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क्यों आवश्यक है जनजातीय देवलोक का अध्ययन?

क्यों आवश्यक है जनजातीय देवलोक का अध्ययन?

झारखंड की भूमि में अध्ययन के अनेक आयाम विद्यमान हैं और इनमें जनजातीय देव-परंपराओं अध्ययन अत्यंत विशिष्ट स्थान रखता है। यहाँ का जीवन इस प्रकार रचा-बसा है कि साधारण भ्रमण, आवागमन और जनजीवन के सहज स्पर्श में भी सीखने के अनंत सूत्र प्रकट हो जाते हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि मन में अपने कुल, पूर्वजों और जातीय-स्मृतियों के प्रति जिज्ञासा और श्रद्धा जागृत हो।व् इसी दृष्टि से मैं सम्पूर्ण देश का नहीं, अपितु विशिष्ट रूप से झारखंड का उल्लेख कर रहा हूँ, क्योंकि मेरा दृढ़ विश्वास है कि झारखंड की जो सांस्कृतिक स्थिति है, वही व्यापक भारतीय समाज की मूल स्थिति का प्रतिबिंब भी है।

इसे समझने के लिए एक उदाहरण देता हूँ। उराँव जाति में 64 गोत्र या किली हैं, मुंडाओं में 92 गोत्र हैं और हो जनजाति में 172 गोत्र हैं। इन गोत्रों के होने का क्या अर्थ है? हर गोत्र के पीछे उनका अपना अधिकार है, कर्तव्य है, रिकॉर्ड है, विधि है, विधान है, पूजा है और सबसे बड़ी बात कि उसके नाम से गांव का निर्माण है। अगर हम मिंज है तो मालूम है कि कौन-कौन मिंज गांव है। केवल गोत्र से ही आप किसी व्यक्ति विशेष को खोज सकते हैं। इस तरह यह भी अध्ययन का विषय है। मैं उराँवों का अध्ययन करवा रहा हूँ, लेकिन इसी तरह मुंडा भी, उरांव भी और संताल भी है। इनका भी अध्ययन किया जाना आवश्यक है। यह एक व्यक्ति के द्वारा किया जाना संभव नहीं है। इसके लिए बहुत से लोगों को लगना होगा।

हमारे यहां लोग ट्राइबल कहते हैं। ट्राइबल शब्द को मैं बहुत अच्छा नहीं मानता। मिशनरीज के हिसाब से देखें तो ट्राइबल का अर्थ बर्बर जातियां हैं। जनजाति बहुत प्राचीन भाषा का शब्द है। जन का यानी जनपद और जनजातियों का बहुत प्राचीन भारत में इतिहास रहा था और लोग अब इसे आदिवासी समझने लगे हैं। कभी-कभी कुछ बातें रूढ़ हो जाती है। जैसे पंकज कहने से कमल का फूल ध्यान आता है लेकिन पंक का अर्थ कीचड़ से उत्पन्न होने वाली चीज से है। लेकिन रूढ़ हो गया है कमल का फूल। क्योंकि कीचड़ से से तो बहुत सारी चीजें उत्पन्न होती हैं। कई बार लोग जनजाति कहने से नहीं समझ पाते हैं, परंतु वे आदिवासी कहने से समझ जाते हैं।

