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वाचिक परम्परा और लोक-विवेक

वाचिक परम्परा और लोक-विवेक

'शक्ति की करो मौलिक कल्पना' ('राम की शक्ति पूजा')

वाचिक परम्परा और लोक विवेक में गहन सम्बन्ध है। लोक विवेक वाचिक परम्परा में सतत् प्रवाहमान रहता है। अतः लोक विवेक को समझना है तो वाचिक परम्परा का अवगाहन करना ही होगा। क्योंकि लिखित परम्परा अपने उपस्थित रूप में प्रायः अभिजन रूप तो ग्रहण नहीं कर लेती किन्तु लोक विवेक से कट अवश्य जाती है। क्योंकि लोक विवेक जड़ होते ही 'लोक विहीन विवेक' में बदल जाता है।

लोक विवेक तो सतत् रूप से परम्परा में प्रवाहमान किन्तु निरंतर अपने को ही निर्मित एवं विनिर्मित, रचित एवं विरचित करता चलता है। इस समय में लोक विवेक को समझना क्यों आवश्यक है? यह प्रश्न उठ सकता है। वस्तुतः जिस रास्ते पर हमारी मानवीय यात्रा संभव होती जा रही है, उस पर चलते-चलते हम बौद्धिकता के ऐसे भयावह अंधकूप एवं अपने ही अतितार्किकता अतिबौद्धिकता एवं अतिविवेक के कारण सर्वग्रासी संकटग्रस्तता में फंस गये हैं।

जिससे जितना निकलना चाहते हैं उतना ही उसमें फँसते भी जाते हैं। इसलिए समकालीन समय में 'लोक विवेक' को समझना उससे अगर हो सके तो कुछ संवाद करना अत्यंत आवश्यक हो गया है। इस लेख में मैं सर्वप्रथम लोक विवेक का सन्दर्भ उपस्थित करना चाह रहा हूँ। 'लोक विवेक' पर विमर्श क्यों आवश्यक है? उसका आन्तरिक रचनाशास्त्र क्या है? 'लोक विवेक' की अभिव्यक्ति के माध्यम क्या है? ये सभी प्रश्न इस अध्ययन की परिधि में हैं।

इस अध्ययन का स्वरूप सैद्धांतिक एवं अनुभववादी दोनों है। यह लोकायन के स्रोतों पर आधारित है। इसमें लोकायन के लिखित और मौखिक, संकलित और असंकलित प्रकाशित और अप्रकाशित दोनों प्रकार के स्रोतों का उपयोग किया गया है। इस अध्ययन की प्रविधि विभिन्न समाज वैज्ञानिक प्रविधियों के अन्तः संवाद के मध्य ही विकसित होने के क्रम में है। इस अन्तः संवाद की स्थिति की मौलिक निर्मिति के लिए 'लोक विवेक' की आवश्यकता हमें प्रतीत होती है क्योंकि बिना 'लोक विवेक' के लोक विवेक को समझना कठिन एवं व्यर्थ है।

भारत में अनेक विद्वानों ने 'लोक एवं समाज शास्त्र' पर अध्ययन करते हुए 'इस लोक विवेक' को प्राप्त करने की कोशिश की है। इस संदर्भ में मैं प्रो. श्यामाचरण दुवे प्रभूत विद्वानों के शोध साहित्य का स्मरण करना चाहूँगा। इस गवेषणापूर्ण अध्ययनों में लोक विवेक के सन्दर्भ में कई प्रश्न उठाते हुए उसकी महत्ता की स्वीकृति दी गयी है। भारतीय समाज के अध्ययन की समग्र दृष्टि की प्राप्ति के लिए इस लोक विवेक की आवश्यकता है। इनमें यह अनुभूति कहीं-कहीं प्रत्यक्ष, कहीं-कहीं परोक्ष दिखायी पड़ती है।

