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पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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युवा: अतीत और भविष्य के मध्य का 'वर्तमान'

युवा: अतीत और भविष्य के मध्य का 'वर्तमान'

एक बहुत ही सामान्य समझ में कहूं तो युवा हम उसे कहते हैं जो गुजर रही पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी के मध्य में समय के सापेक्ष अपना जीवन जी रहा होता है। उसे हम भूत और भविष्य के बीच का वर्तमान भी कह सकते हैं। क्यों... है न यही? 
यदि हां! तो बताइए क्या युवा होने का एक मात्र अर्थ एक निश्चित वर्ष की जैविक आयु का होना भर है? क्या युवा होना आयु के फ्रेम में 'अ' से 'ब' तक की यात्रा करना भर है?

या फिर... युवा होने का सचमुच में अर्थ इससे बढ़कर भी कुछ और है?

युवा कहलाने का अर्थ किसी विशेष आयु वर्ग का प्रतिनिधित्व करना मात्र ही नहीं होता। युवा वह है जो अपनी अपहृत पत्नी को समुद्र के उस पार होना जानकर, एक निमिष मात्र में ही समुद्र को बांध लेने का अदम्य साहस कर बैठता है।

युवा वह है जो मथुरा नरेश कंस के छाती पर प्रहार करके उसका वध कर लेने के बाद भी उसके सिंहासन को मुस्कुराकर त्याग देता है और उस सिंहासन पर अपने मातामह को बिठा देता है।

युवा वह है जो धर्म को पुनर्जीवित करने के लिए दक्षिण के कालड़ी से उत्तर के हिमालय तक एक सांस्कृतिक यात्रा करता है और देश को अखंड अद्वैत के सिद्धांत में बांध कर रख देता है।

युवा वह है जो अपने घर से नरेंद्रनाथ दत्त बनकर तो निकलता है लेकिन देश के युवक-युवितियों को आध्यात्मिकता पर आधारित राष्ट्रवाद का एक ऐसा मजबूत पाठ पढ़ाता है कि संसार उसे विवेकानंद कहकर पुकारने लगता है।

यथार्थ में.... युवा वही है जो साहस कर सके, युवा वही है जो दूसरों के सुख के लिए अपने हिस्से का सुख त्याग सके, युवा वही है जो चुनौतियों को स्वीकार कर सके, युवा वही है जो अपनी सहायता स्वयं कर सके और युवा वही है जो अपने कंधे पर पीढ़ियों की अपेक्षाओं का भार ढो सके।

विश्व धर्म सम्मेलन, 1893
विश्व धर्म सम्मेलन, 1893

पता है! नरेंद्रनाथ का जन्म कलकत्ता के एक प्रसिद्ध दत्त परिवार में हुआ था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त उस काल में कलकत्ता हाईकोर्ट के जाने-माने वक़ील हुआ करते थे।

विवेकानंद जी के पिता विश्वनाथ दत्त
विवेकानंद जी के पिता विश्वनाथ दत्त

एक दिन विधाता की एक निष्ठुर योजना से विश्वनाथ दत्त काल के गाल में समा गए। पिता के इस अचानक देहावसान के बाद उनके परिवार पर आए गंभीर आर्थिक संकट के कारण नरेंद्रनाथ एक मामूली नौकरी तक की तलाश में दिन-दिन भर भटकते रहते थे।

सन्यासी बनकर लोक को प्रबोधन देने की बात तो दूर, उनका तो अधिकांश समय घर के लिए दोनों समय के भोजन की व्यवस्था में ही खप जा रहा था। साहूकारों का ऋण, घर बचाने की कानूनी लड़ाई जैसे चुनौतियां उन्हें 'उठने, जागने और लक्ष्य तक पहुंचने' से रोक रहीं थीं। 

फ़िर एक दिन वह समय आता है जब उनके गुरु श्रीरामकृष्ण अपनी महासमाधि से तीन या चार दिन पहले उन्हें अपने पास बुलाते हैं और भावी कार्य का संपूर्ण भार उनके कंधों पर विधिवत सौंप देते हैं। दायित्व मिलते ही नरेंद्रनाथ अपने व्यक्तिगत दुःख से कहीं बड़ा.... इस संसार के दुःख का वरण करते हैं।

स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद जी

सौंपे गए दायित्व को स्वीकारने का साहस ही तो एक युवा का चरित्र होता है न! नरेंद्रनाथ भी परिव्राजक बनकर अपनी युवा चरित्र का प्रमाण देते हैं।

एक युवा के होने से ही देश का होना सिद्ध होता है। युवा पीढ़ी हमेशा ही समाज में ऊर्जा, नवाचार और नए विचार को लेकर आती है। इस देश में ऐसे अनेक युवा-युवती हुए जिन्होंने अन्याय को चुनौती देते हुए अपनी दृढ़ता और साहस से आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा की नई परिभाषा को गढ़ा है।

चाहे स्वाधीनता की समर में फांसी के फंदे को चूमते खुदीराम बोस समेत तत्कालीन अनेक युवा बलिदानी हों या दक्षिण एशिया की पहली महिला चिकित्सक आनंदीबेन जोशी हो। चाहे धरती आबा बिरसा मुंडा हो या दिव्यांग पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा हो..…. ऐसे और भी तमाम नाम हैं जो युवा थे और आज सभी के सभी प्रणम्य हैं।

लेखक:
श्री करूणा सागर पण्डा 
रायपुर (छत्तीसगढ़)

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