आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

कोटा चित्र शैली में श्री राम का चित्रण

यह आलेख कोटा चित्र शैली में भगवान श्रीराम के विविध प्रसंगों का कलात्मक और सांस्कृतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अहिल्या उद्धार, राम-हनुमान मिलन, पुष्पक विमान, लव-कुश प्रसंग और राम दरबार जैसे चित्रों के माध्यम से कोटा शैली की भक्ति, समरसता, लोकसंस्कार और भारतीय कला परम्परा की गहन अभिव्यक्ति को रेखांकित…

मेवाड़ के हजार वर्ष पुराने सास-बहू मन्दिर की वास्तुकला में रामलीला

उदयपुर के निकट नागदा स्थित सास-बहू मन्दिर की हजार वर्ष पुरानी पाषाण शिल्पकला में रामायण के विविध प्रसंगों का अद्भुत अंकन भारतीय सांस्कृतिक चेतना की अनुपम अभिव्यक्ति है। गुहिलकालीन इस मन्दिर में श्रीराम के वनवास, किष्किन्धा और लंका काण्ड के दृश्य अत्यन्त सूक्ष्मता और सजीवता के साथ उकेरे गए हैं…

खादी - भारत की समृद्धि और राष्ट्रीय चेतना का संवाहक - ग्रामोद्योग भाग 1

यह लेख खादी को केवल वस्त्र नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत स्मृति, स्वदेशी आंदोलन, गांधी दर्शन और आत्मनिर्भरता की चेतना के रूप में प्रस्तुत करता है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आधुनिक ‘खादी इंडिया’ ब्रांड तक, खादी की ऐतिहासिक यात्रा, सामाजिक भूमिका और समकालीन महत्व का समग्र विवेचन इसमें किया…

संगीत और नृत्य का संगम प्रो. कल्याणदास  महंत

रायगढ़ घराने के प्रसिद्ध कथक नर्तक एवं संगीतज्ञ प्रो. कल्याणदास महंत का जीवन भारतीय संगीत और नृत्य परंपरा के स्वर्णिम अध्यायों में से एक है। 1921 में बिलासपुर के मड़वा गांव में जन्मे कल्याणदास जी ने अपने बचपन से ही नृत्य और संगीत के वातावरण में शिक्षा पाई। सारंगढ़ और…

कठपुतलियों की ऐतिहासिकता

कठपुतली कला भारत की प्राचीन लोककलाओं में से एक है, जिसका उल्लेख महाभारत, रामायण और पंचतंत्र जैसे ग्रंथों तक में मिलता है। लोककथाओं के अनुसार इसका उद्भव शिव-पार्वती से जुड़ा है, वहीं राजस्थान को इसका प्रमुख जन्मस्थल माना जाता है। धागा, छड़, छाया और दस्ताने जैसी विविध पद्धतियों में पाई…

संगीत और नृत्य का संगम प्रो. कल्याणदास महंत

प्रो. कल्याणदास महंत छत्तीसगढ़ की माटी से उपजे एक ऐसे नृत्य सम्राट थे, जिन्होंने कथक नृत्य, संगीत और अभिनय के माध्यम से रायगढ़ घराने की परंपरा को देश-विदेश में सम्मान दिलाया। उन्होंने केवल मंच पर ही नहीं, बल्कि शिक्षण संस्थानों और साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों में भी अपनी कला से नई पीढ़ी…

दधिमती शक्तिपीठ (नागौर) के रामकथा मूर्ति फलक

यह लेख राजस्थान के नागौर स्थित दधिमती शक्तिपीठ के प्रतिहारकालीन मंदिर स्थापत्य में उत्कीर्ण रामकथा मूर्ति फलकों का सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत करता है। इसमें श्रीराम के वनवास, सीता हरण, सुग्रीव संवाद, सेतुबन्ध, लक्ष्मण शक्ति और राम-रावण युद्ध जैसे प्रसंगों के शिल्पांकन के माध्यम से भारतीय मंदिर कला में रामायण परम्परा…

संगीत और नृत्य का संगम प्रो. कल्याणदास महंत

नृत्य सम्राट प्रो. कल्याणदास, इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय नियुक्त बड़ी हस्तियों में थे। वे छुट्टी के दिनों में बराबर अपने निवास स्थान रायगढ़ आते थे, जहाँ उनका स्वयं का मकान है। परिवार उस समय यहीं था। उन दिनों हम लोगों की चक्रधर कला परिषद हुआ कल्याण दास महन्त लेखक के…

छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के पर्याय खुमानलाल साव

बंगाल ने रवींद्र-संगीत को मान्यता प्रदान कर उसे अपनी पहचान बना ली। रवींद्र-संगीत को स्थापित कर दिया। इसी तरह से असम ने भूपेन हजारिका को अपनी पहचान बना लिया किन्तु छत्तीसगढ़ ने खुमान-संगीत को अपनी पहचान बनाने के लिए मान्यता प्रदान नहीं की है और स्थापित भी नहीं किया है…

सकल सृष्टि के कर्ता - भगवान विश्वकर्मा

वैदिक साहित्य ने सृष्टि का कर्ता भगवान विश्वकर्मा को माना है, इनके के अनेक रूप बताए जाते हैं- दो बाहु वाले, चार बाहु एवं दस बाहु वाले तथा एक मुख, चार मुख एवं पंचमुख वाले। देवों के देव भगवान श्री विश्वकर्मा ने सदैव कर्म को ही सर्वोपरि बतलाया है। यह…

प्राचीन मूर्ति शिल्प में आखेट अंकन

शिकार द्वारा मनोरंजन वैदिक काल से समाज में विद्यमान रहा है एवं प्राचीन काल के मनोरंजन के साधनों का अंकन मंदिरों की भित्तियों में दिखाई देता है। मंदिरों की भित्तियों में अंकित मूर्तियों से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल के समाज में किस तरह के मनोरंजन के साधन प्रचलित…

दक्षिण कोसल में मूर्तिकला का उद्भव एवं विकास

प्राचीन भारत में प्रतिमा तथा मूर्ति निर्माण की परंम्परा अत्यतं प्राचीन है, हड़प्पा सभ्यता की कला विश्व प्रसिद्ध है इसके बाद ऐतिहासिक काल के विभिन्न राजवंशों यथा मौर्य, शुगं, कुषाण, सातवाहन तथा गुप्त आदि ने कला को खूब पुष्पित एवं पल्लवित किया।  पूर्व मध्य कालीन मूर्तिकला एवं प्रतिमा निर्माण की…

प्राचीन मंदिरों के मूर्ति शिल्प में उत्कीर्ण आभूषण

स्त्री एवं पुरुष दोनों प्राचीन काल से ही सौंदर्य के प्रति सजग रहे हैं। स्त्री सौंदर्य अभिवृद्धि के लिए सोलह शृंगार की मान्यता संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान तक चली आ रही है। कवियों ने अपनी कविताओं में नायिका के सोलह शृंगार का प्रमुखता से वर्णन किया है तो शिल्पकार…

प्रतिमा शिल्प में अंकित स्त्री मनोविनोद

प्राचीनकाल के मंदिरों की भित्ति में जड़ित प्रतिमाओं से तत्कालीन सामाजिक गतिविधियाँ एवं कार्य ज्ञात होते हैं। शिल्पकारों ने इन्हें प्रमुखता से उकेरा है। इन प्रतिमाओं से तत्कालीन समाज में स्त्रियों के कार्य, दिनचर्या एवं मनोरंजन के साधनों का भी पता चलता है।

कंदुक क्रीड़ा कर मनोविनोद करती त्रिभंगी मुद्रा

चितावरी देवी मंदिर धोबनी का स्थापत्य शिल्प

धोबनी ग्राम रायपुर-बिलासपुर राजमार्ग पर दामाखेड़ा ग्राम से बायें तरफ लगभग 2 कि.मी. दूरी पर स्थित है। रायपुर से धोबनी की कुल दूरी लगभग 57 कि.मी. है। (इस ग्राम में वर्ष 2003 तक स्थानीय बाजार तथा पशु मेला रविवार को भरता था जो वर्तमान में किरवई नामक ग्राम के उत्तर…

पुसौर के धातु शिल्पकार एवं बर्तन उद्योग

किसी ज़माने में राजे -महाराजे भले ही सोने -चाँदी के बर्तनों में भोजन करते रहे हों, लेकिन उस दौर में सामान्य प्रजा के घरों में काँसे और पीतल के बर्तनों का ही प्रचलन था। आधुनिक युग में भी अधिकांश भारतीय घरों में काँसे और पीतल के बर्तनों की खनक लम्बे…

