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हम नववर्ष क्यों मनाते हैं?

हम नववर्ष क्यों मनाते हैं?


जब हम समय के प्रवाह को देखते हैं, तो वह अनादि और अनंत प्रतीत होता है। किन्तु कुछ शाश्वत खगोलीय घटनाओं ने इस अनंत समय को हमारे मापने योग्य खण्डों में विभाजित कर दिया है। दिन-रात का होना, चन्द्रमा की कलाओं (phases) का चक्र और ऋतुओं का नियमित आवर्तन, इन सबने हमें काल-गणना का प्राकृतिक आधार दिया है। इस समूची कालगणना में संवत्सर या वर्ष एक महत्त्वपूर्ण इकाई है। परन्तु जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा एक दीर्घवृत्ताकार (elliptical) कक्ष में निरंतर कर रही है, तो आम जनमानस में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इस अनवरत घूमते काल-चक्र में किसी एक विशेष दिन को ही 'नववर्ष' का आरम्भ (वर्षप्रतिपदा) क्यों माना जाता है? और फिर क्या कारण है कि भारत में अलग-अलग लोग अलग-अलग समय पर नववर्षारम्भ का उत्सव मनाते हैं? तो इस लेख के माध्यम से हम यही समझने का प्रयास करेंगे।


आइये इसे एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं। गाड़ी का एक पहिया घूम रहा हो, तो आप कैसे पता करेंगे कि उसने एक चक्र पूरा कर लिया? यदि यह पहिया बैलगाड़ी का पहिया हो, तो आप उसके किसी एक आरे (Spoke) को किसी रंग से रंगकर उस आरे के एक स्थिति से पुनः उस स्थिति में आने पर एक चक्र को पूर्ण मान सकते हैं। यदि यह पहिया मोटर बाइक का हो तो और आसानी होती है। टायर के नोज़ल को सन्दर्भ बिन्दु मानकर हम उसके आधार पर पहिया कितने चक्र घूमा यह निकाल सकते हैं। दोनों ही स्थिति में हमने ऐच्छिक सन्दर्भ बिन्दु लिया है। और मजे की बात यह है कि आप किसी भी बिन्दु को आरम्भ बिन्दु मानेंगे, तो भी परिणाम में कोई अन्तर नहीं आने वाला। पृथ्वी की सूर्य के चारो ओर परिक्रमा को लेकर भी यही बात सत्य है। यदि हम किसी भी दिन को स्वैच्छिक रूप से आरम्भ बिन्दु मान लें, तो पुनः उसी दिन के आने पर हम एक वर्ष पूरा हुआ, यह मान सकते हैं। जन्मदिन एक प्रकार से यही यादृच्छिक (Random) दिन है। और वापस वही दिन आने पर हम आयु में एक वर्ष जोड़ देते हैं। 

पर यहाँ दो प्रश्न उठते हैं। पहला यह कि धरती की परिक्रमा पथ में हम वह आरम्भ का बिन्दु कैसे तय करें? दूसरा यह कि हमें कैसे पता चलेगा कि धरती एक चक्कर पूरा कर पुनः उसी बिन्दु पर आ गई है? इन प्रश्नों के उत्तर बहुत कठिन नहीं है। प्राचीन काल से ही हमारे पूर्वजों के गहरे अवलोकनों से ये प्रश्न उत्तरित हो चुके हैं। भारतीय खगोल विज्ञान (Siddhantic Astronomy) और कैलेण्डरी गणित ने इस प्रश्न का अत्यंत सटीक और वैज्ञानिक उत्तर दिया है। तो आइये पहले हम पृथ्वी के सापेक्ष सूर्य व चन्द्र की गति, पृथ्वी के कोणीय झुकाव के सापेक्ष बनने वाले क्रान्तिवृत्त के आधार बिन्दुओं के आधार पर भारत में नववर्ष आरम्भ होने की इन विभिन्न तिथियों के पीछे का विज्ञान जानने का प्रयास करते हैं।  

