संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया | शनिवार
नक्षत्र: हस्त | योग: शुभ | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 12 सितंबर 2026
रायगढ़ के साहित्यिक-सांस्कृतिक इतिहास में डॉ. बल्देवप्रसाद मिश्र के बहुआयामी योगदान को रेखांकित करता यह आलेख उनके प्रशासनिक जीवन, ‘तुलसी दर्शन’, शिक्षा, लोकसेवा, साहित्य-साधना तथा राजा चक्रधरसिंह के संरक्षण में विकसित बौद्धिक वातावरण का विस्तार से परिचय प्रस्तुत करता है।
संस्कृत की ध्वनि संरचना, महेश्वर सूत्र, शब्द व्युत्पत्ति, उपनिषद, प्राणायाम, ऊर्जा चक्र और कम्प्यूटर भाषा से उसके संबंध पर केंद्रित यह आलेख भारतीय भाषिक परंपरा के वैज्ञानिक, दार्शनिक और तकनीकी आयामों को विस्तृत रूप में प्रस्तुत करता है।
इस लेख में संस्कृत भाषा के संरक्षण और उसके ज्ञान को युवा पीढ़ी तक पहुँचाने में अनुवाद की भूमिका पर चर्चा की गई है। इसमें प्रोफेसर चित्र भूषण श्रीवास्तव 'विदग्ध' के साहित्यिक अनुवाद कार्यों को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है।
संस्कृत की नियमबद्ध व्याकरणिक संरचना, पाणिनीय सूत्र-पद्धति और भारतीय ज्ञान-परंपरा आधुनिक AI, प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (NLP) तथा अभिकलनात्मक भाषाविज्ञान (Computational Linguistics) के संदर्भ में नई प्रासंगिकता प्राप्त कर रही है। यह आलेख संस्कृत, विज्ञान, दर्शन और तकनीक के अंतर्संबंध को रेखांकित करता है।
यह लेख सरल भाषा में बताता है कि भाषा और शब्द कैसे बने। संस्कृत धातुओं, उपसर्गों, प्रत्ययों, प्रकृति, लोकजीवन और विदेशी संपर्क से शब्दों के विकास को उदाहरणों सहित समझाते हुए यह हमारी सांस्कृतिक चेतना को भी उजागर करता है।
मुंशी प्रेमचन्द का साहित्य केवल कथाओं का संसार नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज के यथार्थ, संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं का जीवन्त स्वरूप है। डॉ. नेहा प्रधान का यह विशेष लेख प्रेमचन्द की भाषा दृष्टि और उनकी सशक्त सामाजिक चेतना का गम्भीर विश्लेषण करता है, जो वर्तमान परिदृश्य में भी…
यह लेख भारत की भाषाई विविधता और उसके पीछे छिपी गहरी सांस्कृतिक एकता पर प्रकाश डालता है। जानिए कैसे रामायण, महाभारत, भक्ति परम्परा, पर्व और तीर्थयात्राएँ अलग-अलग भाषाओं के बावजूद पूरे भारतीय समाज को एक अटूट सांस्कृतिक सूत्र में पिरोती हैं।
यह लेख डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ परिचय’ के माध्यम से छत्तीसगढ़ के इतिहास, लोककथाओं, नामकरण, शैलचित्रों, रियासतों और सांस्कृतिक चेतना का विवेचन करता है। इसमें जनश्रुतियों और ऐतिहासिक सन्दर्भों के आधार पर छत्तीसगढ़ की गौरवपूर्ण परम्परा को समझने का प्रयास किया गया है।
गोंड एवं परधान जनजातियों में प्रचलित ‘रामायनी’ लोकगाथा रामकथा का एक अनूठा और आंचलिक स्वरूप प्रस्तुत करती है, जिसमें लक्ष्मण को प्रमुख नायक के रूप में उभारा गया है। यह कथा लोकजीवन, देशज विश्वासों तथा रामायण और महाभारत के प्रसंगों के अद्भुत समन्वय के माध्यम से सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती…
सात हजार वर्षों की गौरवशाली विरासत, सिकंदर से लेकर अंग्रेजों तक हर बार अंतिम विजय भारत की रही! सावरकर के 'भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ' की यह समीक्षा आपकी सोच बदल देगी। पढ़ें पूरी कहानी
भोरमदेव के मड़वा महल अभिलेख और फणिनागवंशी इतिहास की अनजानी कड़ियाँ। भोणिंगदेव और महाराजा सतीम जैसे शासकों से जुड़ी अभिलेखीय साक्ष्य, सिक्के और ऐतिहासिक संभावनाएँ इस आलेख में समाहित हैं। छत्तीसगढ़ के मध्यकालीन राजवंशों की गूढ़ परतों को समझने हेतु पूरा लेख अवश्य पढ़ें।
