संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण शुक्ल चतुर्थी | रविवार
नक्षत्र: हस्त | योग: साध्य | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अगस्त 2026
मुंशी प्रेमचन्द का साहित्य केवल कथाओं का संसार नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज के यथार्थ, संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं का जीवन्त स्वरूप है। डॉ. नेहा प्रधान का यह विशेष लेख प्रेमचन्द की भाषा दृष्टि और उनकी सशक्त सामाजिक चेतना का गम्भीर विश्लेषण करता है, जो वर्तमान परिदृश्य में भी…
बैगा जनजाति 9 वर्ष बाद प्रकृति को समर्पित रसनवा पर्व मनाती है। मोहती का फूल खिलने पर यह समुदाय 15 दिनों तक विशेष पूजा करता है और एक साथ कुटकी तथा शहद का प्रसाद ग्रहण करता है। यह पर्व बैगा चक क्षेत्र की प्राचीन और जीवन्त परम्परा का हिस्सा है।
प्रस्तुत लेख कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि तथा सैनिकों के त्याग का वर्णन करता है। यह लेख बताता है कि कारगिल युद्ध राष्ट्र की रक्षा और नागरिक कर्तव्य के बीच एक गहरा सम्बन्ध स्थापित करता है।
बैगा समाज में विवाह और बेटी की विदाई के समय गाए जाने वाले बिलमा गीत, बिरहा नृत्य, उसके शब्दार्थ और भावार्थ के बारे में विस्तार से जानिए।
विष्णु के उस अद्भुत अवतार के बारे में जानिए जिसने नृसिंह के क्रोध को भी शांत कर दिया। गण्डभेरुण्ड की पौराणिक कथा, मूर्तिकला और इतिहास पर आधारित एक विस्तृत शोध।
गुरु हरगोबिंद साहिब ने मीरी और पीरी के सिद्धान्त के माध्यम से सिख पन्थ को भक्ति, शक्ति, न्याय और आत्मरक्षा का नया जीवनदर्शन दिया। यह लेख उनके तेजस्वी जीवन, अकाल तख्त की स्थापना, सन्त-सिपाही परम्परा और बन्दी छोड़ बाबा के प्रेरक प्रसंग के माध्यम से उनकी अमर विरासत को प्रस्तुत…
यह लेख आगम और तन्त्र परम्परा में भगवान श्रीराम की सूक्ष्म उपस्थिति का गम्भीर विवेचन करता है। इसमें निगम और आगम साधना के भेद के साथ शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध और जैन आगमों में श्रीराम के व्यापक स्वरूप को रेखांकित किया गया है।
प्रस्तुत लेख वीरांगना रानी दुर्गावती के अद्वितीय शौर्य, स्वाभिमान और कुशल शासन का प्रेरक वर्णन करता है। इसमें उनके युद्ध कौशल, मुगल सेना के विरुद्ध प्रतिरोध, जल प्रबन्धन, सामाजिक समरसता और मातृभूमि की रक्षा हेतु दिए गए महान बलिदान को रेखांकित किया गया है। रानी दुर्गावती का जीवन भारतीय इतिहास…
यह लेख जगतजननी की पावन प्राकट्य स्थली पुरैना के धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है। श्रद्धा, भक्ति और लोकआस्था से जुड़ा यह स्थल भक्तों के लिए दिव्य अनुभूति और मातृशक्ति की उपासना का प्रमुख केंद्र है।
यह लेख तमिलनाडु स्थित गोष्ठिपुरम दिव्यदेशम् की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महिमा को रेखांकित करता है। इसमें आचार्य रामानुज की अट्ठारह यात्राओं, अहंकार-त्याग, गुरु-शिष्य परम्परा और जनकल्याण हेतु मोक्ष मन्त्र को जन-जन तक पहुँचाने की करुणामयी कथा का भावपूर्ण वर्णन किया गया है।
यह आलेख छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में भगवान श्रीराम की गहरी उपस्थिति को रेखांकित करता है। जन्म, नामकरण, लोकगीत, अभिवादन, कृषि, विवाह और अंतिम यात्रा तक राम का नाम यहाँ की परम्पराओं, संस्कारों और जनमानस में रचा-बसा हुआ दिखाई देता है।
