ब्रज के देवालयों में होली उत्सव
March 03, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार
नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल
पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व दो छवियों से मिलकर बना है। पहली छवि उभरती है वासुदेव स्वरूप की, जहाँ वे यदुकुल शिरोमणि हैं, दुष्टों का दमन करने वाले हैं, द्वारकाधीश हैं, गीता का ज्ञान देने वाले हैं और विश्वरूप हैं। इसी रूप का विस्तार प्राचीन ‘पांचरात्र’ वैष्णव आगम के व्यूह विचार में दिखाई देता है।
दूसरी छवि गोपालकृष्ण की, गोविन्द की और गोपीजनवल्लभ की है। इसके केन्द्र में ‘व्रज’ है, जो गायों के खिरक अथवा घुमन्तु गोपबस्ती की प्राचीन परम्परा भर नहीं है। यह श्रीकृष्ण की लीलाओं से पूरित एक सम्पूर्ण भावभूगोल है, जिसका बीज वैदिक है।

गोपीजनवल्लभ
वासुदेव और गोपाल श्रीकृष्ण के दो अलग-अलग स्वरूप नहीं हैं। ये एक ही पुरुषोत्तम के ऐश्वर्य और माधुर्य से भरे दो अनुभव हैं। कुरुक्षेत्र में वे अर्जुन के गुरु और विश्वरूप हैं, तो ब्रज में ग्वाल-बालों के सखा। द्वारका में राजाधिराज हैं, तो नन्दगाँव में माता यशोदा के लाल। एक रूप धर्म की स्थापना करता है, दूसरा प्रेम के द्वारा मनुष्य को अपने निकट बुलाता है।
‘व्रज’ शब्द स्वयं गति और गोचारण से जुड़ा हुआ है। वैदिक प्रयोगों में इसका सम्बन्ध गोसमूह, गोष्ठ, पशुओं के ठहरने के स्थान और उनके विचरण क्षेत्र से मिलता है। कालान्तर में यही व्रज मथुरा, गोकुल, नन्दगाँव, वृन्दावन, गोवर्धन और यमुना के तटों से जुड़ा एक विशिष्ट सांस्कृतिक भूगोल बन गया। श्रीकृष्ण की लीलाओं ने इस भूगोल को ऐसा भाव प्रदान किया कि ब्रज प्रेम और भक्ति का केंद्र बन गया। ऋग्वेद का प्रसिद्ध मन्त्र है-
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः।
अतो धर्माणि धारयन्।। १८
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे।
इन्द्रस्य युज्यः सखा।। १९।।
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः।
दिवीव चक्षुराततम्।। २०।।

श्रीकृष्ण गोकुल में
अर्थ है, “हे साधकों! भगवान् विष्णु के महान कार्यों को देखो। वे तीन पदों से समस्त लोकों को व्याप्त करते हैं। वे ही सब लोकों के गोपा अर्थात् रक्षक हैं। वे धर्म के व्रतों को धारण करते हैं और इन्द्र के सच्चे मित्र हैं। उनके परम पद को ज्ञानीजन उसी प्रकार देखते हैं, जैसे आकाश में सर्वत्र फैले हुए नेत्र को।”
इन मन्त्रों में विष्णु के तीन पद उनकी विश्वव्यापकता के प्रतीक हैं। वे पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक को व्याप्त करते हुए सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करते हैं। इसी विराट रूप में उन्हें ‘गोपा’ कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि विष्णु केवल किसी एक समुदाय अथवा भूभाग के रक्षक नहीं, सम्पूर्ण जगत् के पालनकर्ता हैं। सायणाचार्य इस पर टिप्पणी करते हैं-
“गोपा इति लोकानां रक्षकः विष्णुः।”
अर्थात् विष्णु ही सब लोकों के गोपालक, पालनहार और रक्षक हैं।
यहाँ ‘गोपा’ का अर्थ अत्यन्त व्यापक है-
गो = गौ, पृथ्वी, प्रजा, वाणी और प्रकाश
पा = पालन करने वाला अथवा रक्षक

