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राष्ट्रीय सीमाओं में सिसकती संवेदनाएँ

राष्ट्रीय सीमाओं में सिसकती संवेदनाएँ


प्रस्तुत लेख 'राष्ट्रीय सीमाओं में सिसकती संवेदनाएँ' समकालीन विश्व की एक गम्भीर विडम्बना को उजागर करता है। आज जब तकनीक और विज्ञान ने हमें एक 'वैश्विक ग्राम' में परिवर्तित कर दिया है, तब भी हमारी सोच की संकीर्णता और सीमाओं के प्रति हमारा मोह कम नहीं हुआ है। लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव ने आदिम काल से लेकर आधुनिक युग तक की मानवीय यात्रा का विश्लेषण करते हुए यह बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार हमने प्रशासन की सुविधा के लिए खींची गई रेखाओं को अपनी आत्मा की बेड़ियाँ बना लिया है। यह लेख राष्ट्रवाद और वैश्विकता के बीच के द्वन्द्व को मानवीय संवेदना के धरातल पर परखने का एक सार्थक प्रयास है।


मनुष्य का समूचा इतिहास वस्तुतः उसकी निरन्तर गति और अदम्य जिज्ञासा का ही इतिहास है। पुरातन काल के उस आदिम मनुष्य की कल्पना कीजिए, जिसकी आँखों में पूरा आकाश समाया था और जिसके पाँव किसी कृत्रिम सीमा को नहीं पहचानते थे। तब धरती माँ थी और उसका असीम विस्तार ही घर था।

कबीले चलते थे, सभ्यताएँ प्रवास करती थीं और संस्कृतियाँ किसी अविरल बहती नदी की तरह एक दूसरे में विलीन हो जाती थीं। तब न देशों के बीच कोई कँटीली बाड़ थी, न कोई पासपोर्ट और न ही वीज़ा।

मनुष्य की पहचान उसके पदचिह्नों और उसके कर्म से थी, कागज़ के किसी बेजान टुकड़े से नहीं। वह स्व और पर के संकुचित बोध से मुक्त, प्रकृति का एक अभिन्न हिस्सा था। उस आदिम युग में मनुष्य की यात्राएँ केवल भौतिक विस्थापन नहीं थीं, अपितु वे जीवन के नए आयामों की खोज थीं। वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते समय केवल अपनी देह नहीं ले जाते थे, बल्कि अपने साथ अनुभवों का एक अनन्त भण्डार भी लेकर चलते थे।


मानव के सहयात्री रहे हैं अनुभव 

उन पदयात्राओं में संघर्ष था, पर सीमाओं का बन्धन नहीं था। नदियाँ, पर्वत और मरुस्थल उनके मार्ग में बाधक अवश्य बनते थे, किन्तु वे किसी सम्प्रभु राष्ट्र की अनुमति के मोहताज नहीं थे। प्रकृति ने मनुष्य को मुक्त और स्वच्छन्द रचा था, पर मनुष्य ने धीरे धीरे अपने भय और असुरक्षा को सीमाओं का नाम दे दिया।

समय का चक्र घूमा और मनुष्य ने प्रकृति की चुनौतियों को स्वीकार करना सीखा। जब उसने लकड़ी के लट्ठों को जोड़कर पानी पर तैरना सीखा, तो समुद्र की अगाध दूरियाँ छोटी पड़ने लगीं। वह अन्वेषण का युग था। वास्को डि गामा, कोलम्बस और मैगेलन जैसे साहसी नाविकों ने केवल नए भूखण्ड ही नहीं खोजे, बल्कि विचारों और व्यापार के ऐसे सेतु बनाए जिन्होंने दुनिया का नक्शा बदल दिया।

जहाज़ तब केवल मसाले, स्वर्ण या रेशम नहीं ढोते थे, वे अपने साथ दर्शन, कला और जीवन पद्धति के साथ संस्कृति भी ले जाते थे। समुद्र ने देशों को जोड़ा, पर उसी जुड़ाव की कोख से साम्राज्यवाद की महत्त्वाकांक्षा ने भी जन्म लिया। ताक़तवर राष्ट्रों ने मानचित्रों पर अपनी लकीरें बढ़ानी शुरू कीं और यहीं से अधिकार क्षेत्र की अवधारणा प्रबल हुई।


मानव की ताकत और महत्त्वकांक्षा ने बिगाड़ा संतुलन 
 

यह वह समय था जब संसार पहली बार कागज़ी लकीरों में बँधने लगा था। जो समुद्र पहले केवल मिलन का माध्यम थे, वे अब नौसैनिक बेड़ों की गश्त के साक्षी बनने लगे। व्यापारिक मार्गों पर कब्ज़ा करने की होड़ ने मानव मन में यह बीज बो दिया कि धरती का टुकड़ा केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का साधन है।


वास्कोडिगामा- प्रथम यूरोपीय जिसने भारत को देखा 

इसी कालखण्ड ने उपनिवेशवाद के उस अँधेरे अध्याय की नींव रखी, जहाँ एक मनुष्य की पहचान उसके स्वामी राष्ट्र से होने लगी। विज्ञान और तकनीक की उड़ान ने इस विस्तार को नई ऊँचाई दी। राइट ब्रदर्स के सपनों ने जब हवा में पंख फैलाए, तो बादलों के ऊपर से नीचे की सरहदें बौनी और अर्थहीन लगने लगीं।

