आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल पंचमी | मंगलवार

नक्षत्र: मृगशिरा | योग: शोभन | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 21 अप्रैल 2026

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पर्व विशेष : | तदनुसार 21 अप्रैल 2026

जब पर्वों के माध्यम से राष्ट्रीय जागरण किया गया

जब पर्वों के माध्यम से राष्ट्रीय जागरण किया गया

उत्सवों - महोत्सवों का राष्ट्र - जागरण,सामाजिक समरसता तथा भारत की स्वाधीनता में भी उल्लेखनीय योगदान रहा है। 
गणपति - उत्सव अनंत चतुर्दशी के अवसर पर विशेष रूप से महाराष्ट्र में बड़े समारोह से मनाया जाता है। भगवान श्रीगणेश जी महाराज की भव्य प्रतिमाओं की सवारी जगह - जगह धूम - धाम से निकाली जाती है। लाखों श्रद्धालुजन 'गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकरया ' अर्थात हे गणेश बाबा ! आप अगले साल फिर से आना। इस उदघोष के साथ मूर्तियाँ नदियों में विसर्जित करते है। महान राष्ट्रभक्त,सनातन धर्म के निष्ठावान उपासक लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने गणपति - महोत्सव को राष्ट्रीय जागरण तथा हिन्दू - संगठन का माध्यम बनाने का प्रयास किया।

अंग्रेजी शासन कट्टरपंथी मुसलमानों को संरक्षण और प्रोत्साहन दे दंगो के लिये उकसाते थे। सन् 1893 ई.में मुहर्रम के जुलूस की आड़ में प्रभास पट्ट तीर्थ में हिंदू -, मंदिरों पर आक्रमण करके देवमूर्तियाँ भंग की गयी। साधुओं एवं पुजारियों को आग में जला डालने का प्रयास किया। उसी वर्ष बंबई में हनुमान - मंदिर पर मजहबी उन्मादियों की भीड़ ने आक्रमण कर दंगा भड़काया। कई दिनों तक बंबई का बड़ा भाग दंगे की चपेट में अशांत रहा। उस समय लोकमान्य तिलक महाराज ने ' केसरी ' नामक पत्र के संपादकीय लेख में स्पष्ट लिखा था कि ' हिंदू दुश्मनों के आक्रमण से तभी बच पायेंगे जब वे शक्त्तिसंपन्न बन जायेंगे। सन् 1893 ई.में लोकमान्य तिलक महाराज ने पूना में गणपति - महोत्सव को व्यापक रूप दिया। महाराष्ट्र के अनेंक नगरों में गणपति की भव्य शोभा - यात्रा में अनेंक भजन - मंडलियाँ भजन - कीर्तन कर माहौल धार्मिक बना देती थी। वहीं मल्ल शारीरिक प्रदर्शन करते,पटाबाजी - तलवारबाजी से युवकों में वीरता का भाव जाग्रत होता था। पुणे में आयोजित इस गणपति - उत्सव शोभायात्रा में लाखों लोग शामिल हुए थे। जिसका नेतृत्व लोकमान्य तिलक महाराज ने किया था।
                   
सामाजिक समरसता का उदाहरण:- लोकमान्य तिलक जी ने गणेश जी के महत्व पर भाषण दिया तथा आव्हान किया कि समस्त हिन्दू - समाज सामाजिक समरसता के रंगों में रँग कर राष्ट्रीय चेतना का संकल्प ले। आपसी भेद - भाव भुलाकर अपने राष्ट्र,धर्म तथा संस्कृति की रक्षा व्रत ले। तिलक जी शोभायात्रा में आगे - आगे चल रहे थे।एकदम एक मकान की खिड़की से बच्चे के रोने की आवाज सुनायी दी। वे रुके और बोले - बालक क्यों रो रहा है? बालक की माँ ने कहा - इसने गणपति की एक मूर्ति खरीदी है। यह चाहता है कि इसकी मूर्ति भी नदी में विसर्जन की जाने वाली मूर्तियों में शामिल की जाय। मैने इसे यह कह डांट दिया कि हम अस्पृश्य है,हमारी प्रतिमा उनमें शामिल नहीं हो सकती। इसलिए यह रो रहा है।
  
