संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख कृष्ण द्वादशी | गुरुवार
नक्षत्र: रेवती | योग: प्रीति | करण: तैतिल
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 मई 2026
यह आलेख श्रीरामचरितमानस के प्रसंगों के माध्यम से ‘देखना’ और ‘सजग दृष्टि’ के गूढ़ जीवन-दर्शन को अत्यन्त सूक्ष्मता से स्पष्ट करता है। अचल कुमार वैष्णव जी ने रावण, मारीच, हनुमान और भरत जैसे पात्रों के उदाहरणों द्वारा बताया है कि मनुष्य की दृष्टि ही उसके कर्म, विवेक और जीवन की…
सरगुजा अंचल के पारम्परिक लोकगीतों में रामकथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि जनजातीय जीवन, लोकस्मृतियों और सांस्कृतिक आस्था का जीवंत स्वरूप बनकर उपस्थित होती है। यह लेख उरांव, गोंड, कोडाकू और कंवर जैसी जनजातियों के लोकगीतों में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण से जुड़े प्रसंगों का अत्यन्त भावपूर्ण और शोधपरक…
यह आलेख श्रीराम के बहुआयामी आदर्श चरित्र और गोस्वामी तुलसीदास जी के अद्भुत भाषायी कौशल का गम्भीर विवेचन प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार लोकभाषा में रचित श्रीरामचरितमानस ने राम को जन-जन तक पहुँचाया तथा पुत्र, मित्र, पति और राजा के रूप में श्रीराम ने मर्यादा…
यह लेख भगवान श्रीराम के दिव्य एवं मानवीय चरित्र का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें उनके अवतार के ब्रह्मांडीय उद्देश्य से लेकर आदर्श आचरण, मर्यादा, धैर्य और न्याय के सिद्धांतों को समझाया गया है। रामायण को जीवन मार्गदर्शक मानते हुए यह लेख आधुनिक समाज के लिए राम के आदर्शों…
डॉ. अदिति गौड़ के इस शोधपरक आलेख में रामकथा की उस अनन्त यात्रा का विवेचन है, जिसने भारत की सीमाओं को लांघकर विश्वभर में सांस्कृतिक सेतु का निर्माण किया। लोकजीवन, नामकरण, परम्पराओं और रामलीला के विविध रूपों के माध्यम से यह लेख श्रीराम की सर्वव्यापकता और वैश्विक प्रभाव को सजीव…
भारतीय लोकजीवन में भगवान श्रीराम केवल आराध्य देव नहीं, बल्कि संस्कृति, नैतिकता और लोकआस्था के जीवंत प्रतीक हैं। यह लेख भजन, रामलीला और लोकगीतों के माध्यम से भारतीय समाज में रामकथा की अखंड परम्परा और श्रीराम के आदर्शों की शाश्वत उपस्थिति को अत्यन्त भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।
यह लेख आधुनिक युवा पीढ़ी के मानसिक अवसाद, अस्थिरता और दिशाहीनता के संदर्भ में भगवान श्रीराम के ‘स्थितप्रज्ञ’ व्यक्तित्व का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लेखक ने रामायण के प्रसंगों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, आत्मसंयम, कर्मयोग और दायित्वबोध किस प्रकार जीवन को…
छत्तीसगढ़ की धर्मनगरी दामाखेड़ा में आयोजित कबीर पंथियों का संत समागम आध्यात्मिकता, परंपरा और सांस्कृतिक एकता का अद्वितीय संगम है। वसंत पंचमी से माघ पूर्णिमा तक चलने वाले इस आयोजन में विश्वभर से संत और अनुयायी एकत्र होकर कबीर वाणी, सत्यनाम और साधना की परंपरा को जीवंत करते हैं। यह…
बैगा जनजाति की शिकार परंपराएँ उनके प्रकृति-आधारित जीवन, कौशल और वैज्ञानिक समझ का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। इस लेख में धनुष-बाण से लेकर विविध प्रकार के फंदों तथा मछली पकड़ने की पारंपरिक विधियों का विस्तृत वर्णन किया गया है, जो उनकी सामूहिक जीवनशैली और पर्यावरणीय ज्ञान को दर्शाता है…
