आज का पंचांग

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नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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जब ब्रज ने इंद्र नहीं, गोवर्धन की आराधना की

जब ब्रज ने इंद्र नहीं, गोवर्धन की आराधना की

"इंद्रोत्सव की परंपरा अब बंद होनी चाहिए बाबा! जब गोधन ही हमारी संपदा है और हमारी समस्त गायें गोवर्धन पर्वत पर ही चरतीं हैं, तो क्यों न हम इंद्र की नहीं बल्कि गोवर्धन की पूजा करें? ब्रज अब इंद्रोत्सव नहीं, गोपोत्सव मनाएगा।" मात्र सात वर्ष की ही आयु में यह बालक अपने पिता को ऐसा कहकर ब्रज में परिवर्तन ला देता है। भला उस कन्हैया की बात कौन नहीं सुनता और कौन नहीं मानता उसकी बात! 


नंद बाबा को समझाते श्री कृष्ण

नन्द की आज्ञा से नंदगांव गोपोत्सव के लिए सज्ज हुआ। गोवर्धन की तराई में उत्सव की व्यवस्था पूर्ण हुई। व्यवस्था को परखने वह गोवर्धन पर चढ़ता है। ऊपर से व्यवस्था को पूर्ण होते हुए भी अपूर्ण देखकर अपने बड़े भाई से पूछता है- "दाऊ! यदि कुछ अमंगल हुआ तो बृजवासी इक्कठे जाएंगे कहां?" 
"वहीं जाएंगे, जहां उनका चितचोर उन्हें लेकर जाएगा।"
वह अपनी बाएं हाथ की तर्जनी को देखकर मुस्कुराते हुए मुरली की एक तान भरता है। गोप-गोपियां और सारे मनुष्य ही नहीं.... मंगला, पिंगला, कालिंदी और श्यामा जैसे सहस्त्र गायें, पद्मगंध और पिशांगक्ष जैसे सहस्त्र बैल, मोरमुकुटधारी के असंख्य मोर, छोटे पादप से लेकर विशाल वृक्ष तक, पोखर-पुष्कर से लेकर यमुना तक सभी आनंदित हो उठते हैं। उसकी तान से उत्सव आरम्भ होता है।
उत्सव के कारण चारों तरफ चहल-पहल थी। सभी अपने-अपने घरों से मेला की ओर जाने लगे थे लेकिन माँ का वह लल्ला घर के आंगन में आराम से माखन खा रहा था।
"अब थोड़ी देर के लिए माखन का मोह त्याग भी दे लल्ला! खाता ही रहेगा क्या? जाएगा नहीं उत्सव में? तुम्हारे सखा सुबल और मधुमंगल भी तुम्हें दो बार पुकार कर जा चुके हैं। तुम्हारे ही कहने से तो तुम्हारे बाबा ने गोपोत्सव आरंभ किया है। अब शीघ्रता से वहां जाओ भी..…."


गोवर्धन जी की पूजा

"अद्भुत कहती हो मैया! पहले मेरी पीली धोती, गमछा, वैजयंती माला, पगड़ी और मोर पंख तो लाओ। तनिक अपनी लल्ला को तैयार तो कर दो। और हमेशा क्या सिखाती हो तुम कि 'कान्हा थाली में जूठा मत छोड़ना'...…. तो माखन को भी पूरा खा लेने दो न मैया!


ए माधवी! देख न बांके बिहारी को.... कितना सलोना लग रहा है। उसके श्याम शरीर को मैया यशोदा ने क्या सजाया है री! पीतांबरी पहनाई है उसे। पैरों में मंजीर, पीली त्रिकच्छ धोती, कमर पर गमछा, गमछे के चारों ओर छोटी-छोटी घंटियां और गमछे में खोंसी हुई बांसुरी को तो देख.…. क्या खोंसा है उसने अपने कमर पर! ऐसा लगा रहा है जैसे वही इस संसार की धुरी है और सीने में झूलती वैजयंती की माला, उसके कमलनयन, कानों पर लटकता कुंडल, मस्तक पर चमकता कस्तूरी तिलक, तिलक के ऊपर सजी हुई पगड़ी, पगड़ी के ऊपर मनोहारी मोर पंख और कनपटी के पीछे वो घुंघराले बालों का गुच्छा.….. अहा! देख न माधवी, देख न उसे! 

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बाके बिहारी कृष्ण कन्हैया

नहीं चित्रा! मै उसका मुख नहीं देख सकती। मां ने मुझे शपथ दिया है उसे न देखने का।
सचमुच क्या?


