आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण चतुर्दशी | गुरुवार

नक्षत्र: उत्तराभाद्रपद | योग: इंद्र | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अप्रैल 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण चतुर्दशी | गुरुवार

नक्षत्र: उत्तराभाद्रपद | योग: इंद्र | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अप्रैल 2026

कुंकना रामकथा : जनजातीय लोकचेतना में राम

डॉ. रत्ना त्रिवेदी का यह शोधपरक लेख दक्षिण गुजरात के डांग क्षेत्र में प्रचलित ‘कुंकना रामकथा’ की विशिष्ट लोकपरम्परा का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें राम को वनवासी नायक और सीता को सशक्त स्त्री के रूप में चित्रित किया गया है, जो जनजातीय जीवन-दर्शन और प्रकृति-संबंध को अभिव्यक्त करता…

श्रीराम के जीवन से आलोकित पंच प्रण

यह लेख मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन से प्रेरित पाँच ऐसे ‘पंच प्रण’ का विवेचन प्रस्तुत करता है, जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं। श्रीराम के आदर्श चरित्र, त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और धर्मपालन से प्रेरणा लेते हुए यह लेख जीवन को अनुशासित, समरस और…

भरत : खड़ाऊँ की छाया में राजधर्म

राम नवमी के पावन अवसर पर प्रस्तुत यह कथा भरत के त्याग, संयम और राजधर्म के अद्वितीय आदर्श को उजागर करती है। श्रीराम की अनुपस्थिति में भरत ने खड़ाऊँ को सिंहासन पर स्थापित कर यह सिद्ध किया कि सच्चा शासन सत्ता नहीं, बल्कि धर्म, करुणा और न्याय पर आधारित होता…

आइये जाने भारत के राष्ट्रीय पंचांग को

यह लेख भारत के राष्ट्रीय पंचांग की वैज्ञानिक नींव को उजागर करता है — शक संवत पर आधारित यह पंचांग 1952 में प्रो. मेघनाद साहा की अध्यक्षता में बना, जो 30 क्षेत्रीय पंचांगों की भ्रांति को समाप्त कर पूरे भारत को एक सटीक, खगोलीय काल-सूत्र में बाँधता है।

भारतीय संस्कृति में अरण्य

यह लेख भारतीय संस्कृति में वनों के महत्त्व को दर्शाता है। ऋग्वेद के अरण्यानी सूक्त से लेकर श्रीकृष्ण के गोवर्धन उपदेश तक, हमारी परम्परा ने सदैव वृक्षों को पुत्र समान माना है। विश्व वानिकी दिवस पर वन-संरक्षण का संकल्प लें।

गोत्रोद्भव : संस्कृत वाङ्मय

भारतीय समाज की कुछ प्रधान विशेषताओं में से एक है - गोत्र परम्परा। पाणिनि के अनुसार तीसरी पीढ़ी से आगे की संतान 'गोत्र' कहलाती है। यह व्यवस्था वंशावली पहचान, विवाह नियमन और सामाजिक संगठन का आधार रही है।

अशारीकांडी टेराकोटा: मिट्टी की कला और संघर्ष की अनूठी दास्तान

असम के धुबरी जिले के अशारीकांडी गांव की 'हीरामती' मिट्टी से बनी टेराकोटा कला सदियों पुरानी है। 77वें गणतंत्र दिवस परेड में इस अनूठी शिल्पकला को राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली। यह कला भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रमाण है।

हमारी ज्ञान परम्परा का महत्त्वपूर्ण घटक हैं जनऊला!

जनउला छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पहेलियाँ हैं, जो हंसी-मजाक के साथ तर्कशक्ति का विकास करती हैं। ग्रामीण जीवन, प्रकृति और खेती से जुड़े ये लोकसाहित्य के रत्न पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक परंपरा से चले आ रहे हैं।

पौराणिक कथा - चार प्रश्न

युधिष्ठिर कलियुग से अपनी भेंट की कथा सुनाते हैं, जब एक घोड़े विक्रेता के वेश में कलियुग ने चार रहस्यमय प्रश्न पूछे। धर्मराज ने सभी प्रश्नों के उत्तर देकर कलियुग को पहचाना और उसे श्रीकृष्ण के रहते राज्य छोड़ने से मना किया।

सबहिं धरे सजि निज-निज द्वारे: भारत में द्वार-सज्जा के विविध रूप

हमारी लोक परम्परा में घर की देहरी लकड़ी की चौखट से कहीं बढ़कर कुल की मर्यादा और सुख-सौभाग्य की प्रहरी है। चौखट को गोबर से लीपना, चौक पूरना, आम के पत्तों का बंदनवार सजाना आदि नानाविध तरीकों से हम अपने-अपने द्वार-बार को सजाते हैं। हमारे गाँवों में तो यह द्वार-सज्जा…