इसी तरह जनजाति या आदिवासी का मुख्य पहचान है उसका गीत, संगीत और नृत्य। उसके जीवन के हर एक पहलू में गीत और संगीत है। हर एक चीज में हमारा गीत है, हर एक चीज में हमारा संगीत है, हर एक चीज में हमारा नृत्य भी है। गीत, संगीत और नृत्य यही हमारा वेद है, यही हमारा मंत्र है। इसका भी सही से अध्ययन नहीं हो पाया है। जैसे, विवाह को ले लेते हैं। घर से निकलते हैं तो कुछ और गीत होता है, घर में रहते हैं तो कुछ और गीत होता है, घर से बरात के लिए निकलते हैं तो कुछ और गीत होता है, जनवासा पहुंच जाते हैं तो कुछ और गीत होता है, लड़की वाले लेने आते हैं तो कुछ और गीत होता है, लड़की अगर घर में प्रवेश कर जाती है तो कुछ और गीत होता है, लड़की का जब तक विवाह नहीं हुआ है तब तक कुछ और गीत चलता है, सिंदूरदान हो जाता है तो कुछ और गीत होता है, सिंदूरदान के बाद जब वहां से विदा हो जाते हैं तो वहां कुछ और गीत चलता है, उसके गाँव की सीमा से बाहर आ जाते हैं तो कुछ और ही गीत चलता है, अपने गांव के सीमा में आ जाते हैं तो कुछ और गीत चलता है। यही हमारा दिनचर्या, यही हमारा वेद है, और यही हमारा मंत्र है। इनका भी अध्ययन किया जाना चाहिए। इसे सिलसिलेवार ढंग से करने की आवश्यकता है। यह आसान काम नहीं है। पहले सारे लोकगीतों का संग्रह करना, उन्हें सिलसिलेवार ढंग से रखना, फिर उस पर ऑडियो तैयार करना, ऑडियो के साथ वीडियो तैयार करना, इस सारे काम के लिए आदमी 30 साल तक लगे, तभी यह सब हो पाता है। यह एक शोध का का काम है।

इसी तरह और भी बहुत सारी वस्तुएं है। आज बहुत खुशी की बात है कि आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। यह बहुत गौरव की बात है कि हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी ने बिरसा मुंडा या आदिवासी को राष्ट्रीय स्तर पर लाया और राष्ट्रीय पहचान दी। उनके जन्मदिन पर राष्ट्रीय स्तर पर गौरव दिवस मनाने की घोषणा हुई है। आज इस सभा के माध्यम से यहीं नहीं, बल्कि और जगहों पर भी गौरव दिवस मनाने के साथ ही साथ इस पर अध्ययन की बात कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि आदिवासियों या जनजातियों पर कभी कुछ लिखा नहीं गया।

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झारखंड की बात करें तो वर्ष 1765 में यहां ईस्ट इंडिया कंपनी यहां आई थी। 1765 में झारखंड की धरती पर अंग्रेजों के कदम रखते ही जो विद्रोह का सिलसिला शुरू हुआ, जब तक आजादी हासिल नहीं हुई है, तब तक चलता रहा है। शायद ही हिंदुस्तान में कोई क्षेत्र होगा जहाँ इतना लंबा संघर्ष चला हो। अंग्रेजों ने झारखंड में आने के तुरंत बाद यहां चार्टर एक्ट लगाकर उन्होंने सबसे पहले क्षेत्र में पादरी घुसने से मना कर दिया। बोला कि हम पैसा कमा रहे हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी है धर्म कर्म करने नहीं आए हैं मुनाफा कमाने आए हैं। लेकिन लगातार जब विद्रोह हुआ, खासकर बुधु भगत जिनपर 183-32 में जिंदा या मुर्दा 1000 रु. का इनाम रखा गया था, के विद्रोह के बाद सरकार हिल गई। तब उन्होंने विचार किया कि बांटो और राज करो की नीति लागू करना होगा। वर्ष 1845 में चार पादरी पहली बार उनके शासन के करीब-करीब 80 साल बाद यहां आए। 1845 से 1850 तक उन्होंने पूरा कोशिश किया लेकिन यहां का एक भी जनजाति व्यक्ति ईसाई नहीं बना।

इसके बाद फादर यहां खुद यहां आए। उन्होंने कहा कि तुम लोग गलत कदम उठा रहे हो। पहले से यह लोग जिस चीज की भी पूजा पाठ करते हैं, भूत-प्रेत फूल-पत्ती आदि जो भी हो, उसका पहले अध्ययन करो। उसी के हिसाब से ईसाइयत को ढालो। तभी मतांतरण होगा अन्यथा नहीं होगा। वर्ष 1850 को रांची में चर्च की नींव डाली गई। इसके साथ ही शुरू हुआ हमारे अध्ययन का कार्य। पहली बार मुंडाओं का भजन 1866 में प्रकाशित हुआ। 1850 से लेकर 1900 तक जितना भी आदिवासी के बारे में लिखा पढ़ी का कार्य हुआ वो केवल व केवल ईसाई पादरी के द्वारा हुआ है। बाद में उनको लगा कि हम ही लोग लिखेंगे तो मामला बेकार हो जाएगा। तब इसमें बड़े-बड़े उच्च अधिकारी इसमें जुड़े। जैसे डीटी डाल्टन हुए।