यह लेख आधुनिक भारत की युवा पीढ़ी के मानसिक संघर्षों, भावनात्मक शून्यता और संवादहीनता की गंभीर चुनौती को रेखांकित करता है। लेखक ने सामाजिक दबाव, पारिवारिक अपेक्षाओं, बेरोजगारी और एकाकीपन के बीच युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ते संकट को भारतीय लोकपरम्परा, पौराणिक प्रसंगों और मानवीय संवेदना के आधार पर…
प्रस्तुत लेख झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन, शौर्य, त्याग और राष्ट्रभक्ति का प्रेरणादायी चित्रण करता है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, युद्ध-कौशल, झाँसी के अधिकार की रक्षा, दुर्गा दल के गठन और 1857 के स्वाधीनता संग्राम में उनके अदम्य नेतृत्व को रेखांकित किया गया है। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान भारतीय…
प्रस्तुत लेख महाराणा प्रताप के अदम्य साहस, स्वाभिमान, राष्ट्रनिष्ठा और स्वतंत्रता-संकल्प का प्रेरणादायी चित्रण करता है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, सिंहासनारोहण, हल्दीघाटी और दिवेर के युद्ध, भील समाज के सहयोग, चेतक की स्वामीभक्ति तथा भामाशाह के त्याग का वर्णन किया गया है। महाराणा प्रताप का जीवन यह संदेश देता है…
यह लेख चेन्नई स्थित तिरुवोट्टियूर के त्यागराजस्वामी मन्दिर की ऐतिहासिक और शैक्षिक भूमिका पर प्रकाश डालता है। चोल काल में यह मन्दिर केवल आस्था का केन्द्र नहीं, बल्कि ओट्रियूर मठ के माध्यम से संचालित एक जीवंत ज्ञान-पीठ था, जहाँ पाणिनीय व्याकरण, वैदिक दर्शन, मीमांसा, आयुर्वेद और शास्त्रार्थ की परम्परा को…
श्री भागचंद चतुर्वेदी के इस लेख में पढ़ें कि भगवान श्रीराम केवल मन्दिरों के देवता नहीं, बल्कि जन-जन के हृदय में बसने वाले आदर्श हैं। इसमें श्रीराम की करुणा, त्याग, समरसता और रामराज्य के उच्च आदर्शों का भावपूर्ण वर्णन है। यह लेख लोकमंगल और सत्य की स्थापना का सच्चा मार्ग…
यह लेख राष्ट्रीय सीमाओं, पासपोर्ट-वीज़ा व्यवस्था, संकीर्ण राष्ट्रवाद और वैश्विकता के बीच फँसी मानवीय संवेदनाओं का गहन विश्लेषण करता है। लेखक बताता है कि तकनीक ने दुनिया को वैश्विक ग्राम तो बना दिया है, पर मानवता आज भी सीमाओं, भय, पहचान और कट्टरपन्थ की बेड़ियों में जकड़ी हुई है। लेख…
यह लेख महामारी, आपदा और सामाजिक संकटों के संदर्भ में भारतीय ऋषि परम्परा, चरक संहिता, अथर्ववेद और पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित प्राचीन आपदा-प्रबन्धन दृष्टि का विश्लेषण करता है। इसमें बताया गया है कि संकट काल में संयम, एकान्तवास, सामाजिक अनुशासन और शास्त्रीय निर्देश समाज की रक्षा के प्रभावी साधन रहे…
यह लेख डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ परिचय’ के माध्यम से छत्तीसगढ़ के इतिहास, लोककथाओं, नामकरण, शैलचित्रों, रियासतों और सांस्कृतिक चेतना का विवेचन करता है। इसमें जनश्रुतियों और ऐतिहासिक सन्दर्भों के आधार पर छत्तीसगढ़ की गौरवपूर्ण परम्परा को समझने का प्रयास किया गया है।
यह लेख तमिल सन्त कवयित्री अव्वैयार की प्रसिद्ध रचना आठिचूड़ी के नैतिक सूत्रों, जीवन दर्शन और सांस्कृतिक महत्त्व को प्रस्तुत करता है। इसमें सत्य, विनम्रता, दानशीलता, क्रोध नियंत्रण, माता-पिता के सम्मान और चरित्र निर्माण जैसे शाश्वत मूल्यों की सरल व्याख्या की गई है।