यह लेख डिजिटल युग में मनुष्य की बदलती पहचान, डेटा आधारित जीवन, सोशल मीडिया के अकेलेपन और तकनीक के बढ़ते प्रभाव पर गंभीर प्रश्न उठाता है।
यह लेख विष्णु के अवतारवाद की दार्शनिक और सांस्कृतिक व्याख्या करते हुए सृष्टि के विकास क्रम को मत्स्य से नृसिंह तक क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से नृसिंहावतार के माध्यम से भक्त प्रहलाद की रक्षा, अहंकार के विनाश और दिव्य न्याय के सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया…
यह लेख भारत की प्राचीन पांडुलिपि परंपरा की ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करता है। इसमें पांडुलिपियों की उत्पत्ति, विविध स्वरूप, ज्ञान-विज्ञान में उनकी भूमिका तथा उनके संरक्षण हेतु ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के महत्व का विशद विवेचन प्रस्तुत किया गया है, जो भारत को पुनः ‘विश्व गुरु’ बनाने…
यह लेख भगवती सीता के दिव्य प्राकट्य और उनके महाशक्ति स्वरूप के गूढ़ रहस्यों को शास्त्रीय प्रमाणों सहित प्रस्तुत करता है। ऋग्वेद, उपनिषद और विभिन्न रामायणों के आधार पर सीता को केवल जनकनन्दिनी नहीं, बल्कि सृष्टि की मूल शक्ति, योगमाया और संहारकारिणी देवी के रूप में व्याख्यायित किया गया है…
यह लेख रामायण के ‘प्रेम पक्ष’ को विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से उजागर करता है, जहाँ प्रेम केवल आकर्षण नहीं बल्कि त्याग, समर्पण और कर्तव्य का उच्चतम रूप बन जाता है। श्रीराम-सीता, भरत, उर्मिला और हनुमान जैसे पात्रों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि रामायण में भक्ति ही…
गंगा तट पर घटित केवट और श्रीराम का यह भावपूर्ण प्रसंग निष्कलुष भक्ति, समर्पण और प्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति है। लेख दर्शाता है कि केवट का हठ वास्तव में ईश्वर के प्रति उसकी अनन्य श्रद्धा थी, जिसके सामने स्वयं प्रभु भी वश में हो जाते हैं।
यह लेख श्रीराम के चरित्र को लोककलाओं के माध्यम से जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है, जहाँ राम केवल पूजनीय देवता नहीं बल्कि जन-जन के अपने, सखा और परिवार के सदस्य बनकर उभरते हैं। मधुबनी, रामलीला, कठपुतली और लोकगीतों के जरिए यह दिखाया गया है कि भारतीय लोकसंस्कृति ने राम…
प्रो. अश्विनी केशरवानी जी का यह शोधपरक लेख प्राचीन महाकोसल (वर्तमान छत्तीसगढ़) में भगवान श्रीराम के दक्षिणापथ गमन से जुड़े पुरातात्विक और लोकतात्विक साक्ष्यों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें रामगढ़ से लेकर बस्तर तक फैले पावन स्थलों, मूर्तिकला, लोकपरम्पराओं और रामनामी समाज की अद्भुत भक्ति परंपरा के माध्यम…
छत्तीसगढ़ की भुंजिया जनजाति में भगवान श्रीराम केवल देवता नहीं, बल्कि परम सखा और रक्षक के रूप में पूजित हैं। यह लेख उनके अद्भुत लोकविश्वास, लाल बंगला परम्परा और लक्ष्मण रेखा से जुड़ी अनोखी कथा के माध्यम से वनवासी जीवन में रची-बसी रामभक्ति की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है।
तिरुपुल्लाणी स्थित ‘आदि जगन्नाथ पेरुमल मन्दिर’ भगवान श्रीराम के उस दुर्लभ क्रोधित स्वरूप का साक्षी है, जब उन्होंने समुद्र के अहंकार को चुनौती दी थी। यह लेख श्रीराम के प्रेम, संकल्प, शरणागति और करुणा के अद्भुत प्रसंगों को प्रस्तुत करता है, जिसमें रामसेतु निर्माण, विभीषण की शरणागति और ‘दर्भशयनम’ रूप…
