आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल चतुर्थी | शुक्रवार

नक्षत्र: मघा | योग: व्यतिपात | करण: वणिज

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 जुलाई 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल चतुर्थी | शुक्रवार

नक्षत्र: मघा | योग: व्यतिपात | करण: वणिज

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 जुलाई 2026

पंडवानी: महाभारत आख्यान का लोक स्वरूप

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर का मुख्य आधार लोक कलाएँ हैं। इनमें पंडवानी का स्थान विशिष्ट है। यह महाभारत पर आधारित एक पारम्परिक लोकगाथा है। कलाकार इसके माध्यम से कथा और अभिनय का सीधा प्रदर्शन करके लोक परम्परा को सहेजते हैं।

पूर्वोत्तर भारत के योद्धाओं का भारतीय स्वातन्त्रय समर में योगदान

पूर्वोत्तर भारत के उन वीर योद्धाओं की गौरवशाली गाथा जानें, जिन्होंने मुगलों और अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। लचित बरफूकन, वीर टिकेन्द्रजीत और अन्य बलिदानियों का प्रेरणादायक इतिहास पढ़ें।

आख्यान तथा वाचिक परम्परा

यह लेख भारतीय नाट्यशास्त्र में वाचिक अभिनय के महत्त्व को सामने लाता है। यह लेख औपनिवेशिक सोच को चुनौती देकर सिद्ध करता है कि संवाद और वाणी ही हमारी प्राचीन कला का मूल आधार हैं। दक्षिण कोसल टुडे इस प्रामाणिक अध्ययन का पूर्ण स्वागत करता है।

एन्नायिरम मन्दिर: चोल कालीन शिक्षा प्रणाली का प्रमुख केंद्र

प्रस्तुत लेख में विल्लुपुरम जिले के एन्नायिरम मन्दिर की विस्तृत पड़ताल की गई है। यह मन्दिर चोल काल में एक प्रमुख विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात था। राजेन्द्र चोल प्रथम के संरक्षण में यहाँ ज्ञान और शोध की जो सुदीर्घ परम्परा विकसित हुई वह आज भी हमें विस्मित करती है।

जो हमारे हृदय में प्रकाशित हैं, वे ही राम हैं!

प्रस्तुत लेख भगवान श्रीराम और रामायण के गूढ़ आध्यात्मिक, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक स्वरूप का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। इसमें राम को आत्मा, सीता को मन, हनुमान को प्राण, लक्ष्मण को चेतना और रावण को अहंकार के प्रतीक रूप में समझाया गया है। यह आलेख बताता है कि रामायण केवल एक…

अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति: वीरांगना रानी दुर्गावती का शौर्य

प्रस्तुत लेख वीरांगना रानी दुर्गावती के अद्वितीय शौर्य, स्वाभिमान और कुशल शासन का प्रेरक वर्णन करता है। इसमें उनके युद्ध कौशल, मुगल सेना के विरुद्ध प्रतिरोध, जल प्रबन्धन, सामाजिक समरसता और मातृभूमि की रक्षा हेतु दिए गए महान बलिदान को रेखांकित किया गया है। रानी दुर्गावती का जीवन भारतीय इतिहास…

शैलचित्रों की निरंतरता: अतीत से वर्तमान तक

प्रस्तुत लेख बूंदी क्षेत्र के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों और वर्तमान जनजातीय जीवन शैली के बीच सांस्कृतिक निरंतरता का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसमें भील, मीणा, गरासिया और सहरिया जनजातियों की लोककला, प्रकृति-पूजा, सामूहिक नृत्य, प्रतीकात्मक चित्रण और भित्ति सज्जा को प्राचीन शैलचित्रों से जोड़ते हुए भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों…

गोष्ठिपुरम दिव्यदेशम्: जहाँ आचार्य रामानुज की करुणा ने रचा भक्ति का नया इतिहास

यह लेख तमिलनाडु स्थित गोष्ठिपुरम दिव्यदेशम् की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महिमा को रेखांकित करता है। इसमें आचार्य रामानुज की अट्ठारह यात्राओं, अहंकार-त्याग, गुरु-शिष्य परम्परा और जनकल्याण हेतु मोक्ष मन्त्र को जन-जन तक पहुँचाने की करुणामयी कथा का भावपूर्ण वर्णन किया गया है।

