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योग यात्रा स्वयं से परम चेतना तक की जीवन-यात्रा

योग यात्रा स्वयं से परम चेतना तक की जीवन-यात्रा


वर्तमान में मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के बीच भी तनाव और अकेलेपन से जूझ रहा है। आंजनेय विश्वविद्यालय की सहायक प्राध्यापक रश्मि वर्मा द्वारा लिखित लेख "योग यात्रा स्वयं से परम चेतना तक की जीवन-यात्रा" इसी आंतरिक सूनेपन का समाधान प्रस्तुत करता है। यह लेख स्पष्ट करता है कि योग केवल देह के लिए व्यायाम मात्र नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के बीच तालमेल बिठाने का विज्ञान है। इसमें योग के तीन सोपान शारीरिक शुद्धि, मानसिक संतुलन और आत्मचिंतन को समझाया गया है। प्रकृति और अनुशासन को महत्त्व देते हुए लेख यह सिद्ध करता है कि योग बाहर की दुनिया को जीतने से पहले, अपने भीतर के ब्रह्मांड को शांत करने की वास्तविक जीवन-यात्रा है।


मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन एक यात्रा है। इस यात्रा में वह जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक अनुभवों, संघर्षों, सफलताओं और असफलताओं से होकर गुजरता है। प्रत्येक व्यक्ति सुख, शान्ति, प्रेम और आत्मसन्तोष की खोज में निरन्तर आगे बढ़ता रहता है। मनुष्य बाहरी सफलताएँ प्राप्त कर लेता है। इसके बाद भी उसके भीतर एक सूनापन बना रहता है। उसने संसार की यात्रा बहुत की है। उसने स्वयं के भीतर की यात्रा नहीं की है। यही आन्तरिक यात्रा "योग यात्रा" कहलाती है।

योग यात्रा किसी विशेष स्थान तक पहुँचने का नाम नहीं है। यह अपने शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के बीच तालमेल बनाने की प्रक्रिया है। यह यात्रा हमें बाहरी आकर्षणों से हटाकर भीतर की शान्ति का अनुभव कराती है। मनुष्य जब अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है तब उसके जीवन में स्थायी सुख, सन्तुलन और आनन्द आता है।

आज का मनुष्य सुख सुविधाओं से सम्पन्न है। इसके बाद भी वह मानसिक तनाव, भय, असन्तोष और अकेलेपन से घिरा हुआ है। इसका मुख्य कारण जीवन में सन्तुलन की कमी है। योग हमें यही सन्तुलन देता है। योग का अर्थ जोड़ना है। स्वयं को स्वयं से, प्रकृति से, समाज से और अन्ततः परमात्मा से जोड़ना ही योग है। यह जुड़ाव जीवन को सार्थक बनाता है।

योग यात्रा का पहला चरण शरीर की शुद्धि और स्वास्थ्य से प्रारम्भ होता है। स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ मन का आधार है। योगासन, प्राणायाम और शुद्धि की प्रक्रियाएँ शरीर को रोगमुक्त, ऊर्जावान और सन्तुलित बनाती हैं। शरीर स्वस्थ होने पर मन भी स्थिर होने लगता है। योग व्यायाम होने के साथ जीवन जीने का वैज्ञानिक तरीका है।

योग यात्रा का दूसरा चरण मन की शुद्धि है। मन स्वभाव से चंचल है। इच्छाएँ, भय, क्रोध, ईर्ष्या और मोह मन को अशान्त बनाए रखते हैं। ध्यान, प्राणायाम और मन्त्र जप से मन धीरे-धीरे शान्त होने लगता है। मन शान्त होने पर व्यक्ति सही निर्णय ले पाता है। वह जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना भी धैर्य के साथ करता है।

योग यात्रा का तीसरा चरण आत्मचिन्तन है। व्यक्ति स्वयं को समझने का प्रयास करता है। तब उसे अपने दोष, गुण और जीवन का वास्तविक उद्देश्य दिखाई देने लगता है। वह दूसरों को बदलने के स्थान पर स्वयं को बदलने का प्रयास करता है। यह बदलाव उसके व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनाता है। योग हमें संसार को बदलने से पहले स्वयं को बदलना सिखाता है।

योग यात्रा का उद्देश्य व्यक्तिगत विकास के साथ सामाजिक और आध्यात्मिक विकास भी है। व्यक्ति योग से अपने भीतर प्रेम, करुणा, सेवा और साथ मिलकर जीने की भावना जगाता है। इसके बाद उसका जीवन समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है। वह अपने सुख के साथ सबके कल्याण के लिए कार्य करने लगता है। यही योग का बड़ा स्वरूप है।

भारतीय संस्कृति में तीर्थयात्रा का विशेष महत्त्व है। लोग विभिन्न पवित्र स्थलों की यात्रा करते हैं। वहाँ का वातावरण मन को शान्ति और श्रद्धा से भर देता है। बाहरी यात्रा के साथ आन्तरिक यात्रा न होने पर तीर्थ मात्र पर्यटन बनकर रह जाता है। योग यात्रा इन दोनों का सुन्दर तालमेल है। इसमें प्रकृति का साथ, आध्यात्मिक वातावरण, साधना, सेवा और आत्मचिन्तन एक साथ चलते हैं।