कर्मा पर्व मध्य भारत, विशेषकर छत्तीसगढ़ और झारखंड के गोंड, उरांव, बैगा आदि समाज का प्रमुख प्रकृति-पूजा आधारित त्योहार है। कर्म/करम वृक्ष की पूजा से सुख, समृद्धि व फसल उन्नति की कामना की जाती है। आइए जाने कर्म-सिद्धांत से जुड़ा यह पर्व सामूहिक उत्सव से जीवन में कैसे शांति-उन्नति लाता…
यह आलेख छत्तीसगढ़ी फाग गीतों की परंपरा, स्वरूप और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालता है। इसमें ऋतुचक्र, फसलचक्र और वसंतोत्सव के साथ जुड़े फाग गीतों की सामाजिक-धार्मिक अभिव्यक्ति का विवेचन है। राधा-कृष्ण की लीलाएँ, रामकथा प्रसंग, आल्हा गायन और देवर-भाभी संवाद तक, फाग गीत ग्रामीण लोकजीवन, भक्ति और उत्सवधर्मी संस्कृति…
पचराही, छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले का एक प्राचीन पुरातात्विक स्थल है, जो भोरमदेव क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को उजागर करता है। यहाँ 9वीं से 14वीं शताब्दी के फणिनागवंशीय शासन के साक्ष्य, अभिलेख, मूर्तियाँ, सिक्के और मंदिरों के अवशेष मिले हैं। ब्रिटिश काल से लेकर आधुनिक उत्खनन (2007–09) तक…
आंवला नवमी, कार्तिक मास की नवमी तिथि पर मनाया जाने वाला पर्व है, जिसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है। यह दिन त्रेतायुग के आरंभ की स्मृति से जुड़ा है और आयुर्वेद में आंवले के कायाकल्प गुणों का विशेष महत्व है। आंवला नवमी पर आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन…
यह आलेख 'लोक विवेक' की अवधारणा को वाचिक परम्परा और भारतीय समाज के संदर्भ में समझने का प्रयास करता है। इसमें बताया गया है कि लोक विवेक केवल लिखित परम्परा से नहीं, बल्कि लोकजीवन के अनुभव, कहावतों, व्यंग्य, गीतों और मिथकीय प्रतीकों (जैसे घाघ, भड्डुरी, लाल बुझक्कड़) के माध्यम से…
भोरमदेव मंदिर, जिसे अक्सर "छत्तीसगढ़ का खजुराहो" कहा जाता है, अपनी अद्वितीय स्थापत्य शैली और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। 11वीं–12वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर फणिनागवंशी शासकों और कलचुरियों के सांस्कृतिक-संबंधों को दर्शाता है। मंदिर के नामकरण और निर्माता को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं, पर अभिलेखीय…
यह आलेख हिंदी दिवस के महत्व और हिंदी भाषा की विकास यात्रा पर केंद्रित है। इसमें संस्कृत से लेकर प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक हिंदी तक की भाषाई प्रगति को रेखांकित किया गया है। स्वतंत्रता पश्चात संविधान सभा द्वारा हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने की ऐतिहासिक प्रक्रिया, गांधी जी और…
झाँसी जनपद उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पश्चिमी छोर पर स्थित है, जिसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक है। इसका प्राचीन नाम बलवंतनगर था और यह नगर ओरछा नरेश राजा वीरसिंह देव द्वारा स्थापित किया गया था। झाँसी प्रागैतिहासिक काल से मानव निवास का क्षेत्र रहा है, जहाँ पाषाणयुगीन उपकरण, ताम्रपाषाणकालीन अवशेष…
ईन्द पर्व झारखण्ड का एक प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव है जिसकी परंपरा लगभग दो हजार वर्षों से चली आ रही है। नागवंशी शासकों के काल से जुड़ा यह पर्व विभिन्न समुदायों की सहभागिता, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इन्द्रदेव की कृपा और अच्छी वर्षा की कामना…