भारतीयता के साकार रूप हैं हमारे राम

यह आलेख छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में भगवान श्रीराम की गहरी उपस्थिति को रेखांकित करता है। जन्म, नामकरण, लोकगीत, अभिवादन, कृषि, विवाह और अंतिम यात्रा तक राम का नाम यहाँ की परम्पराओं, संस्कारों और जनमानस में रचा-बसा हुआ दिखाई देता है।

रानी लक्ष्मीबाई: स्वाभिमान, संघर्ष और बलिदान की गाथा

प्रस्तुत लेख झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन, शौर्य, त्याग और राष्ट्रभक्ति का प्रेरणादायी चित्रण करता है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, युद्ध-कौशल, झाँसी के अधिकार की रक्षा, दुर्गा दल के गठन और 1857 के स्वाधीनता संग्राम में उनके अदम्य नेतृत्व को रेखांकित किया गया है। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान भारतीय…

रानी लक्ष्मीबाई : एक महान वीरांगना

भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम साहस और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक है। इस आलेख में उनका सामान्य परिचय दिया गया है। इसके साथ ही इसमें विदेशी प्रत्यक्षदर्शियों जॉन लैंग और कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स के साक्ष्यों के आधार पर उनके अन्तिम संघर्ष का विवरण है। इतिहास…

स्वाभिमान के अनन्य शिखर: महाराणा प्रताप

प्रस्तुत लेख महाराणा प्रताप के अदम्य साहस, स्वाभिमान, राष्ट्रनिष्ठा और स्वतंत्रता-संकल्प का प्रेरणादायी चित्रण करता है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, सिंहासनारोहण, हल्दीघाटी और दिवेर के युद्ध, भील समाज के सहयोग, चेतक की स्वामीभक्ति तथा भामाशाह के त्याग का वर्णन किया गया है। महाराणा प्रताप का जीवन यह संदेश देता है…

भक्ति और कर्मयोग : सामाजिक सन्तुलन का अटूट सूत्र

यह लेख चेन्नई स्थित तिरुवोट्टियूर के त्यागराजस्वामी मन्दिर की ऐतिहासिक और शैक्षिक भूमिका पर प्रकाश डालता है। चोल काल में यह मन्दिर केवल आस्था का केन्द्र नहीं, बल्कि ओट्रियूर मठ के माध्यम से संचालित एक जीवंत ज्ञान-पीठ था, जहाँ पाणिनीय व्याकरण, वैदिक दर्शन, मीमांसा, आयुर्वेद और शास्त्रार्थ की परम्परा को…

ज्ञान और भक्ति का पावन संगम : तिरुवोट्टियूर का ऐतिहासिक त्यागराजस्वामी मन्दिर

यह लेख चेन्नई स्थित तिरुवोट्टियूर के त्यागराजस्वामी मन्दिर की ऐतिहासिक और शैक्षिक भूमिका पर प्रकाश डालता है। चोल काल में यह मन्दिर केवल आस्था का केन्द्र नहीं, बल्कि ओट्रियूर मठ के माध्यम से संचालित एक जीवंत ज्ञान-पीठ था, जहाँ पाणिनीय व्याकरण, वैदिक दर्शन, मीमांसा, आयुर्वेद और शास्त्रार्थ की परम्परा को…

धरती आबा बिरसा मुंडा: जनजातीय अस्मिता और स्वाधीनता के अमर पुरोधा

बिरसा मुंडा भारतीय स्वाधीनता संग्राम के ऐसे अमर जननायक थे, जिन्होंने औपनिवेशिक शासन, जमीन्दारी शोषण और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के विरुद्ध जनजातीय समाज को संगठित किया। उनका उलगुलान केवल विद्रोह नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, अस्मिता और स्वाधीनता की रक्षा का ऐतिहासिक अभियान था।

