भारतीय डाक सेवा की ऐतिहासिक यात्रा
October 09, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

राजस्थान हमारी भारतीय संस्कृति का एक ऐसा केंद्र है, जहाँ आज भी भारतीय जीवन-दर्शन की मूल चेतना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यहाँ के उत्सव अपनी परंपराओं, आत्मीयता और सांस्कृतिक मूल्यों के माध्यम से भारत की समृद्ध सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यक्त करते हैं।
लोकजीवन से जुड़ी कई परंपराएं यहाँ के मेलों में दिखाई देते हैं। यहाँ की चिर-परिचित, सुमधुर पंक्तियाँ “केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश” राजस्थान की “अतिथि देवों भव:” की परंपरा को चरितार्थ करते हैं।

राजस्थान में “अतिथि देवों भव:” की परंपरा
स्थानीय निवासियों के अनुसार यह मेला राजवंशों के काल से चला आ रहा है, जिसे 1958 ईस्वी में राज्य सरकार का संरक्षण प्राप्त हुआ। इस मेले को विश्वविख्यात बनाने में मारवाड़ के शासक उम्मीद सिंह को प्रणेता माना जाता है। वर्तमान समय में इसका आयोजन नगर परिषद, पशुपालन विभाग एवं राज्य पर्यटन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में किया जाता है।

मारवाड़ के शासक उम्मीद सिंह
लोकमान्यताओं के अनुसार ग्राम-भूमि से रामदेव जी की प्रतिमा के प्रकट होने के पश्चात यहाँ देवालय का निर्माण कराया गया। मेले में आने वाले पशुपालक सर्वप्रथम इस मंदिर में दर्शन कर अपने पशुओं के स्वास्थ्य एवं समृद्धि की प्रार्थना करते हैं, तत्पश्चात पशुओं की क्रय-विक्रय आरंभ करते हैं।
यह मेला विशेष रूप से अपनी सुदृढ़ एवं प्रभावशाली कद-काठी वाले “नागौरी बैलों” के लिए प्रसिद्ध है, जो प्रकृति की अनुपम देन माने जाते हैं। इस गोवंश की उत्पत्ति नागौर क्षेत्र के सुहालका प्रदेश से मानी जाती है। नागौरी बैल देश के अत्यंत प्रसिद्ध दौड़ने वाले गोधन हैं।

प्रसिद्ध नागौरी बैल
प्रायः श्वेत रंग के ये बैल चुस्त गर्दन, कसे हुए मांसल शरीर, छोटी पूँछ, सुडौल सींग, पतली टाँगें तथा मुलायम त्वचा के लिए जाने जाते हैं। ये बैल एक दिन में पाँच एकड़ तक भूमि जोतने की क्षमता रखते हैं। कच्चे मार्ग पर 6–7 क्विंटल तथा पक्के मार्ग पर 8–9 क्विंटल भार ढोने में सक्षम माने जाते हैं।
मेले की विधिवत शुरुआत के पश्चात प्रतिदिन पशु-गतिविधियाँ और विविध आकर्षण देखने को मिलते हैं। क्रेता-विक्रेता पशुओं का चयन कर मोलभाव करते हैं। सूर्यास्त तक खरीदार प्रस्थान कर लेते हैं और विक्रेता अपने शिविरों में विश्राम करते हैं।
संध्या के पश्चात धोरों के बीच रंगीले राजस्थान की झलक और भी सजीव हो उठती है। संध्या कालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम वातावरण में विशेष रंग भर देते हैं। पशुओं की सजावट एवं सौंदर्य प्रतियोगिताएँ, कठपुतली, पगड़ी बाँधने की कला, तथा मूँछ प्रतियोगिताएँ मेले के आनंद को दुगना कर देती हैं। पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकार अपनी लोककलाओं का प्रदर्शन करते हैं, जिन्हें देखकर पर्यटक दाँतों तले उँगली दबा लेते हैं।

राजस्थान की कठपुतली कला
मेले के प्रमुख आकर्षणों में यहाँ का अनोखा लाल बाजार (मिर्ची बाजार) भी सम्मिलित है। यह मेला लाल मिर्च एवं अन्य मसालों के थोक व्यापार के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ सोयला और मथानिया मिर्च की भारी मांग रहती है, जो अपने शुद्ध पोषक तत्वों और उत्तम गुणवत्ता के लिए जानी जाती हैं।

लाल बाजार (मिर्ची बाजार)
व्यक्तिगत अनुभव के रूप में, कुछ वर्ष पूर्व मैंने स्वयं भी यहाँ से मिर्च की खरीद की थी। इसके अतिरिक्त स्थानीय हस्तशिल्प एवं राजस्थानी आभूषणों की दुकानें पर्यटकों को ठहरने के लिए विवश कर देती हैं। यह मेला बड़ी संख्या में देशी एवं विदेशी पर्यटकों को आकर्षित कर स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाता है।

नागौर पशु मेले में आए पशुधन से जुड़े सामान
इस मेले की जड़ें अत्यंत प्राचीन हैं। आरंभ में यह पशुधन व्यापार के लिए आयोजित होता था, किंतु समय के साथ यह एक व्यापक सांस्कृतिक उत्सव का रूप ले चुका है। यह आस्था, व्यापार, लोकसंस्कृति, परंपरा और ग्रामीण जीवन का एक अनूठा संगम है, जो राजस्थान के धोरों की समृद्ध विरासत को जीवंत बनाए हुए है।

नागौर पशु मेले का दृश्य
राजस्थान की इस रंगीली और समृद्ध सांस्कृतिक भूमि को कवि कन्हैयालाल सेठिया ने अपनी प्रसिद्ध पंक्तियों में अत्यंत सुंदर रूप से अभिव्यक्त किया है –
“आ तो सुरगा ने सरमावै, इण पर देव रमण ने आवै, धरती धोरां री…”
लेखिका
श्रीमती पुष्पा शर्मा
केकड़ी, अजमेर,राजस्थान
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