बरहाझरिया के शैलाश्रय और उसके शैलचित्र

कोरबा जिला 20°01' उत्तरी अक्षांश और 82°07' पूर्वी देशांतर पर बसा है। इसका गठन 25 मई 1998 को हुआ, उसके पहले यह बिलासपुर जिले का ही एक भाग था। यहाँ का क्षेत्रफल 712000 हेक्टेयर है। जिले में चैतुरगढ़ का किला, तुमान का शिव मंदिर और पाली का शिव मंदिर भारत…

दण्डकारण्य में राम : रामनवमी विशेष

बस्तर अपने प्राचीन पुरातात्विक महत्व, आरण्यक संस्कृति, दुर्गम वनांचल एवं अनसुलझे तथ्यों के लिए प्रसिद्ध है। बस्तर, दण्डक, चक्रकूट, भ्रमरकूट, महाकांतर जैसे अनेक नामों से परिभाषित धरती पर स्वर्ग का पर्याय है। बस्तर के पूर्वजों ने धर्म, विज्ञान, साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में जो पराक्रम किया है। वह…

भारतीय शास्त्रीय संगीत और लोकसंगीत

संगीत नामक शब्द से ही मन में स्वर लहरियाँ उत्पन्न होने लगती हैं, मन और आत्मा दोनो तरंगित हो उठते हैं, देह नृत्य करने लगती है, चेतना अपने उच्चतम स्तर पर उर्ध्वगामी हो जाती है। ऐसा ही है आनंद संगीत और स्वर का। यह एक ऐसी विधा है जिसने मानव…

प्राचीन नगर मल्हार का पुरातत्व

प्राचीन नगर मल्हार छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में अक्षांक्ष 21 90 उत्तर तथा देशांतर 82 20 पूर्व में 32 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। बिलासपुर से रायगढ़ जाने वाली सड़क पर 18 किमी दूर मस्तूरी है। वहां से मल्हार, 14 कि. मी. दूर है।

देऊर मंदिर

प्राचीन…

भीम का बनाया यह मंदिर अधूरा रह गया

छत्तीसगढ़ के जांजगीर में कलचुरीकालीन भव्य विष्णु मंदिर है। यह जांजगीर नगरी कलचुरी राजा जाज्वल्य देव की नगरी है तथा विष्णु मंदिर कल्चुरी काल की मूर्तिकला का अनुपम उदाहरण है। मंदिर में जड़े पत्थर शिल्प में प्राचीन परंपरा को दर्शाया गया है। अधूरा निर्माण होने के कारण इसे "नकटा" मंदिर…

छत्तीगढ़ अंचल की प्राचीन प्रतिमाओं का केश अलंकरण

छत्तीसगढ़ अंचल के पुरास्मारकों की प्रतिमाओं में विभिन्न तरह के केश अलंकरण दिखाई देते हैं। मंदिरों की भित्तियों में स्थापित प्रतिमाओं में कालखंड के अनुरुप स्त्री-पुरुष का केश अलंकरण दिखाई देता है। उत्त्खनन में केश संवारने के साधन प्राप्त होते हैं, जिनमें डमरु (बलौदाबाजार) से प्राप्त हाथी दांत का कंघा…

ऐसी कौन सी घास है जो जन्म से मरण तक साथ निभाती है?

मनुष्य का बांस से साक्षात्कार अग्नि के माध्यम से हुआ, अग्नि प्रज्जवलित करने के  लिए उसने अरणी पर परणी का घर्षण कर अग्नि का संधान किया। वर्तमान में विशेष समुदायों में विशेष अवसरों पर इसी तरह अग्नि प्रकट करने का विधान दिखाई देता है। जन्म के बाद बाँस से व्यक्ति…

जानिए क्या है संदेश भेजने एवं उत्साह प्रकट करने का प्राचीन यंत्र

टेसू के फ़ूलों एवं नगाड़ों का चोली-दामन का साथ है, जब टेसू फ़ूलते हैं तो अमराई में बौरा जाती है और नगाड़े बजने लगते हैं। पतझड़ का मौसम होने के कारण पहाड़ों पर टेसू के फ़ूल ऐसे दिखाई देते हैं जानो पहाड़ में आग लग गई हो। विरही नायिका के…