रामचरितमानस में पर्यावरणीय संरक्षण : वैदिक ज्ञान और रामराज्य का अद्भुत सन्देश

यह लेख रामचरितमानस में वर्णित रामराज्य के पर्यावरणीय दृष्टिकोण का विश्लेषण करता है। इसमें जल संरक्षण, वृक्षारोपण, वन्यजीवों की निर्भयता, प्रकृति और मानव के सामंजस्य तथा वर्तमान जलवायु संकट के संदर्भ में वैदिक मूल्यों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया है।

मौन का विसर्जन: हेमचन्द्र विक्रमादित्य और २२ विजयों का विस्मृत इतिहास

यह लेख हेमचन्द्र विक्रमादित्य के उपेक्षित ऐतिहासिक व्यक्तित्व, उनकी 22 विजयों, सैन्य रणनीति और दिल्ली पर अधिकार के माध्यम से भारतीय इतिहास के पुनर्पाठ की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इसमें हेमू को केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि असाधारण नेतृत्व और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया…

छिन्दवाड़ा का ऐतिहासिक गौरव: देवगढ़

यह लेख छिन्दवाड़ा के गौरवशाली इतिहास, देवगढ़ के गोण्ड राजवंश, उनके स्थापत्य कौशल, जल प्रबन्धन, धार्मिक-सांस्कृतिक समरसता और जननायक बादल भोई के बलिदान को ऐतिहासिक दृष्टि से प्रस्तुत करता है।

वनवासी राम

विशाल प्रजापत जी का यह आलेख भगवान श्रीराम के वनवासी स्वरूप, धर्मनिष्ठ आचरण, सामाजिक समरसता और लोककल्याणकारी लीलाओं का प्रेरणादायी विवेचन प्रस्तुत करता है। विराध, कबन्ध, शबरी, केवट, जटायु और सुग्रीव जैसे प्रसंगों के माध्यम से यह लेख बताता है कि श्रीराम का वनवास केवल त्याग की कथा नहीं, बल्कि…

पुरुषोत्तम मास: भारतीय विज्ञान और अध्यात्म की समृद्ध परम्परा का संगम

रमेश शर्मा जी का यह लेख अधिकमास अथवा पुरुषोत्तम मास के वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आधारों को स्पष्ट करता है। इसमें सूर्य और चंद्रमा की गति के अंतर से अधिकमास के निर्धारण, पुरुषोत्तम मास के धार्मिक महत्व, आरोग्य, आत्मशक्ति जागरण और समाज में सकारात्मक ऊर्जा के संदेश का संतुलित विवेचन…

जन्म तिथि विशेष: भारतीय संस्कृति और मूर्तिमान वीरता की प्रतीक-  महारानी अहिल्याबाई होल्कर

महारानी अहिल्याबाई होल्कर भारतीय संस्कृति, सुशासन, नारी-शक्ति और मूर्तिमान वीरता की अद्वितीय प्रतीक थीं। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस और प्रजाहित को अपना राजधर्म बनाया। काशी विश्वनाथ, सोमनाथ सहित अनेक तीर्थों के पुनर्निर्माण और समाजसेवा के माध्यम से उनका जीवन आज भी प्रेरणास्रोत है।

वनवास की पावन यात्रा

यह लेख भगवान श्रीराम के जीवन से नेतृत्व, कर्तव्यनिष्ठा, संकट प्रबंधन, त्याग, सत्यनिष्ठा और लोककल्याण के उन आदर्शों को सामने रखता है, जो आज के समाज, प्रशासन और व्यक्तिगत जीवन के लिए भी अत्यंत प्रेरक और प्रासंगिक हैं।

श्रीराम से पढ़िए नेतृत्व के पाठ

यह लेख श्रीराम के जीवनचरित्र को नेतृत्व, संकट प्रबंधन, त्याग, राजधर्म और संस्थागत सत्यनिष्ठा के कालजयी आदर्श के रूप में प्रस्तुत करता है। डॉ. स्मिता शिने श्रीराम के निर्णयों और आचरण के माध्यम से बताती हैं कि सच्चा नेतृत्व व्यक्तिगत सुख से ऊपर उठकर लोकहित, दायित्वबोध और नैतिक प्रामाणिकता को…