इस बीच में केवल एक भारतीय शरद चंद्र राय (एस सी राय) जो पेशे से वकील था, उन्होंने आदिवासियों पर लिखा। वह भी फील्ड वर्क नहीं किए। केवल पादरियों के डेटा का उपयोग किया। उनकी सारी किताबें जो छपी वो कैथोलिक चर्च प्रेस से छपी है। और वह पूरी तरह ब्रिटिश गवर्नमेंट का मुखापेक्षी था। पहली किताब लिखी उन्होंने, मुंडाज एंड देयर कंट्री, दूसरा उरांव रिलीजियन एंड कस्टम्स। तीन किताबें लिखी गई जिसको उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय से मान्यता मिली। परंतु वह केवल संकलन का कार्य था, मौलिक शोध नहीं था। मैंने इस बात को पकड़ा। इसका एक उदाहरण है उराँव शब्द की उत्पत्ति।

झारखंड में जिसे उरांव कहते हैं, उसे ही उड़ीसा में ओराम बोला जाता है। इसी उरांव को छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में सीधे राम बोला जाता है। ऐसा क्यों है, इसके बारे में एस सी राय ने एक शब्द भी नहीं लिखा। बल्कि उल्टा उरांव को यह कह दिया कि यह लोग द्रविड़ियन है और रावण का वंशज हैं। रावण भी द्रविड़ था। समुद्र के किनारे खड़े होकर ओ रावण-ओ रावण पूजा करता था। इसलिए ओ रावण से उरांव हो गया। इस तरह से पढ़ने पर अर्थात् आपके मन में हीनभावना पैदा होगा, तभी मतांतरण होगा। जब हमको लगे की हम छोटे हैं, हमको उन्नत होना चाहिए। इसलिए सारी लेखनी इस बात पर थी कि आपके अंदर हीन भावना उत्पन्न हो। इसे ही हम अस्मिता का अपहरण कह सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह भी कहा गया कि हम यहां किसी का धर्म परिवर्तन नहीं कर रहे हैं क्योंकि यहां पर रहने वाले जनजातियों का धर्म है ही नहीं। हम बर्बर जातियों को किसान बना रहे हैं, इनका धर्म है ही नहीं बल्कि हम लोग इनको धर्म प्रदान कर रहे हैं। इस तरह से इन लोगों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वाहवाही लूटी। अब समय आ गया है कि आज लोग झारखंड की इन 32 जनजातियों के बारे में अध्ययन करें। मौखिक इतिहास भी होता है, बस जानने की जरूरत है। इनका इतिहास है, सामाजिक संगठन है, उनकी पौराणिक काल से हजारों साल से धार्मिक संगठन है। उनका न्यायिक और प्रशासनिक संगठन है। उनका धर्म-कर्म भी है, सब कुछ है लेकिन यह और बात है कि हम नहीं जानते हैं।

झारखंड में जनसँख्या के दृष्टिकोण से सबसे बड़ी जनजातीयाँ क्रमशः संताल, उराँव, मुंडा और हो है इस संगोष्ठी में सभी की उपस्थिति हुई और उन्होंने अपना बात रखा। हो जनजाति के लोग स्वयं को बहुत पवित्र मानते हैं और हो का शब्दार्थ ही पवित्र लोग होता है, ये किसी प्रकार का मिश्रण और किसी की गुलामी स्वीकार नहीं करते हैं। इन्होने कभी ना भारतीय राजाओं की दासता स्वीकार की, ना ही मुगलों या अंग्रेजों के आगे झुके। स्वतंत्र भारत में भी इनके विद्रोह होते रहते हैं।