पृथ्वी की दीर्घवृत्ताकार परिक्रमा और नववर्ष का निर्धारण
पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा पूर्णतः वृत्ताकार नहीं, बल्कि एक दीर्घवृत्ताकार कक्षा (elliptical orbit) में करती है। इस कक्षा में पृथ्वी की गति एक समान नहीं होती। प्राचीन भारतीय ज्योतिषशास्त्र में इसका सूक्ष्मता से ध्यान रखा गया है। दैनिक ग्रहस्पष्ट चक्र बनाते समय इसका उपयोग होता है। आज के युग में इसकी व्याख्या केपलर के द्वितीय नियम (Kepler's Second Law) के आधार पर की जाती है, जिसके अनुसार जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट (उपसौर या perihelion) होती है, तब उसकी आभासी कोणीय गति सर्वाधिक होती है, जो जनवरी के आस-पास (पौष मास में) होती है। इसके विपरीत, जब पृथ्वी सूर्य से सर्वाधिक दूर (अपसौर या aphelion) होती है, तो उसकी गति न्यूनतम हो जाती है, जो जुलाई (आषाढ़ मास) के आस-पास होती है। इन दोनों बिन्दुओं पर पृथ्वी व सूर्य के बीच की दूरी में लगभग 1 लाख किलोमीटर का अन्तर पड़ता है।

सूर्य से इस घटती-बढ़ती दूरी का पृथ्वी के मौसम पर प्रभाव पड़ता है। और चूँकि पृथ्वी अपने अक्ष पर भी 23 अंश 30 कला झुकी हुई है, तो इससे भी पृथ्वी के किसी स्थान पर सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा घटती-बढती रहती है। इसे हम ऋतु परिवर्तन के रूप में जानते हैं। ये ऋतुएँ ही हमें आभास कराती है कि एक चक्र पूरा होने को है। हम सब अपने प्रियजनों को जन्मदिन की शुभकामनाएँ देते समय कहते हैं - "जीवेम शरदः शतम्" अर्थात् सौ शरद ऋतुओं तक जीवित रहो। इसी प्रकार यह भी एक आम कहावत है कि अमूक व्यक्ति ने अपने जीवन के 40 वसन्त पूरे कर लिए। इन दोनों ही कथनों का आशय वास्तव में उसी ऋतुचक्र से होता है, जो हमें पृथ्वी की वार्षिक गति का भान कराते हैं। परन्तु यहाँ भी नववर्षारम्भ की तिथि स्पष्ट नहीं कही जा सकती, क्योंकि ऋतुओं और उनके बीच का संक्रमण काल सदैव समान नहीं रह पाता।

इस असमान अवधि के कारण केवल ऋतुचक्र के ही आधार पर किसी भी बिन्दु को नववर्ष नहीं माना जा सकता। इसके समाधान के लिए हमारे पूर्वजों ने सूर्य और चन्द्र की गतियों का सूक्ष्मता से अवलोकन किया। इन्होंने पाया कि पृथ्वी की उपर्युक्त गति के कारण सूर्योदय का बिन्दु भी सदी बदलता रहता है, और साल में केवल दो बार ही यह बिल्कुल पूर्व दिशा से उदित होता है। इतना ही नहीं इन दोनों ही दिन पूरी धरती में दिन-रात समान होते हैं। इन दो बिन्दुओं के आस-पास धरती का तापमान समशीतोषष्ण यानी न अधिक ठण्डा, न अधिक गर्म होता है। एक वसन्त ऋतु में आने के कारण वसन्त सम्पात (Vernal Equinox) कहलाया और दूसरा शरद ऋतु में आने के कारण शरद सम्पात (Autumnal Equinox)। इन दोनों के बीच छ महीनों का अन्तर होता है। इन्हें क्रान्तिवृत्त (पृथ्वी का परिक्रमा पथ) पर आधार बिन्दु माना गया। पर इनमें से नववर्ष कौन-सा हो?

