आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

सरई वृक्ष में विराजमान सरई श्रृंगारिणी माता

सरई श्रृंगारिणी माता का मंदिर 22•9'82"उत्तरी अक्षांश और 82•32'9" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से लगभग 910 फिट की ऊँचाई पर बलौदा ब्लाक के ग्राम डोंगरी में स्थित है। सरई श्रृंगारिणी डोंगरी में सरई पेड़ में विराजमान है। अंचल के लोगों की सरई श्रृंगारिणी माता के प्रति अपार श्रद्घा और…

नाट्यशास्त्र एवं लोकनाट्य रामलीला

रंगमंच दिवस विशेष आलेख

भारत में नाटकों का प्रचार, अभिनय कला और रंग मंच का वैदिक काल से ही निर्माण हो चुका था। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से प्रमाण मिलता है। संस्कृत रंगमंच अपनी चरम सीमा में था। नाटक दृश्य एवं श्रव्य काव्य का रूप है जो दर्शकों को आनंदानुभूति कराती…

दक्षिण कोसल में लौह उत्पादन का केन्द्र

मानव सभ्यता के एक सोपान के रुप में "लौह युग" महत्वपूर्ण स्थान रखता है। लोहे की उत्पत्ति मानव सभ्यता के लिए क्रांतिकारी अविष्कार माना गया है। इस युग में मनुष्य ने मिट्टी में लोहे की पहचान की और उसे मिट्टी से पृथक करने एवं परिष्कृति करने विधि विकसित की। फ़िर…

बसंती चोले के दीवाने : भगत-सुखदेव-राजगुरु

(23 मार्च, बलिदान दिवस पर विशेष)

‘एक जीवन और एक ध्येय’ वाले तीन मित्र भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु, इन तीनों की मित्रता क्रांति के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। बसंती चोले के इन दीवानों की ऐसी मित्रता थी जो जीवन के अंतिम क्षण तक साथ थी और बलिदान के बाद…

बस्तर की फ़ागुन मड़ई और होली के रंग

होली हंसी- ठिठोली और रंग -मस्ती से सराबोर होती है। बस्तर के जनजातीय समाज द्वारा होली अपने अलग अंदाज में मनाई जाती है। वनवासी अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों को संजोए हुए होली मनाते हैं, दंतेवाड़ा के माई दरबार में। छत्तीसगढ़ के बस्तर में दंतेवाड़ा जहां बिराजी हैं आदिवासियों की आराध्य देवी…

भगवा ध्वज लहराया है

स्वाभिमान जागा लोगों का, भगवा ध्वज लहराया है।
रामराज्य की आहट लेकर, नया सवेरा आया है ।

जाति- पाँति के बंधन टूटे, टूट गई मन की जड़ता।
ज्वार उठा भाईचारे का, धुल गई कड़वी कटूता।
निर्भय होकर नर- नारी सब, अपने दायित्व निभाते
उत्पीड़न करने वालों का, नहीं कहीं भय-साया…

बस राम लिखूं

रघुकुल गौरव, अवध सिया के,
दशरथ कोशला राम लिखूं।
या रावण हंता, दुष्ट दलंता,
लंका विजई सम्मान लिखूं।

है अनुज दुलारे भरत भाल,
जिन पर मैं अपना स्वास लिखू।
है अनुज दुलारे लखन लाल,
जिन पर मैं अपना विश्वास लिखूं।

ये सम्मानित राघव रघु कुल,
ना काम क्रोध मद लोभ…

विजयी भारत के प्रेरणास्रोत : छत्रपति शिवाजी महाराज

पूरे उत्तर भारत में मुगलों का शासन था। औरंगजेब जैसा राजा दिल्ली के तख्त पर था। दक्षिण में निजामशाही थी। हिन्दू धर्म खतरे में था। छोटे-बड़े हिन्दू राजा, सेनापति जो अपना पराक्रम, शौर्य मुगलों के लिए खर्च करते थे। ऐसे समय पर 15 वर्षीय बालक शिवाजी सामान्य परिवारों के अपने…

