राजस्थान में प्रकृति से जुड़ा लोकोत्सव है- गाँव बारो
September 06, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार
नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

भारत का वर्तमान मानचित्र प्राचीन जम्बूद्वीप का एक हिस्सा है। देश ने सन् 1946 और 1947 ईस्वी में बँटवारे का दर्द झेला। इस दौरान पश्चिम और पूर्व पाकिस्तान के रूप में एक बड़ा भूभाग देश से अलग हो गया। भारतीय समाज के लिए अपने इतिहास और संघर्षों को याद रखना हमारा कर्तव्य है। फ्रांस के पत्रकार फ्रांस्वा गोतिए इस विषय पर इज़राइल का उदाहरण देते है, इज़राइल के लोगों ने अपने विस्थापन और अत्याचारों को कभी भुलाया नहीं। वहाँ माताओं और बहनों ने अपनी पीढ़ियों को हमेशा अपने इतिहास और जन्मभूमि की याद दिलाई। इसी स्मृति ने इज़राइल को आज एक शक्तिशाली देश बना दिया है।
भारत के दो भुजाओं के विभाजन की पीड़ा आज भी समाज में उपस्थित है। भारत की स्वतन्त्रता के इतिहास में अंग्रेजों से मुक्ति के साथ बँटवारे का गहरा दर्द भी शामिल है। सन् 1947 ईस्वी में 15 अगस्त को भारत अंग्रेजी राज से स्वतन्त्र हुआ। स्वतन्त्रता मिलने से ठीक पहले देश ने बँटवारे का संकट झेला। इस घटना ने लाखों परिवारों का जीवन सदा के लिए बदल दिया।
भारत सरकार ने सन् 2021 ईस्वी में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ मनाने की घोषणा की। यह दिन देश के बँटवारे के समय हुए अत्याचारों को याद करने का अवसर है। इस दिन से यह प्रेरणा मिलती है कि देश भविष्य में फिर कभी न टूटे और अखण्ड भारत का निर्माण हो।

रैडक्लिफ़ सीमा रेखा
देश का विभाजन अचानक नहीं हुआ। 3 जून 1947 की योजना के बाद देश को बाँटने की प्रक्रिया आरम्भ हुई। इसकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। सन् 1947 ईस्वी के जुलाई महीने में एक कानून पारित हुआ। इस कानून ने भारत और पाकिस्तान नाम के दो नए देश बनाने का मार्ग साफ किया।
ब्रिटिश सरकार ने पंजाब और बंगाल की सीमाएँ तय करने का काम रैडक्लिफ सीमा आयोग को सौंपा। आयोग ने अन्तिम सीमा रेखा का निर्णय 17 अगस्त 1947 को घोषित किया। उस समय तक देश स्वतन्त्र हो चुका था। इस बँटवारे ने उन इलाकों को भी बाँट दिया जहाँ लोग पीढ़ियों से एक साथ रहते थे। उन लोगों का जीवन और सोच एक समान थी। उनकी बोली, संगीत, खानपान, कहानियाँ और सामाजिक परम्पराएँ एक जैसी थीं। इस एक निर्णय ने उन सभी को बाँट दिया।
इतिहासकार बँटवारे के बाद हुए पलायन को मानव इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन मानते हैं। अलग अलग पुस्तकों में इन लोगों की संख्या अलग है। सामान्य अनुमान के अनुसार लगभग 1.5 करोड़ लोगों को अपनी जान बचाकर सीमा पार करनी पड़ी। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि विस्थापन का दर्द झेलने वाले लोगों की संख्या इससे भी अधिक थी। कितने लोग मारे गए, इसका कोई पक्का हिसाब नहीं है। उस अफरातफरी में लाखों लोगों की जान चली गई।