मल्हार और राम

यह लेख छत्तीसगढ़ के प्राचीन नगर मल्हार स्थित परमेसरा तालाब की पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करता है। लेखक इसे वाल्मीकि रामायण में वर्णित पंचाप्सर तीर्थ से जोड़ते हुए अचला सप्तमी स्नान, पातालेश्वर महादेव अभिषेक और दक्षिण कोसल की प्राचीन तीर्थ-परंपरा का विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर तिरुचिरापल्ली: जहाँ भगवान आज भी राजा की भांति विराजते हैं

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम, भगवान रंगनाथ की राजसी उपासना, श्रीवैष्णव परम्परा, आलवार संतों की भक्ति और भव्य द्रविड़ स्थापत्य का अद्वितीय संगम है। कावेरी तट पर स्थित यह पावन धाम ‘भूलोक वैकुंठ’ के रूप में पूजित है।

भोरमदेवक्षेत्र की शिल्पकला में रूपायित रामकथा के प्रसंग

भोरमदेव क्षेत्र की मंदिर शिल्पकला में श्रीरामकथा के विविध प्रसंगों का जीवंत अंकन मिलता है। गंडई, घटियारी और सहसपुर के मंदिरों में राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, बालि-सुग्रीव युद्ध और अशोक वाटिका जैसे प्रसंग दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक चेतना और रामभक्ति की प्राचीन परंपरा को प्रमाणित करते हैं।

प्राचीन भारतीय मुद्राओं में श्रीराम

यह लेख प्राचीन भारतीय मुद्राओं में भगवान श्रीराम के अंकन की शोधपूर्ण पड़ताल करता है। शुंग, कुषाण, चौहान, विजयनगर और मुगल कालीन सिक्कों के उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि श्रीराम भारतीय जनमानस, शासन परम्परा और सांस्कृतिक स्मृति में निरन्तर प्रतिष्ठित रहे हैं।

वि-उपनिवेशीकरण की ओर बढ़ता भारत: पुरातात्विक धरोहरों की घर वापसी

यह लेख भारत की अपहृत सांस्कृतिक धरोहरों, विशेषकर भोजशाला से सम्बद्ध माँ वाग्देवी सरस्वती की प्रतिमा की पुनर्वापसी की आवश्यकता पर केन्द्रित है। इसमें औपनिवेशिक काल में भारतीय मूर्तियों, पाण्डुलिपियों और पुरातात्त्विक सम्पदाओं की लूट, उनके विदेशों में संग्रहित होने तथा वर्तमान भारत द्वारा सांस्कृतिक धरोहरों की घर वापसी के…

वनवासी प्रभु श्रीराम: त्याग, और मर्यादा के मूर्तिमन्त रूप

यह आलेख प्रभु श्रीराम के वनवास को त्याग, धर्म, मर्यादा और लोकमंगल की अनुपम यात्रा के रूप में प्रस्तुत करता है। अयोध्या से चित्रकूट, पंचवटी और किष्किन्धा तक के प्रसंगों के माध्यम से श्रीराम के आदर्श चरित्र, सीता-लक्ष्मण की निष्ठा, जटायु की भक्ति और हनुमान मिलन की महत्ता का भावपूर्ण…

कोटा चित्र शैली में श्री राम का चित्रण

यह आलेख कोटा चित्र शैली में भगवान श्रीराम के विविध प्रसंगों का कलात्मक और सांस्कृतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अहिल्या उद्धार, राम-हनुमान मिलन, पुष्पक विमान, लव-कुश प्रसंग और राम दरबार जैसे चित्रों के माध्यम से कोटा शैली की भक्ति, समरसता, लोकसंस्कार और भारतीय कला परम्परा की गहन अभिव्यक्ति को रेखांकित…