महा मानव महात्मा गाँधी और छत्तीसगढ़ : पुण्यतिथि विशेष

महात्मा गांधी विश्व के लिए सदैव प्रेरणा स्रोत रहेंगे। उन्होंने देश के ऐतिहासिक स्वतंत्रता संग्राम को सामाजिक जागरण के अपने रचनात्मक अभियान से भी जोड़ा, जिसमें शराबबन्दी ,अस्पृश्यता निवारण, सर्व धर्म समभाव, सार्वजनिक और व्यक्तिगत स्वच्छता, खादी और ग्रामोद्योग, ग्राम स्वराज, ग्राम स्वावलम्बन, पंचायती राज और बुनियादी शिक्षा जैसे कई…

ग़ुलामी के बन्धनों में जीना याने स्वयं की ज़िन्दगी को तबाह करना: लाला लाजपत राय

लाला लाजपत राय जयंती विशेष आलेख

उन्होंने कहा था -ग़ुलामी के बन्धनों में जीना याने स्वयं की ज़िन्दगी को तबाह करना है। लेकिन यह भी सच है कि आज़ादी भले ही हमें प्यारी हो, पर उसे पाने का रास्ता हमेशा कठिन चुनौतियों से भरा होता है। - अपने इन्हीं विचारों…

स्वतंत्रता संग्राम में पूर्वोत्तर की प्रतिनिधि यौद्धा : रानी गाईदिन्ल्यू

पूर्वोत्तर के जनजातीय क्षेत्रों में एक लोकोक्ति बड़ी ही प्रचलित है - “सोत पो, तेरह नाती ; तेहे करीबा कूँहिंयार खेती।” अर्थात स्त्री यथेष्ट संख्या में जब बच्चों को जन्म देगी तब ही समाज में खेती सफल होगी। पूर्वोत्तर के हाड़तोड़ श्रम करने वाले समाज में यह कहावत परिस्थितिवश ही…

75 वर्ष स्वतंत्रता के : क्या खोया, क्या पाया

आजादी का अमृत महोत्सव विशेष आलेख

भारत अपनी संस्कृति एवं सभ्यता के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। हमारे धर्मशास्त्र एवं पुराणों में जीवन जीने की कला के साथ साथ धर्म, आध्यात्म ,राजनीति, अर्थ व्यवस्था एवं विज्ञान की चमत्कृत कर देने वाली घटनाएँ एवं गाथाएँ मौजूद हैं। किसी भी…

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस एवं महात्मा गांधी के मतभेद और मतांतर

त्रिपुरी अधिवेशन 1939 में कांग्रेस के वार्षिक अध्यक्ष पद हेतु गांधीयुगीन कांग्रेस में पहली बार चुनाव हुये थे, इस सनसनी खेज तथा आर-पार वाले चुनाव में सुभाष बाबू ने गांधी जी के समर्थित और प्रिय उम्मीदवार को परास्त किया। त्रिपुरी अधिवेशन के पहले कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सभी सदस्यों (जवाहर…

सोनाखान जमींदारी

अठारहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों का राज्य विस्तार इतना अधिक था कि उनके राज्य में कभी सूरज अस्त नहीं होता था, ऐसे विशाल साम्राज्य को चुनौती देकर उनके विरुध्द विद्रोह का शंखनाद करने वाली छ्त्तीसगढ में एक छोटी-सी रियासत थी सोनाखान। सोनाखान की शल्य-श्यामला भूमि में वीर…

संसार को भारत के ‘स्व’ से परिचित कराने वाले स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी हैं, जिन्होंने हिमालय की कंदराओं में जाकर स्वयं के मोक्ष के प्रयास नहीं किये बल्कि भारत के उत्थान के लिए अपना जीवन खपा दिया। विश्व धर्म सम्मलेन के मंच से दुनिया को भारत के ‘स्व’ से परिचित कराने का सामर्थ्य स्वामी विवेकानंद में ही था, क्योंकि…