हां चित्रा! विवाह के पूर्व ही माँ ने कहा था कि- 'व्याह होकर नंदगांव जा रही हो। भूलकर भी उस श्यामसुंदर को कभी देखना मत अन्यथा उसी की होकर रह जाओगी।' माँ ने कहा है तो ठीक ही कहा होगा न चित्रा?


"वह तो मुझे नहीं पता माधवी और तुम्हें नहीं देखना है तो मत देख.....मुझे देख लेने दे उसे। मै इस स्वर्गिक सुख को नहीं छोड़ सकती।
वह दिन बीता, संध्या हुई। इंद्र कुपित हुए। क्रोधित इंद्र के आदेश से समवर्तक नाम के बादल ने ऐसी धारासार वर्षा की जिसे आज से पहले ब्रज ने कभी देखा नहीं था। हाहाकारी-प्रलयंकारी। 


"लगता है, लल्ला की बातों में आकर हमनें इंद्रदेव को अप्रसन्न कर दिया जी!" यह एक मां का वह मनोभाव था जिसे डर था कि लोग कहीं उसके पुत्र को दोषी न ठहरा दें।

"तुमको क्या लगता है यशोदा! कान्हा ने बिना कुछ सोचे-समझे इंद्रोत्सव को ना कहा होगा क्या? बाबा नन्द प्रश्न के उत्तर में ही प्रश्न पूछ लेते हैं। 


इंद्र ने क्रोधित होकर भारी वर्षा कराई

और अभी उन दोनों में बात चल ही रही होती है कि तभी एक स्वर लोगों के कानों को चीरता हुआ उन तक आ पहुंचता है।
सब चलो रे गोवर्धन के नीचे। नन्द के लाल ने कुछ किया है। गोवर्धन धरती छोड़कर उठ खड़ा हुआ है।'
"तुमने कुछ सुना यशोदा! लोग क्या कह रहे हैं? 
हाँ सुनी जी! अब हम भी चलते हैं गोवर्धन की ओर....
प्राण के भय से ब्रज के बाल-वृद्ध-वनिता समेत समस्त पशुधन गोवर्धन के नीचे आ जमा होते हैं। उस भीड़ में माधवी भी रहती है। भीड़ में माधवी ने सुना कि एक पत्थर पर खड़े होकर कन्हैया ने अपनी बाएं हाथ की तर्जनी से पर्वत को उठा रखा है।

एक दिन, दो दिन..... बीतते-बीतते पूरे सात दिन तक गोवर्धन को उठा हुआ देखकर माधवी का हृदय आश्चर्य से भर जाता है। शपथ की निष्ठा उसे अब खोखली लगने लगती है। अब वह गिरधर को जी भरकर देख लेना चाहती है।


अपनी ऊँगली से गोवर्धन पर्वत उठाये श्री कृष्ण

परमब्रह्म को छू लेना चाहती है, उनके चरणों में मस्तक नंवा लेना चाहती है। वह उस शपथ को कोसने लगती है जिसने उसे सात दिन में सात धनुष की दूरी भी नापने नहीं दिया। माधवी अब गिरधर के समीप जाने को अपना एक पग जैसे ही आगे भरती है, भीड़ उसे दो पग पीछे धकेल देती है।

वह गिरधर से पीछे छूटती चली जाती है। माधवी अब उस दिन को स्मरण करती है जब कन्हैया ने उसे चेताते हुए कहा था- "ठीक है सखी! जाओ.…..मत दिखाओ अपना चेहरा लेकिन याद रखना एक वह दिन भी आएगा जब तुम मुझे देखना चाहोगी और यह श्याम तुम्हें दिखाई नहीं देगा।"

माधवी पश्चाताप में रो पड़ती है लेकिन एक पग आगे फ़िर दो पग पीछे होते हुए भी वह अपना संघर्ष जारी रखती है। इस संघर्ष में फ़िर वह समय भी आता है जब वह धरती पर गिर पड़ती है। धरातल से उसे सिर्फ़ प्रभु के चरण दिखते हैं, कृष्ण का मुख वह अब भी देख ही नहीं पाती। माधवी श्रीचरणों को प्रणाम करती है।

युग बीत जाता है। एक युग के बाद माधवी नागौर के मेड़ता में रत्नसिंह की पुत्री मीरा बनकर गाती है- 'मीरा कहे प्रभु तुमरे दरस बिन लगत हिवड़ा में सूल।'


लेखक,
करुणा सागर पण्डा 
रायपुर (छत्तीसगढ़)

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