इनके अतिरिक्त कुछ विद्वान ऐसे भी है जो 'लोक-विवेक' की चर्चा वैसे ही करते हैं 'जैसे हर चीज की। ऐसे अध्ययनकर्ता लोक विवेक शब्द का बौद्धिक इस्तेमाल तो करते हैं परन्तु सही अर्थों में न तो उसे समझ पाते हैं न ही उसकी व्याख्या कर पाते हैं। क्योंकि वे भूल जाते हैं कि लोक विवेक लोक संस्कृति का सत् है। फ्राँसीसी विद्वानों की दुनिया में एक वर्ग द्वारा लोक के सम्बन्ध में 'संस्कृति-संक्रमण सिद्धांत' प्रचलित है। जिसकी ध्वनि यह है कि असंस्कृत लोक अभिजात्य संस्कृति के सम्पर्क से ही सुसंस्कृत होता है।

यह 'अवधारणा' कहीं न कहीं उस 'लोक-विवेक' को न समझ पाने के कारण विकसित हुई है। जो 'अभिजन बौद्धिकता' से कम सुरुचिपूर्ण एवं पारदर्शी संज्ञान नहीं है।वस्तुतः लोक विवेक का जन्म निरपेक्ष में या ज्ञानकोषों को रटकर नहीं होता, बल्कि यह सम्पूर्ण इतिहास और पुराइतिहासकार के अनुभव जन्य प्रतीति से जन्म लेता है तथा ज्ञानकोषों का निर्णायक बनता है। लोक विवेक वह है जिसके व्यावहारिक ज्ञान की आधार पोथियाँ नहीं है।

पाश्चात्य लोक संस्कृतिविदों ने लोक साहित्य तथा लोक संस्कृति को मनुष्य की 'आदिम अवस्था की अभिव्यक्ति' समझा है। ऐसे विद्वान भी लोक संस्कृति में निहित 'लोक विवेक' की आत्मा से साक्षात्कार न कर पाने के कारण इस प्रकार के भ्रामक निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। यूँ भी भारत में लोक संस्कृति के अध्ययन का भारतीय प्रकरण विकसित करने की आवश्यकता है। इसी में भारतीय लोक संस्कृति का स्वरूप भी हमें मिलेगा।

सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति में 'लोक विवेक' अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा है। इसी 'असभ्य लोक में 6 वे ऋषि एवं मनीषी ज्ञान की साधना करते थे जिनके विचारपूँज आज भी फैल रहे है। ये प्रज्ञा पुरुष स्वयं में और 'लोक विवेक' में परावर्तित होते रहते थे। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में लोक विवेक की छाया दिखायी पड़ती है। इसी मगध से लेकर कुशीनगर के वनों में बुद्ध विचरण किया करते थे। इस प्रकार भारतीय लोक विवेक के निर्माण में इन समस्त प्रज्ञा पुँजों का योग रहा है।

कोई इसे 'भारतीय विवेक की समग्र निर्मिति' के रूप में भी व्याख्यायित कर सकता है। इस प्रकार भारत में लोक संस्कृति के अध्ययन में इन पश्चिमी अवधारणाओं से मुक्ति उस ऐतिहासिक सच की माँग है जिसमें यह 'लोक विवेक' निर्मित हुआ है। यूँ भी प्रकृति की भयावहता को उस आदिम मानुष ने क्या बिना विवेक ही झेल लिया? क्या अच्छा, क्या बुरा के विवेक के बिना ही उस अन्धयुग में जीवित रहा? भले ही यह 'अच्छा-बुरा' उस समय 'शुभ-अशुभ' के रूप में विद्यमान रहा हो।

क्या उनके जीवमान बने रहने में उनकी 'चेतना बीज' का कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं था? क्या वह, जिसने सभ्यता के विभिन्न चरणों पर काव्य, संगीत, लेख, लिपि, संस्कार, रीति-कल्प, रिवाज विकसित किया, अविवेकी था? ये सारे प्रश्न आधुनिक भारतीय विमर्श में बार-बार उठाने की आवश्यकता है। लोक विवेक आविष्कारक भी होता है और निर्णायक भी उसने आग खोजा तथा 'आग-का शास्त्र' भी विकसित किया। उसने लोहा खोजा तथा लोहे का व्याकरण भी बनाया। इसी लोक विवेक ने कबीर, रहीम, दादू, रैदास को भी जना।