दक्षिण कोसल के वनों की पहचान : साल वृक्ष

दक्षिण कोसल के वनों की पहचान साल यानी सरई, सखुआ और न जाने स्थानीय लोग इसे क्या-क्या नाम से जानते-पहचानते हैं। साल जिसका वैज्ञानिक नाम सोरिया रोबस्टा है। अपनी सैकड़ों खूबियों की वजह से आज यह वृक्ष न सिर्फ पवित्र माना जाता है, यह पूजनीय भी है। आदिकाल से यह…

गोवा मुक्ति संग्राम में छत्तीसगढ़ की भूमिका एवं योगदान

कैसी विडेबना रही कि स्वतंत्र भारत के 14 वर्षों तक एक बड़ा भू-भाग पुर्तगाल के अधीन रहा। 19 दिसंबर 1961 का वह दिन था जब पणजी में तिरंगा लहराया। उससे पहले स्थानीय निवासियों पर अनेक तरह के प्रतिबंध थे, सेंसरशिप का आलम तो यह था कि विवाह के निमंत्रण पत्रों…

छत्तीसगढ़ी के प्रथम नाटक के रचयिता : पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय

छत्तीसगढ़ के मनीषी साहित्यकारों में बहुमुखी प्रतिभा के धनी पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय का नाम प्रथम पंक्ति में अमिट अक्षरों में अंकित है। हिंदी और छत्तीसगढ़ी साहित्य को उनके अवदान का उल्लेख किए बिना प्रदेश का साहित्यिक इतिहास अपूर्ण ही माना जाएगा।

कवि, कहानीकार, इतिहासकार और पुरातत्वविद तो वह थे…

कला एवं संगीत को समर्पित एशिया महाद्वीप का एकमात्र विश्वविद्यालय

रायपुर से 140 कि.मी. एवं डोंगरगढ से 40 कि.मी. की दूरी पर स्थित खैरागढ, इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय के लिए प्रसिध्द है। स्वाधीनता से पूर्व खैरागढ एक रियासत थी। खैरागढ रियासत की राजकुमारी इंदिरा की स्मृति में स्थापित खैरागढ का इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, एशिया महाद्वीप का इकलौता…

भारत की नाथ सन्यास परम्परा एवं योगी आदित्यनाथ

भारत में नाथ परम्परा प्राचीन काल से ही विद्यमान है,  नाथ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है स्वामी तथा जगत के नाथ आदिनाथ (भगवान शंकर) को प्रथम नाथ माना जाता है, इन्हीं से नाथ संप्रदाय का प्रारंभ होता है। इसके पश्चात अन्य नाथ प्रकाशित होते हैं, जिनमें भगवान दत्तात्रेय एवं…

दक्षिण कोसल का वन वैभव : उदंती अभयारण्य

उदंती अभयारण्य वर्ष 1984 में 237.5 वर्ग किमी के क्षेत्रफ़ल में स्थापित किया गया है। छत्तीसगढ़ उड़ीसा से लगे रायपुर-देवभोग मार्ग पर स्थित है। समुद्र सतह से इसकी ऊंचाई 320 से 370 मी है। अभयारण्य का तापमान न्यूनतम 7 सेंटीग्रेड से अधिकतम 40 सेंटीग्रेड रहता है। पश्चिम से पूर्व की…

बाबासाहेब के निर्वाणकाल की व्यथा : पुण्यतिथि विशेष

कबीर तहां न जाइए, जहाँ सिद्ध को गाँव, स्वामी कहे न बैठना, फिर फिर पूछे नांव। 
इष्ट मिले अरु मन मिले मिले सकल रस रीति, कहैं कबीर तहां जाइए, जंह संतान की प्रीति। 

बाबासाहेब अम्बेडकर के कांग्रेस से जुड़ाव को कबीर के इन दोहों के माध्यम से पुर्णतः प्रकट किया…