यह सुनते ही तिलक महाराज की आँखों में आँसू आ गये। वे मकान में गये और बालक तथा प्रतिमा को गोद में उठा दोनो को जुलूस में शामिल कर लिया। गणपति - महोत्सव को व्यापक होते देख अंग्रेजी शासन के अधिकारी तिलमिला उठे। कुछ धर्म विरोधी भारतीयों ने भी विरोध शुरू किया। लंदन के टाइम्स पत्र ने सर वेलन्टाइन चिरोल नामक अपने पत्रकार प्रतिनिधि की एक रिपोर्ट प्रकाशित की। उसमें उसने 'लिखा कि बालगंगाधर तिलक ने अपने राजनीतिक आंदोलन के साथ धार्मिक जनता की सहानुभूति प्राप्त के उद्देश्य से भारत के परमप्रिय देव गणपति को माध्यम बनाकर गणपति - महोत्सव को व्यापक स्वरूप दिलाया है। अंग्रेजों की सरकार ने ' गणपति - महोत्सव ' की व्यापकता से चिढ़कर तिलक महाराज को ' अशांति का जन्मदाता ' तक कह डाला था। किंतु अंग्रेजों के विरोधी प्रचार का उल्टा ही प्रभाव पड़ा जिससे गणेशोत्सव और भी तेजी के साथ राष्ट्रीय जागरण का माध्य बनता गया।

महाराष्ट्र में गणपति - उत्सव वैसा ही होता जैसे सारे देश में और और बंगाल में दुर्गा पूजा का होता है। उत्सव के पूर्व घर की स्त्रियाँ अन्य समाज की महिलाओं के साथ हड़ताली तीज पर्व मनाती है। इसके पूर्व संध्या पर मराठी घरों में डाटा मनाया जाता है,जिसमे विभिन्न पकवान बना स्त्रियों को खिलाये जाते है। जिससे  अगले दिन वे स्त्रियां निर्जल उपवास हेतु तैयार हो जाय। हरतालिका के दिन उपवास के बाद रात में मोहल्ले की तीज उपवास वाली स्त्रियां बुलायी जाती है और रात भर कीर्तन - भजन,नृत्य आदि का कार्यक्रम चलता है। ल़डकियां आपस में ' फुगड़ी ' ( चकरी) खेलकर दिन के उपवास को सरलता के साथ व्यतीत करती है। बाद में सुबह उन्हे स्नान के बाद ' पिठल - भात ' खिलाया जाता है।

बेसन से बनी गाढ़ी कढ़ी को ' पिठल ' कहते है। बाद में मिठाई देकर हल्दी - रोली लगाने के बाद स्त्रियों को विदा किया जाता है।गणपति त्योहार सदियों से महाराष्ट्रीय समाज का व्यक्तिगत और पारिवारिक कार्यक्रम है। घर - घर गणेश जी बैठाते है,जो पारिवारिक परंपरानुसार 2 से 7 दिनों तक पूजन के बाद विसर्जित करते हैं।सुबह - शाम प्रत्येक घर पूजन,आरती होती है। उस समय सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची ... आरती गायी जाती है। ऐसा कोई घर बाकी नही है जहां आरती न हो। गणेश जी को मोदक के साथ पूजते हैं। उनका विशेष प्रसाद है - पंच खाद्य (गरी,मखाना,मिश्री,छुहारे और चिरौंजी)। इसी के साथ  अधिकांश घरों में लक्ष्मी स्वरूपा ककंडों की भी पूजा होती है जिसे ' खड़याची लक्ष्मी ' कहते है।गणेश स्थापना के अगले दिन घर की कोई सौभाग्यवती महिला नदी पर जाकर पानी में से सात किंवा नौ कंकड़ ले आती है,जिन्हें लक्ष्मी मानकर गणेश के साथ ही पूजा जाता है और अगले दिन पकवान का भोजन बनाकर ब्राह्मण,सौभाग्यवती महिला और कुमारिका को आमंत्रित करके खिलाया जाता है। अगले दिन भगवान गणेश के साथ - साथ कंकडरूपी लक्ष्मी का विधिवत पूजन - अर्चन के बाद घर का मुखिया सोला (सिल्क)- वस्त्र धारण करके हाथ में छोटी - सी घंटी बजाते हुए ' गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या ' (गणेश जी अगले वर्ष जल्दी आइये ) के उदघोष के साथ गंगाजी में विसर्जन करते हैं। घाट पर सभी चने की भिगोयी दाल में नमक,मिर्च मिलाकर और पंचखाद्य का प्रसाद बांटा जाता है। गणपति - लक्ष्मी - विसर्जन के बाद थाली में गंगाजी का जल और मिट्टी अथवा रेत लाकर घर में रखी जाती है।

