आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | आग्रह्यन कृष्ण प्रतिपदा | शुक्रवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: सिद्ध | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 05 दिसंबर 2025

आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | आग्रह्यन कृष्ण प्रतिपदा | शुक्रवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: सिद्ध | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 05 दिसंबर 2025

पंडित मालिकराम भोगहा का साहित्यिक अवदान

पंडित मालिकराम भोगहा, छत्तीसगढ़ के पहले हिंदी नाटककार, जिनकी रचनाएं आज भी साहित्य प्रेमियों के मन को छू जाती हैं। क्या आप जानते हैं कि किस प्रकार उन्होंने संस्कृत, उर्दू, मराठी और उड़िया भाषा सीखकर छत्तीसगढ़ की संस्कृति और धर्म को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया? इनके नाटक "रामराज्यवियोग" ने प्रदेश…

डोंगर देव : प्रकृति में निहित देवत्व की जीवित परंपरा

डोंगरदेव की परंपरा भारत के जनजातीय समाज में प्रकृति-पूजा के उस गहरे दर्शन को प्रकट करती है जहाँ पर्वत देवालय माने जाते हैं और प्रकृति स्वयं देवत्व का स्वरूप बन जाती है। महाराष्ट्र के सह्याद्री से लेकर झारखण्ड के मारंग बुरु और बस्तर के डूंगरी तक यह समान विश्वास मिलता…

मानव- संस्कृति को भारत का अवदान

भारत ने मानव संस्कृति और सभ्यता को अद्वितीय योगदान दिया है। शून्य और दशमलव प्रणाली से लेकर परमाणुवाद, संस्कृत भाषा की विराट शब्द-संपदा, शर्करा और कपास जैसी खोजों तक, भारत ने विश्व को विज्ञान, दर्शन और जीवनोपयोगी साधनों से समृद्ध किया। भारतीय चिंतन विविधता, साधना और मानवीय मूल्यों पर आधारित…

अगहन मास और छत्तीसगढ़ का लोक जीवन

अगहन मास छत्तीसगढ़ में अन्न, अघहन बृहस्पति पूजन, दान और लोक परंपराओं का पावन समय है। धान पूजा, लक्ष्मी अल्पना, कथा-वाचन और गांवों में सत्संग इस माह की विशिष्ट पहचान हैं। अन्नलक्ष्मी की कृपा और लोकआस्था से भरा छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक वैभव आज भी जीवंत है।

जनजातीय वर्ग का सामाजिक और आध्यात्मिक दर्शन

यह लेख जनजातीय समाज के जीवन-मूल्यों, देवत्व, न्याय व्यवस्था और सामाजिक संतुलन का विश्लेषण करता है। यह दिखाता है कि जिन्हें पिछड़ा कहा गया, वही समाज आज भी मानवता, समानता और सामूहिक जीवन के उच्चतम आदर्शों को जीवित रखे हुए है।

जनजातीय समाज की ज्ञान परम्परा

यह लेख जनजातीय समाज की ज्ञान परम्परा, तकनीकी कौशल और जीवनदृष्टि पर प्रकाश डालता है। यह दिखाता है कि खनिज, औषधि, स्थापत्य और पर्यावरण-संरक्षण में जनजातीय समाज का ज्ञान आज भी भारत के सतत विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधार बन सकता है।

लक्ष्मी पुराण: उत्कल (ओड़िआ) साहित्य का एक प्रमुख ग्रंथ

भारत के पूर्वी तट पर स्थित ओडिशा, एक ऐसी भूमि है जो अपनी अनूठी जगन्नाथ संस्कृति और गहरे आध्यात्मिक लोकाचार के लिए विश्व विख्यात है। यहाँ का जन-जीवन भगवान जगन्नाथ और देवी लक्ष्मी के इर्द-गिर्द बुना गया है। मंदिरों की भव्यता हो या लोक-कलाओं की सादगी, हर जगह एक समन्वय…

जनजातीय समाज : सनातन धर्म के दर्शन और आध्यात्मिक चेतना का शाश्वत आधार

यह लेख बताता है कि जनजातीय समाज केवल प्रकृति-आधारित जीवनशैली का उदाहरण नहीं, बल्कि सनातन धर्म के मूल दर्शन, गोत्र व्यवस्था, प्रकृति पूजन और पितृसम्मान की जीवित परंपरा का शाश्वत आधार है। इतिहास, शास्त्र और संस्कृति – सभी इस समाज की गौरवशाली आध्यात्मिक विरासत की पुष्टि करते हैं।

कार्तिक की कीर्ति कथा है आंवला नवमी

आंवला नवमी, कार्तिक मास की नवमी तिथि पर मनाया जाने वाला पर्व है, जिसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है। यह दिन त्रेतायुग के आरंभ की स्मृति से जुड़ा है और आयुर्वेद में आंवले के कायाकल्प गुणों का विशेष महत्व है। आंवला नवमी पर आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन…

