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नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

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योगिनी एकादशी व्रत महात्म्य

योगिनी एकादशी व्रत महात्म्य


'योगिनी' का शाब्दिक अर्थ है- वह जो आत्मा का परमात्मा से मिलन कराए अथवा जो बिखरे हुए को पुनः 'योग' (जोड़) दे। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मानव के मन, वचन और कर्म में जो भटकाव या बिखराव उत्पन्न हो जाता है, यह पवित्र व्रत उसे समेटकर साधक को आत्मिक एकाग्रता प्रदान करता है। इसी कारण इसे 'योगिनी एकादशी' कहा जाता है।


पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में आषाढ़ मास की कृष्ण एकादशी को 'योगिनी एकादशी' के नाम से उल्लेखित है। हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाने वाला यह व्रत अत्यन्त पुण्यदायी और पापों का नाश करने वाला माना जाता है। योगिनी एकादशी का उल्लेख पद्म पुराण और भागवत पुराण में मिलता है। यह व्रत विशेष रूप से नरक और दुर्गति से मुक्ति दिलाने वाला कहा गया है।यह व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला और 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के पुण्य के समान फल देने वाला बताया गया है।

योगिनी एकादशी, पद्म पुराण
पद्मपुराण में उल्लेखित योगिनी एकादशी

पुराणों में इसकी कथा इस प्रकार से बताई गई है। एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, "हे माधव! कृपया मुझे आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी के सम्बन्ध में कथा, विधि और उसका माहात्म्य बताइए।"

भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, "यह एकादशी योगिनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध है। एक समय की बात है जब अलकापुरी में कुबेर नामक यक्षराज राज्य करते थे। वे भगवान शिव के परम भक्त थे। उनके पुष्पों का विशाल उद्यान था, जिसकी देखभाल हेममाली नामक माली करता था। वह यक्षराज कुबेर को भगवान शिव के पूजन हेतु प्रतिदिन उद्यान से पुष्प लाकर देता था।

श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर के बीच एकादशी संवाद योगिनी एकादशी, पद्म पुराण
धर्मराज युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण: योगिनी एकादशी संवाद

एक दिन हेममाली अपनी पत्नी विशालाक्षी के सौन्दर्य में आसक्त होकर कुबेर को पूजन हेतु समय पर उद्यान से पुष्प नहीं दे पाया। कुबेर को दोपहर तक पूजन हेतु उसकी प्रतीक्षा करनी पड़ी। उन्होंने क्रोधित होकर उसे शाप दिया, 'हे मूर्ख! तू अपने कर्तव्य से च्युत हुआ है, इसलिए अब तू कुष्ठरोगी होकर मृत्युलोक में रहेगा।'

शीघ्र ही हेममाली भूमि पर आ गिरा और उसे भयंकर कुष्ठ रोग हो गया। उसने वर्षों तक कष्ट भोगे और वह जंगल में भटकता रहा। घूमते-घूमते वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुँच गया, जो ब्रह्मा की सभा के समान तेजस्वी लग रहा था। हेममाली वहाँ जाकर उनके चरणों में गिर गया और मुनि मार्कण्डेय को अपनी व्यथा सुनाई।

हेममाली, मार्कण्डेय को अपनी व्यथा सुनाई, योगिनी एकदशी
मुनि मार्कण्डेय को अपनी व्यथा सुनाते हेममाली

मार्कण्डेय मुनि ने करुणावश उससे कहा कि यदि तुम आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करोगे, तो तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएँगे। यह सुनकर हेममाली ने अत्यन्त प्रसन्न होकर मार्कण्डेय ऋषि को दण्डवत् प्रणाम किया। ऋषि के निर्देशानुसार हेममाली ने योगिनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से हेममाली के पाप नष्ट हुए और वह स्वर्ग को प्राप्त हुआ। वहाँ वह अपने पूर्व स्वरूप में आकर अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।"

महत्व- यह व्रत दस हजार वर्षों तक तप, यज्ञ और दान से भी अधिक पुण्यदायी माना गया है। इस व्रत के अनुष्ठान से मन और शरीर की शुद्धि होती है, जिससे साधक की साधना में वृद्धि होती है। जो भी साधक श्रद्धा से यह व्रत करता है, उसकी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की कामनाओं की पूर्ति होती है।

व्रत विधि- व्रती को दशमी तिथि की रात्रि को सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। एकादशी के दिन उपवास, जप, ध्यान, दान और भगवान विष्णु की पूजा करें। रात्रि में जागरण और भजन-कीर्तन करना विशेष फलदायी है। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं पारण करें। योगिनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने का माध्यम है। यह व्रत हमें संयम, श्रद्धा और भक्ति की ओर प्रेरित करता है तथा सांसारिक रोग, दुख और बंधनों से मुक्त करने में सहायक है।


- दक्षिण कोसल टुडे डेस्क

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