यह लेख श्रीरामकथा की वैश्विक लोकप्रियता और उसकी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं मानवीय महत्ता का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें दर्शाया गया है कि रामायण केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर यूरोप और अमेरिका तक मानव जीवन के आदर्शों का मार्गदर्शन करती है। विविध धर्मों और…
यह लेख भारत में शाक्त सम्प्रदाय की ऐतिहासिक, दार्शनिक और भौगोलिक यात्रा का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें लोक, तान्त्रिक और भक्ति परम्पराओं के साथ श्रीकुल और कालीकुल जैसे प्रमुख स्वरूपों तथा क्रान्त विभाजन के माध्यम से शक्ति साधना की विविधता को समझाया गया है। देवी को ब्रह्मांडीय ऊर्जा…
निषादराज गुहा भारतीय परंपरा में अटूट भक्ति, सच्ची मित्रता और सेवा भाव के प्रतीक माने जाते हैं। छत्तीसगढ़ की राव-भाट परंपरा में भित्ति चित्रों के माध्यम से श्रीराम और निषादराज के संबंधों को जीवंत रखा गया है। निषादराज जयंती के अवसर पर उनके जन्म, पौराणिक कथाओं और सामाजिक योगदान को…
गणगौर भारत का एक प्रमुख सांस्कृतिक एवं धार्मिक पर्व है, जो शिव और शक्ति के एकात्म स्वरूप का प्रतीक है। यह विशेष रूप से महिलाओं और अविवाहित कन्याओं द्वारा प्रेम, समर्पण और त्याग के भाव के साथ मनाया जाता है। चैत्र मास में 18 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव…
वारुणी पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिन्दू पर्व है, जो जल के देवता वरुण की उपासना और जल के महत्व की स्मृति से जुड़ा है। भविष्यपुराण, नारदपुराण और स्कन्दपुराण जैसे ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। यह पर्व जल संरक्षण, प्रकृति…
यह लेख गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज को समर्पित एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है। इसमें शिवाजी को केवल क्षेत्रीय नायक नहीं, बल्कि अखंड भारत की राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेख विभाजनकारी राजनीति और इतिहास में फैलाए गए मिथ्यावाद की आलोचना करते हुए…
बैगा जनजाति की गोदना परम्परा केवल शृंगार नहीं, बल्कि पहचान, आस्था और जीवन-दर्शन है। आधुनिकता के दबाव में यह अमूल्य धरोहर विलुप्ति के कगार पर है। बैगा चक क्षेत्र की इस सांस्कृतिक विरासत, मान्यताओं और विधियों को समझने के लिए यह आलेख अवश्य पढ़ें।
यह आलेख बांस शिल्प को भारतीय हस्तकला, वनोत्पाद आधारित ग्रामोद्योग और आत्मनिर्भर भारत के संदर्भ में प्रस्तुत करता है। इसमें बांस की पर्यावरणीय उपयोगिता, सांस्कृतिक महत्त्व, आर्थिक योगदान, जनजातीय कारीगरों की भूमिका और ग्रामीण रोजगार सृजन में इसकी बढ़ती संभावनाओं का समग्र विवेचन किया गया है।
महज उम्र का नाम युवा नहीं है! युवा वो है जिसमें राम सा साहस और विवेकानंद सा त्याग हो। जो चुनौतियों को स्वीकारे और पीढ़ियों का भार उठाए, वही असली युवा है। क्या आप इस कसौटी पर खरे उतरते हैं?
रत्ती एक पौधे का बीज है, जो आमतौर पर पहाड़ी और वन क्षेत्रों में पाया जाता है। यह प्राचीन भारतीय मापन पद्धति के एक इकाई के रूप में प्रचलित थी। इसका उपयोग आयुर्वेद में किया जाता है। आइए इस बहुमूल्य बीज गूंजा/रत्ती के बारे में जाने।
यह लेख “समय” की वैज्ञानिक व सांस्कृतिक महत्ता पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा केवल खगोलीय गणना नहीं, बल्कि सृष्टि, ऋतु परिवर्तन और प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक है। यह पर्व जीवन, कृषि और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है।