हर आदमी की सबसे बड़ी चीज होती है उसका आत्मविश्वास। यहाँ जनजातीय बन्धुओं का आत्मविश्वास दिखाई पद रहा है, आत्मविश्वास से ही स्वावलंबन आता है। मेरे युवा आवस्था में एक घटना घटी। एक राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबाल टीम राँची आई थी। लेकिन हम लोगों को उनका परिचय पता नहीं था। हमने उनसे मैच लिया और उन्हें हराना शुरू कर दिया। जब उनके सीनियर खिलाड़ियों को पता चला तो वे भी उतर आये, लेकिन हमें हरा नहीं पा रहे थे। लेकिन जैसे ही हमें पता चला कि ये राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबाल टीम है, हम डर गए और फिर हारते चले गए। इसलिए आत्मविश्वास बढ़ना आवश्यक है।

यह कार्यक्रम जनजातीय बंधुओं के आत्मविश्वास और उत्साह को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। आप अपने आपको समझिये, अपने आपको जानिये, पहचानिए और अपना आत्मविश्वास वापस लाईये। सरकार ने जनजातियों के हितरक्षा के लिए जितने कानून बनाये हैं, अगर वे लागू हो जाएं तो हर आदिवासी मालामाल हो जायेगा। लेकिन फिर भी हमारी जमीनें लूटी जा रही हैं और आदिवासी ही इस लूट में सहयोगी बने हुए हैं। ये इसलिए हो रहा है कि हममें आत्मविश्वास की कमी है।

पिछले वर्ष हो जनजाति के लोग सरकार से लड़ गए, सही या गलत हो सकता है, लेकिन वे आत्मविश्वास से भरे हुए थे। उन्हें सही दिशा देने की जरूरत है, उनपर जबरदस्ती दबाव मत दीजिये, हमलोग भी जबरदस्ती कुछ लड़ने के लिए यहाँ नहीं बैठे हैं। आज संकट की घडी है, यहाँ बहुत कुछ हो रहा है। कोई बोल रहा है, आदिवासी को हिन्दू बनाया जा रहा है, हम हिन्दू नहीं हैं। कोई बोल रहा है हमारा धर्म सरना है, आदि धरम है। भील बोल रहे हैं, हमारा धर्म भीली है, गोंड बोल रहे हैं हमारा धर्म गोंडी है। परंतु सच यह है कि भारत की धरती पर पनपा हुआ हर धर्म भारतीय है। हम क्रिस्चियन स्कूल में पढ़े हैं, वहां हमें बोला जाता था कि तुम कैसे लोग हो, तुम्हारे 33 करोड़ देवी-देवता हैं। वो ठीक ही बोलते थे, यहाँ डेग डेग में पानी, वाणी और धर्म बदल जाता है, इतने सारे मत सम्प्रदाय हैं। उराँव जनजाति में ही टाना भगत हैं जो अहिंसा को अपना मुख्य सिद्धांत मानते है। हम उराँव हैं, हमसे ही टूटकर भगत उराँव बने, उनसे टूटकर टाना भगत बने, उरांवों में ही कितना अंतर आ गया।

गोत्र का सम्बन्ध उत्पत्ति से नहीं है। हमें इस सम्बन्ध में किसी की देखादेखी नहीं करना चाहिए। हिन्दुओं में 12 ऋषियों से सम्बंधित गोत्र की अलग व्यवस्था है। जनजातियों का गोत्र उस विषय के आधार पर है कि जिससे हम उपकृत हुए, जिससे हमारी जान बची, उसे ही हमने देवता मान लिया। उसको ही गोत्र, टोटेम या किली के रूप में धारण कर लिया है। अतः हम श्रेष्ठ हैं, यह भाव जागृत करें और जहां हैं वहीं दृढ़ता से खड़े रहें।

हम जनजातियों की श्रेष्ठता का एक उदाहरण यह भी है कि विवाहों में जहां हर समाज फ़िल्मी गानों पर नाचता है, वहीं जनजातियों में हर एक अवसर के लिए विशेष गीत, संगीत और नृत्य होते हैं। हमारे यहाँ विवाह संपन्न कराने के लिए कोई पंडित, मौलवी, पादरी आदि नहीं आते हैं। बल्कि सफल दम्पति के द्वारा विवाह कराया जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम हिन्दू नहीं हैं।

लेख 
डॉ. दिवाकर मिंज
रांची विश्वविद्यालय 

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