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पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

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पंचदेव परंपरा और आदर्श वाक्य की जन्मस्थली - मदकूद्वीप

पंचदेव परंपरा और आदर्श वाक्य की जन्मस्थली - मदकूद्वीप

सनातन संस्कृति में सदियों से विविध संप्रदायों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की दृष्टि से आदि शंकराचार्य एवं उनके समकालीन विद्वानों ने पंचदेव पूजा को अनिवार्य माना। इसमें श्री गणेश, विष्णु, शिव, सूर्य और शक्ति के रूप में स्मार्त लिंग की पूजा की परंपरा स्थापित हुई। यह परंपरा आज भी भारतीय धर्म-संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।

छत्तीसगढ़ का मदकू द्वीप जो लोक मान्यताओं में  प्राचीन मांडुक्य द्वीप के नाम से विख्यात  है इसी संस्कृति का एक जीवंत और अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। 2011 में इस द्वीप पर पुरातात्विक उत्खनन के दौरान एक संगठित वेदी पर 18 मंदिरों के अवशेष मिले हैं । इनमें 12 मंदिर स्मार्त लिंग की पूजा के लिए समर्पित हैं जबकि अन्य मंदिरों में उमा-महेश्वर, गरुड़ारूद्र लक्ष्मी-नारायण, शिवलिंग, श्री गणेश और महिषासुर मर्दिनी की सुंदर मूर्तियां प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक समन्वय को दर्शाती हैं।


संरक्षित पुरातात्विक अवशेष- मद्कुद्वीप

पुरातत्वविदों के अनुसार ये मंदिर 10वीं से 11वीं शताब्दी अर्थात कल्चुरी काल के हैं, जो इस द्वीप की गहन धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता को साबित करते हैं। मदकू द्वीप का धार्मिक महत्व प्रयाग, काशी, अयोध्या, चित्रकूट, नासिक और वैद्यनाथ जैसे भारत के प्रमुख तीर्थों के समान है। यहां शिवनाथ नदी, जो महानदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है (290कि.मी.) उत्तर वाहिनी होकर तीन धाराओं का संगम बनाती है, जो ईशान कोण में 28 अंश मुड़कर महानदी से मिलती है।

इस स्थान की परिक्रमा से समस्त तीर्थों की परिक्रमा का फल प्राप्त होने का विश्वास प्रचलित है। प्रयाग की तरह ही मदकू द्वीप में भी यहां के जल और नदियों का महत्व अत्यंत प्राचीन और पावन है। छत्तीसगढ़ में प्रयाग राजिम के संगम स्थल की तरह यह द्वीप भी धार्मिक श्रद्धा का केंद्र है। इस द्वीप को शिव और विष्णु का संगमस्थल माना जाता है इसलिए इसे हरिहर क्षेत्र अथवा केदार तीर्थ की संज्ञा भी दी गयी है।

छत्तीसगढ़ का मोहनजोदड़ों कहलाने वाले मदकू द्वीप का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, पर्यावरण और जैव विविधता की दृष्टि से भी है। 70 एकड़ में विस्तृत इस  प्राकृतिक द्वीप में वनोषधि सम्पदा का विपुल भंडार है यहाँ बहुत सी दुर्लभ वनस्पतियां पायी जाती हैं।इनमें अकोल (अस्थमा, कोलेस्ट्रोल, गठिया रोग) सिरहूट जिसे चिरौट भी कहते है जो, वरूण (गुर्दे की पथरी,लीवर के विकार त्वचा सम्बन्धी रोग और गले के विकार में लाभदायक), केवटी जड़ी जिसे सोमवल्ली भी कहते है कैल्शियम के प्राकृत स्त्रोत, घुटने दर्द और रक्त शुद्धता में सहायक, शतावरी (सिद्धीदात्री)जो महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने, तनाव कम करने और पाचन व प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत करने में लाभदायक है इसके अलावा  पुत्रजीवा, कुटज, धनबहेर, विष्णुजीरा जैसी दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियां और पौधे सम्मिलित हैं, जो द्वीप क्षेत्र के बाहर दुर्लभ हैं।


प्राकृतिक सौन्दर्य और दुर्लभ वनस्पति का क्षेत्र - मदकूद्वीप

इस वनस्पति विशिष्टता के संरक्षण और विकास की आवश्यकता अत्यंत जरूरी है।मदकू द्वीप की ऐतिहासिकता इस तथ्य से भी जुड़ी है कि यहीं ऋषि माण्डुक्य ने मुण्डकोपनिषद् की रचना की। मुण्डकोपनिषद् (3.1.6) के श्लोक में "सत्यमेव जयते नानृतं" का उद्घोष पहली बार हुआ, जो आज भारत का राष्ट्रीय वाक्य है। 1959-60 में प्रकाशित हुई Indian Epigraphy Reoprt  यह बताती है कि यहाँ से अलग-अलग लिपि के दो शिलालेख प्राप्त  हुए हैं जिनमे एक ब्राह्मी लिपि में हैं और एक शंख लिपि में।


ऋषि माण्डुक्य की नवनिर्मित मूर्ति 

इसके वर्तमान स्वरुप में राज्य के ख्यातिलब्ध पुरात्वविद स्वर्गीय अरुण शर्मा जी की अहम् भूमिका है जिन्होंने यहाँ के पुरात्विक साक्ष्यों का गहन अध्ययन किया और मंदिरों के जीर्णोध्दार करने में विशेष योगदान दिया। यहाँ कुछ नवनिर्मित मंदिर भी दिखायी देते हैं जिनमे उत्खनन से प्राप्त अवशेषों का भी उपयोग हुआ है जैसे हरिहर तीर्थ स्थल जिसमे एक प्राचीन जलहरी (हरिहर) की वेदी प्रतिमा स्थापित की गयी है वैसे ही यहाँ नवनिर्मित राधाकृष्ण मंदिर में पुराने स्लैब का उपयोग किया गया है। रमेन्द्रनाथ मिश्र जी के मतानुसार यहाँ से एक पुरुष मूर्ति प्राप्त हुई है जो कल्चुरी शासक (11वीं) रत्नदेव की है।


ध्यानमग्न पुरुष आकृति

यह गौरव छत्तीसगढ़ का ही नहीं, पूरे भारत का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर है। इस पावन भूमि से हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझना, संरक्षित करना और नई पीढ़ी को इसके महत्व की जानकारी देना अत्यंत आवश्यक है। मदकू द्वीप सनातन संस्कृति, धर्म, इतिहास और प्रकृति का समन्वय है, जो हमें हमारे अतीत से जोड़ता है और भविष्य के लिए प्रेरणा देता है।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

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