तिलक महाराज के आव्हान पर गणपति - उत्सव सप्ताह पर्यन्त किये जाने लगे। बच्चों और बच्चियों द्वारा गले और कमर में केसरिया पट्टे बाँधकर दोनों हाथो से ' तिपरियाँ ' ( डांडिया की तरह आकर्षक रंगीन लकड़ियाँ) लेकर समवेत स्वर में गायन से भव्यता और बढ़ गयी। बच्चों के मुख से निकलने वाले जोश के पद्य ' हा ह्रदयि असो अभिमान हिंदूं चा हिंदुस्थान ' अथवा ' उठो अब हिंदुओं जागो नही है वक्त सोने का ' एक अलग ही समाँ बाँधते थे। शोभायात्राओं के दौरान बच्चों के गोफनृत्य जिसमे पद्य गाते हुए गोफ के आठ पट्टों को गूँथकर रस्सीनुमा बनाना और उसी तरह विपरीत रूप से चलकर उन्हे पुनः खोल देना अपने में एक आकर्षक कार्यक्रम होता है। यह परंपरा अभी तक कायम है।  
             
गणेश चतुर्थी का पर्व संपूर्ण भारत में पूजनीय है:- 
गजाननं भूतगणादिसेवितं 
जम्बूफलचारुभक्षणम् ।    
उमासुतं शोकविनाशकारकं 
नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम् 

गणेश जी हिंदुओं के प्रथम पूज्य देवता है। हिंदुओं के घर में चाहे जैसी पूजा या क्रियाकर्म हो,सर्वप्रथम गणेश जी का आवाहन और पूजन किया जाता है। शुभ कार्यों में गणेश की स्तुति का   महत्व है। ये विघ्नों को दूर करने वाले देवता है। इनका मुख हाथी का, उदर लंबा तथा शेष शरीर मनुष्य के समान है। इस दिन नक्तव्रत का विधान है। अतः भोजन सायंकाल करना चाहिए तथापि पूजा यथासंभव मध्यान्ह में ही करनी चाहिए:

पूजाव्रतेषु सर्वेषु मध्यान्ह व्यापिनी तिथिः।    
अर्थात सभी पूजा - व्रतों में मध्यान्हव्यापिनी तिथि लेनी चाहिए।      
           
मिट्टी या गोबर से गणेश की प्रतिमा बनाये या बनी हुई प्रतिमा का पूजन करे। गणेश जी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाये। मोदक और दुर्वा 6 की इस पूजा में विशेषता है।अतः पूजा के अवसर पर 21 दूर्वादल भी रखे तथा उनमें से 2-2 दूर्वा मंत्रों से क्रमशः चढ़ाये। पश्चात दसों नामों का एक साथ उच्चारण कर एक दूब चढ़ाये। इसी प्रकार 21 लड्डू भी गणेश पूजा में आवश्यक होते है। 21 लड्डू का भोग रखकर 5 लड्डू मूर्ति के पास चढ़ाये और 5 ब्राह्मण को दे दे एवं शेष प्रसाद रूप में परिवार के लोगों को बाँट दे। इस प्रकार पूजन की यह विधि चतुर्थी के दिन मध्यान्ह में करे। ब्राह्मण भोजन कराकर दक्षिणा दे और स्वयं भोजन करे।

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को  चंद्रदर्शन - निषेध  
यह चतुर्थी सिद्धविनायक चतुर्थी के नाम से जानी जाती है। इसमें किया गया दान,स्नान,उपवास और अर्चन गणेश जी की कृपा से    सौ गुना हो जाता है,परंतु इस चतुर्थी को चंद्रदर्शन का निषेध किया गया है। इस दिन चंद्रदर्शन से मिथ्या कलंक लगता है। अतः इस तिथि को चंद्रदर्शन न हो सावधानी रखनी चाहिए। यदि संयोगवश हो जाये तो इस दोष - शमन के लिये निम्न मंत्र का पाठ करे। 

सिंहः प्रसेनमवधीतिसंहो   
जाम्बवता हताः।  
सुकुमारक मा रोदीस्तव 
ह्योष स्यमंतक:।।  