इण्टरनेट आया तो लगा कि अब हम सचमुच एक वैश्विक ग्राम के नागरिक बन गए हैं। सूचना क्रान्ति और इण्टरनेट ने तो मानो भूगोल की दूरी बहुत बौनी ही कर दी। न्यूयॉर्क की हलचल मुम्बई के स्क्रीन पर और बीजिंग का बाज़ार लन्दन की गलियों में आ पहुँचा।

'वसुधैव कुटुम्बकम्' का प्राचीन भारतीय दर्शन आधुनिक तकनीक के चश्मे से यथार्थ जैसा दिखने लगा। लगा था कि अब सूचनाओं के आदान प्रदान से संसार एक समरस समाज बनेगा। डिजिटल दुनिया में कोई सीमा चौकी नहीं थी। एक क्लिक पर हम सात समुद्र पार के मित्र से जुड़ सकते थे।

परन्तु क्या यह जुड़ाव वास्तविक था? क्या हम वास्तव में एक दूसरे के सुख दुःख के सहभागी बन रहे थे? तकनीक ने हमें पास तो ला दिया, पर संवेदनाओं का धरातल अभी भी उन पुरानी लकीरों में ही फँसा हुआ था।

उदारवाद और वैश्वीकरण ने एक ऐसे भविष्य का सुनहरा स्वप्न दिखाया, जहाँ बाज़ार और मानवता दोनों एक साझी ज़मीन पर खड़े होंगे। किन्तु, इस भौतिक प्रगति के समानान्तर एक विडम्बना भी अत्यन्त सूक्ष्मता से आकार ले रही थी। जैसे जैसे हमारी संचार गति बढ़ी, हमारी मानसिक संकीर्णता के द्वार भी गहरे होते गए।


तकनीक के प्रसार ने किया संवेदनाओं को सीमित

जिस तकनीक ने हमें ग्लोबल बनाया, उसी ने नियन्त्रण की नई प्रणालियाँ भी विकसित कर दीं। प्रथम विश्व युद्ध के बाद की दुनिया ने पासपोर्ट और वीज़ा जैसे शब्दों को सुरक्षा का कवच बनाया, पर अन्ततः ये हमारी नैसर्गिक स्वतन्त्रता की बेड़ियाँ बन गए।

आज मनुष्य एक चलती फिरती धड़कन और स्वतन्त्र चेतना बाद में है, पहले वह डेटा, बायोमेट्रिक्स और दस्तावेज़ों का एक बण्डल है। हवाई अड्डों की लम्बी कतारें और इमिग्रेशन काउंटरों पर होने वाली पूछताछ उस आधुनिक दासता की प्रतीक हैं, जहाँ आपकी गरिमा आपकी राष्ट्रीयता के रैंक पर निर्भर करती है।

कितनी अजीब बात है कि एक शिक्षित और सभ्य मनुष्य को अपनी निर्दोषता सिद्ध करने के लिए कागज़ों के ढेर दिखाने पड़ते हैं। यदि आप एक विशेष देश के नागरिक हैं, तो आपका स्वागत है, और यदि आप किसी कमज़ोर अर्थव्यवस्था वाले राष्ट्र से हैं, तो आप सन्देह के घेरे में हैं।

यह भेदभाव उस मानवता का अपमान है जिसे हमने सदियों के संघर्ष के बाद अर्जित किया था। सुरक्षा के नाम पर हमने अपनी निजता और आत्मसम्मान को दांव पर लगा दिया है। आज का दौर और भी चुनौतीपूर्ण और विरोधाभासी है। हम एक अजीबोगरीब द्वन्द्व में जी रहे हैं।

एक ओर हम मंगल और चन्द्रमा पर बस्तियाँ बसाने की योजना बना रहे हैं, दूसरी ओर अपनी ही धरती पर पड़ोसी के विरुद्ध दीवारें ऊँची कर रहे हैं। वैश्विकता का वह सुन्दर स्वप्न अब संकुचित क्षेत्रीय राजनीति के शोर में दम तोड़ रहा है।

दक्षिणपन्थी सोच और धार्मिक कट्टरपन्थ के नए उभार ने मनुष्यता को पुनः कबीलों में बाँट दिया है। 'माय कण्ट्री फर्स्ट' का नारा सुनने में आकर्षक लग सकता है, पर जब यह साझा मानवता की कीमत पर उछाला जाता है, तो यह आत्मघाती हो जाता है।

संरक्षणवाद की आड़ में हम अपनी खिड़कियाँ बन्द कर रहे हैं, यह भूलकर कि बन्द कमरों में हवा दूषित हो जाती है और सभ्यताएँ सड़ जाती हैं। यह कट्टरपन्थ केवल सीमाओं पर ही नहीं, बल्कि हमारे मस्तिष्क में भी घर कर गया है। हम अपने देश के भीतर भी 'दूसरे' को ढूँढने लगे हैं।