हम सबके मूल में जनजातीय समाज की मान्यताएं

जब हम किसी समाज को समझना चाहते हैं, तो हम सर्वप्रथम उस समाज के इतिहास को देखते हैं। जैसे राजपूतों को समझने के लिए हम इतिहास में उन्हें देखते हैं। हम इतिहास में पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप जैसे शूरवीरों की ओर देखते हैं। मराठों को समझने के लिए वीर शिवाजी…

कम्बोडिया में भारतीय संस्कृति की छाप

कंबोडिया में भारतीय संस्कृति की छाप गहराई से दिखाई देती है। खमेर साम्राज्य के समय बने अंकोरवाट जैसे भव्य मंदिर दक्षिण भारतीय शैली का प्रतिरूप हैं। हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म, दोनों ही भारत से वहाँ पहुँचे और आज भी सांस्कृतिक संबंध जीवित हैं।

आंवला नवमी: भारतीय समाज में प्रकृति पूजन का पर्व

अमला नवमी, जिसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है, भारतीय समाज में प्रकृति पूजन की अद्वितीय परंपरा का प्रतीक पर्व है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है, जो भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित माना गया है। वैदिक और पौराणिक काल से चली आ रही…

लोकगाथा भरथरी

भरथरी भारतीय लोकगाथाओं और हिन्दी साहित्य के आदिकालीन संत-कवियों में प्रमुख माने जाते हैं। उनकी कथाएँ और पद्य लोकसाहित्य में गहरी पैठ बनाए हुए हैं। गृहस्थ जीवन से विरक्ति, पत्नी पिंगला और सामदेई से जुड़ी किंवदंतियाँ, तथा योगमार्ग की ओर उनका रुझान उन्हें जनमानस में अमर बनाता है। भरथरी की…

सृष्टि केवल मनुष्य के लिए ही नहीं

डॉ. रेखा व्यास का यह लेख जीव-जंतुओं और मनुष्य के गहरे साहचर्य पर प्रकाश डालता है। इसमें बताया गया है कि प्रकृति के संतुलन और जीवों के साथ मित्रता हमारे जीवन को सुख, संतोष और संवेदनशीलता से भर देती है। जानवरों की सहज बुद्धि, सहनशीलता, निष्ठा और निश्छल प्रेम मानव…

स्वावलम्बन और अखंड भारतः आत्मनिर्भरता से एकता तक

यह लेख स्वावलम्बन और अखंड भारत के संबंध को सांस्कृतिक, आर्थिक, भाषाई और आध्यात्मिक दृष्टि से विश्लेषित करता है। इसमें बताया गया है कि आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता, आत्मगौरव और वैश्विक शांति का मार्ग है।

भंगाराम जात्रा : देवी देवताओं की अदालत

बस्तर अंचल के केसकाल स्थित भंगाराम मंदिर रहस्यमयी मान्यताओं और परंपराओं का केंद्र है। यहाँ भंगाराम को कहीं देवी तो कहीं देवता माना जाता है। भादों जतरा पर्व के लिए प्रसिद्ध यह स्थल देवी-देवताओं के न्यायालय के रूप में विख्यात है, जहाँ नकारात्मक शक्तियों का परीक्षण और निष्कासन किया जाता…

शरद पूर्णिमा का सांस्कृतिक महत्त्व

शरद पूर्णिमा भारतीय परंपराओं का ऐसा पर्व है जिसमें धार्मिक आस्था, वैज्ञानिक दृष्टि और सांस्कृतिक विविधता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। इसे कौमुदी पूर्णिमा, कोजागरी पूर्णिमा, कुमार पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से युक्त होकर अमृतवर्षा करता है…

वीरता और त्याग की प्रतीक: रानी दुर्गावती

यह आलेख रानी दुर्गावती के साहस, शासन कौशल और बलिदान की गाथा प्रस्तुत करता है। शेरशाह सूरी और अकबर की सेनाओं का डटकर सामना करने वाली गढ़ा-मंडला की वीरांगना ने प्रजा-कल्याण और संस्कृति के संरक्षण के साथ भारतीय नारी....

छत्तीसगढ़ में दशहरा की अद्भूत परम्परा

यह आलेख छत्तीसगढ़ में दशहरा की अद्भुत परंपराओं का परिचय कराता है। यहां दशहरा केवल रावण दहन तक सीमित नहीं, बल्कि स्थानीय देवियों, राजवंशों और लोक मान्यताओं से जुड़ा एक विशिष्ट उत्सव है। बस्तर की दंतेश्वरी माता की शोभायात्रा, सक्ती की लकड़ी की तलवार पूजा, सारंगढ़ का गढ़ भेदन, चंद्रपुर…

लोकदेवी पतई माता

छत्तीसगढ़ की लोक आस्था में पूजित पतई माता ग्राम्य जीवन की संरक्षिका लोकदेवी मानी जाती हैं। ग्रामीण इलाकों में पतई माता की पूजा अर्चना विशेष उत्सव और मेलों के रूप में होती है, जहाँ श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ति और ग्राम रक्षा हेतु अटूट विश्वास के साथ दर्शन करने आते हैं।