प्रकृति स्वयं एक महान योगाचार्य है। पर्वत हमें धैर्य का सन्देश देते हैं। नदियाँ निरन्तर बहने की प्रेरणा देती हैं। वृक्ष निःस्वार्थ सेवा का पाठ पढ़ाते हैं। आकाश हमें बड़ी सोच अपनाने की शिक्षा देता है। हम योग यात्रा के समय इन प्राकृतिक तत्वों के बीच साधना करते हैं। इससे हमारे भीतर नई ऊर्जा और सकारात्मक सोच आती है। प्रकृति के निकट बिताया गया प्रत्येक पल मन को शान्ति देता है।

योग यात्रा हमें वर्तमान पल में जीना सिखाती है। मनुष्य प्रायः पुराने समय की यादों में उलझा रहता है। वह भविष्य की चिन्ताओं में भी खोया रहता है। योग हमें वर्तमान में रहने की कला सिखाता है। हम जब वर्तमान में जीना सीख जाते हैं, तभी जीवन का वास्तविक आनन्द मिलता है।

योग यात्रा का एक प्रमुख भाग अनुशासन है। नियमित दिनचर्या, सात्त्विक भोजन, समय पर जागना, प्रार्थना, ध्यान, स्वाध्याय और सेवा, ये सभी योगमय जीवन के आधार हैं। अनुशासन व्यक्ति को मजबूत बनाता है। यह उसे लक्ष्य पाने के योग्य भी बनाता है। बिना अनुशासन के योग मात्र एक क्रिया बनकर रह जाता है। अनुशासन जुड़ने पर यही योग जीवन का दर्शन बन जाता है।

योग यात्रा में गुरु का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। गुरु ज्ञान देने के साथ जीवन की दिशा दिखाने वाला प्रकाश है। वह साधक को उसके भीतर छिपी हुई सम्भावनाओं की जानकारी देता है। गुरु के मार्गदर्शन में की गई साधना अधिक प्रभावी और सुरक्षित होती है। इसी कारण भारतीय परम्परा गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान मानती है।

योग यात्रा हमें सिखाती है कि बाहरी सफलताओं से जीवन की सफलता का पता नहीं चलता है। मन शान्त होने, विचार सकारात्मक होने, सम्बन्ध मधुर होने और आत्मा सन्तुष्ट होने पर ही सच्ची सफलता मिलती है। व्यक्ति के पास बहुत धन होने पर भी यदि उसका मन अशान्त है, तो हम उसे वास्तव में समृद्ध नहीं मान सकते। योग इसी आन्तरिक समृद्धि का रास्ता दिखाता है।

वर्तमान समय में युवाओं के लिए योग यात्रा का महत्त्व और अधिक बढ़ गया है। प्रतियोगिता, तनाव, डिजिटल जीवनशैली और असन्तुलित दिनचर्या के कारण युवाओं में मानसिक और शारीरिक समस्याएँ बढ़ रही हैं। योग उन्हें आत्मविश्वास, एकाग्रता, सकारात्मक सोच और स्वस्थ जीवन देता है। योग यात्रा युवाओं को सफल बनाने के साथ एक संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक भी बनाती है।

योग यात्रा का अन्तिम लक्ष्य स्वयं को जानना है। साधक जब अपने भीतर परम शान्ति का अनुभव कर लेता है, तब उसके जीवन में भय, द्वेष और अहंकार समाप्त होने लगते हैं। वह प्रत्येक प्राणी में उसी परमात्मा का स्वरूप देखता है। यह योग की सबसे ऊँची अवस्था है। इस अवस्था में व्यक्ति स्वयं में स्थित होकर सम्पूर्ण सृष्टि के साथ गहरा जुड़ाव महसूस करता है।

अन्ततः योग यात्रा किसी एक दिन, एक स्थान या एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। यह जीवन भर चलने वाली साधना है। यह यात्रा हमें स्वयं से मिलाती है। यह हमारे जीवन को उद्देश्य देती है। यह हमें स्वस्थ, सन्तुलित, संवेदनशील और आध्यात्मिक बनाती है। प्रत्येक व्यक्ति के योग यात्रा अपनाने से उसका व्यक्तिगत जीवन सुखमय होता है। इसके साथ ही परिवार, समाज और राष्ट्र भी शान्ति, प्रेम और सद्भाव से भर जाते हैं। योग यात्रा का सार यह है कि बाहर की दुनिया को जीतने से पहले अपने भीतर के मन को जीतना आवश्यक है। मन शान्त, हृदय पवित्र और आत्मा जागृत होने पर ही जीवन की वास्तविक यात्रा पूरी होती है। 

लेख -
rashmi verma raipur chhattisgarh

सुश्री रश्मि वर्मा
सहायक प्राध्यापक, योग विभाग
आंजनेय विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़

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