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नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

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बघेरा(केकड़ी) के मूर्ति शिल्प में विष्णु अवतार बलराम

बघेरा(केकड़ी) के मूर्ति शिल्प में विष्णु अवतार बलराम

भारतीय संस्कृति की अजस्त्रधरा का मूल मन्त्र है- एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति। सनातन दर्शन में त्रिमूर्ति (ब्रह्या,विष्णु, महेश)के अन्तर्गत भगवान विष्णु की गणना की जाती है। पुराणों में भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों का वर्णन मिलता है। अनेक धार्मिक ग्रन्थ एवं कथाओं में विष्णु के दशावतार का उल्लेख एवं कही- कही अवतारों की संख्या 24 भी उल्लेखित प्राप्य है |विष्णु के अवतारों की संख्या में विभिन्न भेद मिलते है। भगवान विष्णु के निम्न दशावतार प्राय:सर्व मान्य रहे - मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, रघुराम, कृष्ण, बलराम, कल्कि दृष्टव्य है।

अजमेर जिले का केकड़ी उपखण्ड का प्राचीन एवं पुरातात्विक दृष्टिकोण से धनी ग्राम बघेरा पुरातात्विक इतिहास में विशेष स्थान रखता है। यहाँ से प्राप्त अनेकानेक पुरातात्विक सामग्री एवं प्राचीन प्रतिमाएं यहाँ की प्राचीन एवं वृहद सांस्कृतिक विरासत की मूक गवाह है।प्रतिमा विज्ञान के अनुसार विष्णु के दशावतारों के मूर्ति विधान, लक्षणों में श्रीकृष्ण के भ्राता बलराम प्रतिमा का भी वर्णन करता है।


बघेरा से अवाप्त बलराम प्रतिमा -राजपूताना संग्रहालय अजमेर

बघेरा की बलराम प्रतिमाएं- 
केकड़ी से लगभग 19-20 कि.मी. पर स्थित प्राचीन ग्राम बघेरा से 11 वीं शताब्दी की नयनाभिराम बलराम मूर्ति राजपूताना संग्रहालय अजमेर में संरक्षित है। विवेच्य मूर्ति फलक त्रिभंग मूर्ति में उत्कीर्ण है। उनके दाहिने कर में हल और चक्र तथा बायें अधो कर कट्यावलम्बित है। शीश पर मुकुट एवं पंचसर्पफण का छत्र दर्शाया गया हैवे अति सुन्दर किरीट मुकुट,कानों में कुण्डल, ग्रीवा में हार, श्रीवत्स,केयूर,कंकण,मेखला, वनमाला एवं हाथों में आभूषण धारण है। विवेच्य मूर्ति आंशिक रूप से भग्न है, लेकिन सम्भावना है  भग्न कर में वारुणी पात्र शिल्पित रहा होगा। प्रदर्शित मूर्ति के चरणों में बांये ओर पुरुष का अंकन है।

ग्राम बघेरा में दाउजी के मन्दिर के नाम से प्रख्यात देवालय में भी बलराम जी सुन्दर प्रतिमा दर्शनीय है प्रतिमा में आदि शेष अवतार को हल,मूसल के साथ श्रृंगारित स्वरूप में शिल्पित किया गया है। प्रतिमा विज्ञान के अनुसार बलराम प्रतिमा लक्षण में-उन्हें तालकेतु (तालध्वजा)वक्ष में वनमाला से विभूषित,एक कर में सीर एवं दूसरे में मूसल धारण, चतुर्भुज, सौम्य वदन, नीलाम्बर- समावृत कहा गया है।


ग्राम बघेरा के देवालय में दाऊ जी प्रतिमा

हल षष्ठी विधान -
यह त्यौहार श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता दाऊ जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है | इस व्रती स्त्रियाँ गाय के दुग्ध एवं दधि का सेवन नही करती है। प्रात: काल व्रती शुद्धिकरण के पश्चात पृथ्वी को लीपकर (पीली मिटटी) एक छोटा तालाब निर्मित करती है, जिसमें झरबेरी,पलाश के वृक्ष की शाखा बांधकर बनाई गयी हरछठ को रोपकर पूजन-अर्चन करती है। पूजन में सप्त अनाज- चना, जौ, गेहूं, धान, अरहर, मक्का और मूंग अर्पित करने के पश्चात हरी कजरी होली की राख, होली में भुने चने और जौ की बालियाँ समर्पित कर कथा सुनती है |

राजस्थान में कहा जाता है की- सात दिन और नौ त्यौहार- हलषष्ठी के साथ राजस्थान में उबछट भी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। इस दिन उपवास रखा जाता है। सांयकाल स्नान के पश्चात बैठते नही है। देवदर्शन एवं कथा सुनने के साथ चन्द्रोदय होने पर अर्ध्य देकर पूजन किया जाता है तब व्रती पारणा करता है। इस दिन भोजन में चावल का सेवन वर्जित माना जाता है। इस व्रत को चन्दन षष्ठी व्रत भी कहा जाता है।


धाकड़ समाज द्वारा प्रतिष्ठित धरणीधर (संकर्षण, बलराम) प्रतिमा

केकड़ी क्षेत्र में धाकड़ समाज द्वारा हलछठ का त्यौहार बहुत हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है इस अवसर पर भगवान धरणीधर की शोभा यात्रा निकाली जाती है, धाकड़ समुदाय आदिशेष विष्णु अवतार धरणीधर को अपने इष्ट के रूप में मानते है। सर्व समाज में स्त्रियों द्वारा उबछट का पर्व मनाया जाता है। कुंवारी कन्याएं भी व्रत की पालना बेहद उत्साह के साथ करती है।

दार्शनिक दृष्टि से बलराम काल की संहार - कारिणी शक्ति के प्रतीक है। उन्हें पृथ्वी को धारण करने वाले आदिशेष का अवतार भी माना गया है।

लेख -
श्रीमती पुष्पा शर्मा

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