ब्रज के देवालयों में होली उत्सव

ब्रजभूमि में होली का विशेष महत्व है। राधा-कृष्ण की दिव्य होली, बरसाने की लट्ठामार होली और वृन्दावन के उत्सव में टेसू, केसर, चन्दन जैसे प्राकृतिक रंगों की परंपरा आज भी जीवित है।

होली की आभा है- पलाश

रक्तिम पलाश केवल एक पुष्प नहीं, अपितु ऋतुराज बसंत का दैदीप्यमान उद्घोष है। वैदिक साहित्य, आयुर्वेद और लोकपरंपराओं में इसकी पावन महिमा विस्तृत रूप से प्रतिपादित है। जानिए कैसे यह वृक्ष भारतीय संस्कृति, साधना और प्रकृति-सौंदर्य का जीवंत प्रतीक बना। सम्पूर्ण आलेख पढ़ने हेतु क्लिक करें ।

फाग का लोकरंग

फागुन के रंगों में रँगी भारतीय लोक-संस्कृति की यह अनुपम यात्रा छत्तीसगढ़ के फाग गीतों के माध्यम से प्रकृति, कृषि, अध्यात्म और सामाजिक चेतना का समन्वित दर्शन कराती है। जानिए कैसे लोकधारा आज भी हमारी जड़ों को सिंचित कर रही है।

चेतना के व्यक्त प्रतीकः मन्दिर

मंदिर केवल देवालय नहीं — वे विराट् पुरुष की देह हैं। 'भारती' पत्रिका (1964) के इस दुर्लभ लेख में जानिए गर्भगृह, विमान और गोपुरम् में छुपे उस शाश्वत दर्शन को, जो समाज को संस्कार, कला को धारा और जीवन को दिशा देता था।

रैबारी के रीति रिवाज एवं परम्पराएँ

यह लेख राजस्थान की घुमन्तू रैबारी समुदाय की समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं का वर्णन करता है। जन्म, विवाह और मृत्यु संस्कारों से जुड़े अनोखे रीति-रिवाज, देवी-देवताओं में अटूट आस्था और सामूहिक जीवनशैली इस समुदाय की पहचान हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परम्परा से चली आ रही हैं। इस अनमोल संस्कृति को करीब…

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस विशेष: मातृभाषा का सम्मान-राष्ट्र का सम्मान

यह लेख अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (21 फरवरी) के महत्व को दर्शाता है। मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान, संस्कृति और 'दिल की भाषा' है। यह शिक्षा को सुगम बनाती है और समुदायों को जोड़ती है। पूरा लेख पढने के लिए क्लिक करें...

मातृप्रेम एवं त्याग के सचल विग्रह -: श्रीरामकृष्ण परमहंस

यह लेख संतश्रेष्ठ श्रीरामकृष्ण परमहंस के जीवन, साधना और आध्यात्मिक अनुभूतियों का भावपूर्ण वर्णन प्रस्तुत करता है। इसमें उनकी मातृभक्ति, विविध उपासना-पद्धतियों के अभ्यास, शिष्यों के निर्माण तथा मानव-सेवा आधारित आध्यात्मिक दृष्टि को रेखांकित किया गया है। लेख यह दर्शाता है कि श्रीरामकृष्ण का जीवन त्याग, प्रेम और सार्वभौमिक सत्य…

जनजातीय समाज में महाशिवरात्रि का पर्व

जनजातीय समाज में शिव-उपासना की प्राचीन परम्परा रही है। भारत में लगभग 705 से अधिक जनजातीय समुदाय निवास करते हैं। इनमें से अधिकांश समुदाय अपने स्थानीय नामों और स्वरूपों में महादेव की आराधना वर्ष भर करते हैं। कुछ विशेष अवसरों पर पूरा समुदाय पर्व और उत्सव के रूप में शिव-उपासना…

जबलपुर का चौसठ योगिनी मन्दिर

नर्मदा तट पर स्थित भेड़ाघाट का चौसठ योगिनी मन्दिर केवल स्थापत्य नहीं, बल्कि तांत्रिक साधना, कलचुरी सत्ता और मातृका परम्परा का जीवित साक्ष्य है। 64 नहीं, 81 योगिनियों का यह वृत्ताकार देवालय इतिहास, आस्था और रहस्य का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है। पूरा पढने के लिए क्लिक करें।

बैगा समुदाय की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति

छत्तीसगढ़ के घने वनों में बसी बैगा जनजाति का औषधीय ज्ञान आधुनिक चिकित्सा से सदियों पहले विकसित हुआ एक जीवंत विज्ञान है। जड़ी-बूटियों, प्रकृति के साथ तादात्म्य और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिले अनुभवों पर आधारित यह परंपरा आज भी इस समुदाय के लिए जीवनरक्षा का सशक्त माध्यम है।