यहाँ एक प्रश्न और हमारे चिन्तन की परिधि में है। यह प्रश्न है कि उन्नीसवीं शताब्दी में क्या हुआ कि इस लोक विवेक के नकार का अभिनय प्रारंभ हो गया। यह प्रश्न भारतीय समाज एवं उसकी समस्याओं की अभियांत्रिकी में अत्यंत महत्वपूर्ण है। वस्तुतः यह कालखण्ड पूरे विश्व में उपनिवेशवाद के प्रसार का था। उपनिवेशवाद ने साम्राज्यवाद से ज्यादा जागरूक ढंग से ज्ञान, विज्ञान का नवीन शास्त्र विकसित किया। इस नवीन शास्त्र ने उपनिवेशकों को जड़ से काटा।

भारतीय सन्दर्भ में सचमुच 'उपनिवेशवाद ने हमारी आत्मा में विखंडन पैदा किया। इस नवीन और औपनिवेशिक ज्ञान शास्त्र में विवेक को नकारा गया तथा 'बौद्धिकता' को स्थापित किया गया। वह बौद्धिकता जिसकी निर्मिति का आधार 'औपनिवेशिक ज्ञान' था। वह जो अर्न्तदृष्टि को ज्ञान की संरचना से काटती थी, स्थापित हुई। इस बौद्धिकता में 'समग्रता' के विरूद्ध विशेषज्ञता को विकसित किया गया। अतः ऐसे बौद्धिकों एवं उनकी सन्तानों ने किसी भी समस्या को एकांगी होकर देखना शुरू किया।

परिणामत ढेर सारी अवधारणाएँ, नीतियाँ एवं व्यवहार विघटित एवं विखण्डित होकर 'एक भ्रमपूर्ण परिदृश्य' में परिवर्तित हो गये। एक 'कन्फयूजन' का दौर शुरू हो गया। विवेक के नकार ने किसी भी समस्या के मूल्यांकन में अन्तर्दृष्टि को प्रच्छन्न ढंग से समाप्त करना शुरू कर दिया। हम यह भूल गये कि विवेक बौद्धिकता की पारगामी चेतना है। हमारे ज्ञान से वह हंस विलुप्त हो गया जो दूध का दूध और पानी का पानी कर सकता था।

दुर्घटना तो यह हुई कि हमने जो विकसित किया वह पूर्व का 'स्थानापन्न' तथा समानान्तर न होकर 'ध्वंसकारी' हुआ। भारतीय ज्ञान परम्परा में तो 'बौद्धिकता' की अवधारणा ही नहीं, यहाँ 'विवेकी' हुआ करते थे। क्या कबीर, दादू, रैदास बौद्धिक थे? क्या घाघ और भष्ट्टरी बौद्धिक थे? इस प्रकार लोक विवेक जिसे हम विकसित कर 'फलदायी बौद्धिकता' तक पहुँच सकते थे, उन्सकी जगह हमने, 'औपनिवेशिक (त्रासद) बौद्धिकता को स्थापित कर दिया।

इसी बौद्धिकता की मानसिकता ने लोक संस्कृति में 'विवेक' को जाने अनजाने अनदेखा किया। यह एक प्रकार से 'देशज से औपनिवेशिक का, लोक से औपनिवेशिक भद्र के मध्य संज्ञान के आधिपत्य की लड़ाई थी, जिसमे सत्ता, संचार एवं संसाधन का उपयोग कर औपनिवेशिक बौद्धिकता विजयी हुई। विवेक कोई जड़ अवस्थिति नहीं है, बल्कि सतत् विकासमान अवस्थिति है, जो सदैव यथार्थ के अन्तः संवाद से स्वरूप ग्रहण करता है।

जब इतिहास प्राचीन से आधुनिक स्थिति प्राप्त कर गया है तो इतिहास के इस लोक का विवेक भी विकसित हुआ होगा। कोई कह सकता है कि सम्भव है यह लोक विवेक नागर प्रभाव के तहत विकसित हुआ हो। ऐसा कहते हुए हम भूल जाते हैं कि लोक के पास विवेक की वह छननी है जिसमें उसके 'जीवन के पर्यावरण के लिए' आवश्यक तत्व ही छनकर आते हैं। यह 'लोक विवेक' विभिन्न वर्गीय विवेकों के अन्तः संवाद से निर्मित एक ऐसी अवस्थिति है जो सम्पूर्ण समाज की बेहतरी, शान्ति एवं समन्वय की कामना करता है।