श्री कृष्ण का गोपा’रूप
इसलिए गोपा वह है, जो सारी सृष्टि का संरक्षण करता है। वैदिक साहित्य में ‘गो’ शब्द का प्रयोग केवल गाय के अर्थ में नहीं हुआ। विभिन्न प्रसंगों में वह पृथ्वी, प्रकाश, वाणी, प्रजा और समृद्धि का भी संकेत करता है। इस दृष्टि से गोपा वह है, जो जीवन के इन सभी आधारों की रक्षा करता है। वेद में विष्णु विराट और विश्वव्यापी गोपा हैं।
वही विष्णु जब व्रज में प्रकट होते हैं, तब बालकृष्ण बनकर ग्वाल-बालों के साथ गायों को चराते हुए दिखाई देते हैं। महाकवि कालिदास इसीलिए कह उठते हैं, “गोपवेषस्य विष्णोः।” विष्णु का यह गोपवेष लोक के अधिक निकट ले आता है। जो परम तत्त्व समस्त लोकों का पालन करता है, वही ब्रज में गायों को बुलाता है, बछड़ों के पीछे भागता है और ग्वाल-बालों के साथ वन में भोजन करता है।
महाभारत, हरिवंश, विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण में कृष्ण के इस गोपाल स्वरूप का विस्तार मिलता है। भागवत में कृष्ण की गोचारण लीला केवल बालक्रीड़ा नहीं है। इसमें रक्षण, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य सभी एक साथ उपस्थित हैं। कालिय-दमन में वे यमुना और ब्रजवासियों को विष के भय से मुक्त करते हैं। वन में आग लग जाने से दावानल पान कर गायों और ग्वालों की रक्षा करते हैं। गोवर्धन पर्वत को उठा कर सम्पूर्ण ब्रज को इन्द्र के प्रकोप से बचाते हैं।
गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण
यहाँ वैदिक साहित्यों में उल्लेखित विष्णु का विश्व पालनकर्ता और रक्षक का भाव ब्रज में प्रत्यक्ष दिखाई देने लगता है। विष्णु अपने तीन पदों से लोकों को धारण करते हैं और ब्रज के कृष्ण अपनी छोटी उँगली पर गोवर्धन पर्वत धारण करके गायों, गोपों और समस्त ब्रजवासियों की रक्षा करते हैं। दोनों रूप अलग दिखाई देता है, परन्तु मूल तत्त्व पालन और संरक्षण का ही है।
गोपाल सहस्रनाम के पहले श्लोक में ही नाम आते हैं, श्रीगोपाल और महीपाल। श्रीगोपाल अर्थात् गौ तथा लक्ष्मी के पालक और महीपाल अर्थात् पृथ्वी की रक्षा करने वाले। यहाँ वे केवल सृष्टि-पालक नहीं हैं, गायों और गोपों के प्यारे गोपाल भी हैं।
‘गोविन्द’ नाम में भी यही व्यापकता है। वे गायों को आनन्द देने वाले हैं, पृथ्वी के रक्षक हैं और जीव की इन्द्रियों को अपने सौन्दर्य एवं वेणुनाद से आकर्षित करने वाले हैं। ब्रज में कृष्ण को उनके पद अथवा सामर्थ्य से अधिक सम्बन्धों के द्वारा जाना जाता है। वे नन्दनन्दन हैं, यशोदानन्दन हैं, दामोदर हैं, गोपीजनवल्लभ हैं और ग्वाल-बालों के प्रिय सखा हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं-
“गोपालः प्रजापालकः।”
अर्थात् गोपाल केवल गायों का नहीं, पूरी प्रजा का पालन करने वाले हैं।

गोपाल रूप में श्रीकृष्ण
वेद में जो विष्णु गोपा कहलाए, वही ब्रज में कृष्ण रूप में अवतरित होकर गोपाल बने। वैदिक गोपा और श्रीमद्भागवत महापुराण का गोपाल एक ही परमसत्य के दो रूप हैं। वेदों में उल्लेखित गोपा विराट और विश्वव्यापी रक्षक है। भागवत का गोपाल सखा, मधुर और सबके हृदय में बसने वाला है।
वेद में मनुष्य विष्णु के परम पद को ऊपर दृष्टि उठाकर देखता है। ब्रज में माता यशोदा उसी परम तत्त्व को अपनी गोद में उठाती हैं। वेद में ऋषि उनके विराट कर्मों का दर्शन करते हैं, जबकि ब्रज में ग्वाल-बाल उनके कन्धों पर चढ़ते हैं, उनके साथ खेलते हैं और उन्हें अपना सखा मानते हैं। ईश्वर का ऐश्वर्य समाप्त नहीं होता, किन्तु प्रेम के कारण वह सहज और सुलभ हो जाता है।

यशोदा और गोपालकृष्ण
भागवत की इसी भावधारा को निम्बार्काचार्य, वल्लभाचार्य और चैतन्य महाप्रभु जैसी आचार्य परम्पराओं ने आगे बढ़ाया। सूरदास ने कृष्ण के बाल और वात्सल्य स्वरूप को जन-जन तक पहुँचाया, तो रसखान ने ब्रज, गोचारण, करील के कुंजों और गोवर्धन में उसी परम आनन्द का अनुभव किया। इस प्रकार वैदिक गोपा का तत्त्व पुराण, दर्शन, काव्य, संगीत और लोकपरम्परा में निरन्तर प्रवाहित होता रहा। वेदों में कहा गया है “विष्णु सबके रक्षक हैं।” भागवत में “कृष्ण सबके सखा हैं, माता यशोदा के लाल हैं, नन्दनन्दन हैं और गोपियों के प्रियवर हैं।”
वेद में जो विराट के प्रति श्रद्धा है, वही भागवत में प्रेम और माधुर्य बन जाती है। ब्रजभाव ने वैदिक विष्णु को बदला नहीं, बल्कि उनके पालनकर्ता स्वरूप को प्रेम की भाषा में अनुभव किया। इसी कारण गोपालकृष्ण में वैदिक तत्त्व की विराटता और ब्रज के लोकजीवन की आत्मीयता एक साथ दिखाई देती है।
लेख:
श्री लक्ष्मीनारायण तिवारी
सचिव, ब्रज संस्कृति शोध संस्थान
वृन्दावन
श्री कृष्ण का वैदिक स्वरूप
September 03, 2026