यह लेख रामचरितमानस में वर्णित रामराज्य के पर्यावरणीय दृष्टिकोण का विश्लेषण करता है। इसमें जल संरक्षण, वृक्षारोपण, वन्यजीवों की निर्भयता, प्रकृति और मानव के सामंजस्य तथा वर्तमान जलवायु संकट के संदर्भ में वैदिक मूल्यों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया है।
विशाल प्रजापत जी का यह आलेख भगवान श्रीराम के वनवासी स्वरूप, धर्मनिष्ठ आचरण, सामाजिक समरसता और लोककल्याणकारी लीलाओं का प्रेरणादायी विवेचन प्रस्तुत करता है। विराध, कबन्ध, शबरी, केवट, जटायु और सुग्रीव जैसे प्रसंगों के माध्यम से यह लेख बताता है कि श्रीराम का वनवास केवल त्याग की कथा नहीं, बल्कि…
कांचीपुरम का कैलाशनाथर मन्दिर केवल भगवान शिव की उपासना का पवित्र केन्द्र नहीं, अपितु प्राचीन भारत की ज्ञान परम्परा का भी महान प्रतीक है। पल्लव काल में यह मन्दिर शिक्षा, साधना और संस्कृति का ऐसा केन्द्र बना जहाँ देशभर से विद्यार्थी आकर तर्कशास्त्र, राजनीति, चिकित्सा, व्याकरण और वेद-वेदांगों का अध्ययन…
यह लेख प्रभु श्रीराम के ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ स्वरूप का प्रेरणादायी विवेचन करता है। इसमें राम के आदर्श पुत्र, शिष्य, भाई, पति, मित्र और लोकनायक रूप के साथ रामराज्य, सामाजिक समरसता, धैर्य, वीरता और आज के समय में राम के जीवन-मूल्यों की प्रासंगिकता को सरल और भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया…
यह लेख भगवान श्रीराम के जीवन से नेतृत्व, कर्तव्यनिष्ठा, संकट प्रबंधन, त्याग, सत्यनिष्ठा और लोककल्याण के उन आदर्शों को सामने रखता है, जो आज के समाज, प्रशासन और व्यक्तिगत जीवन के लिए भी अत्यंत प्रेरक और प्रासंगिक हैं।
यह लेख श्रीराम के जीवनचरित्र को नेतृत्व, संकट प्रबंधन, त्याग, राजधर्म और संस्थागत सत्यनिष्ठा के कालजयी आदर्श के रूप में प्रस्तुत करता है। डॉ. स्मिता शिने श्रीराम के निर्णयों और आचरण के माध्यम से बताती हैं कि सच्चा नेतृत्व व्यक्तिगत सुख से ऊपर उठकर लोकहित, दायित्वबोध और नैतिक प्रामाणिकता को…
यह लेख छत्तीसगढ़ के प्राचीन नगर मल्हार स्थित परमेसरा तालाब की पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करता है। लेखक इसे वाल्मीकि रामायण में वर्णित पंचाप्सर तीर्थ से जोड़ते हुए अचला सप्तमी स्नान, पातालेश्वर महादेव अभिषेक और दक्षिण कोसल की प्राचीन तीर्थ-परंपरा का विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम, भगवान रंगनाथ की राजसी उपासना, श्रीवैष्णव परम्परा, आलवार संतों की भक्ति और भव्य द्रविड़ स्थापत्य का अद्वितीय संगम है। कावेरी तट पर स्थित यह पावन धाम ‘भूलोक वैकुंठ’ के रूप में पूजित है।
भोरमदेव क्षेत्र की मंदिर शिल्पकला में श्रीरामकथा के विविध प्रसंगों का जीवंत अंकन मिलता है। गंडई, घटियारी और सहसपुर के मंदिरों में राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, बालि-सुग्रीव युद्ध और अशोक वाटिका जैसे प्रसंग दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक चेतना और रामभक्ति की प्राचीन परंपरा को प्रमाणित करते हैं।
यह लेख प्राचीन भारतीय मुद्राओं में भगवान श्रीराम के अंकन की शोधपूर्ण पड़ताल करता है। शुंग, कुषाण, चौहान, विजयनगर और मुगल कालीन सिक्कों के उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि श्रीराम भारतीय जनमानस, शासन परम्परा और सांस्कृतिक स्मृति में निरन्तर प्रतिष्ठित रहे हैं।