इसके चिन्तन में वर्गीय विभेद होने के बावजूद एक आदर्श समन्वय है जिसकी प्राप्ति के लिए विश्व का हर दर्शन अपने उच्चतम रूप में प्रयास करता है। इस विवेक की निर्मिति को सांसारिक कमजोरियाँ प्रभावित करती है। किन्तु अपने सम्पूर्ण रूप में यह उनमें रहते हुए भी उनसे मुक्त होता है। लोक विवेक में सब कुछ अच्छा-अच्छा नहीं होता। इसमें 'द्विविधात्मकता' एवं 'भ्रमात्मकता' होती ही है।

क्योंकि कई मुहावरे, लोकोक्तियाँ ऐसी हैं जो सामाजिक बुराईयों का समर्थन भी करती है। किन्तु ये उसी 'वर्गीय विवेक' की उपज होती हैं। किन्तु वर्गीय विवेक की लघुता से 'लोक विवेक' की महानता में परावर्तन के क्रम में काफी कुछ आदर्श हो जाता है, संकीर्णता कम होती जाती है।इस अध्ययन में मैं 'लोक विवेक' का एक ढाँचा प्रस्तावित करने का प्रयास कर रहा हूँ।

भूमिका

लोक विवेक, वाचिक परम्परा में शामिल लोकायनों में सुझाव, प्रतिक्रिया, गलत के लिए उलाहना, बुरे के लिए उपहास इत्यादि के रूप में अभिव्यक्त होता है। यह सर्वाधिक स्पष्ट रूप से 'व्यंग्य' के प्रारूप में परिलक्षित होता है। क्योंकि लोक में व्यंग्य की अद्भुत क्षमता होती है। आज जबकि पूँजीवादी विकास के दौर में हम सबकी 'व्यंग्य क्षमता' नष्ट होती जा रही है, लोक में तीक्ष्ण हो रहा व्यंग्यार प्रासंगिक है। 'व्यंग्य चेतना' वहीं रह सकती है जहाँ कुछ 'नैतिक मानदण्ड' हो जिसका पक्ष साफ हो।

इस क्षरण के दौर में भी लोक के पास यह सब बचा हुआ है। बुरे और भले का अन्तर, पथ और कुपथ के भेद, आदमीयत के निर्धारण में लोक विवेक मुखरित होता है। इस संदर्भ में मैं 'घाघ की कहावतों' को आँकड़ों के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ। भोजपुरी अंचलों में घाघ की अनेक कहावतें आज भी किसानों के कार्य सम्पादन में वेद की तरह प्रयोग की जाती हैं। बैल खरीदना हो, फसल बोना हो, खेत की गोड़ाई हो, रोपाई का संदर्भहो, किस हवा के बहने पर वर्षा होगी, इन सबके लिए घाघ की कहावतें दिशा-निर्देश करती है।

लोकायनविदों ने धाध के बारे में जो जानकारियाँ इकट्ठी की है, उनमें सर्वाधिक गवेषणापूर्ण प्रयासों के बाद प. रामनरेश त्रिपाठी उन्हें 'कन्नौद का वासी' बताते है।वे सम्भवतः अहीर जाति में जन्में थे, हालांकि कुछ विद्वान उन्हें विप्र भी मानते हैं। किन्तु घाघ बाद के समय में 'व्यष्टि' नहीं बल्कि 'समष्टि' में रूपान्तरित होते दिखते हैं। कृषक जनता अपने विवेक से कहावतों का सृजन कर उसे घाघ के नाम से जोड़ देती है।

