मानव इतिहास को सहेजती गोत्र प्रणाली
July 07, 2025
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार
नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल
पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश का जन्म हुआ था। देशभर में धूमधाम से इस दिन गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। इस बार यह शुभ तिथि आज है। गणेश चतुर्थी को कलंक चतुर्थी भी कहा जाता है, इस दिन चंद्र दर्शन करना निषेध बताया जाता है।
आइए जानते है इसके पीछे का शास्त्रोक्त सम्मत मत क्या है और यदि भूल से भी इस दिन चंद्र दर्शन हो जाए तो उसके परिणाम क्या होते है और उसका निदान क्या बताया गया है? विष्णु पुराण में की कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने एक बार भाद्रपद चतुर्थी के दिन चंद्रमा देख लिया था तो उन पर स्यमंतक मणि की चोरी का झूठा आरोप भी लगा था।
पुराणों के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन भगवान श्री कृष्ण ने अनजाने में चांद को देख लिया था जिसका परिणाम यह हुआ कि उन पर एक व्यक्ति की हत्या का आरोप लगा। भगवान श्री कृष्ण को इस आरोप से मुक्ति पाने के लिए काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था।
नारद जी से जब भगवान श्री कृष्ण ने अपने ऊपर लगे झूठे आरोपों का कारण पूछा तब नारद जी ने श्री कृष्ण भगवान से कहा कि यह आरोप भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन चांद को देखने के कारण लगा है। इस चतुर्थी के दिन चांद को देखने से कलंक लगने की वजह नारद जी ने यह बताई कि इस दिन गणेश जी ने चन्द्रमा को शाप दिया था।
शास्त्रोक्त कथा के अनुसार वास्तव में इसके पीछे गणेशजी का चंद्रमा को दिया हुआ शाप बताया जाता है। यह शाप गणेशजी ने भाद्रमास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को दिया था। इसके पीछे भी एक कथा है। कथा के अनुसार एकबार गणेश जी कहीं से भोजन करके आ रहे थे, तभी उनको रास्ते में चंद्रदेव मिले और उनके गजमुख व लम्बोदर रूप को देखकर हंसने लगे।
इससे गणेश जी क्रोधित हो गए और उन्होंने शाप दे दिया कि तुम्हें अपने रूप का अहंकार हो गया है इसलिए अब से प्रतिदिन तुम्हारा क्षय हो जाएगा। जो भी तुम्हें देखेगा उसे कलंक लगेगा। गणेशजी के शाप से चंद्रमा का रूप तेज हर दिन क्षय होने लगा और मृत्यु की ओर बढ़ने लगे।
चन्द्रमा की दुःखद स्थिति को देखकर देवताओं ने उन्हें सलाह दी कि शिवजी की तपस्या करने को कहा। तब चंद्रदेव ने गुजरात के समुद्रतट पर शिवलिंग बनाकर तपस्या की। चंद्रदेव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको अपने सिर पर बैठाकर मृत्यु से बचा लिया था।
इसी जगह पर भगवान शिव चंद्रमा की प्रार्थना पर ज्योर्तिलिंग रूप में पहली बार प्रकट हुए थे और सोमनाथ कहलाए गए थे। परन्तु तब भी चंद्रदेव के शाप का शमन नही हुआ तब शिव व अन्य देवताओं के कहने पर चंद्र देव ने मोदक एवं पकवानों से गणेश जी की ह्रदय से पूजा की और उन्हें प्रसन्न किया।चंद्रदेव ने अपने अंहकार की भगवान गणेश से क्षमा मांगी।
तब गणेशजी ने उनको क्षमा कर दिया और कहा कि मैं इस शाप को खत्म तो नहीं कर सकता है इसलिए अब से प्रत्येक पखवाड़े आपका हर दिन क्षय होंगा और अगले पन्द्रह दिन बाद फिर बढ़ने लगेंगे और पूर्ण हो जाएंगे। अबसे आपको हर दिन लोग देख सकेंगे किंतु भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन जो भी आपके दर्शन करेगा, उसको झूठा कलंक लगेगा।
अतः गणेश चतुर्थी को चंद्र दर्शन का निषेध है। इसलिये गणेश चतुर्थी को कलंक चतुर्थी भी कहा जाता है। इस दिन जो भूले से भी चांद देख लेता है तो उस पर कोई चोरी का आरोप या जो अपराध उसने कभी भी न किया हो या कोई मिथ्या आरोप उसके सिर जबरन आ पड़ता है और इसका शास्त्रोक्त प्रमाण विष्णु पुराण के अनुसार स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने स्यमन्तक मणि के आरोप को भोगा था।
इसलिए बिहार की कुछ जगहों पर इस चतुर्थी को चौठ चंद्र यानी चतुर्थी चंद्र के रूप में मनाया जाता है। कहीं-कहीं लोग इस दिन चांद की ओर पत्थर भी फेंकते हैं इसलिए इसको 'पत्थर चौथ' के नाम से भी जाना जाता है। इसलिये कई जगह काम बिगाड़ने वालो को "चौथ के चंद्रमा" कहने की कहावत भी प्रचलित हुई।
किंतु शास्त्रो में इसका निवारण भी दिया गया है कि यदि भूल से भी इस दिन चंद्र दर्शन हो जाये तो उसके निवारण के निमित्त श्रीमद्भागवत के 10वें स्कंध के 56-57वें अध्याय में उल्लेखित स्यमंतक मणि की चोरी की कथा का वाचन-श्रवण करना लाभकारक हैं जिससे चंद्रमा के दर्शन से होने वाले मिथ्या कलंक का खतरा कम हो जाता है।
वहीं अगर आपको आवश्यक कार्य से बाहर जाना हो और चन्द्र दर्शन का अंदेशा हो तो पहले आप हाथ में फल, मिठाई या दही लेकर ही चंद्र के दर्शन करें, इससे चंद्रदर्शन का अशुभ फल प्राप्त नहीं होगा तब घर से बाहर निकले और आ कर स्यमन्तक मणि की कथा का पाठ करे यही निवारणार्थ उपाय बताए गए है। अस्तु,भगवान गणेश सकल सृष्टि में सकारात्मक उर्जा का संचार करे।
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