और स्यमन्तकमणि का आख्यान सुनना चाहिए। जो निम्नानुसार है:-     
 द्वापरयुग में द्वारकापुरी में सत्राजित् नामक एक यदुवशी रहता था। वह सूर्य भगवान का परम भक्त था। उसकी भक्ति से प्रसन्न हो भगवान सूर्य ने स्यमंतक नाम की मणि दी, जो सूर्य के समान कांतिमान थी। वह  मणि रोज 8 भार सोना देती थी और उसके प्रभाव से सारे राष्ट्र में रोग,अनावृष्टि,सर्प,अग्नि,  चोर तथा दुर्भिक्ष का भय नहीं रहता था। एक दिन सत्राजित् उस मणि को धारण कर राजा उग्रसेन की सभा में आया,वह मणि की आभा से दूसरे सूर्य के समान दिखायी दे रहा था। इधर भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा थी कि यह दिव्य रत्न राजा उग्रसेन के पास रहता तो सारे राष्ट्र का कल्याण होता। जब यह बात सत्राजित् को मालूम हुई कि श्रीकृष्ण मेरी मणि लेना चाहते हैं। तो उसने वह मणि अपने भाई प्रसेन को दे दी। एक दिन प्रसेन उस मणि को गले में बाँध घोड़े पर बैठ वन में शिकार के लिये गया और एक सिंह द्वारा मारा गया।  
   
प्रसेन के न लौटने पर यादवों में चर्चा होने लगी कि श्रीकृष्ण इस मणि को लेना चाहते थे। अतः उन्होंने ही प्रसेन को मार मणि छुड़ा ली होगी। उधर वन में मुह में मणि दबाये सिंह को ऋक्ष राज जाम्बवान ने देखा तो उसे मारकर स्वयं मणि ले ली और ले जाकर बच्चे को खेलने के लिये दे दी, जिससे वह खेला करता था।      
  
इधर द्वारका में उठते लोकापवाद श्रीकृष्ण तक पहुँचे। वे राजा उग्रसेन से परामर्श कर कुछ साथियों को ले प्रसेन के घोड़े के पद चिन्हों को देखते हुए वन में पहुँचे। वहाँ उन्हें घोड़ा और प्रसेन को मृत पाया तथा उनके पास में सिंह के पंजों के निशान दिखे। उन चिन्हों को देखते हुए आगे जाने पर उन्हें सिंह भी मृत पड़ा मिला। वहाँ से ऋक्षराज जाम्बवान के पैरों के निशान देखते हुए वे लोग जाम्बवान की गुफा तक पहुँचे।    
     
श्रीकृष्ण ने कहा कि अब यह तो स्पष्ट हो चुका है कि घोड़े सहित प्रसेन सिंह द्वारा मारा गया है, परंतु सिंह से भी बलवान कोई है,जो इस गुफा में रहता है। मैं अपने पर लगे कलंक को मिटाने के लिये इस गुफा में प्रवेश करता हूँ और स्यमन्तक मणि लाने का प्रयास करता हूँ। यह कह श्रीकृष्ण उस गुफा में घुस गये। वहाँ उनका ऋक्षराज जाम्बवान से 21 दिनों तक घोर युद्ध हुआ। अंत में शिथिल अंगों वाले जाम्बवान ने भगवान को पहचान कर उनकी प्रार्थना करते हुए कहा - हे प्रभु! आप ही मेरे स्वामी श्रीराम है, द्वापर में आपने इस रूप में मुझे दर्शन दिया। आपको कोटि - कोटि प्रणाम है। नाथ! मैं अपनी इस कन्या जाम्बवती और यह मणि स्यमन्तक आपको देता हूँ, कृपया ग्रहणकर मुझे कृतार्थ करें तथा मेरे अज्ञान को क्षमा करे।  
     
जाम्बवान से पूजित हो श्रीकृष्ण स्यमन्तक मणि लेकर जाम्बवती के साथ द्वारका आये। वहाँ उनके साथ गये यादवगण बारह दिन बाद ही लौट आये थे। द्वारका में यह विश्वास हो गया कि श्रीकृष्ण गुफा में मारे गये, किंतु श्रीकृष्ण को आया देख संपूर्ण द्वारका में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी । श्रीकृष्ण ने सब यादवों से भरी हुई सभा में वह मणि सत्राजित् को दे दी। सत्राजित् ने भी प्रायश्चित स्वरूप अपनी पुत्री सत्य भामा का विवाह श्रीकृष्ण से  कर दिया।      स्यमन्तक मणि का आख्यान जो कोई पढ़ता या सुनता है,उसे भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चंद्रदर्शन के दोष से मुक्ति मिल जाती है।       

व. रि. शि.  
मदनलाल वर्मा 
ग्राम नागपचलाना पोस्ट इकलेरा (माताजी)  
तहसील टोंकखुर्द, जिला देवास (म. प्र.)

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