इस प्रकार घाघ के नाम से मिलने वाली कहावतें समष्टि के लोक विवेक का प्रतिनिधित्व करती हैं। लोक विवेक अपने पारम्परिक अनुभव एवं सूक्ष्म निरीक्षण से कृषि और मौसम के बारे में अन्यतम टिप्पणियाँ करता है। इस सन्दर्भ में यह 'लोकोक्ति' दृष्टव्य है-

माघ में घारै, जेठ में जारै।
भादौ सारै, तेकर मेहरी डेहरी पारै। 

अर्थात् गेहूँ का खेत माघ में जीतना चाहिए, फिर जेठ में जिससे पास जल जाये, फिर भादी में जीतकर सड़ावै। जो किसान ऐसा करेगा, उसी की स्त्री अन्न भरने के लिए कोठिला (अन्नागार) बनायेगी। यानि उसके यहाँ फसल खूब होगी। यह अधुनातन कृषि विज्ञान का समानान्तर कृषि ज्ञान है।

मौसम के सम्बन्ध में लोक विवेक की एक टिप्पणी देखिये-
'जब वर्षा चित्रा में होय। सगरी खेती जावै खोय॥
(अर्थात् जब चित्रा नक्षत्र में वर्षा हो तो सारी खेती बर्बाद हो जायेगी)

'कृषि तन्त्र' में शीर्ष पर बैठा सामन्त जिसे लोक परिभाषा में 'चौधरी' और 'टाक' का सम्बोधन किया गया है, उसके प्रति घाघ की यह व्यंग्योक्ति है।

आठ गाँव का चौधरी, बारह गाँव का राव अपने काम न आय तौ, अपनी ऐसी तैसी में जाव
अर्थात् आठ गाँव का चौधरी हो या बारह गाँव का राव पर जो अपने काम न आवे तो वह ऐसी-तैसी में जाये।

कृषि और राजतन्त्र के सम्बन्धों पर लोक विवेक की प्रतिक्रिया इस तरह से है-
जेकर ऊँचा बैठना, जेकर खेत नीचान। ओकर वैरी का करै, जेकर भीत दीवान॥
यह एक प्रकार से कृषक अभिजात्य के उभार की भी कविता है जिसमें कृषक अभिजात्य के निर्माण के तत्वों की व्याख्या भी है।

लोक विवेक में आदमीयत के निर्धारण का नैतिक मानदण्ड भी है। इसकी परिच्छाया घाघ की कहावतों में दृष्टव्य है-
ओछे बैठक, ओछे काम! ओछी बातें आठों जाम। घाघ बताये तीनि निकाम ! भूलि न लीजो इनकी नाम।।
अर्थात जो ओछे लोगों के साथ बैठता है, जो ओछे काम करता है और जो रात दिन ओछी बातें करता रहता है। घाघ कहता है ये तीनों निकम्मे आदमी हैं। इनका नाम भूलकर भी मत लेना।

लोक विवेक की यही निरन्तरता भड्डुरी की कहावतों में भी मिलती है, जिसे लोकायनों में घाघ की बहुल बताया गया है। कही कहीं उसे घाघ की 'प्रेमिका-पत्नी' भी बताया गया है। सम्बन्ध स्थापना के इस प्रकार की विभिन्न मिथकीय कथाओं के भीतर लोक विवेक को नैरन्तर्य विकसित करने के प्रयास के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

घाघ और भडुरी की यह परम्परा संस्कृत के वाचस्पति कोश के पराशर से मिलती है।

लोक विवेक में सामाजिक संरचना, उसके ढाँचे, उसमें अन्तः एवं वाहा की गतिशीलता, परिवर्तनों की प्रक्रिया का सूक्ष्म अवलोकन तथा अन्तःबोध भी है। लोक विवेक बाजार मूल्य एवं पर्यावरण के भी सम्बन्धों को समझता है-
माघ छटी मर जै नहीं, मैंहगा होय कपास साते देखा निर्मली, तो नाहीं कछु आस
माघ सुदी छठ को अगर बादल न गरजे तो कपास मँहगा होगा।