जो हमसे भिन्न है, जो हमारी भाषा नहीं बोलता या जो हमारे विचारों से सहमत नहीं है, उसे हम शत्रु मानने लगे हैं। यह आत्ममुग्धता हमें विनाश की ओर ले जा रही है। बन्द दरवाजों के पीछे हम सुरक्षित होने का भ्रम तो पाल सकते हैं, पर हम समृद्ध और विकसित नहीं हो सकते। विकास का मार्ग सदा से खुलापन और विनिमय रहा है।

कट्टरपन्थ का यह नया चेहरा दरअसल हमारे भीतर के गहरे असुरक्षा बोध और पराये के प्रति भय की उपज है। यह भय, दूसरे के धर्म, दूसरी संस्कृति, और दूसरे के विचार के प्रति, हमें सुरक्षित नहीं, बल्कि एकाकी और हिंसक बना रहा है।

आज की राजनीति संवेदनाओं पर हावी है और भूगोल दिलों को बाँट रहा है। संकीर्ण राष्ट्रीयता और कट्टरपन्थी विचारधाराएँ हमें यह सिखा रही हैं कि जो हमारे जैसा नहीं दिखता या नहीं सोचता, वह हमारा शत्रु है। यह सोच उस वैश्विक ग्राम की जड़ों में मट्ठा डालने जैसा है, जिसे हमने बड़ी उम्मीदों से सींचा था।

राजनीतिक लाभ के लिए जनता के मन में 'बाहरी' का जो भय पैदा किया जाता है, वह समाज के ताने बाने को नष्ट कर देता है। संवेदनाएँ जब राष्ट्रीयता के साँचे में ढलने लगती हैं, तो वे अपनी तरलता खो देती हैं। तब हम किसी भूखे बच्चे को केवल एक 'विदेशी' के रूप में देखते हैं, एक बच्चे के रूप में नहीं।

सहानुभूति के इस अभाव ने ही दुनिया को शरणार्थी संकट जैसी समस्याओं के सामने ला खड़ा किया है। हमें यह समझना होगा कि धरती पर खींची गई लकीरें प्रशासन की सुविधा के लिए तो हो सकती हैं, पर वे आत्मा की जेल नहीं होनी चाहिए। राष्ट्रों की सुरक्षा अनिवार्य है, पर मनुष्यता का गला घोंटकर नहीं।

एक पक्षी जब बिना वीज़ा के सीमा पार करता है, तो वह हमारी व्यवस्थाओं पर हँसता प्रतीत होता है। हवाओं, खुशबू और संगीत का कोई पासपोर्ट नहीं होता, क्योंकि प्रकृति जानती है कि विस्तार ही जीवन है और संकुचन ही मृत्यु। प्रकृति ने सीमाओं का कोई विधान नहीं बनाया।

पहाड़ एक देश से दूसरे देश में निर्बाध रूप से फैले हुए हैं। नदियाँ अपना जल सबको समान रूप से बाँटती हैं। सूर्य का प्रकाश किसी विशेष नागरिकता का मोहताज नहीं है। फिर हमने स्वयं को इन दीवारों में क्यों कैद कर लिया है? क्या हम अपनी बनाई हुई व्यवस्थाओं के दास बन चुके हैं?


तकनीक के जाल में फंसा अकेलेपन का शिकार मानव

निष्कर्षतः, यह समय आत्ममन्थन का है। यह समय आह्वान है, उस मानवीय चेतना की ओर लौटने का, जहाँ करुणा का कोई भौगोलिक मानचित्र न हो। हमें अपनी पहचान के साथ साथ अपनी सार्वभौमिक मानवता को भी बचाना होगा।

जिस दिन एक इंसान दूसरे के दुःख को बिना उसकी राष्ट्रीयता या धर्म पूछे महसूस करेगा, उसी दिन ये दिलों की दूरी समाप्त होगी। सरहदें नक्शों पर सुशोभित हों तो ठीक, पर उन्हें संवेदनाओं के बीच नहीं खड़ा होना चाहिए।

याद रहे, मानचित्र मनुष्य की रचना है, पर मनुष्यता उस असीम चेतना की संरचना है, जिसका विभाजन सम्भव नहीं है। हमें अपने बच्चों को सीमाओं के प्रति सम्मान तो सिखाना चाहिए, पर उन सीमाओं से परे छिपे व्यापक सत्य को भी बताना चाहिए। मनुष्यता का भविष्य सहअस्तित्व में है, अलगाव में नहीं।

यदि हम अपनी संवेदनाओं को राष्ट्रीय परिधियों से मुक्त नहीं कर पाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें एक ऐसे युग के रूप में याद रखेंगी जिसके पास तकनीक तो थी, पर हृदय नहीं था। आइए, हम सब मिलकर एक ऐसी दुनिया की कल्पना करें जहाँ प्रेम और सहानुभूति के लिए किसी वीज़ा की आवश्यकता न हो और मनुष्य की पहचान केवल उसका मनुष्य होना ही पर्याप्त हो।

 

-विवेक रंजन श्रीवास्तव
  भोपाल 


 

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