण, मर्यादा, धैर्य और न्याय के सिद्धांतों को समझाया गया है। रामायण को जीवन मार्गदर्शक मानते हुए यह लेख आधुनिक समाज के लिए राम के आदर्शों…
डॉ. अदिति गौड़ के इस शोधपरक आलेख में रामकथा की उस अनन्त यात्रा का विवेचन है, जिसने भारत की सीमाओं को लांघकर विश्वभर में सांस्कृतिक सेतु का निर्माण किया। लोकजीवन, नामकरण, परम्पराओं और रामलीला के विविध रूपों के माध्यम से यह लेख श्रीराम की सर्वव्यापकता और वैश्विक प्रभाव को सजीव…
भारतीय लोकजीवन में भगवान श्रीराम केवल आराध्य देव नहीं, बल्कि संस्कृति, नैतिकता और लोकआस्था के जीवंत प्रतीक हैं। यह लेख भजन, रामलीला और लोकगीतों के माध्यम से भारतीय समाज में रामकथा की अखंड परम्परा और श्रीराम के आदर्शों की शाश्वत उपस्थिति को अत्यन्त भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।
यह लेख आधुनिक युवा पीढ़ी के मानसिक अवसाद, अस्थिरता और दिशाहीनता के संदर्भ में भगवान श्रीराम के ‘स्थितप्रज्ञ’ व्यक्तित्व का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लेखक ने रामायण के प्रसंगों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, आत्मसंयम, कर्मयोग और दायित्वबोध किस प्रकार जीवन को…
बैगा जनजाति की शिकार परंपराएँ उनके प्रकृति-आधारित जीवन, कौशल और वैज्ञानिक समझ का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। इस लेख में धनुष-बाण से लेकर विविध प्रकार के फंदों तथा मछली पकड़ने की पारंपरिक विधियों का विस्तृत वर्णन किया गया है, जो उनकी सामूहिक जीवनशैली और पर्यावरणीय ज्ञान को दर्शाता है…
यह लेख डिजिटल युग में मनुष्य की बदलती पहचान, डेटा आधारित जीवन, सोशल मीडिया के अकेलेपन और तकनीक के बढ़ते प्रभाव पर गंभीर प्रश्न उठाता है।