Still images of sunrise and sunset location over the year

तो अब हमारे पूर्वजों ने यह अलोकन किया कि बसन्त सम्पात से शरद सम्पात के बीच सूर्योदय का बिन्दु पहले लगातार उत्तर दिशा की ओर खिसकता है, और लगभग 23 अंश 30 कला के बाद पुनः मूल स्थिति पर लौटता हुआ शरद सम्पात के दिन ठीक पूर्व दिशा में होता है। इसके बाद सूर्योदय का बिन्दु दक्षिण की ओर खिसकता हुआ तीन महीनों में 23 अंश 30 कला तक जाने के बाद बसन्त सम्पात के दिन ठीक पूर्व दिशा में आ जाता है। इन उत्तरतम व दक्षिणतम बिन्दुओं को क्रमशः ग्रीष्मायण (Summer Solistice) व शीतायण (Winter Solistice) कहा जाता है। वसन्त सम्पात से शरद सम्पात के बीच के समय को उत्तर गोल तथा शरद सम्पात से वसन्त सम्पात के समय को दक्षिण गोल कहा जाता है। 

प्राचीन खगोलविदों ने सूर्य के क्रांतिवृत्त (ecliptic) पर स्थित इन चार प्रमुख 'आधार बिन्दुओं' (Cardinal points) को ही वर्ष निर्धारण के लिए चुना, जहाँ से ऋतुओं का वास्तविक परिवर्तन होता है। इनमें भी 'वसंत सम्पात' (Vernal Equinox) वह महत्वपूर्ण खगोलीय बिन्दु है, जब सूर्य विषुवत रेखा (Equator) को पार करता है और दिन-रात बराबर होते हैं। और जिसके बाद सूर्य की ऊर्जा उत्तरी गोलार्द्ध में बढ़ती है। चूँकि भारत उत्तरी गोलार्द्ध में अवस्थित है, इसलिए सूर्य के इसी वसंत सम्पात बिन्दु को पार करने के अगले दिन को प्राकृतिक और खगोलीय रूप से नववर्षारम्भ माना गया। हमारे यहाँ प्राचीन काल से आजतक पूरे भारत में नववर्ष इसी घटना पर आधारित रहा है। पर चूँकि भारत में सूर्य और चन्द्र दोनों की गति के आधार पर प्राचीन काल से समय की गणना होती रही है, तो हम इस आधार पर भारत में नववर्षारम्भ की अलग-अलग तिथियों के पीछे का कारण समझने का प्रयास करते हैं।  

भारतीय सौरगणना (Solar Calender) और नववर्ष
भारतीय खगोलशास्त्रियों ने सूर्य के चारो ओर पृथ्वी की गति के आधार पर 'सौर मास' (Saura Masa) की संकल्पना की। पर चूँकि हम पृथ्वी पर हैं, इसलिए हमें पृथ्वी स्थिर रहकर सूर्य आदि गति करते दिखलाई पड़ते हैं। सूर्य द्वारा क्रांतिवृत्त (पृथ्वी के परिक्रमा पथ) के 30-30 अंश पार करने की घटना को 'संक्रान्ति' कहा जाता है। चूँकि पृथ्वी की गति दीर्घवृत्ताकार पथ पर असमान होती है, अतः सूर्य को 30 अंश पार करने में भिन्न-भिन्न समय लगता है। इसी कारण हमारे सौर मासों की अवधि निश्चित 30 या 31 दिन न होकर 29 दिन से लेकर 32 दिन तक होती है।