मावली ही दंतेश्वरी माई है।

दंतेवाड़ा में शंखिनी-डंकिनी नदियों के संगम पर स्थित माँ दंतेश्वरी मंदिर बस्तर की संस्कृति और आस्था का केंद्र है। सहस्राब्दियों से पूजित यह धाम बस्तर दशहरा और फागुन मड़ई जैसे पर्वों का आधार है, जो लोक परंपराओं और श्रद्धा को जीवंत रखते हैं।

बागबाहरा कलां की तीन देवियाँ

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बागबाहरा कला ग्राम में माता खल्लारी थापना, माता चंडी थापना और माता काली मंदिर स्थित हैं। इन तीनों देवियों की स्थापना आस्था, किवदंती और श्रद्धा से जुड़ी है। नवरात्रि के अवसर पर यहाँ मनोकामना ज्योति कलश प्रज्ज्वलित होते हैं और भक्तजन दूर-दूर से दर्शन करने…

बुचीपुर की महामाया माई

छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के नवागढ़ तहसील स्थित बुचीपुर गाँव माँ महामाया के पावन धाम के रूप में विख्यात है। 18वीं शताब्दी से आरंभ हुई यह परंपरा आज भी भक्तों को आत्मिक शांति और मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद देती है। चैत्र और कुँवार माह में यहाँ ज्योति कलश प्रज्ज्वलित करने…

बस्तर दशहरा: शक्ति की उपासना और महिषासुर पर विजय की यात्रा (भाग 03)

यह लेख बस्तर दशहरा के प्रमुख अनुष्ठानों और विधियों का विस्तृत परिचय देता है। इसमें ज्योति कलश स्थापना, जोगी बिठाई, बेल-पूजा, मावली माता का आगमन, रथ-यात्रा, महाअष्टमी-नवरात्र अनुष्ठान, भीतर रैनी, मुरिया दरबार और विदाई तक की परंपराओं का वर्णन है। लेख बताता है कि बस्तर दशहरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि…

समग्र सृष्टि के रचयिता देव शिल्पी विश्वकर्मा

यह आलेख भगवान विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर सृष्टि के महान शिल्पी एवं देव अभियंता भगवान विश्वकर्मा की महिमा और योगदान को उजागर करता है। वैदिक साहित्य से लेकर पुराणों तक विश्वकर्मा को समस्त सृष्टि का रचयिता और दिव्य शिल्पकार माना गया है। प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल और आधुनिक…

भारतीय प्राचीन कथाओं में सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना

भारतीय प्राचीन कथाओं में सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का गहरा संदेश निहित है। वैदिक साहित्य, पुराण, रामायण, महाभारत, जैन-बौद्ध ग्रंथों और पंचतंत्र जैसी रचनाओं में प्रस्तुत कथाएं केवल मनोरंजन के लिए नहीं रची गईं, बल्कि परिवार, समाज, सहयोग, त्याग, सहिष्णुता और सद्भावना जैसे जीवन मूल्यों को स्थापित करने का माध्यम…

भारतीय संज्ञा प्रज्ञा विज्ञान का परिचय

यह आलेख स्वामी विवेकानंद के 1893 के शिकागो धर्मसभा संभाषण के महत्व और भारत की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक परंपरा पर उनके विचारों को उजागर करता है। इसमें बताया गया है कि विवेकानंद ने भारत की पहचान धर्म, संस्कृति और वैदिक परंपरा में निहित बताई थी। उनका मानना था कि राष्ट्रीयता का मूल…

धर्म और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक : डॉ राधाकृष्णन

यह आलेख डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन, शिक्षण दर्शन और विचारों पर प्रकाश डालता है। इसमें माता-पिता और गुरु की भूमिका, गुरु-शिष्य परंपरा, शिक्षा का महत्व, तथा धर्म और विज्ञान के परस्पर पूरक संबंध को विस्तार से समझाया गया है। डॉ. राधाकृष्णन का मानना था कि शिक्षा केवल ज्ञान का…

लद्दाख का सांस्कृतिक महत्त्व

यह आलेख लद्दाख की समृद्ध बौद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहरों, धार्मिक प्रतीकों, नृत्य-गीतों और सामाजिक जीवन पर केंद्रित है। स्तूप, "ॐ मणि पद्मे हूं" जैसे मंत्र, गोम्पा, तांत्रिक परंपरा और पारंपरिक लोकनृत्य लद्दाख की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं। लेख में सम्राट अशोक से लेकर महायान परंपरा, तिब्बती प्रभाव और आधुनिक…

भारतीय संस्कृति का स्वरूप

यह आलेख भारतीय संस्कृति की समृद्ध यात्रा, उसकी कलात्मक, दार्शनिक और सामाजिक विशेषताओं का व्यापक वर्णन करता है। इसमें प्राचीन भारत की मूर्तिकला, चित्रकला, नाट्यकला, नृत्यकला, शिक्षा, दर्शन और जीवन मूल्यों से लेकर वर्तमान समय में संस्कृति पर पड़ते पाश्चात्य प्रभाव तक की चर्चा की गई है। आलेख यह भी…