विभाजन के बाद बड़ी संख्या में विस्थापन
बँटवारे की कहानियाँ कई परिवारों में पीढ़ियों तक जिन्दा हैं। किसी के पास पुरानी हवेली की चाबी बची और हवेली पीछे छूट गई। किसी के पास जमीन के कागज रह गए और जमीन सीमा के उस पार चली गई। किसी के पास अपने गाँव का नाम और रास्तों की याद भर बची। लोगों की बातचीत और यादों को सहेजने वाली संस्थाओं ने ऐसे हजारों किस्से सुरक्षित किए हैं। ‘द 1947 पार्टिशन आर्काइव’ जैसी संस्थाओं के पास हजारों लोगों की बातचीत दर्ज है।
हिंसा के उस भयानक दौर में कई लोगों ने दूसरे समुदाय के पड़ोसियों को अपने घरों में छिपाया। उन लोगों ने एक दूसरे को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाया। उन्होंने बच्चों को बचाया और परिवारों को सीमा पार भेजने में मदद की। ये किस्से बताते हैं कि इतिहास के सबसे बुरे समय में भी मानवता बची रही।

महिलाओं और बच्चों की त्रासदी
बँटवारे की चर्चा महिलाओं की पीड़ा के बिना पूरी नहीं होती। बड़ी संख्या में महिलाओं को अपहरण, हिंसा, जबरन शादी, धर्म परिवर्तन और परिवार से बिछुड़ने जैसी अमानवीय स्थितियों का सामना करना पड़ा। किसी भी बड़े संकट में महिलाओं, बच्चों और कमजोर लोगों की सुरक्षा सरकार और समाज का सबसे बड़ा दायित्व होता है। बँटवारे के समय तत्कालीन व्यवस्था इस दायित्व को पूरा करने में पूरी तरह विफल रही।

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस
अपना घर और गाँव छोड़ने वाले परिवारों ने नए सिरे से अपना जीवन आरम्भ किया। उन लोगों ने शिविरों, अस्थायी बस्तियों और अनजान शहरों में रहते हुए छोटे मोटे काम धन्धे शुरू किए। उन्होंने पढ़ाई पर ध्यान दिया तथा खेती और उद्योग में नई शुरुआत की। इन लोगों ने उजड़े बाजारों को फिर से बसाया। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और देश के कई अन्य हिस्सों के विकास में इन लोगों की मेहनत साफ दिखाई देती है। उनके पास खोई हुई सम्पत्ति वापस पाने का कोई रास्ता नहीं था। उन्होंने अपनी मेहनत, हुनर, परिवार और उम्मीद को ही अपनी पूँजी बनाया।

स्मृतियों का संरक्षण
सन् 1947 के विभाजन ने हमारी साझी संस्कृति को पूरी तरह अलग नहीं कर सकी। आज भी पंजाब के लोकगीत, सिन्ध की यादें, बंगाल का साहित्य और भाषा जीवित हैं। सूफी और भक्ति परम्पराएँ, खानपान, कारीगरी और संस्कार यह बताते हैं कि संस्कृति राजनीतिक सीमाओं से बहुत बड़ी होती है।
जब समाज अपने इतिहास के प्रति सचेत रहता है, तभी वह अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकता है। आने वाली पीढ़ियों को यह समझना होगा कि अखंड भारत का निर्माण केवल राजनीतिक सीमाओं का विषय नहीं है, यह सांकृतिक मूल्यों को समाज में पुनः स्थापित करने का विषय है। यह लोगों के विचार और समाज के भीतर आपसी मेलजोल स्थापित करने का दिन है। अतीत के इस गहरे दर्द से सीख लेकर देश की एकता को निरन्तर मजबूत बनाए रखना ही उन लाखों विस्थापितों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
लेख:

ऋचा विशाल शर्मा,
रायपुर, छत्तीसगढ़
प्रमुख संदर्भ-
1. भारत सरकार, पत्र सूचना कार्यालय: 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने संबंधी घोषणा, 14 अगस्त 2021।
2. प्रधानमंत्री कार्यालय, भारत सरकार: विभाजन की स्मृति, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता पर आधिकारिक वक्तव्य।
3. द 1947 पार्टिशन आर्काइव, स्टैनफोर्ड डिजिटल प्रदर्शनी: विभाजन-प्रत्यक्षदर्शियों के मौखिक इतिहास एवं साक्षात्कार।
4. विभाजनकालीन लैंगिक हिंसा पर प्रकाशित ऐतिहासिक शोध, लॉ एंड हिस्ट्री रिव्यू, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस।
5. विभाजन, विस्थापन और जन-स्थानांतरण पर उपलब्ध मान्य ऐतिहासिक अध्ययनों एवं अभिलेखीय सामग्री का तुलनात्मक अध्ययन।
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