हमारे प्राचीन सूर्य सिद्धान्त (Surya Siddhanta) के अनुसार वर्ष का आरम्भ वसंत सम्पात के दिन से होना चाहिए। पहले वसन्त सम्पात सूर्य के मेष राशि में प्रवेश यानी मेष संक्रान्ति पर पर होता था। यही कारण है कि भारत में नक्षत्र मण्डल का आदि बिन्दु मेष राशि के आधि बिन्दु को नियत किया गया और मेष संक्रान्ति को वर्ष का पहला दिन। इस समय भारत में वसन्त ऋतु रहती है। मौसम न अधिक सर्द, न अधिक गर्म होता है, और लम्बी सर्दी के बाद पूरी प्रकृति अपना नवशृंगार कर रही होती है। भारत के कई प्रान्तों में, जहाँ सौर गणना प्रचलित है, वहाँ सौर नववर्ष (मेष संक्रान्ति) का आरम्भ मेष संक्रान्ति पर मनाया जाता है। प्रचलित अंग्रेजी कैलेण्डर (ग्रेगोरियन कैलेण्डर) के अनुसार यह तिथि 14 अप्रैल पड़ती है। इसी सौर गणना के आधार पर पंजाब में बैसाखी, असम में बोहाग बिहू, बंगाल में पोइला बैशाख (नववर्ष), केरल में विषु और तमिलनाडु में पुथंडु का पर्व मनाया जाता है।

पर फिर भी एक खगोलीय घटना पर आधारित होने के बाद भी विविध प्रान्तों में नववर्ष की तिथि में कभी-कभी एक दिन का अंतर आ जाता है। इसका कारण नागरिक दिन (Civil day) के आरम्भ से जुड़ी कुछ लोक मान्यताएँ हैं। जैसे -
 १. उड़ीसा नियम: संक्रान्ति चाहे मध्यरात्रि से पहले हो या बाद में, उसी दिन नववर्ष (महीने का पहला दिन) माना जाता है।
 २. तमिल नियम: संक्रान्ति सूर्यास्त से पहले हो तो उसी दिन, सूर्यास्त के बाद हो तो अगले दिन मास आरम्भ होता है।
 ३. मालाबार (केरल) नियम: यदि संक्रान्ति दोपहर लगभग १:१२ बजे (सूर्योदय से १८ घटी) से पहले हो तो उसी दिन, अन्यथा अगले दिन।
 ४. बंगाल नियम:संक्रान्ति मध्यरात्रि से पहले होने पर अगले दिन से मास आरम्भ होता है।

अब हम भारत में सर्वाधिक प्रचलित चान्द-सौर गणना के आधार पर नववर्षारम्भ पर चर्चा करेंगे।

चन्द्र-सौर कैलेण्डर (Luni-Solar Calendar) और नववर्ष
सौर कैलेण्डर के साथ-साथ भारत में वैदिक काल से ही धार्मिक और सामाजिक पर्वों के लिए चन्द्र-सौर (Luni-solar) कैलेण्डर का उपयोग होता रहा है। चन्द्र मास की गणना दो प्रकार से होती है: 'अमान्त' (एक अमावस्या से अगली अमावस्या तक) और 'पूर्णिमान्त' (एक पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा तक)। एक चन्द्र वर्ष में लगभग 354 दिन होते हैं, जो सौर वर्ष (365.24 दिन) से लगभग 10.89 दिन छोटा होता है। यदि केवल चन्द्र मास का पालन किया जाए, तो हर साल नववर्ष लगभग 11 दिन पीछे खिसक जाएगा और 33 वर्षों में सभी ऋतुओं में घूम लेगा। अतः चन्द्र कैलेण्डर को सौर कैलेण्डर (ऋतुओं) के साथ बाँधने के लिए प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों ने 'अधिक मास' (Intercalary month) की अत्यंत वैज्ञानिक प्रणाली विकसित की। सिद्धान्तिक खगोल विज्ञान के अनुसार, लगभग हर 32 या 33 सौर मासों के एक अतिरिक्त मास को जोड़कर चन्द्र वर्ष को पुनः सौर वर्ष (ऋतुओं) के समानांतर कर दिया जाता है। यह चन्द्र और सौर गतियों का एक अत्यंत परिष्कृत और वैज्ञानिक समन्वय है।

