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पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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धर्म ग्रंथों से सीख

धर्म ग्रंथों  से सीख


यह लेख धर्म ग्रंथों की महत्ता, उनके जीवनदायी मूल्यों और मानव समाज के मार्गदर्शन में उनकी भूमिका को स्पष्ट करता है। वेद, पुराण, उपनिषद और गीता जैसे ग्रंथ न केवल आध्यात्मिक ज्ञान देते हैं, बल्कि वसुधैव कुटुम्बकम्, पर्यावरण संरक्षण, नारी सम्मान और परोपकार जैसे सार्वभौमिक सिद्धांतों के माध्यम से जीवन को सार्थक दिशा प्रदान करते हैं।


प्रस्तावना धर्म ग्रंथों का जनक महर्षि वेदव्यास जी को माना जाता है, क्योंकि उन्होंने ही श्रुतियों व पुराणों का प्रतिपादन कर मनुष्य समुदाय को 'धर्म ग्रंथ' रूपी यह अमूल्य निधि प्रदान की है। मानव जीवन में धर्म ग्रंथों की सार्थकता अत्यंत अद्भुत और महान है। धर्म ग्रंथ न होते तो हमारे मूल्यों और जीवन जीने का कोई उद्देश्य ही नहीं रह जाता। प्रजनन और वंशवृद्धि तो पशु भी करते हैं, किन्तु मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो अपने आचरण द्वारा अपना और समाज का उद्धार कर सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता (2.66) में भी कहा गया है:

"न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्"
(अर्थात्: जो भावनाहीन है, उसे कहीं भी सुख नहीं है।)

धन्य है मानव जाति जिसे चार वेद, अठारह पुराण, एक सौ आठ उपनिषद्, रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य और श्रुति-स्मृति जैसी ग्रंथ रूपी निधि प्राप्त हुई। ये पुरातन होते हुए भी अपने विचारों में सदा नित्य और नवीन हैं।वसुधैव कुटुम्बकम् और राष्ट्रप्रेम।हमारे ग्रंथ संकीर्ण मानसिकता का त्याग कर वैश्विक भाईचारे का संदेश देते हैं। महोपनिषद् (6.71) में वर्णित है:

"अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥"

(अर्थात्: 'यह मेरा है, वह पराया है' यह संकीर्ण मानसिकता का प्रमाण है। उदार हृदय वालों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही उनके परिवार के समान है।)

इसी प्रकार, अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में भूमि को माता माना गया है— 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः'। भगवान श्रीराम भी मातृभूमि की महिमा का गान करते हुए कहते हैं:

"अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।"

(अर्थात्: हे लक्ष्मण! यह सोने की लंका मुझे नहीं सुहाती, मेरे लिए तो जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है।)

पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण
हमारे धर्म ग्रंथों में नदियों, पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों की पूजा के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया है। जहाँ विश्व के कई हिस्सों में पशुओं की हत्या आम बात है, वहीं हमारी संस्कृति में सर्प को संकर्षण का अवतार, हाथी को भगवान गणेश का प्रतीक, बैल को भगवान शिव के गण और श्वान को भगवान भैरव के अनुचर के रूप में पूजा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीमद्भागवत महापुराण (दसवें स्कन्ध, पूर्वार्ध, श्लोक 32-35) में वृक्षों की महानता का विस्तृत वर्णन किया है।

सदाचार, परोपकार और वैश्विक कल्याण
गरुड़ पुराण, महाभारत, नारद पुराण आदि ग्रंथों में 'नरक' का वर्णन इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य किसी भी प्राणी या प्रकृति को कष्ट न दे। नरकों का भय दिखाकर कुमार्ग पर जाते लोगों को सुमार्ग पर लाने का प्रयास किया गया है। सनातन धर्म का मूल मंत्र ही संकट में पड़े लोगों की सहायता करना है:

  • कोविड-19 और भारत का योगदान: जब पूरा विश्व महामारी से जूझ रहा था, तब भारत ने "सर्वे भवन्तु सुखिन:" के सिद्धांत पर चलते हुए श्रीलंका, भूटान, म्यांमार, मॉरीशस आदि अनेक देशों को वैक्सीन और जीवनरक्षक दवाएं उपलब्ध कराईं।

  • नारी सम्मान: मनुस्मृति (3.56) का श्लोक "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" स्त्री सम्मान की हमारी प्राचीन परंपरा और कन्या पूजन की रीति को प्रमाणित करता है।

  • सामाजिक उत्तरदायित्व: मृतकों की स्मृति में वृक्षारोपण, धर्मशालाएं व विद्यालय बनवाना, पथिकों के लिए जल-व्यवस्था, और पशु-पक्षियों को भोजन कराना हमारे ग्रंथों द्वारा निर्देशित सत्कर्म हैं।

महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों का सार केवल दो पंक्तियों में समेट दिया है:

"अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥"

(अर्थात्: परोपकार करना सबसे बड़ा पुण्य है और दूसरों को दु:ख पहुँचाना सबसे बड़ा पाप है।)

निष्कर्ष हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथ प्रकृति का संरक्षण, सबकी समृद्धि, सबको साथ लेकर चलने और किसी को दु:ख न देने का जो उपदेश देते हैं, वह वर्तमान काल में भी इनकी प्रासंगिकता और सार्थकता को शत-प्रतिशत सिद्ध करता है। श्रीमद्भगवद्गीता (3.35) में कहा गया है:

"श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:॥"

अतः हमें सदैव अपने स्वधर्म पर अडिग रहते हुए इन धर्म ग्रंथों का अनुसरण करना चाहिए। समाज में परोपकार के कार्य करें, श्रेष्ठ आदर्श स्थापित करें और "मनुर्भवः" (मनुष्य बनो) के वैदिक वाक्य को चरितार्थ करते हुए अपने जीवन को सार्थक बनाएं।

- श्री विशाल प्रजापत 

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