पर सप्तमी को आकाश बिलकुल साफ हो तो, कुछ भी आशा इस प्रकार लोक विवेक प्रत्येक समस्या का 'समग्र सन्दर्भ' विकसित करता है। जबकि हमारी 'बौद्धिकता' किसी भी समस्या को एवं एकांगी ढंग से देखने की अभ्यस्त है। वह छोटे-छोटे निरीक्षणों से बड़े निष्कर्षों पर पहुँचती है। हमारी आज की 'बौद्धिकता' की तरह वह अवधारणा बनाकर सत्य की खोज करने नहीं जाती बल्कि सत्य एवं तथ्यों से अवधारणा तक पहुंचती है।"

इस सम्पूर्ण व्याख्या के ढाँचे में सबसे रोचक है- वाचिक परम्परा लोक बुझक्कड़ की संघटना। 'लाल बुझक्कड़ को एक व्यक्ति के रूप में नहीं वरन् एक प्रतीक के रूप में भी देखा जाना चाहिए। वस्तुतः समाज में नयी चुनौतियों का सामना करने के क्रम में लोक विवेक के नये-नये रूप परिलक्षित होते हैं। समाज की द्विविधात्मक, भ्रमपूर्ण एवं छलनामय ताँत को काटने के लिए 'सामुदायिक लोक' ने 'लाल बुझक्कड़' के प्रतीक को जन्म दिया।

वाचिक परम्परा में लाल बुझक्कड़ एक ऐसे विवेकवान पुरूष के रूप में उभरे हैं। जो दूर छद्म, भ्रम एवं छल को जान जाते हैं तथा उस छल को कहावतों एवं बुझोलियों में स्पष्ट कर देते हैं। इस प्रकार छदमपूर्ण एवं 'बरह रूपिया' सामाजिक पर्यावरण को भेदने के लिए लोक मानसिकता ने बुझौलियों का फार्म चुना। इस सम्पूर्ण भ्रमात्मकता के भेदन के लिए लोक विवेक ने स्वतः को 'लाल बुझक्कड़' के रूप में परिभाषित किया।

इस प्रकार 'समाज' के छलनामय स्तरों से जूझने का लोक विवेक का यह अपना माध्यम है जिसमें जटिलता संघटना को भी कहावतों एवं बुझौलियों के रचनात्मक रूप में सरलतम बनाकर कह देती है। यूँ तो 'लोकायनविदों' ने 'लाल बुझक्कड़' को एक व्यक्ति के रूप में पहचानने का यत्न किया है १० किन्तु लोकायनों के सम्पूर्ण इतिहास में 'लाल बुझक्कड़' एक व्यक्ति न होकर सामाजिक मिथक एवं सामुदायिक प्रतीक में रूपान्तरित होते दिखायी पड़ते हैं।

'लाल बुझावकड़' की बुझौलियों के मूल्यांकन में सबसे रोचक तथ्य यह है कि इनमें 'द्विविधात्मकता' का मुकाबला 'द्विविधात्मकता' से किया गया है। इन बुझौलियों में यदि कोई रास्तों में अस्पष्ट रूप से उभरे हाथी के पाँव दिखाकर किसी से पूछे कि यह क्या है तो लोकोक्ति यूँ बनती है-
लाल बुझक्कड़ यूझिया और न बूझा कोय, पैर में चक्की बाँध के हारन न कूदा होय

यह समाज में बढ़ रही 'भ्रमात्मकता' का ही रचनात्मक उत्पादन है तथा उसी पर व्यंग्य भी करता है तथा उसी की शैली में उसका उपहास भी करता है। इस प्रकार यह वाचिक परम्परा में प्रवाहमान 'लोक विवेक' की प्रस्तावना भर है। इसके खोज का काम अभी शेष है। यदि इस लोक विवेक से अन्तः संवाद कर हमने अपनी बौद्धिकता विकसित की होती, यदि सत्ता एवं संचार के साधनों ने इस लोक विवेक के

सकारात्मक फॉलत का सामाजिक पर्यावरण के निर्माण में सहयोग लिया होता तो हमारे समाज की मूलभूत प्रवृत्तियाँ मजबूत हुई होती तथा नये सामाजिक इतिहास की रचना का नया सन्दर्भ बनता।

लेख-
श्री बद्री नारायण
चौमासा अंक- 56

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