इसी चन्द्र-सौर पद्धति के आधार पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष का आरम्भ माना जाता है। इसका भी कारण वही है, जो मेषादि का है। चूँकि भारत में महीनों के नाम चन्द्रमा के नक्षत्रों पर पड़े हैं, तो जिस पूर्णिमा को चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र में होता है, वह मास चैत्र मास कहलाता है। अब चूँकि पूर्णिमा को चन्द्रमा आकाश में सूर्य (अश्विनी नक्षत्र 0-13.33 अंश) के ठीक विपरीत स्थिति में होता है, यानी 180 अंश पर चित्रा नक्षत्र में होता है, अतः इस मास की प्रतिपदा, यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को चान्द्र-सौर पंचांग के आधार पर नववर्षारम्भ की तिथि माना जाता है। इस तिथि को महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में गुड़ी पड़वा, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में उगादि (युगादि), सिन्ध में चैटी चण्ड्र (चैती चन्द्र), और कश्मीर में नवरेह के रूप में उल्लासपूर्वक मनाया जाता है। 

विविधता में निहित वैज्ञानिक ऐक्य
कुल मिलाकर भारत में नववर्ष मनाने की क्षेत्रीय परम्पराएँ चाहे जितनी भी भिन्न क्यों न दिखें, उनका खगोलीय आधार एक ही है। ऐतिहासिक रूप से भारत में लगभग 30 अलग-अलग युग (Eras) और कैलेण्डर प्रचलित रहे हैं। चाहे वह विक्रम संवत हो, शक संवत हो, या बंगाली सन; चाहे वे पूर्णिमान्त हों या अमान्त; इन सभी के मूल में एक ही 'सिद्धान्तिक खगोल विज्ञान' (Siddhantic Astronomy) कार्य कर रहा है। 

प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्रियों जैसे आर्यभट, वराहमिहिर और भास्कराचार्य ने 'अहर्गण' (Ahargana - दिनों का समूह या Heap of days) जैसी निरंतर काल गणना की प्रणाली भी विकसित की थी, जो आज भी ग्रहीय गणनाओं का आधार है। हमारे पंचांगों में 'तिथि' की गणना सूर्य और चन्द्रमा की 'वास्तविक आभासी गति' (True motion) के बीच 12 अंश (12 degrees) के अंतर पर आधारित है, जो एक अत्यंत सूक्ष्म खगोलीय मापन है।

तो इस तरह पृथ्वी अपनी कक्षा में अनवरत घूमते हुए जब वसंत सम्पात के बिंदु (Vernal Equinox) को पार करती है, तो उत्तरी गोलार्ध में वसंत ऋतु का पूर्ण यौवन होता है, और दिन-रात की अवधि समान हो जाती है। इसी प्राकृतिक और खगोलीय संतुलन के क्षण को भारत के मनीषियों ने वर्षप्रतिपदा के लिए चुना। और इसलिए दक्षिण में 'पुथंडु', पूर्व में 'नव वर्ष', उत्तर-पश्चिम में 'बैसाखी' (सौर नववर्ष) हों, या 'गुड़ी पड़वा' और 'उगादि' (चन्द्र-सौर नववर्ष) हों, ये सभी दर्शाते हैं कि एक ही खगोलीय घटनाओं का उत्सव भारत अपनी संस्कृति में कितनी विविधता से मनाता है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि सम्पूर्ण भारत एक ही वैज्ञानिक और खगोलीय 'काल-बोध' (Time reckoning) से जुड़ा हुआ है। ऋतुओं के आवर्तन और ब्रह्मांडीय पिंडों (सूर्य और चन्द्र) की गतियों का यह गणितीय और खगोलीय समन्वय भारतीय काल-गणना को विश्व में अद्वितीय बनाता है।

तो अब आप इस प्रश्न का उत्तर जान ही गए होंगे कि हम नववर्ष क्यों मनाते हैं? साथ-साथ आप यह भी जान गए होंगे कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा व मेष संक्रान्ति को ही नववर्षारम्भ के दिन के रूप में क्यों चुना गया? तो इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा और मेष संक्रान्ति को अपने प्रियजनों को नववर्ष आरम्भ होने की शुभकामना देना न भूलें।

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