यह आलेख छत्तीसगढ़ की वाचिक परंपराओं में हाना (मुहावरे/लोकोक्तियों) की महत्ता को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि कैसे हाना लोकजीवन के अनुभवों, प्रकृति, इतिहास, धर्म, समाज और पारिवारिक जीवन से जन्म लेकर छत्तीसगढ़ की संस्कृति का दर्पण बनते हैं। कम शब्दों में गहरी बात कहने की क्षमता, हास्य…
यह आलेख राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में अभिव्यक्त मानव प्रेम, समता, संवेदनशीलता और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की उदात्त भावना को दर्शाता है। गुप्त जी ने धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंगों के माध्यम से मनुष्यत्व, त्याग, करुणा, और वसुधैव कुटुंबकम् की चेतना को काव्य में पिरोया। उनके राम मानव-प्रेम के…
राजस्थान के दक्षिण-पूर्व में स्थित बूंदी, कोटा, बारां और झालावाड़ जिलों को मिला कर बना हाड़ौती क्षेत्र लोक साहित्य की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध रहा है। यहाँ की लोकभाषा ‘हाड़ौती’ में लोकगीत, लोकनाट्य, गाथाएँ, कहावतें, प्रहेलिकाएँ, गद्य-पद्य तथा संत साहित्य की सशक्त परम्परा रही। विवाह, संस्कार, पर्व-त्योहार, कृषि और भक्ति…
यह लेख स्वामी दयानंद सरस्वती की दृष्टि से पौराणिक अवतारों की वैज्ञानिक व्याख्या करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे मत्स्य से लेकर श्रीराम और श्रीकृष्ण तक के अवतार, मानव सभ्यता और प्रकृति के क्रमिक विकास का प्रतीक हैं। जल, मृदा, वनस्पति, पशु और मानव रूपी विकास की इस…
उड़िया भाषा का विकास पूर्वमागधी अपभ्रंश से होकर 11वीं शताब्दी में प्रारंभ हुआ, जिसका प्रमाण उर्जाम शिलालेख एवं चर्यागीतिका में मिलता है। इस विस्तृत आलेख में उड़िया लोक साहित्य के विविध आयामों – जैसे लोकगीत, लोककथा, लोकनाट्य, गाथाएं, कहावतें, झूला गीत, श्रम गीत, मंत्र गीत आदि – का विश्लेषण किया…
यह लेख पर्यटन और भारतीय साहित्य के गहरे संबंध को उजागर करता है। यात्रा के अनुभवों ने किस प्रकार धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक चेतना, साहित्यिक अभिव्यक्ति और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को जन्म दिया—लेख में इसका विश्लेषण किया गया है। भक्त कवियों से लेकर आधुनिक यात्रावृत्त लेखकों तक, भारतीय भाषाओं में यात्रा-साहित्य की…
यह आलेख भोजपुरी अंचल की लोकगीत परंपरा ‘पवाँरा’ पर केंद्रित है, जो गीत, कथा और नाट्य के अद्भुत समन्वय से जीवन के संस्कारों, पर्वों और सामाजिक मूल्यों को प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से शिशु जन्म जैसे अवसरों पर गाया जाने वाला यह गीत-नृत्य ग्रामीण समाज में आज भी भावनात्मक…
तमिल साहित्य और संस्कृति का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है, जिसकी जड़ें प्राचीन तमिल भाषा, विश्वबंधुत्व की भावना, भक्ति आंदोलन, और सामाजिक सुधारों में गहराई से जुड़ी हैं। संघकालीन युग से लेकर आधुनिक काल तक तमिल साहित्य ने शिव-भक्ति, वैष्णव प्रेम, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय भावनाओं को समेटते हुए अपनी…
प्राची घाटी ओडिशा का एक प्राचीन सांस्कृतिक परिदृश्य है, जो कलिंग सभ्यता की जीवंत विरासत, मंदिर वास्तुकला, और जैन, बौद्ध, शैव, शक्त और वैष्णव संप्रदायों के सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व को प्रदर्शित करता है। यह सदियों से चली आ रही आध्यात्मिक भक्ति और कलात्मक उत्कृष्टता का जीवंत प्रमाण है। हाल के पुरातात्विक…
18 जून सन्, 1576 हल्दीघाटी के महान् युद्ध और हिंदुत्व की विजय स्मृति में सादर समर्पित -प्रामाणिक शोध