धर्म और राजनीति

धर्म और राजनीति, भारतीय इतिहास की दो अविरल धाराएँ हैं। जब धर्म नैतिक विधान बनकर शासन को मर्यादा देता है, तब राज्य लोककल्याण का साधन होता है। पर जब पंथ सत्ता का उपकरण बनता है, तब समाज का विश्वास टूटता है। वशिष्ठ से ब्लू स्टार तक, इस विमर्श को पढ़िए…

सूर्य मंदिर मोढेरा- प्राचीन शिलाओं में परिलक्षित होता भारतीय ज्ञान

गुजरात के मेहसाणा जिले में स्थित मोढेरा का सूर्य मंदिर भारतीय स्थापत्य, खगोल विज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान परंपरा का अद्भुत उदाहरण है। सोलंकी शासक भीम प्रथम द्वारा 11वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर मारू-गुर्जर शैली, सूर्य उपासना, ज्यामितीय संरचना और खगोलीय सटीकता का अनुपम संगम प्रस्तुत करता है। सूर्यकुंड, नृत्यमंडप…

अठारह शक्ति पीठों में एक: बस्तर की माई दंतेश्वरी

चक्रकोट की माणिक्य देवी से दन्तेश्वरी माई तक की यह यात्रा केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि शिलालेखों, शक्तिपीठ परंपरा और बस्तर के ऐतिहासिक आत्मबोध की कथा है। देवी के पुरातन स्वरूप, अभिलेखीय प्रमाण और लोकमान्यता को जानने के लिए पूरा आलेख अवश्य पढ़ें।

छत्तीसगढ़ में संक्रांति पूजा

यह लेख मकर संक्रांति के खगोलीय आधार, उत्तरायण-दक्षिणायन के वैदिक अर्थ और ‘देवयान-पितृयान’ की मान्यता को स्पष्ट करता है। साथ ही स्नान-दान, तिल-गुड़, यज्ञ, श्राद्ध-तर्पण, पतंग परंपरा और देशभर की विविध रीति-रिवाजों पर प्रकाश डालता है।

मकर संक्रांति- सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व

मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का पावन पर्व है, जो ऋतु परिवर्तन, आध्यात्मिक चेतना, दान, तिल-गुड़, तीर्थ स्नान और सामाजिक सौहार्द का संदेश देता है। यह पर्व विविध नामों और परंपराओं के साथ भारत की सांस्कृतिक एकता को उजागर करता है।

मकर संक्रांति: छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल) की लोक-संस्कृति, खगोलीय विज्ञान और एक बचपन की जिज्ञासा

भारतीय संस्कृति में पर्व केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति, विज्ञान और लोकजीवन के बीच संतुलन स्थापित करने वाले जीवंत सूत्र होते हैं। भारत की परंपरा में उत्सव जीवन को समझने, ऋतुओं को पहचानने और समाज को जोड़ने का माध्यम रहे हैं। ऐसे ही पर्वों में…

लोहड़ी: ऋतु, कृषि और सामूहिक चेतना का उत्सव

लोहड़ी पंजाब और उत्तर भारत का प्रमुख लोकपर्व है, जो मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर ऋतु परिवर्तन, कृषि जीवन, श्रम-सम्मान और सामूहिक एकता का उत्सव है। अग्नि, नई फसल, लोकगीत और लोकनृत्यों के माध्यम से यह पर्व कृतज्ञता, नवऊर्जा और सामाजिक समरसता का संदेश देता है।

क्या है तिल-गुड़ का विज्ञान

यह लेख मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ की परंपरा के पीछे छिपे धार्मिक, ज्योतिषीय, सामाजिक और वैज्ञानिक कारणों का विवेचन करता है। तिल-गुड़ केवल एक पर्व-व्यंजन नहीं, बल्कि ऋतु, स्वास्थ्य, दान-पुण्य और जीवन में संतुलन का गहरा सांस्कृतिक संदेश है।

ईशावास्योपनिषद के श्लोक को चरितार्थ करता त्यौहार- दियारी

दियारी छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक कृषि-पर्व है, जो नई फसल और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। यह उत्सव भारतीय संस्कृति में निहित ईशावास्य, प्रकृति-एकात्मता और सामुदायिक सहभागिता के जीवंत दर्शन को प्रकट करता है।

भारतीय मापन पद्धति में रत्ती का महत्व

रत्ती एक पौधे का बीज है, जो आमतौर पर पहाड़ी और वन क्षेत्रों में पाया जाता है। यह प्राचीन भारतीय मापन पद्धति के एक इकाई के रूप में प्रचलित थी। इसका उपयोग आयुर्वेद में किया जाता है। आइए इस बहुमूल्य बीज गूंजा/रत्ती के बारे में जाने।