मध्यकालीन अंधकार में प्रकाश स्तंभ गुरु नानकदेव

एक राष्ट्र के रूप में भारत ने आज तक की अपनी निंरतर ऐतिहासिक यात्रा में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। इतिहास बताता है कि देश के सांस्कृतिक-आध्यात्मिक आधार के कारण किसी एक आध्यात्मिक विभूति की उपस्थिति ने समाज को पतन से उबारा है। तत्कालीन समाज में व्याप्त अज्ञानता, रूढ़ि और कर्मकांड…

ईसाई षड़यंत्रों के लिए बड़ी चुनौती थे भगवान बिरसा मुंडा

जनजातीय गौरव दिवस विशेष आलेख

वन में रहनेवाले जनजातियों (वनवासियों) को एकत्र कर अंग्रेजी शासकों के दमनकारी एवं कठोर कानून के खिलाफ व्यापक आंदोलन चलाने वाले बिरसा मुंडा आज अपने अनुयायियों के बीच ‘भगवान’ के रूप में पूजे जाते हैं और देशभर में उन्हें वनवासियों का प्रेरणाप्रद नेता माना जाता…

भगवा ध्वज लहराए : सप्ताह की कविता

भगवा ध्वज लहराए, भगवा ध्वज फहराए।
सप्त सिंधु की लहर-लहर में, नव ऊर्जा भर जाए।

घर-घर के आंगन में गूँजे,
उत्सव की किलकारें।
द्वार-द्वार में फूल बिछे हों,
नाचें झूम बहारें।

हर्षित मन का कोना कोना, मंद मंद मुस्काए।
भगवा ध्वज लहराए, भगवा ध्वज फहराए।

अंबर-धरती, दसों दिशा में,
वेद…

छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश के स्मृतिशेष नवगीतकार : विशेष आलेख

नवगीत गीत-परंपरा के विकास का वर्तमान स्वरूप है जिसमें समकालीन परिप्रेक्ष्य का समग्र मूल्यांकन दिखाई देता है । दरअसल नवगीत गीत ही है , वह गीत के अन्तर्गत नवाचार है, कोई अलग विधा नहीं है। अक्सर प्रश्न उठता कि जब गीत की जानकारी के बिना नवगीत नहीं लिखा जा…

अवघट म मिलय राम : मातर विशेष

प्रकाशपर्व दीपावली की प्रतीक्षा हर वर्ग करता है। विशेषकर गौचारण और गौ-पालन करने वाले यदुवंशियों को इस पर्व की विशेष प्रतीक्षा होती है। क्योंकि ये पर्व उनको गौधन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर प्रदान करता है। दीपावली के दूसरे दिन अर्थात गोवर्धन पूजा के दिन से अहीर समुदाय…

जानिए नरक चौदस का महत्व

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी कहा जाता है। नरक चतुर्दशी को 'छोटी दीपावली' भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त इस चतुर्दशी को 'नरक चौदस', 'रूप चौदस', 'रूप चतुर्दशी', 'नर्क चतुर्दशी' या 'नरका पूजा' के नाम से भी जाना जाता है।

नरक शब्द का अभिप्राय मलिनता से…

फणिनागवंशियों के नगर पचराही का पुरातात्विक वैभव

पचराही, छत्तीसगढ के कबीरधाम जिला मुख्यलय से लगभग 45 कि॰ मी॰ दूर हांप नदी के किनारे मैकल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसा एक छोटा सा गांव है। प्राचीन नाम पंचराहों का अपभंश पचराही से समझा जा सकता है। क्योंकि यहां से पांच राहे निकलती है।

जिनमे रतनपुर, मंडला, सहसपुर…

छत्तीसगढ़ के लोक-देवता पर पहला उपन्यास : देवी करिया धुरवा

दुनिया के अधिकांश ऐसे देशों में जहाँ गाँवों की बहुलता है और खेती बहुतायत से होती है, जहाँ नदियों, पहाड़ों और हरे -भरे वनों का प्राकृतिक सौन्दर्य है, ग्राम देवताओं और ग्राम देवियों की पूजा-अर्चना वहाँ की एक प्रमुख सांस्कृतिक विशेषता मानी जाती है। सूर्य, चन्द्रमा, आकाश, अग्नि, वायु, जल…